यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाड़ली” का चौथा भाग है।बचपन की मासूमियत और अधूरे प्यार के बाद,
अब ज़िंदगी मुझे एक ऐसे मोड़ पर ले आई
जहाँ फैसले मेरे नहीं थे।
रिश्ते तय किए जा रहे थे,
और मुझसे सिर्फ़ चुप रहना उम्मीद किया जा रहा था।
अध्याय 4 – रिश्तों का फैसला।
स्कूल और कॉलेज के दिन अब पीछे छूट चुके थे।
वह समय, जब ज़िंदगी हल्की लगती थी,
जब सपने बिना डर के देखे जाते थे।
अब ज़िंदगी धीरे-धीरे गंभीर होने लगी थी।
हँसी के साथ ज़िम्मेदारियाँ जुड़ने लगी थीं
और भविष्य का नाम सुनते ही मन में सवाल उठने लगे थे।
सपने अब केवल प्यार तक सीमित नहीं थे,
उनमें परिवार, समाज और अपेक्षाओं की परछाइयाँ भी शामिल हो चुकी थीं।
इसी दौरान घर में मेरी शादी की बातें शुरू हो गईं।
शुरू में यह सब सामान्य सा लगा,
जैसे हर घर में होता है।
मैं सुनती थी, सिर हिलाती थी,
पर भीतर से बिल्कुल तैयार नहीं थी।
मेरा दिल अब भी वही था
जो केवल महसूस करना जानता था,
फैसले लेना नहीं सीख पाया था।
मुझे लगता था कि शादी जैसे फैसले के लिए
दिल का तैयार होना ज़रूरी है,
सिर्फ उम्र का नहीं।
मैंने घरवालों को समझाने की कोशिश की।
कहा कि मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूँ,
कि मुझे थोड़ा और समय चाहिए।
मैं खुद को समझना चाहती थी,
अपनी पहचान बनाना चाहती थी।
लेकिन उनकी नज़र में
शादी ही हर समस्या का समाधान थी।
उन्हें लगता था कि शादी के बाद
सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।
जिस लड़के से मेरी शादी तय की जा रही थी,
उससे मेरी कभी सीधी बातचीत नहीं हुई।
सारी बातें मेरी मामीजी के ज़रिए होती थीं।
मुझसे बस इतना कहा गया—
“लड़का अच्छा है, परिवार अच्छा है।”
लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा था
कि क्या मैं उस अच्छाई में खुद को देख पा रही हूँ या नहीं।
घरवालों ने मुझे बहुत समझाया।
कभी प्यार से,
कभी भावनात्मक दबाव के साथ।
हर बातचीत के बाद मुझे यही लगता
कि मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला
मेरी इच्छा के बिना लिया जा रहा है।
मेरी चुप्पी को सहमति समझ लिया गया,
और मेरी झिझक को बचपना कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
मेरा मन इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
ना उस लड़के के लिए कोई भावना थी,
ना उस भविष्य की कल्पना
मुझे अपनी लग रही थी।
लेकिन मेरी भावनाओं को
अनुभवहीनता का नाम दे दिया गया।
जैसे मेरे डर, मेरी उलझनें
किसी मायने की ही न हों।
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया
कि मेरी हर बात दीवार से टकराकर लौट आती है।
किसी को सुनना नहीं था,
सबको बस फैसला सुनाना था।
फिर एक दिन ऐसा आया
जब मैंने बोलना छोड़ दिया।
शायद मैं थक चुकी थी,
शायद हर कोशिश से हार मान चुकी थी।
उस खामोशी में कोई विद्रोह नहीं था,
बस एक गहरा खालीपन था।
और उसी खामोशी के साथ
मेरी शादी तय कर दी गई।
उस दिन मैंने समझ लिया
कि कुछ फैसले रिश्तों के नाम पर लिए जाते हैं,
लेकिन उनमें दिल की सहमति
अक्सर शामिल नहीं होती।
उस रात मैंने बहुत देर तक खुद से सवाल किए।
क्या यही ज़िंदगी है,
या बस निभाए जाने वाले रिश्तों की एक कड़ी?
मेरे सपने, मेरी चाहतें
सब कहीं पीछे छूटती जा रही थीं।
मैंने खुद को समझा लिया
कि शायद यही सही है।
पर दिल के किसी कोने में
एक टीस हमेशा के लिए रह गई।
उस वक्त मुझे बस इतना लगा
कि कहानी यहीं थमी है,
जबकि असल ज़िंदगी
अभी आगे लिखी जानी थी।