अध्याय 7 – अब मैं चुप नहीं हूँ
(दादा-दादी की लाडली का सफर)मैं वही लाडली हूँ,जिसे दादा-दादी ने हमेशा अपने प्यार में पाला,जिसके लिए हर मुस्कान, हर आशीर्वाददिल से निकला था।आज भी, जब मैं अपने बीते दिनों को याद करती हूँ,मुझे उनकी वो बातें याद आती हैं —“बेटी, दुनिया चाहे जैसी भी हो,तुम अपनी इज्ज़त और खुशी कभी मत खोना।”और यही सीख, यही प्यार,मेरे हर फैसले में,मेरी हर लड़ाई में,मेरी ताकत बनकर साथ है।दो शादियों के बादमैं यह समझ चुकी थीकि हर बार समझौता करनासमाधान नहीं होता…
अध्याय 7 – अब मैं चुप नहीं हूँ
दो शादियों के बाद
मैं यह समझ चुकी थी
कि हर बार समझौता करना
समाधान नहीं होता।
कभी-कभी समझौता करते-करते
इंसान खुद को ही खो देता है।
इस अध्याय तक आते-आते
मैं थकी हुई थी,
पर टूटी हुई नहीं।
धीरे-धीरे एक बात साफ होने लगी —
चुप रहना मेरी कमजोरी नहीं,
मेरी पसंद हो सकती है…
पर हर बार नहीं।
अब जहाँ मैं सही होती हूँ,
वहाँ मैं बोलती हूँ।
शोर मचाकर नहीं,
बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ।
मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी वजह
मेरा बेटा है।
उसके चेहरे पर आती मुस्कान
मुझे याद दिलाती है
कि मुझे सिर्फ जीना ही नहीं,
सही ढंग से जीना भी है।
मैं उसे सिखाती हूँ —
“बेटा, हर जगह ‘हाँ’ कहना ज़रूरी नहीं होता।
कभी-कभी ‘ना’ कहना
खुद की इज़्ज़त होती है।”
और मैं यह भी कहती हूँ —
“जहाँ तुम सही हो,
वहाँ तुम्हारी माँ
हमेशा तुम्हारे साथ खड़ी मिलेगी।”
अब भी डर है।
अब भी कुछ लोगों की नज़रों में
शक है।
फोन आता है तो सवाल उठते हैं,
बातें बनती हैं।
पर अब मैं हर बार
खुद को समझाती या समझाती नहीं फिरती।
क्योंकि
मैंने कुछ गलत नहीं किया।
मैं सिर्फ एक माँ हूँ
जो अपने बच्चे के लिए
और अपने लिए
बेहतर ज़िंदगी चाहती है।
अभी मेरी ज़िंदगी परफेक्ट नहीं है।
अभी प्यार, सम्मान और देखभाल
पूरी तरह नहीं मिले।
पर मैं जानती हूँ —
ज़िंदगी अभी बाकी है।
मैं इंतज़ार कर रही हूँ
एक ऐसी ज़िंदगी का
जहाँ मुझे सिर्फ सहा न जाए,
बल्कि समझा जाए।
एक ऐसे इंसान का
जो मुझे ही नहीं,
मेरे बेटे को भी
पूरे दिल से अपना सके।
और इस इंतज़ार में
मैं अकेली नहीं हूँ।
मेरा भरोसा
मेरे श्याम बाबा पर है।
वो जब भी देंगे,
सही समय पर देंगे।
तब तक
मैं खुद को मज़बूत बना रही हूँ,
खुद के लिए खड़ी हो रही हूँ।
क्योंकि यह कहानी
अभी खत्म नहीं हुई है।
मैं रुकी नहीं हूँ,
मैं सिर्फ अपनी ज़िंदगी के अगले मोड़ का इंतज़ार कर रही हूँ।
अंतिम टिप्पणी – यह अंत नहीं है
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
अभी मेरी ज़िंदगी का एक और अध्याय बाकी है।
मैं इंतज़ार कर रही हूँ —
उस प्यार का
जो सिर्फ शब्दों का नहीं,
एहसासों का हो।
उस ज़िंदगी का
जहाँ मुझे सिर्फ समझौता न करना पड़े,
बल्कि समझा जाए,
सम्मान दिया जाए,
और सच्ची देखभाल मिले।
जब वह दिन आएगा,
जब मेरी नई ज़िंदगी शुरू होगी,
तब यह कहानी
“भाग 2” में लिखी जाएगी।
और वह भाग
और भी ज़्यादा खूबसूरत होगा —
क्योंकि वह कहानी होगी
इंतज़ार के बाद मिले सुकून की,
और हार के बाद मिली जीत की।
अभी मैं रुकी नहीं हूँ।
मैं सिर्फ भरोसे के साथ इंतज़ार कर रही हूँ।
मुझे पूरा विश्वास है
अपने श्याम बाबा पर।
वो जब भी देंगे,
सबसे अच्छा देंगे,
और सही समय पर देंगे।
बस एक ही प्रार्थना है —
मेरी ज़िंदगी में
वह प्यार आए
जो मुझे और मेरे बेटे को
पूरे दिल से अपना सके।
यह अंत नहीं है,
यह सिर्फ इंतज़ार है।
भाग 2 के लिए —
थोड़ा सा और भरोसा।
प्यारे पाठकों,
मुझे उम्मीद है कि मेरी यह कहानी आपको महसूस हुई होगी।
आप सबको मेरी कहानी कैसी लगी,
कृपया अपनी राय जरूर दें।
आपके विचार मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं।