ruho ka soda in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा

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रूहों का सौदा

रूहों का सौदा 

क्या जीत केवल तलवार से होती है? जब मर्यादा की दीवारें ढहने लगीं और क्रोध ने विवेक का गला घोंट दिया, तब रुद्र ने उठाया एक ऐसा कदम जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। लेकिन इस शांति के पीछे एक भयानक तूफान छिपा था। एक रहस्यमयी परछाईं और एक खौफनाक चेतावनी— 'महागुरु ही तुम्हारे विनाश का द्वार हैं!' क्या रुद्र अपने रक्षक पर भरोसा कर पाएगा? क्या 'रक्त-शिला' के जागने का अर्थ पूरे गुरुकुल का अंत है?"

​अध्याय 1  रुद्र का समर्पण और क्रोध का शमन

​तलवारों की खनखनाहट और लौरा की चीखें पूरे गलियारे में गूँज रही थीं। लौरा के प्रहार अब और भी तीखे होते जा रहे थे। रुद्र को समझ आ गया था कि यदि यह लड़ाई इसी तरह चलती रही, तो या तो मर्यादा पूरी तरह भंग हो जाएगी या किसी को गहरी चोट लग जाएगी। उसने देखा कि लौरा की आँखों में क्रोध के पीछे एक गहरी पीड़ा और असुरक्षा छिपी है।

​रुद्र का अप्रत्याशित कदम

​अचानक, रुद्र ने अपनी तलवार नीचे कर ली। उसने बचाव करना भी बंद कर दिया और अपनी तलवार को ज़मीन पर गिरा दिया। लौरा की तलवार उसके गले से मात्र एक इंच की दूरी पर रुक गई। पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर खड़े गुरुओं और शिष्यों की साँसें थम गईं।

​"क्यों रुक गए?" लौरा हाँफते हुए चिल्लाई। "अपनी तलवार उठाओ! लड़ो मुझसे!"

​रुद्र ने बहुत ही शांत और कोमल स्वर में कहना शुरू किया, "नहीं लौरा, अब और नहीं। तुम्हारा गुस्सा जायज है, लेकिन तुम्हारी ये लड़ाई मुझसे नहीं, खुद से है।"

​रुद्र की स्वीकृति

​रुद्र धीरे-धीरे लौरा की ओर बढ़ा, उसकी तलवार की नोक अभी भी उसके गले के पास थी। उसने शांत भाव से लौरा की आँखों में देखते हुए कहा, "लौरा, तुम शांत हो जाओ। मैं नहीं चाहता कि हम दोनों की लड़ाई इस गुरुकुल की नींव हिला दे। और जहाँ तक श्रेष्ठ होने की बात है..."

​रुद्र ने अपनी आवाज़ ऊँची की ताकि बाहर खड़े सभी छात्र और महागुरु भी सुन सकें, "मैं पूरे गुरुकुल के सामने, महागुरु के समक्ष यह कबूल करता हूँ कि तुम मुझसे कहीं बेहतर योद्धा हो। तुम्हारा कौशल, तुम्हारी गति और तुम्हारा समर्पण अद्वितीय है। मैंने तुम्हें कभी भी खुद से कम नहीं आँका है, बल्कि मैं तो तुम्हें अपना आदर्श मानता हूँ।"

​भावुक अंत

​रुद्र के इन निस्वार्थ शब्दों ने लौरा के भीतर धधक रही आग पर ठंडे जल का काम किया। उसके हाथ कांपने लगे और उसकी तलवार धीरे से हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। जिस सम्मान और पहचान के लिए वह लड़ रही थी, वह उसे रुद्र ने बिना लड़े ही दे दिया था। लौरा की आँखों से अब क्रोध के नहीं, बल्कि आत्मग्लानि के आँसू बहने लगे। उसने रुद्र की ओर देखा, जिसने अपना सिर झुका लिया था। महागुरु ने दूर खड़े होकर यह दृश्य देखा और उनकी आँखों में एक संतोष था—उन्हें पता चल गया था कि रुद्र ने न केवल युद्ध कला, बल्कि हृदय जीतने की कला भी सीख ली है।

​रुद्र के मुख से निकली वह स्वीकारोक्ति— "तुम मुझसे बेहतर हो" —ने न केवल लौरा का क्रोध शांत किया, बल्कि पूरे गुरुकुल के सामने एक नई मिसाल पेश की। मैदान में खड़ा हर छात्र, जो अब तक ईर्ष्या की आग में जल रहा था, रुद्र के इस बड़प्पन के आगे नतमस्तक हो गया।

​लौरा, जो अब तक केवल युद्ध को अपनी पहचान समझती थी, पहली बार निशब्द खड़ी थी। उसने अपनी तलवार उठाई, लेकिन इस बार आक्रमण के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के लिए। उसने तलवार की मूठ को अपने माथे से लगाया और रुद्र की ओर झुककर कहा, "रुद्र, आज तुमने मुझे युद्ध में नहीं, बल्कि मर्यादा में हरा दिया है। श्रेष्ठ शस्त्र नहीं होता, श्रेष्ठ वह मन होता है जो सत्य को स्वीकार कर सके।"

​आचार्या वसुंधरा की आँखों में गर्व के आंसू थे, और महागुरु के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान। उन्हें पता था कि इन दोनों का यह मिलाप ही आने वाले महा-अंधकार का एकमात्र काट है। जैसे ही दोनों ने एक-दूसरे को सम्मान दिया और छात्र जश्न मनाने के लिए आगे बढ़े, अचानक वातावरण का तापमान गिरने लगा। वह दोपहर की चिलचिलाती धूप देखते ही देखते एक अजीब से काले कोहरे में बदलने लगी। महागुरु का चेहरा अचानक पत्थर जैसा हो गया। उन्होंने आसमान की ओर देखा, जहाँ सूर्य को एक काली छाया निगल रही थी। यह ग्रहण प्राकृतिक नहीं था।

​खौफनाक चेतावनी

​तभी, गुरुकुल की उस ऊँची दीवार पर एक काली आकृति प्रकट हुई। उसके हाथ में एक मशाल थी जो नीली ज्वाला के साथ जल रही थी। उस आकृति ने एक डरावनी आवाज़ में कहा:

​"तैयारी पूरी हुई... रक्त-शिला जाग चुकी है। रुद्र, वह जिसे तुम अपना रक्षक समझ रहे हो, वही तुम्हारे विनाश का द्वार है।"

​इतना कहकर वह आकृति हवा में विलीन हो गई। रुद्र ने मुड़कर महागुरु की ओर देखा, जिनकी नज़रें अब झुकी हुई थीं। क्या महागुरु वाकई रुद्र को बचा रहे थे, या वे उसे किसी बड़े बलिदान के लिए तैयार कर रहे थे?

​अनकहे रहस्य

​रुद्र और लौरा एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, जहाँ अब प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि एक गहरा सन्नाटा था। मन में रह-रहकर यही सवाल उठ रहा था कि आखिर कैसे एक सामान्य से दिखने वाले अभ्यास से शुरू हुई यह घटना यहाँ तक पहुँच गई? शुरुआत तो केवल श्रेष्ठता की एक छोटी सी जंग से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते इसने एक भयानक मोड़ ले लिया। क्या वो सब कुछ जो अब तक गुरुकुल की दीवारों के पीछे हुआ था—चाहे वो रुद्र का कठिन परिश्रम हो, लौरा की बढ़ती ईर्ष्या हो, या महागुरु के वे रहस्यमयी निर्देश—सब इसी विनाशकारी पल की तैयारी थी?

​हवा में तैरती वह नीली ज्वाला इस बात का संकेत थी कि जो कुछ भी पीछे घटा है, वह तो बस एक छोटी सी चिंगारी थी; असली आग तो अब लगी है। अब रुद्र को उन पन्नों को पीछे मुड़कर देखना होगा कि आखिर कहाँ से और कैसे यह सब शुरू हुआ, और आने वाले कल के धुंधलके में क्या छिपा है।