Ravindra Nath Tyagi: Satirical Column in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | रवीन्द्र नाथ त्यागी : व्यंग्य स्तंभ

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रवीन्द्र नाथ त्यागी : व्यंग्य स्तंभ

रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य परंपरा के आधार प्रतिनिधि 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

रवीन्द्रनाथ त्यागी हिंदी व्यंग्य साहित्य की उस गौरवशाली परंपरा के प्रतिनिधि लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य को केवल हास्य या चुटकुलेबाजी का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक आलोचना, आत्मपरीक्षण और सांस्कृतिक विमर्श का गम्भीर औजार बनाया। उनका व्यंग्य हँसाता कम है, चौंकाता ज्यादा है । वह पाठक को भीतर तक झकझोरता है और अपने ही समाज की विडंबनाओं के आईने में उसका चेहरा दिखाता है। त्यागी जी का व्यंग्य लेखन , विशुद्ध मनोरंजन के विरुद्ध एक विद्रोह है। वह मनोरंजन के बहाने व्यक्ति की सामाजिक और मानसिक जड़ताओं से, रूढ़ियों से, पाखंडों से और कभी-कभी स्वयं लेखक की ही आत्ममुग्धता से मुक्ति का मार्ग खोजते हैं ।

रवीन्द्रनाथ त्यागी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वे व्यंग्य को शब्दों की बाजीगरी नहीं मानते। उनके लिए व्यंग्य यथार्थ को देखने की, उसे समझने की और फिर उसे इस तरह से पाठक के सामने प्रस्तुत करने की एक दृष्टि है, कि वह मुस्कराए भी, लज्जित भी हो, और कहीं न कहीं अपने भीतर झाँकने के लिए विवश हो जाए। उनकी रचनाओं में कोई अतिरिक्त अलंकरण नहीं है, न ही बनावटी गढ़े गए हास्यप्रसंग हैं। वे घटनाओं और
पात्रों के माध्यम से सामाजिक स्थितियों की तह तक पहुँचते हैं। उनकी शैली में सहजता है, लेकिन वह सहजता एक लंबे अनुभव और गंभीर आत्मचिंतन से उपजी है।

त्यागी जी की रचनाओं में भाषा एक अलग ही जीवित पात्र की तरह व्यवहार करती है। वे शुद्ध साहित्यिक हिंदी का आग्रह नहीं रखते, न ही प्रचलित बाजारू भाषा की ओर झुकते हैं। उनकी भाषा वह लोक भाषा है जो गाँव , कस्बों और नगरों के बीच सामाजिक सरोकारों से जुड़ती है। वे आम बोलचाल के शब्दों का इस तरह से प्रयोग करते हैं कि वे विश्लेषण और व्यंग्य के माध्यम बन जाते हैं। 'मैं और मेरा समाज' या 'टंच माल' जैसी रचनाओं में हम देखते हैं कि एक ही शब्द या वाक्यांश कितनी बार कितने अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होकर पाठक को गहरे व्यंग्यबोध की स्थिति में पहुँचा देता है। यह शब्दों की नहीं, उनकी लेखकीय सोच की चतुराई है।

त्यागी जी के व्यंग्य की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता उनका आत्म-रूपांतरण है। वे अपने पात्रों में स्वयं को शामिल करते हैं। यानी वह 'मैं' जो लेखक का है, अक्सर उतना ही दोषी, उलझा हुआ और मजेदार होता है , जितना कि कोई दूसरा पात्र। यह ईमानदारी, यह आत्मव्यंग्य की क्षमता उन्हें विशेष बनाती है। वे अपने पाठकों पर ऊँगली नहीं उठाते, बल्कि खुद के जरिए उन्हें यह अनुभव कराते हैं कि समाज का हर हिस्सा, हर व्यक्ति किसी न किसी विडंबना का हिस्सा है, उनके हास्य की शुरुआत आत्म-स्वीकृति से ही होती है।

उनका व्यंग्य एक तरह से 'भीतर से बाहर' जाने वाली प्रक्रिया है। जहाँ आज के कई व्यंग्यकार समाज को बाहर से देखकर उस पर तंज कसते हैं, वहीं त्यागी जी का व्यंग्य समाज के भीतर उतर कर, उसके छोटे-छोटे अनुभवों को समेट कर उभरता है। वे डॉक्टर, प्रोफेसर, बाबू, नेता, लेखक. गृहणी, पंडित सबको अपने ही रंग में दिखाते हैं, लेकिन न तो किसी को खलनायक बनाते हैं, न ही किसी को देवता। उनका हास्य 'करुणा' से निकला है, उपहास से नहीं।

व्यंग्य में विचारशीलता का होना, और वह भी बिना बोझिल हुए, रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की रचनाशीलता की विशेष उपलब्धि है। उनके लेखों में विचार पाठक के ऊपर लादा नहीं जाता, बल्कि वह कहानी और संवाद के बीच से धीरे-धीरे रिसता है। पाठक को पता भी नहीं चलता और वह किसी गूढ़ सामाजिक सच्चाई से साक्षात्कार कर बैठता है। जैसे 'संपादक जी' या 'ठलुआ क्लब' जैसी रचनाएँ पढ़ते समय हम हँसते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर यह भी समझते हैं कि यह समाज कैसे धीरे-धीरे आत्म-मुग्धता और सुविधा-प्रियता के जाल में फंसता जा रहा है।

रवीन्द्रनाथ त्यागी का व्यंग्य एक तरह से समय का सामाजिक दस्तावेज है। उन्होंने अपने समय की नौकरशाही, साहित्यिक दुनिया, शिक्षा व्यवस्था, मध्यमवर्गीय नैतिकता और राजनीतिक पाखंड को बड़े ही प्रभावी तरीके से उजागर किया है। वे किसी वाद या प्रचार की भाषा नहीं बोलते, बल्कि उनकी लेखनी पाठक को इस स्थिति में खड़ा करती है, जहाँ वह हँसते-हँसते अपनी ही भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाने लगता है। यह शक्ति सामान्य व्यंग्यकारों में नहीं पाई जाती।

त्यागी जी की शैली में कथा और निबंध का ऐसा अद्भुत मेल मिलता है, जहाँ एक ओर अनुभवजन्य घटनाएँ पाठक को बांधती हैं. वहीं दूसरी ओर लेखक की टिप्पणी, कटाक्ष और मूल्यांकन उसे वैचारिक स्तर पर भी झकझोरते हैं। वे एक साथ कथाकार, निबंधकार और टीकाकार की भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस तरह से कि कोई भूमिका दूसरी पर भारी नहीं पड़ती। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि हम किसी साहित्यिक कथा का आनंद ले रहे हैं, लेकिन अगले ही पल एक गहरा व्यंग्य वाक्य हमें उस कल्पना से बाहर खींच कर सामाजिक यथार्थ के कठोर धरातल पर ले आता है।

त्यागी जी की रचनाओं में विसंगति पकड़ने की अद्भुत दृष्टि है। वे समाज की उस दरार को भी देख लेते हैं जो सामान्य दृष्टि से छिपी रहती है। फिर वह दरार चाहे भाषायी हो, नैतिक हो, या मानसिक। 'कहानी का संकट' जैसे लेखों में हम देख सकते हैं कि वे कैसे भाषा, शैली और कथ्य के कृत्रिमता की ओर संकेत करते हैं। उनका व्यंग्य साहित्यिक आत्ममुग्धता पर भी उतना ही प्रहार करता है जितना वह सामाजिक पाखंड पर करता है। यह संतुलन उन्हें एक संपूर्ण व्यंग्यकार बनाता है।

त्यागी जी की रचनाएँ समकालीन हैं, लेकिन उनकी दृष्टि कालातीत है। वे किसी विशेष घटना या व्यक्ति से बँधे नहीं है, बल्कि प्रवृत्तियों को पकड़ते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं जितनी अपने समय में थीं। वे न तो केवल 'क्लासिक' बन गए हैं, न ही 'समाचार'। वे उस मध्यधारा में हैं जहाँ साहित्य जीवन से संवाद करता है, जीवन पर टिप्पणी करता है और कभी-कभी उसकी दिशा भी बदलता है।

त्यागी जी के व्यंग्य में 'संवेदना' एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्त्व है। वे केवल हँसी नहीं पैदा करते, बल्कि उस हँसी के पीछे छिपे दर्द, असहायता, विडंबना और थकावट को भी महसूस कराते हैं। पाठक उनके लेखों को पढ़कर केवल 'हँसता' नहीं, बल्कि सोचने लगता है, कभी खुद के बारे में, कभी समाज के बारे में, और कभी-कभी लेखक के बारे में भी। उनका व्यंग्य कोई निर्णय नहीं सुनाता, बल्कि प्रश्न छोड़ता है। शायद यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वे व्यंग्य को समाधान नहीं, संवाद बनाते हैं।

आज के व्यंग्य साहित्य में जहाँ तीखापन और आक्रोश अधिक है, वहाँ रवीन्द्रनाथ त्यागी एक सधे हुए संतुलन की मिसाल हैं। उनका व्यंग्य न गाली है, न ताली । वह आइना है, साफ, खरा और कभी-कभी चुभता हुआ। वह हमें यह नहीं बताता कि हम गलत हैं, वह केवल इतना करता है कि हमें हमारी तस्वीर दिखा देता है और फिर छोड़ देता है कि हम खुद ही तय करें कि हमें बदलना है या नहीं। यह व्यंग्य की पराकाष्ठा है और रवीन्द्रनाथ त्यागी इस शिखर पर स्थिर और प्रतिष्ठित दिखाई देते हैं।

इस दृष्टि से देखें तो रवीन्द्रनाथ त्यागी केवल व्यंग्यकार नहीं हैं, वे हिंदी समाज के भीतर बैठे उस 'स्व' की आलोचना हैं जो कभी स्वयं पर हँसना नहीं जानता था। उन्होंने व्यंग्य को आत्म साक्षात्कार का माध्यम बनाया। वे हमारे समय के दर्पणकार हैं जिन्होंने हमें हमसे मिलवाया, और यह सबसे बड़ा साहित्यिक योगदान है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव