redness of the sun in Hindi Poems by DrAnamika books and stories PDF | सूरज की लाली

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सूरज की लाली


सूर्योदय की लालिमा, भर दे मन में आस।

तम का हर ले मौन में, जीवन का विश्वास॥
यदि आप चाहें तो मैं   

सूर्योदय का स्पर्श जब, छू ले सूना मन।
थकन उतर कर दूर हो, खिल उठे हर क्षण॥

सूर्योदय संग जागता, सोया हुआ विश्वास।
हर दिन देता सीख यह, मत छोड़ो प्रयास॥



उन्मुक्त गगन की लाली फैली है चहुँओर
क्षितिज में सूरज विराजमान हुआ प्राची की ओर


सूर्योदय की लालिमा, कहती मौन पुकार।
उठो, समय का मान रखो, मत खोओ अधिकार॥

सूर्योदय जब मुस्कुरा, नभ के खुले कपाट।
नव आशा के पंख लगें, बदले जीवन-घाट॥

सूर्योदय की पहली रौशनी, धोए मन का मेल।
बीते कल की छाया हटे, आगे बढ़े खेल॥

सूर्योदय का सत्य यह, अँधियारा क्षणिक।
धैर्य रखो पथ पर सदा, होगा उजियारा निश्चित॥
 
सूर्योदय की साँस में, छुपा नया संकल्प।
जो रुका था भय से कभी, आज वही सक्षम॥

सूर्योदय हर रोज कहे, हार नहीं स्वीकार।
टूटे सपने जोड़ कर, बन फिर से तैयार॥

सूर्योदय का रंग लिए, सपनों की हर डोर।
कहता है यह जीवन से, चलना है अब और॥


रंगों की परतें चढ़ने लगीं,

पाइन की शाखों के भीतर

रोशनी की नदियाँ बहने लगीं।


हवा ने ठंडे सुरों में

एक मीठा वाद्य बजाया,

जैसे प्रकृति ने खुद सुबह का

पहला भजन गाया।


दूर कहीं चरवाहा जागा,

घंटियों का गूँज उठी,

घाटी के नन्हे फूलों पर

धूप की उँगली फिसल पड़ी।


हर चोटी ने चमक ओढ़ ली,

हर खाई ने मुस्कान पाई,

सूरज बोला

“जहाँ ऊँचाइयाँ मुश्किल लगें,

वहीं उम्मीदें राह बनाती आई।” 

 


समुद्र का सूर्योदय


रात की लहरें थककर

किनारे पर सोई थीं,

चाँदनी की चादर ओढ़े

धीरे–धीरे डोल रही थीं।


तभी क्षितिज की नीली देहरी पर

एक सुनहरी साँस उभरी,

मानो आसमान ने अचानक

अपने होंठों पर लौ जगी धरी।


पहली किरण के स्पर्श से

पानी में चमक तैरने लगी,

जैसे किसी ने मोती की थाली

भोर के आगे फेर दी।


लहरें गुलाबी रौशनी में

गीतों-सी लहराईं,

और सीपियों के छोटे मुँह

सरगम-सी मुस्काईं।

दूर एक नाव के पालों पर

धूप ने रंग गाढ़े बुने,

जैसे उम्मीद की कोई चिट्ठी

जल-राह में रख दी सुने। 


“हर लहर लौटकर आती है,

हारें भी राह बनाती हैं।

सूर्योदय का सच यही है

नई कोशिशें जग जाती हैं।


सूरज ने बाहर आकर यूँ कहा—

“भारी बादल चाहे कितने हों,

उजाला अपना पथ ढूंढ लेता है;

और हर भीगते हुए पल के बाद

जीवन फिर से धूप चुन लेता है।”

बरसात के बाद का सूर्योदय

भीगी धरती की साँसों में
अभी भी ठंडी आँच थी,
पत्तों की गोद में पानी
मोती बनकर नाच रहा थी।

काले बादल धीरे–धीरे
आकाश से सरक रहे थे,
जैसे कोई भारी मन
हल्का होना सीख रहे थे।

तभी पूर्व दिशा की दरारों से
एक कोमल उजाला फूटा,
मानो बारिश की थकी कहानी में
नया अध्याय खुद-ब-खुद छूटा।

धूप की पतली सुनहरी धार
पानी में चित्र बनाने लगी,
गड्ढों की छोटी झीलों में
रंगों की नावें तैरने लगीं।

कंकालों-से सूखे पेड़ भी
अब चमक की चादर ओढ़े थे,
हर गली में भोर के कदम
शांत सुरों में गूँजे थे।


सूरज ने बाहर आकर यूँ कहा—
“भारी बादल चाहे कितने हों,
उजाला अपना पथ ढूंढ लेता है;
और हर भीगते हुए पल के बाद
जीवन फिर से धूप चुन लेता है।” गाँव का सूर्योदय

कच्ची पगडंडी के दोनों ओर
ओस की बूंदें थिरक रही थीं,
जैसे रात ने अपने आँसू
घास के आँचल पर रख दी थीं।

पूर्व दिशा की मिट्टी से
जब पहली किरणें झाँकीं,
माटी की महक में डूबी
सुबह ने आँखें आँकीं।

खलिहान के दरवाज़े पर
भैंसों की घंटियाँ जाग उठीं,
चूल्हे से उठती धुआँ-लकीरें
आकाश में गीत बुनने लगीं।

सरसों की पीली चादर पर
धूप ने उँगलियाँ फेरीं,
और खेतों में छिपी हवा
छेड़ चुकी  एक राग ढोने लगी है