main dada dadi ki ladli, chapter- 6 in Hindi Biography by sapna books and stories PDF | मैं दादा-दादी की लाड़ली - 6

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मैं दादा-दादी की लाड़ली - 6

मैं दादा-दादी की लाडली – 6
दूसरी शादी — वही टूटा भरोसा
यह “मैं दादा-दादी की लाडली” की कहानी का छठा अध्याय है।
बचपन की मासूमियत और टूटे सपनों के बाद,
अब मेरी ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई थी
जहाँ मुझे अपने लिए नहीं,
बल्कि अपने बेटे के भविष्य के लिए फैसला लेना था।
पहली शादी ने मुझे भीतर तक तोड़ दिया था।
भरोसा जैसे कहीं पीछे छूट गया था।
मैंने सोचा था कि अब मेरी ज़िंदगी
सिर्फ मेरे बेटे और मेरी जिम्मेदारियों तक सीमित रहेगी।
लेकिन समाज को एक अकेली औरत
कभी पूरी नहीं लगती।
लोगों की नज़रें,
रिश्तेदारों की बातें,
और घरवालों की चिंता —
सब मिलकर एक ही बात दोहराने लगे।
“दूसरी शादी कर लो।”
“बच्चे को पिता का नाम मिल जाएगा।”
“इस बार लड़का अच्छा है।”
मैंने बहुत मना किया।
मैंने कहा मेरा दिल अब तैयार नहीं है।
मैंने कहा मैं डरती हूँ।
मैंने कहा कि भरोसा करना अब आसान नहीं।
लेकिन हर बार मुझे समझाया गया —
“हर इंसान एक जैसा नहीं होता।”
“तुम्हें आगे बढ़ना ही होगा।”
एक माँ के दिल के सामने
उसका अपना डर छोटा पड़ जाता है।
मैंने अपने लिए नहीं,
अपने बेटे के लिए
दूसरी शादी के लिए हाँ कह दी।
मुझे लगा शायद इस बार
मेरी कहानी बदल जाएगी।
शायद इस बार
दादा-दादी की लाडली की किस्मत
थोड़ी मेहरबान हो जाएगी।
पर मुझे नहीं पता था
कि यह फैसला
मेरे धैर्य की
एक और कठिन परीक्षा बनने वाला है।
दूसरी शादी…
नाम नया था,
उम्मीद नई थी,
लेकिन जल्द ही समझ आ गया —
कहानी फिर उसी टूटे भरोसे की है।


मेरी दूसरी शादी भी हुई।
मैंने बहुत मना किया था।
सच कहूँ तो मेरा मन नहीं, मेरा डर बोल रहा था।
पहली बार टूटने के बाद
मैं दोबारा उसी रास्ते पर चलना नहीं चाहती थी।
लेकिन मुझे समझाया गया —
“हर आदमी एक जैसा नहीं होता।”
“इस बार सब ठीक होगा।”
“तुम्हारे बेटे को बाप मिल जाएगा।”
एक माँ अपने बच्चे के सामने
अपना डर हार जाती है।
मैंने भी हार मान ली।
अपने लिए नहीं,
अपने बेटे के लिए।
मैं हाउस वाइफ थी।
मेरी अपनी कोई कमाई नहीं थी।
मेरी दुनिया बस मेरा घर और मेरा बच्चा था।
मैंने सोचा था —
अगर पति साथ देगा,
तो जिंदगी संभल जाएगी।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ आया
कि साथ सिर्फ नाम का है।
उन्हें पैसों की जरूरत हमेशा रहती थी।
घर खर्च से लेकर छोटी-बड़ी मांग तक —
जैसे हर चीज़ की जिम्मेदारी मेरी ही हो।
मैं कभी अपने मायके से मदद लेती,
कभी बचाए हुए पैसे निकालती,
कभी अपनी जरूरतें टाल देती।
जब पूछती —
“इतना पैसा कहाँ जा रहा है?”
तो जवाब नहीं,
गुस्सा मिलता था।
मेरी बातों को बहस बना दिया जाता।
मेरी चुप्पी को कमजोरी समझ लिया जाता।
मैं सम्मान के दो शब्दों के लिए तरसती रही।
किसी के यह पूछ लेने के लिए —
“तुम थक तो नहीं गई?”
लेकिन वहाँ संवेदना नहीं थी।
सिर्फ अपेक्षाएँ थीं।
मैं निभाती रही।
क्योंकि मुझे घर बचाना था।
मुझे अपने बेटे को टूटता हुआ परिवार नहीं दिखाना था।
पर सच्चाई यह थी —
घर पहले ही भीतर से खाली हो चुका था।
धीरे-धीरे मैंने समझ लिया —
सिर्फ पति कहलाने से कोई जीवनसाथी नहीं बन जाता।
और सिर्फ पिता कहलाने से
कोई जिम्मेदार नहीं हो जाता।
साथ तब होता है
जब दुख में कंधा मिले,
डर में हाथ थामने वाला हो,
और गलती में भी इज़्ज़त बनी रहे।
इस दूसरी शादी ने मुझे बहुत थका दिया।
लेकिन उसने मुझे जगा भी दिया।
अब मैं समझ चुकी हूँ —
जो व्यक्ति भावनाओं की कीमत नहीं समझता,
वह किसी का सहारा नहीं बन सकता।
मैं टूटी हूँ,
लेकिन अब अंधी नहीं हूँ।


Do baar shaadi hui,
par sukoon ek baar bhi nahi mila.
Haan, samajh zaroor mil