मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है—यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। समाज में रहते हुए ही मनुष्य अपने अस्तित्व को अर्थ देता है, संबंधों को आकार देता है और भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। इस अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है—कला। साहित्य, संगीत और नाट्य—ये केवल रचनात्मक विधाएँ नहीं, बल्कि मनुष्यता के संरक्षण और संवर्धन के साधन हैं।
कला हमें भीतर से परिष्कृत करती है। वह हमें संवेदनशील बनाती है, जोड़ती है, और हमारी सामूहिक चेतना को जीवित रखती है। जब हम कविता पढ़ते हैं, संगीत सुनते हैं या रंगमंच पर किसी पात्र को जीवंत होते देखते हैं, तो वस्तुतः हम स्वयं को ही नए रूप में पहचान रहे होते हैं।
मेरे जीवन की यात्रा भी इसी कला और संवेदना से अनुप्राणित रही है। गया मेरी जन्मभूमि है—वह धरती जहाँ मैंने प्रथम सांस ली, जहाँ मेरे संस्कारों की नींव पड़ी। वहीं दिल्ली मेरी कर्मभूमि है—जहाँ मेरे सपनों को आकार मिला, जहाँ संघर्षों ने मुझे मांजा और अवसरों ने मुझे दिशा दी।
माँ और मौसी के संबंध को लेकर बिहार में एक कहावत प्रचलित है—“मारे माय, जिलावे मौसी।” अर्थात् यदि माँ कभी डाँट दे, तो मौसी अपने स्नेह से मन को सहला देती है। गया मेरी माँ है—संस्कारों की कठोरता और अनुशासन का प्रतीक। दिल्ली मेरी मौसी है—जिसने अपने विस्तार और अपनत्व से मुझे संभाला, संबल दिया और आगे बढ़ने का अवसर दिया।
जब मैं गया से दिल्ली आया, तब इस महानगर ने मुझे केवल आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि अपने भावों से अपनाया। मैंने दिल्ली को केवल निवास-स्थान नहीं माना; उसे जिया है, महसूस किया है। उम्र और समय तो सभी जी लेते हैं, पर भाव और स्वभाव को जी लेना ही जीवन का वास्तविक आनंद है।
राजनीतिक और साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ नाट्य की दुनिया ने भी मुझे विशेष आकर्षित किया है।रंगमंच केवल अभिनय का मंच नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है। जब विश्व के प्रतिष्ठित रंगमंच आयोजनों में से एक भारत रंग महोत्सव का साक्षी बनने का अवसर मिलता है, तब यह अनुभव और भी गहरा हो जाता है। वहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ, भाषाएँ और विचार एक मंच पर मिलते हैं—और यह सिद्ध करते हैं कि कला की भाषा सार्वभौमिक होती है।
कला के विविध आयामों के माध्यम से हम केवल प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि पहले उसे अपने अंतस में जीते हैं। जब तक भाव भीतर न उतरे, तब तक उसकी अभिव्यक्ति प्रभावी नहीं हो सकती। शब्द, संगीत, अभिनय या मूर्त रूप—सभी अभिव्यक्तियाँ तभी सार्थक होती हैं, जब वे आत्मा से उपजी हों।
वास्तव में यह संसार स्वयं एक रंगमंच है। प्रत्येक व्यक्ति यहाँ एक कलाकार है—कोई अपने कर्म से, कोई अपने विचार से, कोई अपने संघर्ष से और कोई अपनी संवेदनशीलता से। जीवन की पटकथा समय लिखता है, परिस्थितियाँ निर्देशन करती हैं, और हम अपने-अपने पात्र को निभाते चलते हैं।
अंततः कला हमें यह सिखाती है कि मनुष्यता ही सबसे बड़ा रंग है—और वही रंग शाश्वत है। यदि हम उसे अपने भीतर जीवित रख सकें, तो हमारा हर कर्म, हर शब्द और हर अभिव्यक्ति एक सृजन बन जाती है।
संसार एक रंगमंच है—और हम सभी उसके कलाकार। यही जीवन का सौंदर्य है, यही उसका सत्य।