Jaagti Parchhai - 4-5 in Hindi Horror Stories by Shivani Paswan books and stories PDF | जागती परछाई - 4-5

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जागती परछाई - 4-5

Chapter 4 : जिसे ढूँढा नहीं जाता

मैंने नाम लिया—Sarika।

उसने दो सेकंड सोचा, फिर बोली, “यहाँ इस नाम की कोई active file नहीं है।”

Active.
शब्द अटका रहा।
मतलब कभी रही होगी।
मैंने ज़्यादा सवाल नहीं किए। सवाल तभी पूछे जाते हैं जब सामने वाला सुनने को तैयार हो। यहाँ वो तैयारी नहीं थी।
दिन भर काम करती रही, लेकिन ध्यान बार-बार वहीं लौट आता था। कुछ ढूँढने की इच्छा और कुछ पाने का डर—दोनों एक साथ चल रहे थे।

शाम को घर लौटी तो सबसे पहले अलमारी खोली। पुरानी फाइलें, पुराने काग़ज़, कॉलेज के नोट्स—सब कुछ। मैं किसी एक चीज़ को ढूँढ नहीं रही थी, बस ये देखना चाहती थी कि क्या कुछ ज़्यादा है।
एक पुरानी कॉपी मिली। कवर थोड़ा फटा हुआ था।
खोलते ही कुछ पन्ने बीच से गायब थे।
मैंने ध्यान नहीं दिया होता, अगर आख़िरी पन्ने पर लिखा एक वाक्य न दिखता—

अगर ये पढ़ रही हूँ, तो मतलब मैंने फिर से सब भूलने का फैसला किया है।”

मेरे हाथ रुक गए।
“फिर से?”
मैंने खुद से पूछा।
ये पहली बार नहीं था।
ये बात अब साफ़ हो रही थी।
मैंने कॉपी बंद की और कुर्सी पर बैठ गई। कमरे में वही पुरानी खामोशी थी, लेकिन अब वो खाली नहीं लग रही थी। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो—मेरे सवाल पूछने का नहीं, बल्कि मेरे मान लेने का।
मोबाइल की स्क्रीन जली।
एक unknown number से मैसेज था।
कोई नाम नहीं।
कोई परिचय नहीं।
सिर्फ़ एक लाइन—

कुछ चीज़ें ढूँढी नहीं जातीं,
उन्हें याद किया जाता है।”

मैंने स्क्रीन बंद कर दी।
अब मुझे यक़ीन था—
ये सब संयोग नहीं है।
और ये भी कि
जिसे मैं ढूँढ रही हूँ,
वो शायद
मुझसे ही छुपा हुआ है।

Chapter 5 : कोई जो मुझे जानता है

मैंने उस मैसेज का जवाब नहीं दिया।
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब देना, उन्हें सच मान लेने जैसा होता है। और मैं अभी वहाँ तक नहीं पहुँची थी।

अगली सुबह घर से निकलते वक्त एक अजीब-सी सतर्कता थी। जैसे मैं पहली बार अपनी ही दिनचर्या को बाहर से देख रही हूँ—कौन-सा रास्ता लेती हूँ, कितनी देर रुकती हूँ, किससे बात करती हूँ।
ऑफिस के पास एक छोटा-सा कैफ़े है। मैं वहाँ अक्सर नहीं जाती, लेकिन उस दिन बिना सोचे अंदर चली गई। शायद इसलिए कि वहाँ शोर था। और शोर मुझे कुछ देर के लिए खुद से दूर रखता है।
कॉफी का कप सामने रखा ही था कि किसी ने मेरा नाम लिया।
“Shivi?”
आवाज़ अनजान नहीं थी।
पर याद भी नहीं आई।
मैंने सिर उठाया। सामने एक आदमी खड़ा था—लगभग मेरी उम्र का, साधारण-सा चेहरा, लेकिन आँखों में वो हिचक नहीं थी जो अजनबियों में होती है।
“पहचाना?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
मैंने सच कहा।
“नहीं।”
उसकी मुस्कान एक पल के लिए अटकी। फिर संभल गई।
“कोई बात नहीं। मुझे अंदाज़ा था।”
ये जवाब मुझे परेशान कर गया। लोग आमतौर पर ऐसा नहीं कहते।
“हम पहले मिले हैं?” मैंने पूछा।
उसने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, “हाँ। काफ़ी क़रीब से।”
क़रीब।
शब्द सीधा था, लेकिन मतलब धुँधला।
उसने अपना नाम बताया। मैं उसे दोहरा नहीं पाई। नाम दिमाग़ में टिक ही नहीं रहा था, जैसे फिसल रहा हो।
“तुम ठीक हो?” उसने पूछा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया। आदतन।
“बस थोड़ा थकी हुई हूँ।”
उसने मेरी तरफ़ ध्यान से देखा। बहुत ध्यान से।
“तुम्हें फिर से कुछ चीज़ें भूलनी शुरू हो गई हैं, है न?”
मेरे हाथ से कप लगभग छूट गया।
“तुम ये कैसे जानते हो?”
मेरी आवाज़ धीमी थी, लेकिन भीतर कुछ टूट-सा गया था।
उसने इधर-उधर देखा, जैसे यक़ीन कर रहा हो कि कोई सुन नहीं रहा।
“क्योंकि पिछली बार भी ऐसे ही शुरू हुआ था।”
पिछली बार।
ये शब्द अब नए नहीं रहे थे।
पर उनका वज़न अब बढ़ गया था।
“तुम Sarika को याद करती हो?”
उसने अचानक पूछा।
मेरे दिमाग़ में एक खालीपन फैल गया।
जैसे किसी ने सारी आवाज़ें एक साथ बंद कर दी हों।
मैंने कुछ नहीं कहा।
कहने को कुछ था भी नहीं।
उसने धीरे से कहा, “शायद यही बेहतर है। जितना कम याद रहेगा, उतना कम दर्द होगा।”
मैं खड़ी हो गई।
कॉफी हाथ नहीं लगाई।
“मुझे जाना होगा,” मैंने कहा।
वो भी खड़ा हुआ।
“Shivi,” उसने मेरा नाम इस तरह लिया जैसे उसे बहुत अच्छे से जानता हो,
“अगर फिर से सब शुरू होने लगे… तो इस बार अकेले मत लड़ना।”
मैं बिना पीछे देखे बाहर निकल आई।
सड़क वही थी।
लोग वही।
पर अब एक बात साफ़ थी—
मैं कुछ भूल नहीं रही हूँ।
मुझसे कुछ छीना जा रहा है।
और जो मुझे जानता है,
वो
मुझसे ज़्यादा जानता है।