The challenge of preserving and promoting folk culture in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन की चुनौती

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लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन की चुनौती



जनजातीय लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन की चुनौती 

प्रस्तुतकर्ता: विवेक रंजन श्रीवास्तव

(राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित प्रबुद्ध विचारक और अन्वेषक)

 प्रस्तावना 
जनजातीय संस्कृति मानवता के इतिहास की वह आधारशिला है, जिस पर दुनिया भर में आधुनिक सभ्यताओं का निर्माण हुआ है। यह केवल लोकगीत, नृत्य या हस्तशिल्प का समूह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड, प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों का एक सहज स्वीकार्य जीवन शैली दर्शन है। वैश्विक स्तर पर जनजातीय समुदाय जैव-विविधता के सबसे बड़े संरक्षक रहे हैं। उन चुनौतियों और समाधानों का विश्लेषण करना समय की जरूरत है,जो इस धरोहर के अस्तित्व से जुड़ी हैं।

 संरक्षण की प्रमुख चुनौतियां

 इन चुनौतियों को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

भाषाई विलुप्ति का संकट: दुनिया की लगभग 7,000 भाषाओं में से 40% के विलुप्त होने का खतरा है, जिनमें अधिकांश जनजातीय बोलियां हैं।
जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ पीढ़ियों से चला आ रहा मौखिक ज्ञान (Traditional Knowledge) भी समाप्त हो जाता है।

सांस्कृतिक विस्थापन और वैश्वीकरण: पश्चिमीकरण और शहरीकरण के दबाव में जनजातीय युवा अपनी जड़ों से कट रहे हैं।
मुख्यधारा के मीडिया का प्रभाव उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान को 'पिछड़ा' मानने पर मजबूर कर रहा है।

आर्थिक और भौगोलिक विस्थापन: औद्योगीकरण, खनन और बांध परियोजनाओं के कारण जनजातियों को उनके प्राकृतिक आवास (जल, जंगल, जमीन) से बेदखल होना पड़ा है।
जड़ से उखड़कर शहरों की ओर पलायन करने से उनकी सामुदायिक जीवनशैली नष्ट हो जाती है।

लोक संस्कृति का व्यवसायीकरण (Commoditisation): पर्यटन और बाजार ने लोक कलाओं को केवल एक 'शोपीस' बना दिया है।

पवित्र अनुष्ठानों और नृत्यों का मंचन जब बिना संदर्भ के व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसा इन दिनों प्रायः देखने मिलता है, तो उनकी आध्यात्मिक आत्मा मर जाती है।

दस्तावेजीकरण का अभाव: अधिकांश जनजातीय ज्ञान (औषधियां, कृषि पद्धतियां) अलिखित है। दस्तावेजीकरण के अभाव में यह ज्ञान बुजुर्गों के साथ ही खत्म हो रहा है।

संवर्धन के लिए रणनीतिक प्रयास (Strategic Actions for Promotion)
संवर्धन केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि विकास का मार्ग है:

शिक्षा का स्थानीयकरण: जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा होनी चाहिए। पाठ्यपुस्तकों में उनके लोक नायकों और कहानियों को शामिल किया जाए।
बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और GI टैग: जनजातीय कला (जैसे गोंड पेंटिंग, ढोकरा आर्ट) को कानूनी संरक्षण प्रदान करना ताकि बिचौलिए उनका शोषण न कर सकें।

डिजिटल एथ्नोग्राफी: एआई (AI) और डिजिटल डेटाबेस के माध्यम से लोक संगीत, भाषा और लोक कथाओं का उच्च गुणवत्ता वाला संग्रह तैयार करना।

इको-कल्चरल टूरिज्म: पर्यटन ऐसा हो जिससे समुदाय को आय हो, लेकिन उनकी निजता और संस्कृति का अपमान न हो।

 वैश्विक परिप्रेक्ष्य और केस स्टडी
न्यूजीलैंड (माओरी मॉडल): माओरी भाषा को पुनर्जीवित करने के लिए 'लैंग्वेज नेस्ट्स' बनाए गए, जहाँ बच्चे अपनी संस्कृति सीखते हैं।

अमेज़न बेसिन: यहाँ के समुदायों ने तकनीक (GPS और मैप्स) का उपयोग कर अपने वनों और सांस्कृतिक सीमाओं की रक्षा की है।

भारत का योगदान: भारत का 'ट्राइब्स इंडिया' जैसे मंच और 'आदि महोत्सव' जनजातीय उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ रहे हैं।

 निष्कर्ष 
लेख का निष्कर्ष यह है कि जनजातीय संस्कृति का संरक्षण "दया" का विषय नहीं बल्कि "अधिकार" का विषय है।

सह-अस्तित्व: हमें आदिम समाज को 'असामान्य' समझने की मानसिकता छोड़नी होगी। वे प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने के वैश्विक गुरु हैं।

युवाओं की भूमिका: संवर्धन तब सफल होगा जब जनजातीय युवा अपनी परंपराओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर 'प्राउड कैरियर' बनेंगे।

नीतिगत आह्वान: सरकारों को 'विकास' की परिभाषा में सांस्कृतिक स्थिरता को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
7000375798
*वरिष्ठ और सक्रिय व्यंग्यकार , नाटक लेखक , समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, पुरस्कार प्राप्त सामाजिक मुद्दों पर निरंतर लेखन 

23 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। चर्चित हिंदी ब्लागर ।
*इन दिनों मिनाल रेजीडेंसी, भोपाल में रह रहे हैं।*
*फिलहाल अमेरिका प्रवास पर हैं।*