लहू के आँसू और वो काली रात
आज अमावस्या की बेहद डरावनी और काली रात थी। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव के उस मोहल्ले पर इस अंधेरी रात का गहरा साया छाया हुआ था। बाहर सन्नाटा और अंधेरा था, लेकिन दीनानाथ के घर के अंदर का माहौल बाहर के अंधेरे से कहीं ज्यादा भयानक था। हॉल में टीवी तेज़ आवाज़ में चल रहा था। समाचार चैनल पर देश-दुनिया की खबरें गूंज रही थीं, लेकिन उन्हीं दीवारों के बीच एक 21 साल के युवक की सिसकियाँ उस शोर में दब कर रह गई थीं।
रुद्रांश ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था। उसके गाल पर पाँच उंगलियों के लाल निशान अभी ताज़ा थे। सामने उसकी सौतेली माँ, शीला, क्रोध में फनफना रही थी। उसकी आँखों में नफरत की ऐसी आग थी, मानो वह रुद्रांश को ज़िंदा जला देना चाहती हो।
"नाकारा! हरामखोर!" शीला की आवाज़ टीवी के शोर से ज्यादा तेज सुनाई दे रही थी"मैंने अपना पर्स मेज पर रखा था, पर्स में से पाँच सौ का नोट गायब है। तेरे सिवा और इस घर में कौन छू सकता है? घर में चोर तो केवल तू ही पैदा हुआ है!"
रुद्रांश ने कांपते हुए हाथ जोड़े, "माँ... विश्वास कीजिये, मैंने पैसे नहीं लिया। मैं तो कॉलेज से आते ही सीधे अपने कमरे में चला गया था..."
"झूठा कहीं का! ज़बान लड़ाता है?" शीला ने पास में पड़ा वाइपर उठाया और पूरी ताकत से रुद्रांश की पीठ पर मारा।
"आह!" रुद्रांश के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली। वह दर्द से कराह पड़ा। उसकी नज़र सोफे पर बैठे अपने पिता, दीनानाथ पर पड़ी। दीनानाथ के हाथ में रिमोट था। बेटे की चीख सुनकर उन्होंने उसकी तरफ देखा तक नहीं, बस टीवी की आवाज़ और तेज़ कर दी ताकि शोर-शराबा उनके मनोरंजन में खलल न डाले।
रुद्रांश की आँखों से आंसू बह निकले। यह शारीरिक चोट का दर्द नहीं था, यह उस अनदेखी का दर्द था जो उसके पिता उसे हर रोज़ देते थे। पाँच साल की उम्र में जब उसकी सगी माँ गुज़री थीं, तब से दीनानाथ ने मान लिया था कि रुद्रांश ही उनकी मौत का कारण है।
तभी कमरे से रुद्रांश का सौतेला भाई, रोहन और बहन, रिया बाहर आए। दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान थी। रोहन की जेब से वही पाँच सौ का नोट हल्का सा झांक रहा था, जिसे चुराने का आरोप रुद्रांश पर लगा था। वे दोनों जानते थे कि चोर कौन है, पर तमाशा देखने का मज़ा ही कुछ और था।
शीला ने रुद्रांश के बाल पकड़े और उसे घसीटते हुए मुख्य दरवाज़े की तरफ ले गई। "आज के बाद इस घर में कदम मत रखना। जा, मर जा कहीं जाकर! वैसे भी तेरे बाप को तेरी कोई ज़रूरत नहीं है।"
दरवाज़ा खुला और रुद्रांश को एक फटे हुए कचरे की थैली की तरह बाहर फेंक दिया गया। धड़ाम से दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही उस घर की रही-सही रोशनी भी रुद्रांश के लिए बुझ गई।
शून्य में भटकाव
बाहर कड़ाके की ठंड थी। रुद्रांश के बदन पर सिर्फ एक पुरानी, जगह-जगह से फटी हुई टी-शर्ट और पतलून थी। घुटने छिल गए थे और पीठ पर वाइपर की मार से नील पड़ गया था। वह लड़खड़ाता हुआ उठा। पेट में भूख की ऐंठन थी, क्योंकि उसे सुबह से खाना नहीं दिया गया था, और अब मन में जीने की इच्छा भी खत्म हो रही थी।
"क्यों हूँ मैं ज़िंदा?" वह बुदबुदाया। "पिता को नफरत है, माँ बची नहीं, और दुनिया के लिए मैं सिर्फ एक मज़ाक हूँ।"
उसके कदम अनजाने ही उस रास्ते पर मुड़ गए जो गांव के बाहर, पहाड़ पर स्थित पुराने शिव मंदिर की ओर जाता था। जब भी दुनिया का बोझ उसे तोड़ने लगता, वह उसी मंदिर की सीढ़ियों पर जाकर रो लेता था। आज भी वह वहीं जा रहा था, अपनी नियति से शिकायत करने।
पहाड़ का रास्ता पथरीला और सुनसान था। झाड़ियाँ उसके पैरों से टकरा रही थीं, लेकिन शारीरिक दर्द उसके दिल के दर्द के आगे कुछ भी नहीं था। वह मंदिर पहुँचा, लेकिन आज वहां का सन्नाटा उसे काट रहा था। उसे ऐसा लगा कि जैसे भगवान भी आज उससे मुंह मोड़ चुके हैं।
बेचैनी में वह मंदिर के चबूतरे पर नहीं रुका। एक अजीब सी कशिश, एक अदृश्य डोर उसे मंदिर के पीछे के घने जंगल की ओर खींचने लगी। वहां कोई रास्ता नहीं था, सिर्फ कंटीली झाड़ियाँ और अंधेरा था। फिर भी, जैसे कोई सम्मोहन हो, रुद्रांश बढ़ता गया।
चलते-चलते वह एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ चट्टानों के बीच एक संकरी गुफा का मुंह खुला था। गुफा के बाहर एक अजीब सी शांति थी, न कीड़ों की आवाज़, न हवा की सरसराहट।
थकान से बेहाल होकर वह गुफा के अंदर चला गया। अंदर का नज़ारा बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग था। वहां एक विशाल, प्राचीन वटवृक्ष था जो गुफा के अंदर भी हरा-भरा था। उस पेड़ के नीचे एक बड़ा, चपटा और काला पत्थर रखा था, जो किसी आसन जैसा लग रहा था।
रुद्रांश की टांगों ने जवाब दे दिया। वह उसी काले पत्थर पर गिर पड़ा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह वहीं पत्थर पर ही लेट गया।
विष और वरदान
आधी रात हो चुकी थी। गुफा में चारों तरफ सन्नाटा था। तभी, पेड़ की जड़ों के बीच से सरसराहट हुई। एक काला, जिसकी आँखों में अंगारे जैसी चमक थी, धीरे-धीरे रुद्रांश की ओर बढ़ा।
अचानक, रुद्रांश के हाथ में ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने पिघला हुआ लोहा डाल दिया हो।
"आआह्ह्ह!" उसकी चीख गुफा के वातावरण में गूंज उठी।
नाग ने उसके दाहिने हाथ की कलाई पर अपने दाँत गड़ा दिया था। वह जल्दी से उठा, हाथ को झटकते हुए नाग को दूर फेंका।
खून की धार उसके हाथ से बहने लगी। ज़हर बहुत तेज़ था। कुछ ही पलों में उसकी नसों में आग दौड़ने लगी। उसका शरीर ऐंठने लगा, मुंह से झाग निकलने लगा।
"नहीं... मैं ऐसे नहीं मर सकता..." रुद्रांश ने तड़पते हुए ज़मीन पर हाथ मारा। उसका खून से सना हाथ उसी काले पत्थर पर जा लगा जिस पर वह लेटा था।
दर्द और मौत के खौफ में उसने उस पत्थर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। तभी एक चमत्कार हुआ।
जैसे ही रुद्रांश का गर्म खून उस ठंडे पत्थर की दरारों में गया, पत्थर कांपने लगा। पत्थर की ऊपरी काली परत, किसी पुरानी पपड़ी या केंचुली की तरह टूटने लगी।
चट... चट... चट...
पत्थर बिखर गया और उसके भीतर से एक 'दिव्य मणि' प्रकट हुई। वह मणि हीरे से भी ज्यादा चमकदार थी और उससे एक नीली आभा निकल रही थी। वह रोशनी इतनी तेज़ थी कि गुफा का कोना-कोना जगमगा उठा।
रुद्रांश की धुंधली होती आँखों ने उस मणि को देखा। अनजाने में, उसका हाथ उस मणि की ओर बढ़ा। जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस दिव्य अंश को हुआ, मणि ठोस से तरल बन गई। वह पिघलकर प्रकाश की एक धारा बन गई और रुद्रांश की हथेली के घाव से होते हुए उसके शरीर में प्रवेश कर गई।
एक जोरदार झटका लगा। रुद्रांश का शरीर हवा में कुछ इंच ऊपर उठा। वह नीली रोशनी उसकी नसों में दौड़ गई, सांप के काले ज़हर को जलाकर राख कर दिया। वह रोशनी उसके सीने के बीचों-बीच जाकर स्थिर हो गई।
रुद्रांश के मुंह से एक गहरी सांस निकली और फिर वह अचेत होकर गिर पड़ा।
पुनर्जन्म
अगली सुबह जब रुद्रांश की आँखें खुलीं, तो सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा।
"मैं... मैं ज़िंदा हूँ?" उसने अपने हाथ को देखा। हाथ पर सांप के काटने का कोई निशान नहीं था। उसने अपनी पीठ को छूकर देखा, कल रात की मार का दर्द गायब था। सारे घाव, सारी चोटें ऐसे गायब थीं जैसे कभी थी ही नहीं।
उसके शरीर में एक अदम्य ऊर्जा का संचार हो रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि वह मीलों दौड़ सकता है, भारी चट्टानों को उठा सकता है। उसकी आँखों की रोशनी इतनी तेज़ हो गई थी कि वह दूर पेड़ पर बैठे पक्षी के पंखों के रेशे भी देख सकता था।
वह हैरान होकर चारों तरफ देखने लगा। "वह गुफा कहाँ गई? वह पेड़?"
वह अभी खुले आसमान के नीचे, मंदिर के पीछे वाली चट्टान पर बैठा था। न वहां कोई गुफा थी, न कोई पेड़, और न ही पत्थर के टुकड़े। सब कुछ गायब था।
"क्या वह सपना था?" रुद्रांश ने सोचा। लेकिन फिर उसने अपने सीने पर हाथ रखा। वहां, त्वचा के नीचे, उसे एक हल्की सी धड़कन महसूस हुई जो उसके दिल की धड़कन से अलग थी। एक गर्म, शांत ऊर्जा का स्रोत वहां मौजूद था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है, लेकिन एक बात तय थी—वह अब वह कमजोर और लाचार रुद्रांश नहीं रहा था जो कल रात यहाँ मरने आया था।
उसने मंदिर की ओर देख खा। उसका पेट खाली था, होंठ सूखे थे, लेकिन उसकी आँखों में एक नई चमक थी। एक अदृश्य उदय हो चुका था।
उसने मुट्ठी भींची और मंदिर की ओर कदम बढ़ा दिए। एक नई कहानी शुरू होने वाली थी।