कमरे में हल्की-सी पीली रोशनी जल रही थी।
दीवारों पर पुराने पोस्टर टंगे थे और खिड़की के बाहर अंधेरे में कहीं-कहीं मवेशियों की घंटियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
कमरे में एक कोने में बैठा विजय बोतल से शराब का घूंट भरता है और सामने चारपाई पर बैठे अजय सिंह को घूरता है।
विजय ने लंबी सांस ली।
विजय –
"आज यहां आए हमें पूरा एक महीना हो गया अजय…
सच कहूं तो तूने मुझे ऐश-आराम की जिंदगी से उठाकर यहां चपरासी बना दिया है।"
वो खिड़की की तरफ देखता है।
"चारों तरफ बस भैंस… गाय… ऊंट… और उनके गोश्त की बदबू।
यार… कैसी लाइफ बना दी है तूने मेरी।"
वो फिर से बोतल से एक घूंट लेता है और मुंह बनाता है।
विजय –
"अपने भारत में 5G आ चुका है…
और यहां देख… 3G से काम चलाना पड़ रहा है… वो भी कभी-कभी।"
फोन को हवा में हिलाते हुए।
"और कसम से… यहां की शराब में भी कोई मजा नहीं है।"
अजय सिंह उसे देखते हुए मुस्कुरा देता है।
अजय सिंह (हल्की हंसी के साथ) –
"हा हा… मुझे पता है यहां किस चीज़ में तुझे मजा आ सकता है…"
वो आंख मारता है।
"वो… बुरखे वाली में।"
विजय उसे घूरता है और फिर दोनों हल्का-सा हंस पड़ते हैं।
अजय सिंह –
"और वैसे भी… इस मिशन पर आने से तुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा।"
विजय सिर खुजाते हुए बोलता है।
विजय –
"सीखने के लिए… क्या यही जगह मिली थी भाई?"
वो उंगलियों पर गिनाने लगता है।
"आसाम… मिजोरम… झारखंड… नागालैंड…
इतने ऑपरेशन किए हमने।
कम सीखने को मिला क्या वहां?"
वो कुछ पल चुप रहता है।
नशा अब उसके सिर पर चढ़ने लगा था।
विजय (थोड़ा ऊंची आवाज में) –
"इससे अच्छा होता कि हम सीधी एयर स्ट्राइक कर देते…
एक ही बार में पूरा खेल खत्म।"
वो कमरे की दीवार पर मुक्का मारता है।
"कम से कम यहां आकर इन जानवरों की बदबू तो नहीं सहनी पड़ती।"
अजय सिंह का चेहरा अब थोड़ा गंभीर हो गया।
अजय सिंह –
"तुम्हारी बात गलत नहीं है विजय…"
वो धीरे-धीरे बोलता है।
"लेकिन ऐसा करने से… बहुत सारे बेकसूर लोग भी मारे जाते।"
वो मेज पर रखे नक्शे की तरफ इशारा करता है।
"तुम जानते हो… ये लोग आम जनता को अपनी ढाल बनाते हैं।
अगर हमने एयर स्ट्राइक की…"
वो नक्शे पर उंगली घुमाता है।
"तो इसका सीधा असर जम्मू-कश्मीर और पीओके के उन इलाकों पर पड़ेगा…
जहां के लोग आज भी भारत से जुड़ना चाहते हैं।"
विजय कुछ पल चुप रहता है।
फिर बोतल नीचे रखते हुए बोलता है।
विजय –
"लेकिन गलती भी तो उनकी है ना…"
वो गुस्से से कहता है।
"क्यों अपने घरों में इन आतंकवादियों को पनाह देते हैं?
ऐसे लोगों का मरना ही अच्छा है।"
अजय सिंह उसकी आंखों में देखते हुए शांत आवाज में बोलता है।
अजय सिंह –
"ये मत भूलो विजय…
वो भी कभी भारत के नागरिक थे…"
वो धीरे से जोड़ता है।
"और दिल से… आज भी हैं।"
कमरे में कुछ पल सन्नाटा छा जाता है।
फिर अजय सिंह खड़ा होता है और खिड़की से बाहर अंधेरे को देखने लगता है।
अजय सिंह –
"हमें मिशन मिला है…
आतंकवादियों को खत्म करने का।"
वो मुड़कर विजय की तरफ देखता है।
"मासूम लोगों को नहीं।"
विजय सिर हिलाता है।
फिर अचानक हंस पड़ता है।
विजय –
"तेरी बात सही है भाई…"
वो मजाकिया अंदाज में कहता है।
"लेकिन अगर इसी तरह मिशन चलता रहा ना…
तो हम यहीं बूढ़े हो जाएंगे।"
वो हाथ फैलाकर बोलता है।
"और फिर मजबूरी में… यहीं निकाह करना पड़ेगा…
और दस-बीस बच्चे भी पैदा करने पड़ेंगे।"
अजय सिंह जोर से हंस पड़ता है।
अजय सिंह –
"मेरे पास एक प्लान है।"
विजय का नशा थोड़ा उतर जाता है।
वो तुरंत सीधा बैठ जाता है।
विजय –
"क्या प्लान?"
"जल्दी बता।"
अजय सिंह कुर्सी पर बैठते हुए धीरे-धीरे बोलता है।
अजय सिंह –
"जिस तरह हमने नूर जहां का दिल जीता है…"
वो मुस्कुराता है।
"ठीक उसी तरह हमें उसके अब्बू और उसके भाई का दिल जीतना होगा।"
विजय समझने की कोशिश करता है।
अजय सिंह –
"एक बार अगर हम उनके घर के अंदर घुस गए…"
उसकी आवाज ठंडी हो जाती है।
"तो फिर… एक-एक करके…
यहीं पाकिस्तान की जमीन में उनकी कब्र खोदेंगे।"
वो हल्का-सा मुस्कुराता है।
"और दफन करके वापस लौटेंगे।"
विजय हंसता है।
विजय –
"मतलब… अभी तक सिर्फ दो की कब्र खोदी है…?"
अजय सिर हिलाता है।
अजय सिंह –
"और बहुत बाकी हैं।"
वो मेज पर पड़े अखबार की तरफ इशारा करता है।
"वैसे भी… न्यूज चैनलों पर तहलका मचा हुआ है।"
विजय अचानक चौकता है।
विजय –
"रुको…"
"तुम्हारे कहने का मतलब है…
हमें नूर जहां के अब्बू और भाई का दिल जीतने के लिए फिर से…"
वो हंसते हुए कहता है।
"वही होटल वाला कांड करना पड़ेगा?"
वो हाथ जोड़ लेता है।
"ना भाई… ना।"
अजय हंसते हुए सिर हिलाता है।
अजय सिंह –
"नहीं यार… इस बार कुछ अलग करेंगे।"
विजय अचानक सोच में पड़ जाता है।
फिर उसकी आंखें चमक उठती हैं।
विजय –
"मेरे पास भी एक प्लान है।"
अजय उत्सुकता से देखता है।
अजय सिंह –
"सुन रहा हूं।"
विजय धीरे-धीरे बोलता है।
विजय –
"कुछ दिनों बाद यहां एक बड़ा जलसा होने वाला है।"
वो मेज पर उंगली से गोल घुमाते हुए कहता है।
"उसमें इनके बड़े-बड़े आका आएंगे…
और कई दूसरे गीदड़ भी।"
वो मुस्कुराता है।
"क्यों ना… उसी जलसे में खेल खेला जाए?"
अजय सिंह कुछ पल सोचता है।
फिर उसके चेहरे पर खतरनाक मुस्कान आ जाती है।
अजय सिंह –
"आइडिया बुरा नहीं है।"
वो धीरे से कहता है।
"लेकिन उससे पहले…"
वो अपनी जैकेट उठाता है।
"हमें एक और को जन्नत का रास्ता दिखाना है।"
वो विजय की तरफ देखता है।
अजय सिंह –
"तो… तैयार है?"
विजय खड़ा हो जाता है।
उसकी आंखों में अब नशे की जगह चमक थी।
विजय –
"क्यों नहीं।"
वो अपनी बंदूक उठाता है।
"चलो…"
वो मुस्कुराता है।
"टीवी चैनलों के लिए एक और सनसनीखेज खबर तैयार करते हैं।"
अजय सिंह दरवाजा खोलता है।
दोनों एक साथ हंसते हैं।
और फिर…
अंधेरे में गायब हो जाते हैं।
अपने अगले मिशन की तरफ।
लेखक भगवत सिंह नरूका ✍️ ✍️