Spiritual Significance of Shivratri in Hindi Mythological Stories by Abhishek Chaturvedi books and stories PDF | महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व एवं चतु:प्रहर अभिषेक का फल

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महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व एवं चतु:प्रहर अभिषेक का फल

*महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व एवं चतु:प्रहर अभिषेक का फल* 

 _लेखक:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'_ 

महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का अत्यंत पावन और रहस्यमयी पर्व है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि साधना, तप, उपवास और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का दिव्य अवसर है। 

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को मनाया जाने वाला यह पर्व  लिंग रूप के प्राकट्य के रूप में मनाया जाता है। 

(कुछ लोग इसे शिव-शक्ति के विवाह से जोड़ते हैं जो शास्त्रीय प्रमाण के साथ सत्य नहीं है।)

 इस दिन शिवभक्त रात्रि जागरण, जप, ध्यान और विशेष रूप से चतु:प्रहर अभिषेक करते हैं, जिसका वर्णन शिवपुराण में विस्तार से मिलता है।

 महाशिवरात्रि का महत्व (शिवपुराण प्रमाण सहित)

शिवपुराण (विद्येश्वर संहिता) में कहा गया है—

माघकृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ जागरणं नरः।

शिवपूजां विशेषेण करोति स शिवप्रियः॥”

अर्थात:- जो व्यक्ति माघ (फाल्गुन) कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में जागरण कर भगवान शिव की पूजा करता है, वह शिव का अत्यंत प्रिय बन जाता है।

एक अन्य श्लोक में कहा गया है—

न स्नानेन न दानेन न व्रतेन न च क्रियाः।

यथा तु शिवरात्रौ तु पूजया तुष्टो महेश्वरः॥”

अर्थात:- जितना पुण्य स्नान, दान या अन्य व्रतों से नहीं मिलता, उससे कहीं अधिक फल शिवरात्रि की पूजा से मिलता है।

चतु:प्रहर अभिषेक का महत्व:—

महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक करने का विशेष विधान है।

शिवपुराण में कहा गया है कि जो भक्त चारों प्रहर में अलग-अलग द्रव्यों से शिवलिंग का अभिषेक करता है, उसे क्रमशः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रथम प्रहर अभिषेक (दूध से)

पहले प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक दूध से किया जाता है।

 फल:

सभी पापों का नाश होता है

शरीर और मन की शुद्धि होती है

जीवन में शांति और सुख आता है

शिवपुराण प्रमाण—

क्षीरेण स्नापयेद् देवं सर्वपापैः प्रमुच्यते।”

 द्वितीय प्रहर अभिषेक (दही से)

दूसरे प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक दही से किया जाता है।

 फल:

आयु, बल और स्वास्थ्य की वृद्धि

परिवार में समृद्धि

सौभाग्य की प्राप्ति

शिवपुराण में कहा गया है—

दध्ना स्नानं यः कुर्यात् आयुरारोग्यवर्धनम्।”

 तृतीय प्रहर अभिषेक (घृत से)

तीसरे प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक घी (घृत) से किया जाता है।

फल:

धन, वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति

बुद्धि और तेज की वृद्धि

जीवन में उन्नति

शिवपुराण प्रमाण—

घृतेन स्नापयेद् यस्तु धनधान्यसमृद्धिभाक्।”

 चतुर्थ प्रहर अभिषेक (शहद से)

चौथे और अंतिम प्रहर में शहद से अभिषेक किया जाता है।

 फल:

मधुर वाणी और आकर्षण

सभी मनोकामनाओं की पूर्ति

अंततः मोक्ष की प्राप्ति

शिवपुराण में वर्णन है—

मधुना स्नानमात्रेण मोक्षं लभते न संशयः।”

बिल्वपत्र और मंत्र का महत्व

शिवरात्रि में बिल्वपत्र का विशेष महत्व है।

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।

त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥”

एक बिल्वपत्र अर्पित करने से तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

साथ ही “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप अत्यंत फलदायी होता है।

महाशिवरात्रि केवल व्रत और पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और शिवत्व को प्राप्त करने का अवसर है। चतु:प्रहर अभिषेक के माध्यम से भक्त क्रमशः अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार और पापों को त्यागकर शिव के निकट पहुंचता है।

शिवपुराण के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से इस दिन उपवास, रात्रि जागरण और अभिषेक करता है, उसे भगवान शिव की कृपा से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और अंततः मोक्ष प्राप्त होता है।

महाशिवरात्रि का पावन व्रत एवं चतु:प्रहर अभिषेक का विस्तृत विधान (शिवपुराण प्रमाण सहित)

महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सर्वोत्तम अवसर है। इस रात्रि में उपवास, जागरण, जप और चतु:प्रहर अभिषेक का विशेष महत्व है। शिवपुराण में स्पष्ट कहा गया है कि इस रात्रि में चारों प्रहर में विधिपूर्वक अभिषेक करने वाला भक्त धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ प्राप्त करता है।

शिवपुराण में शिवरात्रि का महत्व:—

न स्नानेन न दानेन न व्रतेन न च क्रियाः।

यथा तु शिवरात्रौ तु पूजया तुष्टो महेश्वरः॥”

अर्थात् शिवरात्रि की पूजा से भगवान शिव जितने प्रसन्न होते हैं, उतने अन्य किसी साधन से नहीं होते।

 चतु:प्रहर अभिषेक का रहस्य:-

शिवपुराण में रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक करने का विधान बताया गया है। यह अभिषेक केवल बाह्य पूजा नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धि का प्रतीक है।

अब हम दूध, गन्ने का रस, घृत और कुशोदक (कुशा युक्त जल) के साथ चारों प्रहर का फल देखते हैं—

 प्रथम प्रहर — दूध से अभिषेक (क्षीराभिषेक)

पहले प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक दूध से किया जाता है।

 भावार्थ: दूध शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है।

 फल:

समस्त पापों का नाश

मन की शांति

जीवन में सौम्यता और पवित्रता

शिवपुराण प्रमाण—

क्षीरेण स्नापयेद् देवं सर्वपापैः प्रमुच्यते।”

 द्वितीय प्रहर — गन्ने के रस से अभिषेक (इक्षुरस)

दूसरे प्रहर में गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।

 भावार्थ: गन्ने का रस मधुरता और आनंद का प्रतीक है।

 फल:

जीवन में मधुरता और प्रेम की वृद्धि

धन और सुख की प्राप्ति

परिवार में सौहार्द

शास्त्रीय भाव—

इक्षुरस से अभिषेक करने से जीवन में कटुता समाप्त होकर मधुरता आती है और लक्ष्मी की कृपा होती है।

 तृतीय प्रहर — घृत से अभिषेक (घृताभिषेक)

तीसरे प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक घृत (घी) से किया जाता है।

भावार्थ: घृत तेज, ज्ञान और यज्ञ का प्रतीक है।

 फल:

बुद्धि और तेज की वृद्धि

धन, वैभव और यश

आध्यात्मिक उन्नति

शिवपुराण प्रमाण—

घृतेन स्नापयेद् यस्तु धनधान्यसमृद्धिभाक्।”

 चतुर्थ प्रहर — कुशोदक से अभिषेक (कुशा युक्त जल)

चौथे प्रहर में कुशा युक्त जल से अभिषेक किया जाता है।

 भावार्थ: कुशा पवित्रता और वैदिक यज्ञ का प्रतीक है।

 फल:

समस्त दोषों का शमन

पितृदोष और ऋणों से मुक्ति

अंततः मोक्ष की प्राप्ति

शास्त्रीय मान्यता—

कुशोदक से अभिषेक करने से पवित्रता की पराकाष्ठा होती है और आत्मा शुद्ध होकर शिवत्व की ओर अग्रसर होती है।

चारों प्रहर का समग्र फल

शिवपुराण में वर्णित है कि जो भक्त चारों प्रहर में विधिपूर्वक अभिषेक करता है—

“चतु:प्रहरपूजया लभते पुरुषार्थचतुष्टयम्।”

अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों की प्राप्ति होती है।

बिल्वपत्र और मंत्र का महत्व

शिवरात्रि में बिल्वपत्र अर्पण अत्यंत फलदायी है—

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्।

त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥”

साथ ही “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करने से शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

निष्कर्ष:—

महाशिवरात्रि की रात्रि में किया गया चतु:प्रहर अभिषेक केवल विधि नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि की एक साधना है।

दूध से पवित्रता, गन्ने के रस से मधुरता, घृत से तेज और कुशोदक से मोक्ष का मार्ग खुलता है।

जो भक्त श्रद्धा, भक्ति और संयम के साथ इस व्रत का पालन करता है, वह भगवान शिव की कृपा से जीवन के सभी कष्टों से मुक्त होकर अंततः शिवत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

 _लेखक/ खोजकर्ता :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'_