A dream rising from the ashes in Hindi Motivational Stories by Ayush Kumar books and stories PDF | राख से उठता हुआ सपना

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राख से उठता हुआ सपना

राख से उठता हुआ सपना

मैं जला था उस दिन,
जब हालातों ने मेरे घर का पता पूछा था,
और किस्मत ने खामोशी से
दरवाज़े पर ताला लगा दिया था।
चारों तरफ धुआँ था,
लोगों की आँखों में अफ़सोस
और मेरी हथेलियों में
कुछ अधजले ख़्वाब।

कहते हैं —
राख में कुछ नहीं बचता,
पर उन्होंने शायद
उम्मीद को जलते नहीं देखा।

मेरे सपनों की चिंगारी
अब भी वहीं थी,
ठंडी ज़रूर पड़ी थी,
पर मरी नहीं थी।

मैंने उस राख को उठाया,
माथे पर लगा लिया,
जैसे कोई योद्धा
अपने ज़ख्मों को छुपाता नहीं,
उन्हें अपनी ताक़त बना लेता है।

लोग हँसते रहे,
कहते रहे —
“अब क्या बचा है तेरे पास?”
मैं मुस्कुराता रहा,
क्योंकि मुझे पता था
राख उड़ती नहीं,
उड़ान का इशारा करती है।

मेरी रातें लंबी हो गई थीं,
नींद मुझसे दूर रहती थी,
पर सपने अब भी आते थे —
बिना दरवाज़ा खटखटाए,
बिना इजाज़त लिए।

मैंने ठोकरों को
सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया,
और दर्द को
अपनी कविता बना लिया।
जो जल चुका था
उसी की रोशनी में
मैंने नया रास्ता देखा।

अब डर नहीं लगता आग से,
मैंने खुद को जलते देखा है,
अब डर नहीं लगता हार से,
मैंने खुद को संभलते देखा है।

वक़्त ने जब पूछा —
“तू फिर खड़ा कैसे हुआ?”
मैंने धीरे से कहा —
“मैं गिरा ही कब था,
बस थोड़ी देर के लिए
खुद को खोजने बैठ गया था।”

मेरी खामोशी में अब शोर है,
मेरी आँखों में अब
सिर्फ सपने नहीं,
पूरा आसमान है।

जो राख समझकर छोड़ गए थे,
आज वही लोग पूछते हैं —
“तेरी उड़ान का राज़ क्या है?”
मैं हँस देता हूँ,
क्योंकि उन्हें कैसे बताऊँ —
मैंने हार को हराकर नहीं,
उसे अपनाकर जीता है।

अब जब भी आईना देखता हूँ,
एक नई कहानी दिखती है,
एक ऐसा इंसान
जो टूटा भी,
बिखरा भी,
जला भी,
फिर भी बचा रहा।

राख ने मुझे मिटाया नहीं,
उसने मुझे गढ़ा है,
मेरी हर हार ने
मुझे थोड़ा और बड़ा किया है।

अब मेरी मंज़िल दूर नहीं,
पर सफर से मोहब्बत हो गई है,
अब जीत ज़रूरी नहीं,
खुद से मिलने की आदत हो गई है।

मैं वो सपना हूँ
जो जलकर भी जिंदा है,
मैं वो उम्मीद हूँ
जो हर बार गिरकर भी खड़ी है।

और हाँ —
अब अगर फिर आग लगेगी,
तो डरूँगा नहीं,
क्योंकि मुझे पता है
राख से उठना
मेरी फितरत बन चुका है] 

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