“राधा… ज़रा धीरे चल बेटी…”
माँ हाँफती हुई पीछे से बोली।
“तेरे कदमों में अभी जवानी की रफ्तार है… पर मैं अब 25 की नहीं रही… थोड़ा साथ चल ले।”आज माँ राधा को साथ लेकर बाज़ार आई थी।
कुछ ही दिन पहले राधा की कॉलेज की परीक्षाएँ खत्म हुई थीं। अब वह 21 साल की हो चुकी थी और उसकी छुट्टियाँ चल रही थीं।
माँ ने सोचा — चलो, आज इसे सब्ज़ी खरीदना भी सिखा देती हूँ।
लेकिन माँ को जल्दी ही समझ आ गया कि सब कुछ उल्टा हो रहा है।
राधा का ध्यान सब्ज़ियों की तरफ बिल्कुल नहीं था।
वह कभी इधर-उधर की दुकानों को देखती, कभी सड़क पर भागती भीड़ को, तो कभी आसमान में उड़ते पंछियों को।
उसे सब्ज़ी लेने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।
पीछे से माँ उसे देख रही थी —
थोड़ी परेशान… और थोड़ी मुस्कुराती हुई।अचानक उसकी नजर एक दुकान पर रखे तरबूजों पर पड़ी।
वह तुरंत उस दुकान के सामने रुक गई और पीछे मुड़कर बोली —
“माँ, ये ले लो ना…”
माँ हल्की सी मुस्कुराई और बोली —
“आज मैं तुझे साथ लेकर आई हूँ, तो तू ही बता… इनमें से कौन सा मीठा होगा?”
राधा कुछ पल के लिए चुप हो गई।
वह तरबूजों को ध्यान से देखने लगी — जैसे पहली बार समझने की कोशिश कर रही हो कि सही चीज कैसे चुनी जाती है।अब राधा को समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे पहचाने —
कौन सा तरबूज रसिला होगा, कौन सा अंदर से लाल निकलेगा।
वह कुछ देर तक तरबूजों को घुमाकर देखती रही, फिर अचानक दुकानदार भैया से बोली —
“भैया, इसे थोड़ा काटकर दिखा दो… अंदर से कैसा है। तभी तो पता चलेगा।”
दुकानदार हल्का सा मुस्कुराया,
और माँ राधा को देखती रह गई —
जैसे समझ रही हो कि उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।दुकानदार भैया हल्का सा हँसते हुए बोले —
“मैडम, मैं काट तो दूँगा… लेकिन फिर आपको यही खरीदना होगा।”
राधा ने हैरानी से पूछा —
“ऐसा क्यों? मुझे तो बस लाल तरबूज चाहिए।”
भैया मुस्कुराए और बोले —
“अगर हर तरबूज काटकर देखने लगेंगे, तो बाकी कौन खरीदेगा? इसलिए जो कटेगा, वही लेना पड़ता है।”
राधा धीरे से माँ की तरफ देखने लगी —
जैसे अब उसे बात थोड़ी-थोड़ी समझ आने लगी हो।अब राधा ने अपने ही अनुमान से एक तरबूज चुन लिया।
उसके चेहरे पर हल्की सी खुशी थी — जैसे उसने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो।
लेकिन उसके मन में बस एक ही बात चल रही थी —
घर जाकर इसे जल्दी से काटना है… देखना है अंदर से कैसा निकलेगा।
तभी माँ ने उसे रोका और मुस्कुराते हुए बोली —
“रुक… अभी और भी सब्ज़ी लेनी है। और वो भी तुझे ही लेनी है।”
राधा ने थोड़ा सा मुँह बनाया,
लेकिन फिर चुपचाप माँ के साथ आगे बढ़ गई।बाज़ार का रोज़ का वही माहौल था।
हर तरफ चहल-पहल और आवाज़ों का शोर गूंज रहा था।
कहीं दुकानदार ग्राहकों को आवाज़ लगाकर बुला रहे थे,
तो कहीं महिलाएँ मोल-भाव कर रही थीं।
कोई सब्ज़ियों को छाँट-छाँट कर चुन रही थी,
तो कोई दाम कम करवाने में लगी हुई थी।
राधा यह सब ध्यान से देख रही थी —
जैसे पहली बार समझ रही हो कि बाज़ार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं,
बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक हिस्सा है।और राधा ने देखा कि वहाँ ज़्यादातर महिलाएँ ही खरीदारी कर रही थीं।
उन्हें देखकर उसने भी धीरे-धीरे मोल-भाव करना शुरू कर दिया।
माँ थोड़ी दूर खड़ी होकर उसे देख रही थी —
जैसे चाहती हो कि राधा खुद सीखकर समझे।
जैसे-तैसे करके राधा ने सब्ज़ियाँ खरीद लीं।
फिर माँ के पास आकर बोली —
“माँ, ये तो बहुत मुश्किल काम है। हर सब्ज़ी को बारीकी से देखना पड़ता है कि कहीं सड़ी-गली तो नहीं। मैं तो सोचती थी कि ये बहुत आसान काम है।”
माँ बस हल्का सा मुस्कुरा दी।
धीरे-धीरे दोनों घर की तरफ बढ़ने लगीं —
और राधा के कदमों के साथ-साथ उसकी समझ भी थोड़ी और बढ़ चुकी थी।आज राधा ने काफ़ी कुछ सीख लिया था,
इसलिए वह अंदर ही अंदर बहुत खुश थी।
जब दोनों घर पहुँचीं, तो देखा —
बड़ी बहन गेट के पास खड़ी उनका इंतज़ार कर रही थी।
जैसे ही राधा और माँ अंदर गईं,
तो देखा कि पापा अंदर बैठे हुए हैं…
और उनके साथ शायद दो लोग और भी बैठे थे।
राधा ने एक पल के लिए माँ की तरफ देखा —
जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि घर में क्या चल रहा है।बड़ी बहन दरवाज़े के पास खड़ी थी।
उसके बाल लंबे थे, जो कमर तक आ रहे थे।
उसने सूट-सलवार पहना हुआ था।
उसका रंग गेहुँआ था और उसके चेहरे के नैन-नक्श साफ और सधे हुए लग रहे थे।
उसके चेहरे पर हल्की सी शांति थी —
जैसे वह काफी देर से उनका इंतज़ार कर रही हो।माँ रसोई घर में चली गई।
उन्होंने सारी सब्ज़ियाँ राधा से अंदर रखवा दीं,
फिर बड़ी बेटी सीमा से बोलीं —
“सब्ज़ियों को अच्छे से साफ करके टोकरी में रख देना।”
इसके बाद माँ पापा के पास चली गईं।
पापा माँ को देखते ही उठकर उनके पास आए और धीमे से बोले —
“कहाँ थीं? ये लोग कब से आपका इंतज़ार कर रहे हैं।”
फिर पापा ने आगे कहा —
“ये हमारी बड़ी बेटी सीमा के लिए रिश्ता लेकर आए हैं।
लड़का अच्छा बताया है। मैंने अभी फोटो देखी है।
ये मेरे साथ ही ऑफिस में काम करते हैं… और लड़का इनका भतीजा है।
तुम भी फोटो देख लो।”
माँ कुछ पल के लिए चुप हो गईं —
जैसे अचानक आई इस बात को समझने की कोशिश कर रही हों।माँ ने मेहमानों को नमस्कार किया,
फिर फोटो लेकर अंदर रसोई घर में चली गईं।
वहाँ सीमा और राधा दोनों थीं।
माँ ने जैसे ही सीमा को देखा, उनके मन में एक अजीब सी हलचल हुई।
उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी सीमा शादी के लायक हो गई।
हर माँ-बाप के लिए उनके बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं।
सीमा अभी शायद 24–25 साल की ही हुई थी।
पिछले दो साल से वह केमिस्ट्री में एम.एससी. कर रही थी।
उसे भी नहीं पता था कि इतनी जल्दी उसके लिए शादी का रिश्ता आ जाएगा।
माँ के मन में खुशी भी थी… और चिंता भी।
खुशी इस बात की कि बेटी के लिए रिश्ता आया है,
और चिंता इस बात की कि कैसे अपनी बेटी को दूसरे घर भेज पाएँगी।
लेकिन माँ समाज के आगे चुप भी थी —
क्योंकि अगर मना किया, तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाता।
माँ ने धीरे से सीमा और राधा को लड़के की फोटो दिखा दी।राधा स्वभाव से थोड़ी झल्ली और मज़ाकिया थी।
उसे हर बात में हँसी-मज़ाक करना अच्छा लगता था।
इसके बिल्कुल उलट सीमा शांत रहने वाली, कम बोलने वाली और समझदार थी।
सीमा ने जैसे ही लड़के की फोटो देखी,
वह चुपचाप देखने लगी —
और उसे लड़का ठीक लगा।
फिर राधा ने फोटो देखनी शुरू की।
वह अपनी आदत के अनुसार मज़ाक करने लगी —
“अरे… देखो ना, इसका चेहरा थोड़ा अलग सा लग रहा है… और ये बाल भी थोड़े कम लग रहे हैं…”
राधा की बात सुनकर माँ और सीमा हँस पड़ीं —
क्योंकि वे जानती थीं कि राधा का इरादा किसी का मज़ाक उड़ाना नहीं,
बस माहौल हल्का करना था।फिर मेहमानों ने सीमा को देखा
और रस्म के तौर पर उसके हाथ में एक सिक्का रखकर रिश्ता पक्का कर दिया।
घर में खुशी का माहौल छा गया।
शाम होते-होते मेहमान अपने घर चले गए।
घर में अब एक अजीब सा माहौल था —
थोड़ी खुशी… और थोड़ा सा भावुकपन भी।
लेकिन राधा तो सबको हँसाने में हमेशा आगे रहती थी।
वह अचानक बोली —
“अरे, आज मैं तरबूज लेकर आई हूँ… और वो भी अंदर से लाल! वो भी बिना देखे।”
पापा हँसते हुए बोले —
“अच्छा! मैं तो आज तक बिना देखे लाल तरबूज नहीं ला पाया…
आज देखते हैं, तुम्हारा कैसा निकला।”
घर में हल्की-सी हँसी गूंज गई —
और माहौल थोड़ा हल्का हो गया।जैसे ही राधा ने तरबूज काटा,
तो अंदर से वह लगभग सफेद निकला —
जैसे अभी उसने ठीक से पकना शुरू भी नहीं किया हो।
कुछ पल के लिए घर में हल्की सी चुप्पी छा गई।
सब लोग राधा का चेहरा देखने लगे —
जैसे सोच रहे हों कि अब राधा क्या बोलेगी।
लेकिन राधा तो राधा थी।
वह तुरंत मुस्कुराकर बोली —
“अरे… ये तो पहली बार था ना!
कोई बात नहीं… अगली बार लेकर आऊँगी,
तब देखिएगा कितना रसिला निकलेगा।”
उसकी बात सुनकर सब हँसने लगे।
घर का माहौल फिर से हल्का और खुशियों से भर गया।शाम को सबने रोज़ की तरह रात का खाना खाया
और फिर अपने-अपने कमरों में चले गए।
राधा और सीमा एक ही कमरे में रहती थीं।
कमरे में आते ही राधा ने बात शुरू की —
“क्या दीदी… आपको पसंद आया लड़का?
आपने तो उसे अभी सिर्फ फोटो में ही देखा है।
हमें क्या पता… असल में वो कैसा होगा, कैसा नहीं?”
सीमा ने राधा की बात सुनकर हल्की मुस्कान के साथ कहा —
“तू कब से इतनी समझदारी वाली बातें करने लगी?”
फिर उसने धीरे से कहा —
“पापा ने देखा ही होगा…
वो बिना देखे तो रिश्ता तय नहीं करते ना।
और जब सगाई होगी, तब मिल ही लेंगे।”
राधा चुप हो गई —
लेकिन उसके मन में अब भी कई सवाल चल रहे थे।सीमा सोच में डूब गई।
उसे याद आया —
आज राधा तरबूज लेकर आई थी…
बिना अंदर से देखे।
उसे खुद पर भी भरोसा था
और तरबूज पर भी —
कि वह अंदर से लाल और रसिला निकलेगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सीमा के मन में अचानक एक सवाल उठा —
क्या ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है?
अगर मैं उनसे एक बार मिल भी लूँ…
तो क्या मैं एक मुलाकात में उनके अंदर झाँक कर देख पाऊँगी?
कैसा है वो इंसान…
उसका व्यवहार कैसा है…
उसमें क्या खूबियाँ हैं… और क्या कमियाँ…
सीमा छत की तरफ देखते हुए यही सब सोचती रही —
और उसे महसूस हुआ कि
ज़िंदगी के कुछ फैसले
शायद तरबूज चुनने से भी ज़्यादा मुश्किल होते हैं।धीरे-धीरे बात करते-करते दोनों बहनें सो गईं।
खिड़की खुली हुई थी।
गर्मियाँ शुरू हो चुकी थीं,
इसलिए ठंडी-ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।
हल्की ठंड महसूस होने पर
राधा ने खुद को चादर में ढक लिया।
कमरे में शांति थी —
सिर्फ हवा की हल्की आवाज़ और रात की खामोशी।
धीरे-धीरे रात गुजरने लगी…
और दोनों बहनें अपने-अपने ख्यालों के साथ गहरी नींद में चली गईं।