अर्जुन के हाथ काँप रहे थे। सामने वही पीला लिफाफा था—जिस पर दादी की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट थी। दादी को गुज़रे पूरे दस साल हो चुके थे, फिर भी हर साल उसके जन्मदिन पर यह चिट्ठी आती थी। आज उसका 30वाँ जन्मदिन था, और इस बार लिफाफे पर लिखा था—“मेरे लाल… आज सच जानने का दिन है।”
अर्जुन की आँखें भर आईं। लिफाफे में वही दादी की खुशबू थी—मोती जैसी सफेद साड़ी, हल्की सी चंदन की महक… जैसे दादी अभी भी यहीं कहीं बैठी हो। उसने धीरे-धीरे लिफाफा खोला। हर साल की तरह एक चिट्ठी थी, पर इस बार एक पुरानी फोटो भी थी और एक कागज़ पर लिखा हुआ एक पता। अर्जुन का दिल तेज़ धड़कने लगा। उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।
“मेरे प्यारे अर्जुन, जन्मदिन मुबारक, मेरे लाल। अगर तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे हो, तो मुझे गए दस साल हो चुके होंगे। दस साल… बहुत लंबा समय होता है ना? तुम बदल गए होगे, बड़े हो गए होगे। शायद अब नौकरी में ऊँचे पद पर हो, या तुम्हारी शादी भी हो गई हो… लेकिन बेटा, क्या तुम खुश हो?
क्या वो अर्जुन अब भी जिंदा है जो छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूँढ लेता था? जो बारिश में भीगना चाहता था, जो गुब्बारे वाले बच्चे से सिर्फ इसलिए गुब्बारा खरीद लेता था क्योंकि वो गरीब था? जिंदगी जिम्मेदारियों से इंसान को बड़ा कर देती है, पर कई बार उसे अंदर से सूखा भी देती है। मैं चाहती थी—तुम बड़ा बनो, पर कठोर मत बनो। तुम मजबूत बनो, पर पत्थर मत बनो। तुम कामयाब बनो, पर इंसानियत मत खोना।
तुम्हें पिछले दस सालों की चिट्ठियाँ याद हैं? पहली चिट्ठी में लिखा था—‘हमेशा माफी माँगना सीखो।’ दूसरी में—‘गलतियों से सीखो, उनसे डरो मत।’ तीसरी में—‘माँ-बाप को वक्त दो।’ बेटा, क्या तुमने उन बातों को अपनाया?
आज मैं तुम्हें एक राज बताने जा रही हूँ। ये चिट्ठियाँ… मैंने नहीं लिखीं। कम से कम पहली के बाद वाली तो नहीं। हैरान हो ना? तो सुनो, मेरे लाल…
जब मुझे पता चला कि मेरे पास ज्यादा समय नहीं है, तो मैं सिविल हॉस्पिटल गई थी, उस वार्ड में जहाँ गरीब मरीज भर्ती होते हैं। वहाँ मैंने दस लोगों से मुलाकात की—दस अलग चेहरे, दस अलग संघर्ष, और दस अधूरी इच्छाएँ। मैंने उन्हें एक-एक लिफाफा दिया। उसमें थोड़े पैसे, तुम्हारा पता और एक विनती—‘हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर उसे एक चिट्ठी भेजना, और चिट्ठी में लिखना कि जिंदगी ने तुम्हें क्या सिखाया।’
मैं चाहती थी कि तुम जिंदगी के असली सबक उन लोगों से सीखो जो रोज जिंदगी से लड़ते हैं। पहली चिट्ठी रामप्रसाद ने भेजी थी—एक रिक्शा चालक, जिसे कैंसर था। उसने लिखा था—‘माफी माँगना सीखो…’ क्योंकि वो अपनी बेटी से लड़कर मर गया था, और माफी माँगने का मौका नहीं मिला।
दूसरी चिट्ठी सुमित्रा देवी ने भेजी—एक विधवा जिसने अकेले तीन बच्चे पाले। उसने लिखा—‘गलतियों से सीखो…’ क्योंकि उसकी पूरी जिंदगी गलतियों को सुधारते-सुधारते गुजर गई, और उसी ने उसे मजबूत बनाया।
और इसी तरह… दस साल, दस चिट्ठियाँ, दस जिंदगियों के सबक।
अब इस चिट्ठी के साथ जो पता भेज रही हूँ, वो उसी बस्ती का है जहाँ ये लोग रहते थे। शायद अब उनमें से कोई न बचा हो, शायद कुछ बच गए हों… पर तुम्हें वहाँ जाना है, अर्जुन। उनसे मिलना है, या उनके परिवार से।
और बेटा… अगर तुम्हारे भीतर अभी भी वो दिल बचा है जो मैंने देखा था, तो तुम खुद जान जाओगे कि तुम्हें क्या करना है। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, मेरे लाल। तुम्हारी दादी।
पुनश्च: फोटो में जो दस लोग हैं… वही तुम्हारे गुरु हैं। उन्हें कभी मत भूलना।”
अर्जुन के हाथों से चिट्ठी काँप रही थी। उसने फोटो देखी। दस चेहरे, दस मुस्कानें, और बीच में दादी—वही मोती जैसी सफेद साड़ी में। अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया—पहली चिट्ठी के बाद उसने अपने बॉस से माफी माँगी थी। उस दिन उसका अहंकार टूटा था और इंसान बना था। दूसरी चिट्ठी के बाद उसने अपनी गलती से भागना छोड़ दिया था और सीखना शुरू किया था। तीसरी चिट्ठी के बाद उसने अपने पिता के साथ पूरा दिन बिताया था—बिना मोबाइल देखे, बस बातें करते हुए। हर चिट्ठी ने उसे बदला था। और आज उसे पता चला कि वो सिर्फ दादी का प्यार नहीं था, वो दस अजनबियों की दुआ थी।
अगले ही दिन अर्जुन उस पते पर पहुँच गया। गंदी गलियाँ थीं, टूटे घर थे, लेकिन लोगों की आँखों में फिर भी जिंदगी थी। उसने पूछना शुरू किया—“रामप्रसाद जी कहाँ रहते थे?”
एक युवक ने उसे देखा और चौंक गया, “आप… अर्जुन?” अर्जुन रुक गया, “हाँ… मैं अर्जुन हूँ।” युवक की आँखें भर आईं, “मैं रामप्रसाद का बेटा हूँ… पिताजी तीन साल पहले चल बसे।” अर्जुन का गला भर आया, “उन्होंने मुझे हर साल चिट्ठी भेजी…” युवक रो पड़ा, “हाँ… वो कहते थे—‘ये दादी माँ ने सौंपा है, मरते दम तक निभाऊँगा।’ आखिरी दो साल मैंने उनकी जगह लिखी थी।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया, “तुम्हारे पिताजी ने मेरी जिंदगी बदल दी…” युवक ने काँपती आवाज में पूछा, “सच? कैसे?” अर्जुन ने कहा, “उसने मुझे सिखाया कि माफी माँगना कमजोरी नहीं होती… माफी माँगना इंसान होने की पहचान है।” युवक फूट-फूटकर रोने लगा, “मैं सोचता था पिताजी बस सपना देख रहे हैं… पर आप सच में आ गए…”
अर्जुन एक-एक करके बाकी लोगों के घर भी गया। कहीं कोई जिंदा था, कहीं सिर्फ उनकी यादें बची थीं, लेकिन हर घर में एक बात common थी—दादी की आखिरी ख्वाहिश और उन अजनबियों की आखिरी ईमानदारी।
अंत में वो पहुँचा सुमित्रा देवी के घर। 75 साल की बूढ़ी औरत थी, पर आँखों में वही चमक थी, जैसे अब भी जिंदगी से हार मानना नहीं सीखा। अर्जुन ने कहा, “मैं… अर्जुन…” सुमित्रा देवी वहीं बैठकर रो पड़ीं, “बेटा… मैं रोज भगवान से प्रार्थना करती थी कि मुझे उस दिन तक जिंदा रखना जब तक तुम मिल नहीं जाते।” अर्जुन की आँखें भर आईं, “आपने मेरे लिए इतना क्यों किया?”
सुमित्रा देवी ने उसका माथा छुआ, “दादी ने हमें सिर्फ पैसे नहीं दिए थे, बेटा… उन्होंने हमें एक मकसद दिया था। हम सब बीमार थे, टूटे हुए थे, पर हर साल तुम्हें लिखते समय हम अपने दर्द को शब्दों में बदल देते थे, और उसी में हमारा इलाज हो जाता था।” अर्जुन समझ गया—दादी ने सिर्फ उसे नहीं बचाया था, दादी ने उन दस लोगों को भी बचाया था।
उस रात अर्जुन ने फैसला किया। अगले महीने उसने उसी बस्ती में एक छोटा सा स्कूल खोला। नाम रखा—“दादी माँ का आशीर्वाद।” स्कूल की दीवार पर उसने वो फोटो लगा दी—दादी और दस लोग। और नीचे लिखा—“ये वो लोग हैं जिन्होंने मुझे जीना सिखाया। बिना मिले, बिना कुछ लिए, सिर्फ एक बूढ़ी औरत के प्यार की खातिर।”
सुमित्रा देवी स्कूल की पहली शिक्षिका बनीं। रामप्रसाद का बेटा चौकीदार। बाकी परिवारों को भी उसने स्कूल से जोड़ दिया। स्कूल की पहली सालगिरह पर अर्जुन ने सबको इकट्ठा किया और दादी की आखिरी चिट्ठी सबके सामने पढ़ी। हर आँख नम थी, हर दिल भारी, पर रोशनी से भरा हुआ। अर्जुन ने कहा, “दादी ने पूछा था… क्या मैं वो इंसान बन पाया जो वो मुझे बनते देखना चाहती थीं… मुझे नहीं पता… पर मैं इतना जरूर जानता हूँ कि मैं कोशिश कर रहा हूँ। और ये कोशिश… आप सबकी वजह से है।”
तीन साल बाद स्कूल में 200 बच्चे पढ़ते थे। अर्जुन ने नौकरी छोड़ दी थी और पूरा समय स्कूल को देता था। एक दिन स्कूल में एक बूढ़ा आदमी आया। उसने कहा, “मैं मोहन हूँ… मैंने आपको पाँचवें साल चिट्ठी लिखी थी…” अर्जुन की आँखें चमक उठीं, “आप! आपने लिखा था—‘दूसरों की मदद करना ही सच्ची पूजा है।’” मोहन की आवाज काँप गई, “मैं सोचता था मेरी जिंदगी बेकार है… पर आज ये स्कूल देखकर… मुझे लगा मेरी जिंदगी का कोई मतलब है।” अर्जुन ने मुस्कुरा कर कहा, “हर जिंदगी का मतलब होता है… बस किसी को समझना पड़ता है।”
आज अर्जुन 40 साल का है। उसकी दो बेटियाँ हैं। वो उन्हें रोज दादी की कहानी सुनाता है, और उन दस लोगों की कहानी भी। स्कूल की दीवार पर अब एक और फोटो है—अर्जुन की बेटियाँ और बस्ती के बच्चे साथ में हँसते हुए। नई पीढ़ी, नई उम्मीदें, लेकिन वही प्यार। और हर साल अपने जन्मदिन पर अर्जुन वो पुरानी डायरी खोलता है, दस चिट्ठियाँ पढ़ता है, और हर बार रोता है—खुशी के आँसू। क्योंकि उसे पता है कि दादी उसे देख रही हैं और मुस्कुरा रही हैं।
कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते… वो चिट्ठियों में नहीं, हमारी सोच में, हमारे कर्मों में, और हमारी इंसानियत में जिंदा रहते हैं। दादी चली गई थीं… पर उन्होंने मुझे “अच्छा इंसान” बनकर हमेशा के लिए छोड़ दिया।
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“आपकी जिंदगी में वो कौन था जिसने आपको अच्छा इंसान बनाया?”