यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाड़ली” का तीसरा अध्याय है।यह अध्याय उस मासूम एहसास की बात करता है
जिसे हम अपना पहला प्यार कहते हैं।
स्कूल के दिनों में हमारी ज़िंदगी कितनी सरल होती है, यह तब समझ नहीं आता,
लेकिन जब यादों में लौटते हैं, तो वही दिन सबसे खूबसूरत लगते हैं।
उन्हीं दिनों में हमारी कक्षा में एक नया दोस्त आया।
उसकी मौजूदगी ने बिना कुछ कहे ही मेरे मन में हलचल मचा दी।
उससे मिलने की छोटी-छोटी बातें,
उसकी मुस्कान, उसकी हंसी और उसका बात करने का तरीका
मुझे हर दिन थोड़ा-सा और अपना सा लगने लगा।
पहली बार जब उसने मुझसे बात की,
तो मेरा दिल इतनी तेज़ धड़कने लगा कि मुझे डर लगने लगा—
कहीं उसे सुनाई न दे जाए।
हम रोज़ स्कूल की छुट्टी में एक साथ चलते।
कभी खेल के मैदान की ओर,
तो कभी लाइब्रेरी की शांत गलियों में।
कभी किताबों की बातें होतीं,
तो कभी बस यूँ ही चुपचाप साथ चलना भी अच्छा लगता।
उसकी हर छोटी-छोटी आदत मुझे बेहद प्यारी लगती थी—
उसका हँसते हुए सिर झुका लेना,
या किसी बात पर अचानक शर्माना।
एक दिन उसने मेरे लिए एक छोटा सा नोट छोड़ा।
उसमें लिखा था—
“तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो।”
ये शब्द पढ़ते ही मेरे दिल में खुशी की लहर दौड़ गई।
मैंने चुपके से उसे देखा,
और उसकी मुस्कान ने मेरा पूरा दिन रोशन कर दिया।
वो नोट मैंने बहुत संभालकर रखा,
जैसे वो काग़ज़ नहीं, मेरे दिल का कोई हिस्सा हो।
हमारी दोस्ती धीरे-धीरे और खास होती गई।
हर दिन उसके साथ बिताया गया समय
मेरे लिए किसी तोहफ़े से कम नहीं था।
मगर मेरे दिल की गहराई में कुछ और ही चल रहा था।
मैं महसूस करने लगी थी कि
ये सिर्फ दोस्ती नहीं है।
शायद… यही मेरा पहला प्यार था।
उसके साथ बिताए हर पल ने मेरी यादों में अपनी जगह बना ली।
उसकी बातें, उसका हँसना,
और वो नज़रों का मिलना—
सब कुछ मेरे दिल में बस गया।
मगर जैसे पहले प्यार में अक्सर होता है,
मैं अपने दिल की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।
डर लगता था कि अगर कह दिया,
तो कहीं सब कुछ बदल न जाए।
मैं बस दूर से उसे देखती रही,
उसके लिए छोटी-छोटी खुशियाँ ढूंढती रही,
और अपने मन में ही उसके लिए दुआएँ करती रही।
वो पहला प्यार मुझे बहुत कुछ सिखा गया—
• प्यार हमेशा शब्दों में नहीं होता,
• कभी-कभी वो सिर्फ महसूस किया जाता है,
• और अधूरा होकर भी पूरी ज़िंदगी साथ रहता है।
यादों के इन पलों ने मेरी ज़िंदगी को रंगीन बना दिया।
हर मुस्कान, हर छोटी-सी मुलाकात
आज भी मेरे दिल में जिंदा है।
और शायद यही पहले प्यार की सबसे बड़ी खूबसूरती है—
वो कभी पूरा नहीं होता,
लेकिन कभी खत्म भी नहीं होता।
मैं उसे आज भी संजोकर रखती हूँ,
हर दिन उस खामोश प्यार को महसूस करती हूँ,
और अपनी यादों के इन अनमोल पलों के साथ
हल्की-सी मुस्कान लिए आगे बढ़ती रहती हूँ।
कभी-कभी अकेले में बैठकर मैं यही सोचती थी
कि अगर वो मेरे दिल की बात समझ पाता,
तो शायद मुस्कुरा देता,
या शायद कुछ बदल ही जाता।
लेकिन मैं जानती थी
कि कुछ रिश्ते शब्दों के मोहताज नहीं होते।
वे खामोशी में ही पनपते हैं
और खामोशी में ही अपनी जगह बना लेते हैं।
उस पहले प्यार ने मुझे यह भी सिखाया
कि हर एहसास को पाना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ एहसास सिर्फ महसूस करने के लिए होते हैं,
ताकि हम खुद को पहचान सकें।
उसने बिना कुछ कहे
मेरे भीतर की लड़की को थोड़ा और समझदार बना दिया।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो कोई शिकवा नहीं है,
बस एक मीठी-सी याद है
जो दिल को हल्का कर देती है।
वो पहला प्यार
मेरे जीवन का सबसे शांत एहसास था—
जिसमें उम्मीद भी थी,
डर भी था
और मासूमियत भी।