एक बड़े मेले के भीड़-भाड़ वाले प्रांगण के भीतर एक विशाल कक्ष सजा हुआ था। वहां बहुत सारे लोग मौजूद थे। सामने, एक सोने-ओसके सिंहासन पर लगभग सोलह–सत्रह वर्ष का एक लड़का बैठा था; जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर। उसकी आँखों में युवावस्था की चमक थी, पर स्वभाव में बादशाहत का गर्व। उसके चारों ओर दरबारी और लोग खड़े थे।
सामने बैठे थे मियाँ तानसेन, जिनकी उँगलियाँ वीणा के तारों पर ऐसे फिर रही थीं, मानो हवा भी सुरों में ढल रही हो।
ज्यों ही आलाप समाप्त हुआ, पूरा दरबार सन्नाटे में डूब गया।
फिर अकबर ने धीरे से ताली बजाते हुए कहा —
“वाह… वाह… सुब्हान अल्लाह!
मियाँ तानसेन, ऐसी रूहानी गायकी हमने आज तक नहीं सुनी।
तुम्हारे स्वर तो सीधे दिल में उतर जाते हैं।”
वीणा बजाने वाला झुकते हुए बोला, “धन्यवाद, जहाँपनाह।”
फिर वह थोड़ा और झुका और नम्रता से कहा, “किंतु मैं तो ऐसा कुछ भी नहीं गाता। शायद आपने मीरा माँ को गाते हुए नहीं सुना होगा। यदि आप उन्हें सुन लेते तो मेरी प्रशंसा करना मेरे हिस्से की बात न रहती उनकी भक्ति में जो भाव है, वह मेरी गायकी में कहाँ। एक बार आप उनके मुख से भजन सुन लेंगे तो उनके चरणों में आप सर झुका देंगे।”
मियाँ तानसेन, की बात अभी आधी भी हुई थी कि सामने खड़ा जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर। अचानक क्रोधित हो उठा। उसने तलवार निकाली और मियाँ तानसेन, के गर्दन पर रख दी। उसके शब्द कठोर थे — “जालालुद्दीन किसी के सामने सर नहीं झुकाता।”
यह दृश्य देखकर पास खड़ी एक औरत — काले रंग के कपड़े पहने — चौंककर बोल पड़ी, “शाहंशाह, आप क्या कर रहे हैं?”
पर अकबर के चेहरे पर क्रोध था और होंठों पर कटाक्ष।
तानसेन ने फिर भी बिना भय के कहा –
“जहाँपनाह, मीरा माँ कोई साधारण स्त्री नहीं हैं… वे एक रोशन रूह हैं।”
अकबर ने तलवार हटाए बिना ताने से कहा –
“अच्छा! और अगर हम उस मीरा बाई को सुनने के बाद भी उनके चरणों में सिर न झुकाएँ,
तो हम तुम्हारा सिर कलम कर देंगे!”
तानसेन ने विस्मय से पूछा –
“आप कहना क्या चाहते हैं, जहाँपनाह?”
अकबर ने ठंडी मुस्कान के साथ उत्तर दिया –
“हम मीरा बाई से मिलना चाहते हैं… और उन्हें स्वयं सुनना चाहते हैं।”
दूसरा दृश्य – मेवाड़ का महल
उधर मेवाड़ के आलिशान महल के एक कक्ष में तीन लोग उपस्थित थे —
दो स्त्रियाँ और एक सोलह–सत्रह वर्ष का बालक।
उनमें से एक महिला ने पूछा –
“क्या कहा तुमने, कुंवर प्रताप? क्या राणा जी मान गए?”
कुंवर प्रताप हर्ष से बोले –
“हाँ, रानी माँ! पिता श्री ने हमें अनुमति दे दी है कि हम द्वारका जाकर मीरा माँ को लेकर आएँ।
उन्होंने स्वयं हमें यह आदेश दिया है। कृपया हमारे प्रस्थान की तैयारी आरंभ करें।”
यह सुनकर बगल में खड़ी महिला प्रसन्न होकर बोली –
“हाँ, रानी माँ! मैं अभी दासियों को निर्देश देती हूँ।”
वह जाने ही वाली थी कि तभी मुख्य रानी — जयवंता बाई जी, बोलीं –
“नहीं! मैं स्वयं जाकर राणा जी से पुष्टि करूँगी।”
कुंवर प्रताप ने झट से कहा –
“रानी माँ, मैं सत्य कह रहा हूँ। दाजीराज ने हमें अनुमति दे दी है।”
परंतु जयवंता बाई उनकी बात अनसुनी करती हुई तेज कदमों से महल के दूसरे प्रकोष्ठ की ओर बढ़ीं।
तभी द्वार खुला और भीतर राणा उदय सिंह प्रवेश करते हैं।
उन्हें देखते ही सभी लोग झुककर प्रणाम करते हैं।
जयवंता बाई उनके समीप आकर बोलीं –
“राणा जी, क्या कुंवर प्रताप जो कह रहे हैं, वह सत्य है? क्या आपने उन्हें अनुमति दी है?”
राणा उदय सिंह ने अपने पुत्र की ओर देखा और मुस्कुराते हुए बोले –
“हाँ, जयवंता बाई जी, जो कुंवर प्रताप कह रहे हैं, वह पूर्ण सत्य है।”
यह सुनते ही जयवंता बाई की आँखें नम हो गईं।
वे प्रसन्न होकर राणा जी के गले लग गईं –
“धन्यवाद, राणा जी!”
राणा ने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा –
“जयवंता बाई… मुझे लगा था कि मीरा भाभी के जाने का घाव समय के साथ भर जाएगा,
परंतु प्रताप ने यह महसूस करा दिया कि वह घाव अभी भी ताजा है।
अब यह घाव तभी भर सकता है जब भाभी हमें क्षमा कर दें और पुनः मेवाड़ लौट आएँ।”
कुंवर प्रताप मुस्कुराते हुए बोले –
“रानी माँ, अब तो आपका सत्यापन हो गया!”
यह सुनकर जयवंता बाई और उनके पास खड़ी दूसरी रानी दोनों मुस्कुरा दीं।
राणा उदय सिंह भी संतोष से उन्हें देख रहे थे।
परंतु कुंवर प्रताप गंभीर स्वर में बोले –
“रानी माँ, जाने से पहले हमें मीरा माँ के बारे में सब कुछ जानना होगा।
आप हमसे कुछ भी न छिपाइएगा।”
अकबर का दरबार
इधर अकबर के महल में तानसेन खड़े थे।
उन्होंने कहा –
“जहाँपनाह, मैं आपको मीरा माँ के जीवन की कथा अवश्य सुना दूँगा, परंतु उसमें बहुत समय लगेगा।
क्योंकि उनकी जीवनगाथा इतनी गहरी है कि यदि कोई उसे सच्चे रूप में समझ ले,
तो वह जीवन का असली अर्थ जान लेता है।
क्या शहंशाह के पास इतना समय है?”
यह सुनकर अकबर तमतमाकर बोले –
“मियाँ तानसेन! हम वक्त के ग़ुलाम नहीं हैं… वक्त हमारा ग़ुलाम है।
द्वारका तक के सफर में हमें पर्याप्त समय मिलेगा।
तुम वहीं हमें यह कथा विस्तार से सुनाओगे।”
पीछे खड़ी वही काले वस्त्रों वाली महिला — यानी अकबर की अमी जान — बोलीं,
“शहंशाह, यह कैसा निर्णय ले लिया आपने?”
अकबर ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया –
“सफ़र की पूरी तैयारी कर लो।
हम मीरा बाई से मिलना चाहते हैं।”
तानसेन झुककर बोले –
“जो हुक्म, जहाँपनाह।”
और वे दरबार से चले गए।
उनके जाते ही अकबर की अमी जान बोलीं –
“जालाल, यह कैसी ज़िद ठान ली है आप न ?”
अकबर ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया –
“यह ज़िद नहीं, गुरूर है, अम्मी।
मियाँ तानसेन ने हमारे अभिमान को चुनौती दी है।
उन्होंने कहा कि हम, जालालुद्दीन मोहम्मद अकबर,
जो मेवाड़ के हाथों हुई अपमानजनक हार का बदला लेने के लिए दिन-रात तड़प रहे हैं —
वही हम, मेवाड़ की बहू मीरा बाई के चरणों में सिर झुकाएँगे?
नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता!”
अमी जान ने शांत स्वर में कहा –
“हम भी जानती हैं, जालाल।
पर इतनी सी बात साबित करने के लिए तुम्हें द्वारका तक जाने की क्या ज़रूरत है?
तुम अभी इसी वक्त उस गवैये का सिर कलम कर सकते हो।”
अकबर ने दृढ़ता से उत्तर दिया –
“नहीं, अम्मी। मियाँ तानसेन के घमंड से उठे हुए सिर को
हम मीरा बाई के सामने कलम करना चाहते हैं … तो
ताकि फिर कभी कोई भी शहंशाह-ए-हिंद की शान को ललकारने की जुर्रत न करे।”
अमी जान ने कुछ कहना चाहा, पर अकबर ने हाथ उठाकर रोक दिया।
उनकी आवाज़ गूंजी –
“शहंशाह-ए-हिंद का फैसला आख़िरी होता है।”
इस कहानी को लिखने का विचार बहुत पहले किसी ने मुझे दिया था — और तब से यह मेरे दिल के बहुत करीब रही है।
लंबे समय से मैं महसूस करती थी कि इतिहास की उन गलियों में एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसमें न सिर्फ़ युद्ध और वीरता है, बल्कि दोस्ती, प्रेम, और इंसानी रिश्तों की गहराई भी है।
यह उपन्यास मेवाड़ की मिट्टी से जन्मी एक भावनात्मक यात्रा है — जहाँ महाराणा प्रताप और अकबर की दोस्ती भी है, मतभेद भी हैं; और साथ ही एक अनकही प्रेम कहानी, जो इतिहास की परछाइयों में कहीं छूट गई थी।
यह कथा मेरे लिए केवल युद्धों या राजनैतिक घटनाओं की नहीं, बल्कि उस मानवीय भाव की है जो हर युग में हमें जोड़ता है — सम्मान, प्रेम और त्याग का।
मैं पूरी कोशिश करूँगी कि हर अध्याय सच्चाई और श्रद्धा के साथ लिखा जाए, ताकि आप सभी को लगे जैसे आप भी उसी दौर में सांस ले रहे हैं।
अगर कभी किसी प्रसंग या पात्र से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचे, तो कृपया समझिए — मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। यह कथा आदर और सीख के भाव से लिखी गई है, न कि किसी की छवि को ठेस पहुँचाने के लिए।
आप सबका स्नेह मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत है।
कृपया इस कहानी को अपना प्यार दीजिएगा, और यदि कहीं कोई गलती या सुझाव लगे — तो ज़रूर बताइएगा, ताकि मैं उसे और बेहतर बना सकूँ।