अगले दिन सुबह से दोनों फिर काम में डूब गए। समय जैसे दौड़ रहा था।आख़िरी दिन शाम तक प्रोजेक्ट पूरा हुआ।सिया ने फाइल अर्शित को भेजते हुए काँपती आवाज़ में कहा—“सर… हो गया।”अर्शित ने ध्यान से पूरा प्रोजेक्ट देखा। कुछ देर चुप रहा। फिर उसने लैपटॉप बंद किया और मुस्कुरा कर कहा— “बहुत अच्छा काम किया है, सिया।”उसकी आवाज़ में गर्व था।सिया की आँखें नम हो गईं।यह वही लड़की थी, जो कभी खुद पर भरोसा नहीं कर पाती थी…और आज उसी के काम पर किसी को गर्व हो रहा था। अर्शित ने सिया से कहा—" मिस शर्मा आप बहुत थक गई हैं, मेरे ख्याल से आपको आराम की जरूरत है आप ऑफिस से कुछ दिनों की छुट्टी ले सकती है।" "नहीं सर. मै बिल्कुल ठीक हूँ और ऑफिस के हर काम के लिए हमेशा तैयार हूँ।"सिया ने खुशी से जवाब देते हुए कहा।लेकिन अर्शित ने अपने पी. ए को बुलाया और कहा " मिस शर्मा आज से दो दिन की छुट्टी पर है आप उनके हिस्से का काम किसी और इंटर्न को दे दीजिए लेकिन ध्यान रहे मिस शर्मा की सैलरी में कोई गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए।" उसके पी ए ने वैसा ही किया और सिया को दो दिन की छुट्टी दे दी।सिया जब घर पहुंची तो बिना कुछ खाए पिए सीधा बिस्तर पर जा गिरी , थकान और कमजोरी की वजह से उसे कोई होश नहीं था वक्त का पता ही नहीं चला।अगली सुबह अर्शित ने प्रोजेक्ट क्लाइंट को दिखाया और अपना प्रेजेंटेशन दिया ,क्लाइंट से जब अप्रूवल आया, तो अर्शित ने सबसे पहले सिया को बताने की सोची उसने सिया को कई कॉल और मैसेज किए लेकिन सिया का कोई जवाब नहीं आया वो घबरा गया आखिर ऐसा क्या हो गया जो सुबह से सिया का कोई जवाब नहीं आ रहा। वो तुरंत सिया के रूम पर पहुंचा और बेल बजाने लगा लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ सिया न तो दरवाजा खोल रही थी और न ही कोई जवाब दे रही थी।अर्शित की चिंता बढ़ने लगी। उसने आस-पास के लोगों से पूछताछ की, लेकिन किसी को कुछ पता नहीं था। दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी।उसने एक पल भी देर नहीं की और तुरंत बिल्डिंग के केयरटेकर को बुलाया।“दरवाज़ा खोलना पड़ेगा,” अर्शित की आवाज़ में घबराहट साफ़ झलक रही थी।केयरटेकर ने मास्टर चाबी से दरवाज़ा खोला।अंदर का दृश्य देखकर अर्शित का दिल जैसे थम सा गया।सिया बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। चेहरा पीला, होंठ सूखे हुए। मोबाइल बगल में पड़ा था, जिस पर अर्शित की कई मिस्ड कॉल थे।“सिया…”अर्शित ने उसका नाम पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं।उसने बिना सोचे-समझे उसे गोद में उठाया और तुरंत हॉस्पिटल ले गया।डॉक्टर ने जांच के बाद कहा—“ये बहुत ज़्यादा थकान, कमजोरी और स्ट्रेस की वजह से बेहोश हुई है, और इनके बेहोश हुए काफी वक्त हो चुका है जिसकी वजह से इनकी हालत खराब है ,अच्छा हुआ आप इन्हें वक्त पर ले आए, वरना हालत और भी ज्यादा बिगड़ सकती थी।”ये सुनते ही अर्शित की सांस जैसे अटक गई।उसकी आंखों के सामने वही रातें घूमने लगीं— जब सिया बिना रुके काम करती रही, जब उसने कभी शिकायत नहीं की, कभी थकान नहीं जताई।कुछ देर बाद सिया को होश आया। आंखें खुली तो सामने अर्शित को बैठा देखा।“सर…?”उसकी आवाज़ बहुत कमज़ोर थी।अर्शित ने पानी उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा—“अब मैं तुम्हारा बॉस नहीं हूँ। अभी सिर्फ़ ये ज़रूरी है कि तुम ठीक हो जाओ”सिया की आँखें भर आईं।“मुझे माफ़ कर दीजिए… प्रोजेक्ट की वजह से—”“बस।”अर्शित ने पहली बार सख़्त आवाज़ में कहा। “काम ज़रूरी है,” “लेकिन तुम उससे भी ज़्यादा ज़रूरी हो।”"मतलब"सिया ने धीमी आवाज में पूछा।लेकिन अर्शित ने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी नजारे घुमा ली।डिस्चार्ज के समय डॉक्टर ने सख़्त लहजे में कहा—“इन्हें कम से कम एक हफ्ते का पूरा आराम चाहिए। कोई काम, कोई तनाव नहीं।”अर्शित ने शख्त आवाज में जवाब दिया— " आप फिक्र मत कीजिए डॉक्टर, इन्हें दुबारा हॉस्पिटल लेकर आने की नौबत नहीं आएगी" सिया कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसकी हालत देखकर शब्द खुद ही रुक गए।अर्शित सिया को अपने साथ अपने घर ले गया।उसका घर सादा था—ना कोई दिखावा, ना कोई शोर।सिया को सोफे पर बैठाते हुए उसने कहा—“आज से तुम यहीं रहोगी।”“क्या?”सिया चौंक गई।तभी अर्शित ने जवाब दिया —“अकेली रहोगी, तो फिर वही होगा।”“मैं किसी भी हाल में ये रिस्क नहीं ले सकता।”उसकी आवाज़ में चिंता भी थी और डर भी।सिया कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीरे से बोली—“ मेरे लिए हर फैसला आप क्यों ले रहे हैं, सर?”अर्शित ने पहली बार खुलकर कहा—“क्योंकि अगर आज तुम्हे कुछ हो जाता… तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाता।”"तुम्हारा यहां आना मेरा और मेरी कंपनी का फैसला था, इसलिए तुम और तुम्हारी सेफ्टी मेरी जिम्मेदारी है।" अर्शित ने फिर कहा— तुम यहाँ रहोगी, तो जल्दी ठीक हो जाओगी "स. सर आपके घर के बाकी लोग कहा है? — सिया ने धीमी आवाज में पूछाअर्शित एक पल के लिए चुप हो गया। जैसे कोई पुराना दरवाज़ा धीरे से खुल गया हो।फिर उसने खिड़की की तरफ़ देखते हुए कहा—“कोई नहीं है।”सिया चौंकी।“मतलब…?”"मतलब वही जो तुम सोच रही हो।"अर्शित की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक अजीब सा खालीपन था।उसने फिर कहा — “माँ-पापा बहुत पहले चले गए। तब से ये घर… बस घर है। परिवार नहीं, तुम जब बेहोश थी मुझे ऐसा लग रहा था कि एक बार फिर से ये घर टूटने वाला है।"सिया अर्शित की बात सुनकर कुछ बोल नहीं पाई वो बस अर्शित का चेहरा देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी, जिस इंसान को वो हमेशा मज़बूत, सख़्त और कंट्रोल में देखती आई थी,उसके भीतर भी कोई अधूरापन था।अर्शित ने बात बदलते हुए कहा—“मैने तुम्हारे लिए कमरा तैयार करवा दिया है तुम आराम करो ,तब तक मैं तुम्हारे लिए सूप बना देता हूं।""आप"? सिया चौंक गईतभी अर्शित ने कहा " हां क्यों? मै नहीं बना सकता? "नहीं.. मेरा मतलब" सिया बोलते बोलते अचानक रुक गई तभी अर्शित ने कहा" माना कि मैं एक CEO हूं , लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं किचेन में भी नहीं जा सकता" दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। अर्शित सिया को कमरे में ले गया और उसे बिस्तर पर लेटा दिया।
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