मैं कोई लेखक नहीं , ना ही कोई खास तजुर्बा हैं जिंदगी का, बस कुछ सैलाब हैं मन के और लंबी खामोशी की सिसकियां हैं कोशिश करती हु कुछ पिरोने का कुछ अपना कुछ आपका....। हो सकता मानसिक पटल पर अपनी दक्षता दिखने में चूक जाऊंगी पर फिर भी सोचती हु शुद्ध कही दिल को छू जाऊ। एक साधारण सी अति सूक्ष्म दुनिया की नासमझ लड़की हूं। जूझ रही हु खुद से , और जमाने को दिखा रही हूं कि मुझसे बेहतर कोई नहीं , पर सच कहूँ अधिकतर खुद से ही सवाल करती हु कि आखिर मैं हुं क्या.... मैं तो कुछ भी नहीं...कोई क्यों ही मुझे जाने मुझे याद करे। ऐसा क्या ही है जो कभी कुछ पा सकू ....मुझे तो मेरी मर्जी भी नहीं पता क्या चाहती हूँ कभी लगता है इतनी सख्त मजबूत हो जाऊ कि कभी किसी की जरूरत ही न हो सब अकेले सम्भल लू सबका भला करु पर किसी से कोई उम्मीद ना रखी और कभी तीव्र इच्छा होती की काश कोई तो संभाल ले मुझे ......शायद कभी ऐसा दिन आए जब मुझे कुछ भी सोचना ना पड़े दिल खोल कर रख दूं बस । ऐसा कहा कभी होता है किसी किसी के नसीब ही ऐसे लिखे होते है या कुछ लोग ऐसे होते जो वाकई में उस लायक हो । जिसे देख कर ही उसे पाने की इच्छा हो उन्हें सहेज कर पास रखने का मन हो , मेरा ऐसा भाग्य कहा । आपकी बिना इजाजत के ही मन का मीत बना रही हु जो मन में बीत रही है वो बता रही हूं। जताने का शौक नहीं मुझे बस कुछ किले हैं जो मुझे कुरेदे जा रही है उसे निकालने का प्रयास कर रही हूं। थक गई हु सोचते सोचते एक सपना एक चाह पता नहीं क्यों छोड़ नहीं पाती । क्यों चाहता है दिल की कि..कोई हो ! कोई हो ये जरूरी तो नहीं ... ऐसे कितने है जिन्होंने संन्यास ले लिया या अकेले जिन्दगी सुकून से बीता रहे है फिर मुझे इस नाव से पार क्यों नहीं मिल पा रहा।
रोज की थी लड़ाई होती है कि खुद को कैसे संभालकर रखूं। कभी कभी मेरी नाकामी मेरी आंखों से बह उठती है सीना फटने सा लगता है लगता है कि बस अब बाहर बहने दूं सब कुछ कह दूं सांसे तेज चलने लगती है फिर एकदम से दिल कहता है कि कहना तो है पर कहेगी कहां, कौन है जो तुझे सुने , जो तुझे समझ ले और अगर कह भी दिया तो फिर जो गुबार फूटेगा उस समय कौन है जो तुझे समेटेगा....तू खुद को समेट ले ऐसा होना ही था सो हुआ हैं। आखिर कौन किसका करता है और आए भी अकेले थे जाना भी अकेला है फिर साथ कैसा....मेरे आंसू खामोशी से बहते जाते है और सांसे मांग होकर जीवन की हकीकत अंदर घोलने का काम करने लगती है । कभी शायद अच्छा हो ये भगवान की इच्छा पर खुद के लिए खुद ही सहारा बनना ज्यादा सही है । और जब टूटु तो भगवान को अपना मान कर छोड़ दूं । पता नहीं अब कितने पन्ने जीवन के पलटने बाकी है पर ईश्वर अगर सफर ऐसा ही है तो मुझे ज्यादा लंबा रास्ता मत चला मैं बहुत थक गई हूं। बैसाखियों जरूरत में भी बिना सहारे चल रही हूं। मुझे पता है तू सब जनता है