गांव में सुबहें अक्सर शोर से नहीं, खबरों से शुरू होती हैं।
उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ।
माँ की आवाज़ में एक अजीब-सा ठहराव था जब उन्होंने कहा—
“सुना है, मोहल्ले की लड़की… भाग गई है।”
गांव में भाग जाना कोई क्रिया नहीं, एक तमगा होता है।
और इस तमगे को फैलाने का काम बहुत तेज़ी से होता है—हवा से भी तेज़।
कौन कह रहा है, क्यों कह रहा है—इन सवालों की ज़रूरत नहीं होती।
बस इतना काफी होता है कि कोई लड़की है, और उसने तय सीमा लांघ ली है।
मैंने उम्र सुनी—सत्रह, अठारह।
इतनी कम उम्र में इतना बड़ा फैसला?
मन ने सवाल उठाया, लेकिन जवाब देने से पहले ही समाज ने फैसला सुना दिया।
उसी दिन श्राद्ध का भोज था।
सरकारी रोक कागज़ों में थी, गांव की हवेलियों में नहीं।
पुरानी दीवारें, पीतल की थालियाँ, गर्म पूरी, आलू की सब्ज़ी, लड्डू और चांदी—
सब कुछ वैसा ही था, जैसा पीढ़ियों से होता आया है।
और उसी भीड़ में मैंने उसे देखा।
छह महीने पहले भागी हुई लड़की।
वो चुपचाप बैठी थी, जैसे अपनी मौजूदगी को छोटा कर लेना चाहती हो।
उसकी उम्र भी शायद वही—जहाँ बचपन खत्म होता है और समझ शुरू भी नहीं होती।
मैं उसे देखती रही।
वो शायद जानती थी कि हर निगाह उसे तौल रही है—
गलती की नाप में, इज़्ज़त के तराज़ू पर।
घर आकर लगा दिन खत्म हो गया है।
लेकिन गांव में दिन कभी यूँ खत्म नहीं होते।
फोन आया—
“वो नीलम थी… जिमने में आई थी।”
अब नाम मिल गया था।
और नाम मिलते ही कहानियाँ और तेज़ हो जाती हैं।
कहा गया—उसे घर ले आए हैं।
कहा गया—वो भागी नहीं थी।
कहा गया—बस मासी के घर गई थी।
लेकिन गांव की औरतों को सच और झूठ के बीच फर्क समझाने की ज़रूरत नहीं होती।
उन्हें सब पता होता है—
कहाँ थी, किसके साथ थी, और क्यों थी।
कुछ दिन बाद उसकी शादी कर दी गई।
एक नए लड़के के साथ।
घरवालों ने राहत की सांस ली—
इज़्ज़त अब सुरक्षित थी।
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि लड़की सुरक्षित है या नहीं।
तीन महीने बाद वही हुआ, जो होना था।
नीलम फिर भाग गई।
उसी लड़के के साथ, जिसे वो पहले चुन चुकी थी।
अब समाज के पास शब्द कम पड़ गए।
गुस्सा बचा, ताने बचे, और फैसले बचे—
“ऐसी लड़कियाँ…”
“इतनी आज़ादी…”
“यही नतीजा…”
मैंने भी एक पल को सोचा—
शायद सच में आज़ादी ज़्यादा हो गई है।
फिर याद आया—
मैं भी एक लड़की हूँ।
मैं न नीलम के हर फैसले का समर्थन करती हूँ,
न उस समाज का जो फैसले सुनाता है।
मुझे कमी दिखती है—
उस बातचीत की, जो कभी हुई ही नहीं।
उस भरोसे की, जो बनाया ही नहीं गया।
अब वो समय नहीं रहा
जब बेटियाँ सिर्फ़ इंतज़ार करती थीं—शादी का।
और वो समय भी नहीं रहा
जब बच्चे बिना सवाल किए चुप रहते थे।
अगर आज भी हम सिर्फ़ यही सोचते रहेंगे कि
लोग क्या कहेंगे,
मैं न नीलम के हर फैसले को सही ठहराती हूँ,
न समाज के हर डर को पूरी तरह गलत कहती हूँ।
मुझे बस इतना लगता है कि कहीं न कहीं
हम सब से कुछ छूट गया।
शायद बातें समय पर नहीं हुईं।
शायद सवालों से डर लगे।
शायद “इज़्ज़त” को बचाते-बचाते
किसी की आवाज़ सुनना भूल गए।
समय बदल रहा है,
और उसके साथ बच्चे भी।
अब ज़रूरत पाबंदियों की नहीं,
समझ की है।
डर की नहीं,
संवाद की है।
अगर हम अपने बच्चों के साथ बैठकर
बिना जज किए बात कर सकें,
तो शायद फैसले भागने में नहीं,
समझ में लिए जाएँ।
और शायद तब
ना किसी नीलम को
यूँ खुद को साबित करने के लिए
बार-बार भागना पड़े।