मेरे निर्जीव शरीर को श्मशान में अग्नि स्थल पर रख दिया गया और मेरे निर्जीव शरीर के नीचे ऊपर, बराबर में लकड़ियों को ऐसे लगाने लगे, जैसे ईंटों की दीवार बना रहे हो, मैं चाहकर भी अपने चारों तरफ लगी हुई लकड़ियां हटा न सका। मेरी रूह बराबर में खड़ी सारा दृश्य अपनी आँखों से देखती रही।
मैंने देखा कि मेरा एकमात्र बेटा आंसू बहा रहा है, बाकी सब आपस की बातें कर रहे हैं, कोई कहीं शादी में जाने की बात कर रहे हैं तो कोई अपने बिजनेस की बातें कर रहे हैं।
फिर पंडित जी ने मेरे पुत्र को आवाज दी, और एक जलती हुई मशाल मेरे पुत्र के हाथ में दे दी, मेरे पुत्र ने मेरे निर्जीव शरीर के चारों तरफ लगी हुई लकड़ियों में आग लगा दी, मैं कुछ न कर सका केवल एक दर्शक बन कर देखने लगा, मैं अब तक समझ गया था कि मैं मर चुका हूं, धीरे धीरे मेरे साथ आये मेरे सभी दोस्त मेरे पुत्र के साथ साथ श्मशान से जाने लगे, मुझे आग की जबरदस्त तपिश सताने लगी, एक पल के लिए मैंने सोचा कि मैं भी अपने घर पर चलूँ लेकिन फिर सोचा कि मैं तो मर चुका हूं, अब घर जाने से क्या होगा, जिस पुत्र को मैंने अपने खून से सींच कर बड़ा किया वही मेरे मृत शरीर को जला कर चला गया, फिर सोचा कि सबकी साथ यही होता आया है फिर मैं क्यों दुःख मानू, वैसे भी मुझे जवान होने से आज तक दुःख ही तो मिले तो मिले है फिर आज क्या अलग हुआ है मेरे साथ, यह सोचते ही मेरा मन थोड़ा हलका हुआ और मैं एक अनजानी दिशा की ओर बढ़ने लगा। मुझे एक अजीब सा प्रकाश दिखाई देने लगा, न जाने मैं कितनी देर तक चला अचानक से मेरे सामने दो आकृति आ खड़ी हुई।
""आप कौन है,,,। मैंने किसी तरह से साहस जुटाते हुये उनसे पूछा।
""हम यम के दूत है और तुम्हे लेने आये है,,। उन दोनों में से एक ने कहा। और मैं उनके पीछे पीछे चलने लगा।
"" तुमने अपनी जिंदगी में कोई अच्छा काम किया है या नहीं,,,। दूसरे यमदूत ने पूछा
"" मैने अपनी जिंदगी में सभी काम अच्छे किये,,। मैंने बेखौफ अंदाज में कहा।
""तुमने क्या अच्छा काम किया, मेरी जानकारी के अनुसार तुम तो जिंदगी भर नास्तिक रहे, तुमने कभी भगवान को ही नहीं माना,,,। पहले वाले यमदूत ने कहा।
"" हाँ नहीं माना कभी भगवान को,,। मैने फिर से उसी अंदाज में जवाब दिया।
"", लेकिन क्यों नहीं माना कभी भगवान को,,।
"" जन्म होने के कुछ वर्ष बाद मेरे पिता जी चल बसे, जिस उम्र में मुझे खेलना चाहिए था उस उम्र में मैं रोजगार की चिंता में पड़ गया, जिससे प्यार किया उससे समाज ने शादी नहीं होने दी, जिससे शादी हुई उसने कभी मुझ से प्यार नहीं किया, किसी तरह से एक बेटा हुआ, उसने कभी मेरी बात नहीं मानी, फिर मैने उसकी शादी करा दी , बेटे की पत्नी भी ऐसी निकली कि उसने कोर्ट कचहरी में खींच लिया, मैं किस लिए मानू भगवान को, मेरी पूरी जिंदगी में कभी मेरे लिए कुछ भी अच्छा नहीं हुआ, पूरी जिंदगी मैं परेशान ही रहा,,। मैं बिना रूके कहता गया।"
""आज वही भगवान श्री आपका न्याय करेंगे,,।
""तो कोई बात नहीं, मैंने भले ही पूरी जिन्दगी भगवान को नहीं माना, लेकिन अपनी पूरी जिन्दगी में कभी किसी के साथ बुरा नहीं किया,,। और मैं बेखौफ अंदाज में उनकी साथ चलने लगा।।।।।