आलोचना : एक जासूसी लेखक की मुकम्मल जिंदगी की दास्तान :
आत्मकथा: पानी केरा बुदबुदा
__________________________आत्मकथाएं कुछ बुरी होती हैं,कुछ काल्पनिक उपन्यास सी,कुछ झूठ का पुलंदा और कुछ कम बुरी ।
अकसर वह हमें उस दुनिया में ले जाती हैं जो हमारी पहुंच और सोच से दूर होती हैं। वह दुनिया जो हम दूर से देखते,समझते हैं कि खासी चमकीली होगी,सहज होगी और क्या ही शानदार होगी। फिर एक आह निकलती है कि "काश हम भी जी पाते"। फिर जब आत्मकथा पन्ने दर पन्ने पढ़ते जाते हैं तो समझ आती है सच्चाई। यह आसान नहीं हुआ। किस तरह से ग्रासरूट से चलकर,घिस घिसकर ,अपने बूते अपना करियर,भविष्य बनाया। थोड़ी ईमानदार आत्मकथा में यह भी होता है कि कितनी नाकामियों,धोखे,फरेब खा खाकर,खाक छानकर और कठिन राह पर अडिग रहते हुए आज वह इंसान हमारे सामने इस रूप में है,जब हम उसे कामयाब,आदर्श और एक ऊंचे मुकाम पर पाते हैं।
सुरेंद्र मोहन पाठक,जाने माने मिस्ट्री राइटर तो हैं ही साथ ही काफी विटी इंसान भी हैं। आपकी आत्मकथा के तीन खंड,______ विगत दो वर्षों में आकर खासे चर्चित और लोकप्रिय हुए हैं। वजह है उनकी साफगोई। स्वयं लिखे हैं कि "मुझे जब यह ऑफर आया कि आत्मकथा लिखूं तो मैंने मना कर दिया।क्योंकि मैं पचास पेज भी अपने बारे में नहीं लिख सकता।क्या लिखूंगा? कौन पढ़ेगा?" यह कथन है साठ वर्षों में तीन सौ से अधिक उपन्यास लिख चुके व्यक्ति का।
ऐसी ईमानदारी के बाद बार बार कहने पर वह लिखने बैठे तो कहते हैं कि मैंने लगातार दो हफ्ते में लगभग बारह सौ पृष्ठ लिख दिए।
और यह तीन खंड की सामग्री सुव्यवस्थित ढंग से वेस्टलैंड,राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई और बेहद प्रसिद्ध हुई। इतनी की तीसरे ,और अंतिम खंड,का तो दस दिन में ही दूसरा संस्करण करना पड़ा श्री अशोक माहेश्वरी को।
और अब इनकी आत्मकथा का चतुर्थ भाग "पानी केरा बुदबुदा असमानस की जात
देखत ही छुप जाएगा ज्यों तारा परभात " (कबीर दास) से यह शीर्षक लिया है,आया है। इस पर आगे चर्चा करूंगा और थोड़ा बहुत आलोचक ,साहित्यकार होने के नाते इनके प्रश्नों के भी उत्तर दूंगा कि क्यों साहित्यकार देश और समाज में वह नाम एक किताब ,एक कहानी से कमा लेता है जो बाज लोग अनगिनत साहित्यिक किताबों से भी नहीं कमा पाते। रहस्य और रोमांच के अलावा आठ रस और हैं भारतीय मेधा में। और यह सभी बराबर से महत्व रखते हैं।जैसे सत्व,राजस और तमस गुणों की साम्यावस्था का नाम निवृत्ति है और इनकी छिन्न डिस्टर्ब अवस्था से ही प्रकृति,यह सृष्टि,जीव ,जगत बनता है।
पाठक साहब को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यह जानकार कि यह तीनों गुण हम सबके अंदर हैं। और प्रतिदिन असर दिखाते हैं। समझदार व्यक्ति इनमें से तमस और राजस को कम और सत्व को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। अक्सर एक गुण प्रधान हो जाता है तो बाकी दो गौण।ईश्वरकृष्ण
इन तीनों खंडों में क्या था
______________________दरअसल आत्मकथा हम सभी को,यहां अर्थ है पढ़ने लिखने वालों से, अपनी जिंदगी,देश,परिवेश और बीती हुई गलियों में ले जाने का मौका देती हैं। वह भी पुस्तक के रूप में घर बैठे, जब हम चाहेंऔर कितनी ही बार पढ़ें। कोई महंगे स्मार्ट फोन,लैपटॉप या अन्य की जरूरत नहीं।पुस्तक सच्ची दोस्त सी हर वक्त साथ निभाती है।
तो इन खंडों में पहले भाग " न बैरी न कोई बेगाना "में आजादी के पहले और फिर आजादी के बाद का माहौल का जीवंत चित्रण हैं। इसी में लेखक का बचपन,शिक्षा और रिश्तेदारों की भी बारीकियां हैं। फिर डीएवी कॉलेज जालंधर की भी यादें हैं जहां उस समय मोहन राकेश पढ़ाते थे।जगजीत सिंह,रविंदर कालिया भी इन्हीं के साथ हॉस्टल में रहते थे। यह इतना सटीक और सजीव चित्रण है कि आप सहज ही अपने बचपन और स्कूल,कॉलेज के दिनों में पहुंच जाते हैं। यहीं एक अतृप्त पढ़ने की बेचैनी छोड़कर पहला भाग समाप्त होता है जो करीब तीन सौ नब्बे पृष्ट का है।
दूसरा भाग "हम नहीं चंगे बुरा नहीं कोय" राजकमल प्रकाशन से भव्य ढंग से आया। इसमें लेखक ने बड़ी ईमानदारी से कुबूला की किस तरह उस वक्त के अपने किशोर दोस्त वेदप्रकाश कांबोज को सुपर स्टार लेखक जनप्रिय ओमप्रकाश शर्मा के सानिध्य में उपन्यास लेखन की बारीकियां सीखते देखा।और फिर युवा सुरेन्द्र भी इस वजह से आकर्षित हुआ कि कंबोज का भी जासूसी उपन्यास आ गया ओमप्रकाश जी की चाकरी करते करते और उससे उस वक्त आज से आधी सदी पूर्व सौ रुपए मिले।
इससे प्रेरित होकर कई वर्षों तक पाठक कंबोज की साइड किक बने रहे। फिर किस तरह वह सिगरेट,शराब ला लाकर शर्मा जी की निगाह में आए। फिर किस तरह बीस बीस रुपयों के लिए उपन्यास के कवर बनाए मेरठ जाकर। किस प्रकार बड़े जनप्रिय लेखक ,जो खुद उस वक्त दिल्ली क्लॉथ मिल में पावरलूम मजदूर था,की निगाह से उन्हें उनकी पहली जासूसी कहानी लिखने का अवसर उन्नीस सौ साठ में मिला । फिर आगे लंबा वर्णन है ईमानदारी से की किस तरह वह भी ओम जी के प्रिय हुए और दोनों उस्तादों ,कंबोज से भी, लेखन की बारीकियां सीखी।
इसी में मध्य मध्य में रिश्तेदारों के प्रति उनकी उदासीनता भी दिखती है। साथ ही अपनी पहली और आखिरी सरकारी नौकरी इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री में एक कर्मचारी से अफसर तक के सफर की लंबी यात्रा का जिक्र है।ऐसे रोचक और वास्तविक विवरण है कि किस तरह साहब मातहत को परेशान करते हैं। कार्यस्थल की रोचक घटनाएं हैं। और यह भी की जब थोड़ी थोड़ी प्रसिद्धि मिलने शुरु हुई तो दफ्तर में साहब लोगों ने और काम बढ़ा दिया कि पाठक लिखेगा कैसे?
पर इस जीवट वाले शख्स ने ईमानदारी से दस से पांच ड्यूटी और फिर एक घंटा घर शाहदरा जाने का फिर बिना आराम अपने लाखों पाठकों के लिए विश्वसनीय और यथार्थवादी नायकों सुनील कुमार चंद्रवर्ती,सुधीर कोहली और थ्रिलर उपन्यास लिखे।
लेखक के ही शब्दों में " लोग मेरी अभी की लोकप्रियता संपन्नता देखते है पर यह नहीं देखते कि कितने वर्ष,अपनी हर छुट्टी ,रविवार मैंने घंटों बारह से सोलह घंटे लिखने में खर्च किए। मैं किसी पार्टी,शादी में नहीं गया ।जरूरी हुआ तो एक दो बस।" यह समर्पण और लगन ही सुरेंद्र मोहन पाठक को आज साठ वर्षों से जासूसी,थ्रिलर उपन्यास लेखन का सिरमौर बनाती है। जिनके एक एक उपन्यास की एडवांस रॉयल्टी दस लाख है। और अभी तक करोड़ों रुपए वह उपन्यास लेखन से कमा चुके।जिनके उपन्यास हाथों हाथ बिक जाते हैं। (इस बात का मैं खुद गवाह हूं पिछले चालीस वर्षों से )
और ऐसा भी नहीं कोई जादुई यथार्थवाद हो,जैसा आजकल हिंदी साहित्य के लेखक करते है, बल्कि यथार्थपरक और वास्तविक दुनिया की घटनाओं से किस तरह बारीक दृष्टि से उनके नायक केस हल करते हैं यही इसकी खूबसूरती है।
"निंदक नियरे राखिए",तीसरा भाग आत्मकथा का राजकमल प्रकाशन के इतिहास में पिछले कई दशकों की पहली पुस्तक है जिसके आने के महज पंद्रह दिनों में दूसरा संस्करण लाना पड़ा। यह पुस्तक के कवर पर इंगित है।
तीसरा भाग सहयोगी लेखकों और प्रकाशकों के दांवपेच से भरपूर किसी थ्रिलर उपन्यास सा मजा देता है। इसमें जहां सरकारी नौकरी के उत्तरार्द्ध का भी जिक्र है तो बेहद प्रसिद्ध हो चुके और लाखों रुपए में एक नोवल की फीस ले रहे लेखक की फैन फॉलोइंग,दोस्तों और अपनी सोच का उल्लेख है।गुडगांव, दिल्ली और मेरठ शहरों का आंखोदेखा वर्णन है।यहीं यह भी है किस तरह कई किरदार स्वयं लेखक के जीवन से प्रेरित होकर आए। ऐसे भी प्रशंसक मिले जिन्होंने महज लेखक से मिलने के लिए कोर्ट केस कर दिया उपन्यास पर और लेखक जब प्रकाशक सहित फिक्रमंद पहुंचा तो कहा गया कि आप चिन्ता न करो वकील साहब सब सम्भाल लेंगे। अनेकों खट्टी मीठी घटनाओं से भरा तीसरा भाग है।परंतु एक बात मुझे इसमें अधिक खटकी की कहीं भी अपनी पत्नी,अर्धांगिनी का विस्तृत न सही दस पेज का भी जिक्र नहीं। जब आप ईमानदारी और निष्ठा से ऑफिस में नौकरी कर रहे और फिर बाकी समय में पढ़ रहे,तैयारी कर रहे उपन्यास लेखन की और फिर छुट्टियों में उपन्यास लिख रहे तो दो बच्चों, आपकी माताजी और पूरे परिवार का जिम्मा जिसके रहा उसके प्रति भी न्याय होना चाहिए या नहीं? यह सारा कार्य वह ,श्रीमती पाठक,खुशी और जिम्मेदारी से नहीं करती ,तो लेखक पाठक पाठक नहीं होते। हालांकि लेखक शुक्रगुजार हुआ है इस अंदाज से की शी इस ऑलसो रैन।
इसी भाग में यह बात शिद्दत से आई कि लेखक की बुद्धिमानी या एंबीशियस से उसकी तीन चार साल बाद बड़े प्रकाशकों से नहीं बनी। जिनसे उनके तीस तीस उपन्यास छपे ,भरपूर रॉयल्टी मिली पर फिर आगे दिक्कत। लेखक की गलती नहीं और आगे जो बता रहा हूं वह हिंदी जगत और साहित्य जगत के लिए चमत्कृत करने वाला होगा क्योंकि इतनी अधिक रॉयल्टी और रिप्रिंट से आमदनी बहुत कम की होती है।वह भी मीडिया की मदद के बिना। पांच से दस लाख प्रति उपन्यास और साल में चार उपन्यास ,चालीस से अधिक वर्षों से, तय है आना। कभी कभी छह उपन्यास भी हर वर्ष।और दस पन्द्रह रिप्रिंट पिछले उपन्यासों के वह भी आठ नौ अलग अलग प्रकाशकों से। तो यह जैसे आप पढ़ने वालों को आश्चर्य में डालता है वैसे ही प्रकाशकों को। क्योंकि इस लेखक का अपने क्राफ्ट और उसकी बारीकियों पर इतना बेहतरीन कार्य है कि हर कहानी जासूसी उपन्यास हाथों हाथ बिकता है। जबकि बाकी लेखक दूर दूर तक नहीं। तो स्वाभाविक है लेखक पाठक जी कहेंगे ही कि जब आप मेरी किताबों के लाखों ऑर्डर निकालकर कमा रहे हो तो मेरी फीस बढ़ाओ। उधर हर प्रकाशक का वही रोना कागज महंगा,पुस्तक बिकती नहीं।पर यह बात इनके उपन्यासों पर लागू नहीं होती। तो विवाद होता और पाठक जी झुकते पर कितना? और प्रकाशक तो वैसा ही। साथी लेखकों और दोस्त, प्रशंसकों की कई दास्तानें हैं इस चार सौ से अधिक पृष्ट की आत्मकथा में।
इसी में है वह दौर जब अपने गुरु और पितृपुरुष ओमप्रकाश जी ने खुद माना सुरेंद्र मोहन पाठक की लोकप्रियता को। कंबोज की शराबखोरी और पटनी।लेखक का उसे सीमित मदद करना जबकि उन दोनों ने उसे सब बारीकियां बताई, सिखाई ।खैर मानुष जात,मिट्टी का खिलौना क्या तो अच्छा और क्या बुरा।
इन्हीं भागों में ईमानदारी से लेखक बताता है कि किस तरह अपने अंग्रेजी के अच्छे ज्ञान और पढ़ने की आदत से उसने हर रविवार दरियागंज के फुटपाथ मार्केट से विदेशी जासूसी उपन्यासों और पत्रिकाओं को भरपूर खरीदा और पढ़ा,घोंटा।कई उपन्यासों का प्लॉट हुबहु इनसे लिया गया है। और आधे में हत्या की ट्रिक यहीं से ली गई।उर्दू का भी ज्ञान होने से इब्ने सफी,आनंद प्रकाश सरीखे लेखक भी पढ़े। प्रेमचंद,मोहन राकेश पढ़े पर रुचे नहीं।
भाग चार : पानी केरा बुलबुला (कुछ कहने को अब भी बाकी है पर दोहराव है)
________________________ नवीनतम भाग करीब दो वर्ष बाद आया है और आते ही काफी प्रतियां बिकी हैं।परंतु यह उतना ग्रिपी और तथ्यों से भरपूर नहीं है। बल्कि कहा जाए तीन भागों की लोकप्रियता को निचोड़ने के लिए बनाया गया तो गलत नहीं होगा।हालांकि अभी भी बहुत कुछ लिखने के लिए है परंतु उन तक शायद जाने की सूझी नहीं। इस भाग में सबसे पहले यह साफ़गोई है कि आत्मकथा किस तरह लिखी गई।जिसमें जो दायरे के लोगों,अफसोस पाठक साहब दायरे के लोग औसत दर्जे के निकले,ने बताया वह आत्मकथाएं बाजार से लाकर उल्टी पलटी नोट्स लिए। और फिर कोशिश की । और चूंकि इस मेहनती,पढ़ाकू ,धैर्यवान और भाषा के धनी अपने क्राफ्ट्स के माहिर लेखक की वेल कमिटेड फैन फॉलोइंग और एसएमपी फैन क्लब भी है तो यह भाग भी हजारों की संख्या में बिकेगा और पसंद किया जाएगा। क्योंकि वह लोग भक्तों की तरह इनकी किताबों के दशकों से आदि हैं। यह सच भी है मैं खुद गवाह हूं कि जिसने सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब का जासूसी उपन्यास एक बार पढ़ लिया तो फिर वह दूसरे लेखक का उपन्यास पसंद कर ही नहीं सकता।इतना बारीक,सहज,यथार्थ और हमारे आपके सामान्य जीवन से कहानी बुनते और चुनते हैं। मैने खुद तीन सौ पृष्ट के कई उपन्यास चार घंटे की एक सीटिंग में पढ़े हैं।क्योंकि घटनाक्रम इतना रोचक,तेज रफ्तार और दिलो दिमाग को संतुष्टि देने वाला। इस भाग की शुरुआत होती है लेखक के फैन और यात्राओं की घटनाओं से।जिसे परवान मिलता है ,लेखक के प्रिय विषय प्रकाशकों की ठगी या कहें लालच को लेखक द्वारा पकड़ने और रोकने से।चूंकि आपके सारे उपन्यासों के कॉपीराइट इस बुद्धिमान,सरकारी नौकरी ,अड़तीस साल करके और उसके साथ साथ साठ साल से निरंतर जासूसी उपन्यास लिख रहे , के ही पास हैं।जिसका बहुत बहुत लाभ उन्हें हुआ और आगे भी होगा। और इसी से इन्होंने सख्ती की और एक सीमा के आगे प्रकाशकों के दबाब में नहीं आए। इसमें अपने खास अंदाज में वेस्टलैंड,हार्पर कॉलिंस,ऑक्सफोर्ड प्रेस आदि विदेशी प्रकाशकों के भारत में कार्य की बानगी दिखाई है।
संतोष के साथ लेखक को आर्थिक लाभ भी काफी हुआ पर वह कहावत है न "जब तक तिलों में तेल है तब तक निचोड़ लो" वह दूतरफा लागू होती है।
पांच लाख से काफी आगे बढ़ चुकी रॉयल्टी नए तीन उपन्यासों और दस रिप्रिंट पर पचास लाख रुपए तक पहुंची। पर वह पेशकश हिंदी के इस जासूसी कथाकार ने मना कर दी। यह इस भाग में दर्ज है। चेतन भगत,देवदत्त पटनायक का जिक्र भी है जो करोड़ों में रॉयल्टी पाते हैं।परंतु हिंदी के फिक्शन राइटर द्वारा इससे पचास लाख से अधिक रॉयल्टी की मांग करना आज के समय में दर्शाता है लेखक सटक गया है या फिर उसके क्राफ्ट ,मेहनत और भाषा का जादू देश विदेश के पाठकों के सिर चढ़कर बोल रहा है।निसंदेह दूसरी बात ही सही है।
दिलचस्प वाकया
_______________
कई हैं पर तीन का जिक्र जरूरी जो आप हम को जिंदगी और अपनी मेहनत पर गर्व करना और सत्य के साथ खड़े रहना सिखाते हैं।
पहला दिलचस्प वाकया है जब राजा पॉकेट बुक्स के बहाने लेखक ने बताया कि किस तरह उसके द्वारा दी गई फाइनल स्क्रिप्ट के प्रूफ को खुद प्रकाशक ने कई जगह शब्द अपनी समझ से बदलकर अर्थ का अनर्थ कर दिया।लंबी बीस बिंदुओं की सूची लिखी है। इसमें यह व्यंग्य काबिलेतारिफ है कि हर प्रूफ रीडर खुद को भाषा का उस्ताद समझता है।
दूसरा कहीं अधिक रोचक और आप सभी के साथ नित प्रतिदिन होता है,वह है बैंक वालों की मनमानी और मनचाहा राशि डिडक्ट कर लेना। वरिष्ट नागरिक पाठक साहब,अभी आप 85 के हैं, के बैंक अकाउंट में कई बार इंटरेस्ट और चेक की एंट्री सही नहीं हुई।बैंकअकाउंटेंट से कहा तो उसने सब सही है कहकर कान से मक्खी उड़ाई।
आपने घर पर बाकायदा सारा अपना रिकॉर्ड चेक किया,खुद गणना करके बाकायदा गलतियां ढूंढी और मैनेजर को बताया।उसने भी यही कहा,"अरे आप भी कहां उलझ रहे हो। यह नहीं है बल्कि मेरा अकाउंटेंट ही सही है।" ऐसा हमारे आपके साथ अक्सर होता है।हम मजबूरी में फंसे कुछ कर नहीं पाते।
व्यस्त और दोस्तों,फैंस को भी मिलने देखने वाले लेखक ने इस पर कोई बहस या झगड़ा नहीं किया बल्कि उसी बैंक के हेडक्वार्टर में अपनी शिकायत मेल कर दी। जिसकी रिसीव्ड भी आ गई।दिल्ली में होने का फायदा यह हुआ कि तीन दिन बाद ,गौर से पढ़ें दोस्तों, तीन दिन बाद उसी बैंक मैनेजर का फोन आया कि क्या आप दिन में बैंक आ सकते हैं? आपके खाते ठीक करेंगे।"
क्या करते हैं हम और आप? पहुंच जाते हैं फिर समय खराब करने, काम छोड़कर। पाठक साहब ने साफ मना कर दिया कि व्यस्त हूं ।नहीं आ सकता।
क्यों? क्योंकि बुद्धिमत्ता कहती है जब आपने सारे मौके स्थानीय बैंक कर्मचारियों को दिए और उन्होंने नहीं सुनी और आप बहुत परेशान हुए। और अब जीएम के कहने पर सुन रहे हैं तो अब आपको उनके लिए बैंक नहीं भागना है।काम अब होगा ही होगा। बॉल उनके कोर्ट में है।
तो इनकार कर दिया कि नहीं आ पाऊंगा।
अगले ही दिन सुबह नौ बजे बैंक मैनेजर,एक उच्च अधिकारी और वही अकाउंटेंट लेखक के घर पर मौजूद मय फाइलों के। घर पर ही एफडी के इंटरेस्ट की गलती ठीक हुई। राशि खाते में दी गई। साइन लिए गए। और यह भी पूछा गया कि क्या आप संबंधित स्टाफ पर कार्यवाही करना चाहते हैं? यहां लेखक ने माफ कर दिया।
यह वाकया बताने के लिए काफी है कि सत्य,सिद्धांत के साथ अपनी बात पर टिके रहिए।
अगली घटना सोच और लिखे शब्दों की महिमा,जिसे अक्षर ब्रह्म कहा गया है,बताती है। लेखक कहते है कि मैं रोज पढ़ता हूं ,उसके बिना मुझे नींद नहीं आती। किताबों को पढ़ने के बाद मैं उन्हें बाँट देता हूं। योग्य व्यक्ति को दे देता हूं,(पृष्ट 284) दिलचस्प बात आगे है जिसमें वह कहते हैं,"यदि ईश्वर मुझे कहे कि अब आपकी जिंदगी के चंद घंटे बचे हैं तो मैं उन घंटों में पुस्तकें पढ़ते हुए और कलम हाथ में लिए हुए ही दुनिया से विदा लेना चाहूंगा "(288)।
कितने होंगे इस सोच और ऐसी मयार के?
बहु पठनीय स्वभाव के लेखक आगे विश्व के सभी प्रमुख लेखकों की खास उक्तियों को उद्धत करते हैं जो यकीनन कहीं भी यूट्यूब पर भी नहीं मिलेंगी।क्योंकि वह साठ वर्षों की निरंतर पुस्तकों को पढ़ने के साथ साथ लेखक ने नोट करके रखीं,सहेजी जो आगे काम भी आईं। यहां यह कहने में मुझे कोई दिक्कत नहीं की एसएमपी जी का दिमाग और बुद्धि बेहद दुरुस्त और उपयोगी है।और यह एकाएक नहीं आई बल्कि बरसों के अनुभव,अनगिनत बार धोखा खाने,फिर गिरने,फिर उठने के साथ साथ आई। प्रोफेशनल राइवरी का उल्लेख भाग तीन में काफी हुआ है।
खैर,कुछ युक्तियां आपके लिए, 1. मैं किसी ऐसे शख्स से बातचीत का इच्छुक नहीं जिसे जितना पढ़ा है उससे ज्यादा लिखा है।(सैमुअल जॉनसन )
2. जो शख्स पढ़ता नहीं वह उस शख्स से किसी कदर बेहतर नहीं है जो अनपढ़ है।( मार्क टवेन)
3. गॉडफादर के लेखक मारियो पूजो ,जिनकी किताब "रूल फॉर राइटिंग" बेस्ट सेलर नोवल है, कहते हैं "घर के झगड़ों तकरारों को कभी अपने लिखने के शेड्यूल में हावी न होने दें। अगर आप अगले दिन ऐसे बखेड़ों से मुक्त नहीं हो पाते हैं तो बीवी से मुक्ति पाए।
4. प्रसिद्ध अमेरिकी टीवी एंकर ओपरा विनफ्रे कहती हैं "कुछ महिलाओं की कमजोरी जूते होती हैं मैं कभी जरूरत पड़ी तो नंगे पांव चलने के लिए तैयार हूं मेरी कमजोरी पुस्तक हैं।"
5. 19वीं सदी के लेखक और राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले बहुत दिलचस्प बात कहते हैं "कोई मुझे महलों,लजीज पकवानों ,सुंदर स्त्रियों, वाहनों सैकड़ो वस्त्रों और नौकर चाकरों से युक्त सम्राट घोषित करें और बदले में यह शर्त रखे कि मैं कोई पुस्तक नहीं पढ़ सकता तो ऐसा साम्राज्य मुझे हरगिज कबूल नहीं होगा।"
आखिर में ,जो मुझे अभी भी अपूर्ण लगती है आत्मकथा का यह चतुर्थ भाग,लेखक फिर उस मायाजाल में है कि साहित्यकार क्यों नहीं कहलाते व्यवसायिक या कहें जासूसी उपन्यासकार? इस मद में वह जय शंकर प्रसाद से लेकर श्रीलाल शुकुल, आदमी का जहर,आनंद प्रकाश,मनोहर श्याम जोशी,कमलेश्वर,राजेंद्र यादव,धर्मवीर भारती,अश्क ,मोहन राकेश आदि की बिला वजह नुक्ताचीनी करते हैं। और हंसी आती है जो चंद अपने फैंस के पत्रों को भी जोड़ देते हैं।
जी हां, आत्मकथा के चौथे भाग के आखिरी पैंसठ पृष्ट छुटपुट (283 से आखिर 347) के अंतर्गत इसी के नाम गए हैं।और यही जहां लेखक अपनी पीड़ा ,साहित्यकार नहीं कहलाए जाने की, बड़े सम्मान आदि नहीं मिलने की को ईमानदारी से स्वर देता है,तर्क देता है,उदाहरण सहित बताता है। क्यों मंटो जिंदगी भर कहानियां लिखते रहे और एक उपन्यास लिखा वह भी अप्रकाशित था जो बाद में " बिना उन्वान के" ,शीर्षक रहित छपा।
इसी में उनका जवाब भी छुपा है कि इसके बाद भी मंटो पर फिल्म बनती है और वह दो देशों में चर्चित भी या हालांकि वह कोई जनवादी या स्तरीय लेखक नहीं था परंतु उसका समूह और ग्रुपीज्म जबरदस्त रहा। और साथ ही कुछ आज की विपक्ष की राजनीति और प्रगतिशील आदियों की मजबूरी है कि उनके पास चंद ही नाम बचे हैं।
भारतीय परम्परा के वेद,उपनिषद,पुराण ,त्रिपिटक,थेरी गाथा,आम्रपाली के समय की, कालिदास,तुलसीदास आदि को मानते हुए उनका दिल दुखता है।तो वह यही सब करते हैं। बाकी हम जो भारतीय संस्कृति और साहित्य से जुड़े हुए हैं हम अभी अपने को साहित्य का विद्यार्थी ही मानते हैं ।भले ही लगभग पच्चीस वर्षों से साहित्य की भूमि पर चल रहे हैं। आठ पुस्तकों और पचास से अधिक देश विदेश के सम्मानों के बाद भी यही लगता है अभी अभी तो चलना सीखा है। आत्मकथा का भाग चार ,पिछले तीन भागों की तुलना में कमजोर है। क्योंकि कई जरूरी विषय छूट गए हैं जिन पर लिखना चाहिए।
साहित्यकार क्यों कहलाने की जिद है?
____________________________
यह जिद या जुनून पिछले दो दशक से अधिक है जबसे भारत में सबसे अधिक और लोकप्रिय जासूसी कथाकार एकमेव सुरेंद्र मोहन पाठक बन गए।इसलिए भी की बाकी चुक गए और एक वेद प्रकाश शर्मा,स्वर्ग सिधार गए। और सामाजिक उपन्यासों की पूछ तो बीस साल पूर्व ही टेलीविजन के धारावाहिकों और अब ओटीटी ने खत्म कर दी। ऐसा ही जासूसी लेखक के साथ भी होता पर अपने लेखन की
मौलिकता और दशकों की साख से पाठक जी बेदाग , साबुत और मजबूती से पांव जमाए खड़े रहे।
कोई समझे सकता है मिथुन चक्रवर्ती,तीन सौ से अधिक फिल्म के बाद भी यादगार रोल एक नहीं कर पाता है। और कैसे मात्र सत्तर से कम फिल्मों के बाद भी दिलीप कुमार के कई रोल आंखों के सामने आ जाते हैं।
दूर न जाएं तो मुगल ए आजम का पांच मिनट को पर्दे पर आया वह संगसार,मूर्ति वाला ,जो अकबर के रौब और जलाल के सामने भी अपने डायलॉग इस तेवर से बोलता है कि वह आज तक याद रहता है। भले ही वह नायक या सहनायक कुछ नहीं था। जिंदगी और लोकप्रियता कभी सम्पूर्ण नहीं होती।कमी रहती ही है।
साहित्यकार ,भले ही रॉयल्टी पाते हैं आटे में नमक बराबर, उनके घर चूल्हा सहित के सदके नहीं जलता परंतु वह बेशकीमती प्रतिष्ठा और साख होती है जिससे वह देश विदेश में जाने जाते हैं।।नागार्जुन,मुक्तिबोध,शैलेश मटियानी,केदारनाथ अग्रवाल,ज्ञानेंद्रपति आदि अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जो अपनी सादगी और अभावों में भी पढ़ने और लिखने की जिद नहीं छोड़ने के लिए जाने जाते हैं और हिंदी जब तक रहेगी वह जाने जाएंगे ।
हवाईजहाज से पहली हवाई यात्रा ठेठ ग्वालियर का किसान परिवार का साठ वर्ष का साहित्यकार करता है।जिसे हिंदी व्याकरण का भी पूरा ज्ञान नहीं पर जिसका लिखा माटी की महक लगता है।
ऐसे ही अष्टभुजा शुकुल,कवि जो अपनी कविताओं से अधिक अपनी सादगी से जाने जाते हैं। पर चेतन भगत,देवदत्त पटनायक आदि को कभी साहित्यकार नहीं माना गया न माना जाएगा।
कमियों की भी बात हो जाए
________________________ अपनी तरफ से लेखक ने जो कहना था उससे अधिक ही कह दिया। यहां तक कि पाठकों के पत्र भी तीस पृष्ठों के हो गए।जो अधिकतर तारीफ और महान बताने टाइप के ही हैं। इसी बात को लेकर अंदर पृष्ट 293 पर ब्रिटिश लेखक नील
गैमन के विचार पढ़ने चाहिए। पर चारों खंडों को देखने के बाद लगता है कि रोमांस,प्यार,महिला फैंस आदि का जिक्र नहीं किया गया है। तीसरे भाग में आटे में नमक बराबर कुछ रोमांस का जिक्र है पर मामूली। इसमें शायद लेखक की आत्मकथा की जिम्मेदारी और हिम्मत जवाब दे गई। जबकि मनुष्य जीवन का महत्व्पूर्ण हिस्सा है प्यार,रोमांस जहां आप किसी को धोखा नहीं दे रहे बल्कि अपनी अपनी मर्जी से साथ है।यहां बच्चन हो,जिन्होंने अपनी आत्मकथा के प्रथम भाग "क्या भूलूं क्या याद करूं " में अपने से उम्र में बड़ी स्त्री से आकर्षण और प्यार को लिखा,अपनी दोनो पत्नियों का जिक्र किया। अज्ञेय की अनौपचारिक आत्मकथा शेखर :एक जीवनी में उन्होंने अपने प्यार को बताया। दूर न जाए तो तुलसीराम अपनी आत्मकथा "मणिकर्णिका" में अलग से एक विस्तृत अध्याय अपनी जिंदगी में आई स्त्रियों पर लिखते हैं।रमणिका गुप्ता, आपहुदरी में अपनी जिंदगी में आए पुरुषों और तत्कालीन युवा कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष और आगे भारत के राष्ट्रपति बने एक नेता से प्रेम को लिखती हैं। मल्लिका शेख,बेबी हालदार, कृष्णा सोबती ,प्रभा खेतान, मैत्रीय पुष्पा, कृष्णा अग्निहोत्री लंबी सूची है पाठक साहब इन लोगों ने,महिलाओं ने अधिक,अपने प्रेम और पुरुषों के साथ संबंधों को साहस से लिखा और उजागर किया।
इन सबको पढ़ा नहीं आपने? शायद लोकप्रिय लेखक प्यार और रोमांस की गंगा तो नहा लेते हैं पर उसके बारे में लिखते नहीं। आखिरकार परिवार भी तो है। साहित्यकार यह सब बेबाक लिखते हैं चाहे मोहन राकेश हो या मन्नू भंडारी,अनिता औलक आदि। यह भी अंतर है। मनोस्थिति का। दायरे खुद तोड़ना और उनसे मुक्त होना ही साहित्यकार होना है। कादंबरी मेहरा,लंदन प्रवासी साहित्यकार हैं, उनका बेहद लोकप्रिय जासूसी उपन्यास "निष्प्राण गवाह" पढ़ें आप जान जाएंगे अच्छा साहित्यकार, जो खूब पढ़ता है एक बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिख सकता है। काश,इसका उल्टा भी होता।
और आप कहते हो मुझे साहित्यकार मानो?
जब इतना साहस नहीं और कोई अच्छा या कई अच्छे रिश्ते बने होंगे,उन महिला दोस्तों का उल्लेख क्यों न हो जो पुरुष के व्यक्तित्व निखारती हैं और उसके अंदर उष्णता जगाती हैं।
साहित्यकार साहस से रोचक ढंग से सच लिखता है अपना भी ।साहित्यकार मानने के पक्ष में कई वर्षों से कुतर्क देकर या साहित्य के स से भी अनजान पाठकों के पत्रों से कोई भी लोकप्रिय लेखक साहित्यकार या साहित्य का पुरस्कार नहीं पा सकता।भले ही वह कितनी ही दौलत कमा ले।यही दौलत और लाखों पाठकों में लोकप्रियता आपकी विरासत और ईश्वर का वरदान है।
ईश्वर से याद आया गुरबाणी के पदों का खुलकर उपयोग उपन्यासों के अंदर और बिमल सीरीज में तो हर कवर करने वाला लेखक आत्मकथा के चारों भाग के करीब पंद्रह सौ पृष्ठों में कहीं भी किसी धार्मिक स्थल अथवा अपनी आस्था का जिक्र नहीं करता है।
यह संकेत है एक प्रोफेशनल लेखक होने का जो बेहद संतुलित,कैलकुलेटिव और सोचकर लिखता है।
और यह भी की जो चंद आत्मकथाएं लेखक ने देखी (खुद कहा भाग चार की भूमिका में) उनमें कोई धार्मिक या आस्था का जिक्र नहीं होगा तो हमने भी नहीं किया।
तो इसका अर्थ क्या हुआ? कम से कम आधी गुरुबाणी,उर्दू के शेर आदि लाखों पाठकों को पढ़ा चुके लेखक ने इन चीजों और गुरु की ताकत को महसूस नहीं किया? या उसे लिखने का ख्याल नहीं आया? या संभवतः लेखक इतना अधिक व्यवहारिक,कहें नास्तिक या कुशल है ,की वह इन चीजों का जिक्र करता है अपनी पुस्तक बेचने के लिए पर खुद उस पर अमल नहीं करता ?
और जो बात सबसे अधिक खलती है वह है खामोशी से बड़े लेखक साहब की घर गृहस्थी संभालती और बच्चों की हर इच्छा और छोटी छोटी खुशी पूरी करती, ऊपर से अपने मायके वालों की कमियां भी सुनती लेखक की पत्नी का कहीं से भी कोई खास क्या दो लाइन से अधिक उल्लेख नहीं है। जिसने पूरी जिंदगी खपा दी ,कहीं कोई बाधा नहीं आने दी इनके लेखन और नौकरी में। क्योंकि बकौल लेखक नौ से छह नौकरी नियम से चौंतीस साल,शाम को मित्रों,प्रकाशकों,प्रेस क्लब और कई जगह की घुमक्कड़ी, फिर हर रविवार और छुट्टी के दिन नियम से ,सतत लेखन ,लेखन और लेखन। तो परिवार और पत्नी के लिए समय कहां? कोई आज की ही नहीं तीस साल पहले की भी स्त्री होती तो लेखक साहब कोर्ट केस झेलते और सारी कमाई का आधा देकर कराह रहे होते।उस देवी स्वरूपा पुण्य आत्मा को नमन और श्रद्धा से याद करें हम सभी और बड़े लेखक भी। क्योंकि जासूसी कथाकार,वह भी बेहद लोकप्रिय और यार दोस्ती पर खुलकर पैसा खर्च करने वाले की एक दो नहीं कम से कम दर्जनों दोस्त, फैन,हार्ट चुराने वाली,दिलदार महिलाएं रहीं होंगी। ऐसा कोई नहीं हुआ आज तक जिसके एक भी चक्कर घरवाली से नहीं खुले हो। यहां साहित्यकार तो ईमानदारी से कबूलता भी है और यदि रहना संभव नहीं तो आपसी सहमति से अलग होता है या साथ रहकर दूसरे शहर में ब्याह करता है। और किसी को हो न हो पत्नी को जरूर खबर हो जाती है। शांति और परिवार बरकरार रहा तभी बड़ा लेखन हो पाया।मेरी निगाह में सुरेंद्र मोहन पाठक जी की आधी सफलता नहीं बल्कि पूरी सफलता, दौलत और स्वास्थ्य का श्रेय उनकी धर्म पत्नी को जाता है।
उस स्त्री पर कुछ विशेष लिखना तो बनता ही है जिसने
यह किताब क्यों पढ़े ?
___________________
मुख्यत यह कि जिस समर्पण,ईमानदारी, निष्टा और तथ्यों को लेकर अपनी ओरिजिनल और सहज भाषा से वह जासूसी कहानियों को लिखते हैं वह लाखों पाठकों के दिलों दिमाग पर असर डालती है। साथ ही बता दूं जहां दुनिया व्यवसायिक लाभ के लिए हर कार्य कर लेती है वहीं सुरेंद्र मोहन पाठक उन चंद लोगों में से हैं जिनके तीन सौ से अधिक उपन्यासों में कोई यौन चित्रण अथवा सेक्स के लंबे लंबे दृश्य नहीं हैं। जासूसी कथाओं का अनिवार्य तत्व होने के बावजूद लेखक ने कभी समझौता नहीं किया। और यही वजह है कि अपनी दमदार और रोमांचक लेखनी से इनका मजबूत,इनके ही शब्दों में स्टील पैक्ड पाठक वर्ग है।
यह किताब अपनी ईमानदारी और साथ ही कनविक्शन के लिए पढ़ी जानी चाहिए। जिस आयु वर्ग में अधिकांश भारतीय तीन समय भोजन,टहलना, घंटों अखबार या टीवी पर बेकार के समाचार देखना और दवाई समय पर खाने का ध्यान रखते हैं उसी दौर में पाठक जी ,और एक नीलू गुप्ता जी निरंतर सक्रिय हैं और व्यस्त हैं।
नीलू गुप्ता, सैन फ्रांसिस्को केलिफोर्निया में साहित्य और समाज सेवा के माध्यम से निरंतर हिंदी और राष्ट्र की सेवा कर रही हैं। वह डी एंजा कॉलेज में पिछले कई दशकों से विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा और सिखा रही हैं। वह भी निस्वार्थ। आपका वहां पांच दशकों से स्वतंत्र व्यवसाय है।
इधर पाठक जी अभी नया प्लॉट,नए उपन्यास की तैयारी और नए किरदार सोच रहे होंगे,अपने विशाल पाठक वर्ग के लिए। यह दूसरों के लिए जीना ही वास्तव में बेहद आत्मीय लम्हे होते हैं। जहां अपना नहीं बल्कि सबके लिए कुछ करने की सोच और जज्बा हो वहा जिंदगी सम्पूर्ण है।यही नहीं चुनौतियां भी हैं आज के तेज रफ्तार समय की देखते हुए कथानक और भाषा चुनना। लिखने के अभिलाषी और लिख रहे लोगों को यह आत्मकथा इसलिए भी पढ़नी चाहिए कि लिखना कोई साधारण कार्य नहीं बल्कि बेहद तैयारी और श्रम साधना करनी पड़ती है। हर बार ,हर लेख, किताब के लिए। जीवंत उद्धरण सुरेंद्र मोहन पाठक हमारे आपके समय में और पास हैं। आखिर में यह आत्मकथा इसलिए भी पढ़नी चाहिए यह मनुष्य को निरंतर बिना विश्राम के अपने कर्म पथ पर चलने के एक नहीं कई कई मौके और प्रेरणा देती है।यह एक सच्चे अर्थों में कर्मयोगी की आत्मकथा है जिसमें कहीं भी कुछ भी भाग्य अथवा रहमतों से नहीं हुआ बल्कि लेखक ने अपने कार्यों,सीखने की इच्छा और मेहनत से खुद अपनी तकदीर बनाई। ईश्वर को उतना ही ,दो पल याद किया जितना हम भूलें नहीं। यह मानवीय जिजीविषा और उसके परिश्रम की विजयी गाथा है।
_____________
( डॉ.संदीप अवस्थी,जाने माने आलोचक,स्क्रिप्ट राइटर,कथाकार हैं। आपको देश विदेश के अनेक पुरस्कार प्राप्त हैं।राजस्थान के निवासी हैं।
संपर्क मो 7737407061 .
संपादक )