Rocky Aur Rani ki Prem Kahani in Hindi Love Stories by The Urban Writer books and stories PDF | रोकी और रानी की प्रेम कहानी

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रोकी और रानी की प्रेम कहानी




स्थान: 'सुकून विला', कसौली (हिमाचल प्रदेश)
समय (टाइमलाइन 1): 10 जनवरी, 2026 (रात के 11:45 बजे)
तापमान: -2°C (बर्फीला तूफ़ान)

बाहर बर्फीला तूफ़ान अपनी पूरी ताकत से चीख रहा था। कसौली की वादियों में स्थित 'सुकून विला' आज सुकून से कोसों दूर, किसी भुतहा हवेली जैसा लग रहा था। साल 2026 की जनवरी इतनी सर्द होगी, ये 'ग्लोबल वार्मिंग' के एक्सपर्ट्स ने भी प्रेडिक्ट नहीं किया था।
विला के लिविंग रूम में, रोकी ने फायरप्लेस में थोड़ी और लकड़ियाँ डालीं। आग की लपटें भड़कीं, और रोकी के चेहरे पर एक उदास सी परछाई नाच उठी। रोकी, उम्र 28 साल। पेशे से एक 'Data Scientist' और दिल से एक टूटा हुआ आशिक। शहर के शोरशराबे, ब्रेकअप के डिप्रेशन और डिजिटल दुनिया के फेक दिखावे से भागकर, वो अपने दादाजी के इस पुराने विला में 'Digital Detox' के लिए आया था।
यहाँ न वाई-फाई था, न ही स्मार्ट होम डिवाइसेज। यहाँ तक कि उसका iPhone 16 Pro Max भी नेटवर्क न होने के कारण सिर्फ एक महंगा पेपरवेट बनकर रह गया था।
रोकी ने अपने हाथ रगड़े और कमरे के कोने में रखे उस पुराने, धूल से अटे 'Grandfather Clock' की तरफ देखा। टिकटिक... टिकटिक... सन्नाटे को चीरती वो आवाज़ अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी। तभी उसकी नज़र कमरे के दूसरे कोने में रखी एक चीज़ पर पड़ी—एक पुराना, भारी-भरकम, रोटरी डायल वाला लैंडलाइन फोन। काले रंग का वो फोन, जिस पर 90 के दशक की धूल जमी थी।
"अजीब है," रोकी बुदबुदाया। "दादाजी ने इसे फेंका क्यों नहीं? इसकी वायर तो कटी हुई है।"
उसने कौतूहलवश फोन के रिसीवर को उठाया। कोई डायल टोन नहीं थी। बस एक अजीब सा सन्नाटा। "Dead as my love life," उसने हसते हुए सोचा और रिसीवर वापस रख दिया।
तभी...
ट्रिंग... ट्रिंग...
रोकी का दिल एक पल के लिए रुक सा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा। आवाज़ उसी फोन से आ रही थी।
ट्रिंग... ट्रिंग...
"Impossible!" रोकी के माथे पर पसीना आ गया, जबकि कमरे का तापमान जमा देने वाला था। उसने फोन की वायर चेक की। वायर कटी हुई थी और हवा में झूल रही थी। बिना कनेक्शन के लैंडलाइन कैसे बज सकता है? क्या ये कोई प्रैंक है? या मेरा वहम? या फिर... कोई भूत?
हिम्मत करके, कांपते हाथों से उसने रिसीवर उठाया और कान से लगाया।
"ह... हेलो?" उसकी आवाज़ लड़खड़ाई।
दूसरी तरफ से बहुत ज़्यादा 'Static Noise' (खरखर की आवाज़) आ रही थी, जैसे रेडियो का सिग्नल वीक हो। और फिर, उस शोर के बीच से एक आवाज़ आई। एक लड़की की आवाज़। मीठी, सुरीली, लेकिन थोड़ी घबराई हुई।
"हेलो? कौन? क्या ये मदनलाल जी की दुकान है? मुझे अर्जेंट कॉल करना है, मेरा फोन डेड है।"
रोकी confuse हो गया। "मदनलाल? नहीं, ये 'सुकून विला' है। और आप कौन? ये नंबर तो बंद है।"
"बंद?" लड़की हंसी। उसकी हंसी में एक खनक थी। "कैसी बातें कर रहे हैं भाईसाहब? अभी तो मैंने 'क्रॉस-कनेक्शन' सही किया है। खैर, मुझे शिमला बात करनी है, लाइन मिल ही नहीं रही। आज मौसम बहुत ख़राब है।"
"हाँ, मौसम तो ख़राब है," रोकी ने खिड़की की तरफ देखा, जहाँ बर्फ गिर रही थी। "स्नोफॉल बहुत ज़्यादा है।"
"स्नोफॉल?" लड़की चौंकी। "अरे, आप पागल हो गए हैं क्या? जून के महीने में स्नोफॉल? यहाँ तो बारिश हो रही है, और वो भी ऐसी कि पूरा कसौली भीग गया है। उफ्फ, ये उमस!"
रोकी का दिमाग चकरा गया। "जून? मैडम, आप नशा करके बैठी हैं क्या? आज 10 जनवरी है। और साल 2026 चल रहा है।"
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि रोकी को अपनी धड़कनें सुनाई देने लगीं।
"मिस्टर," लड़की की आवाज़ अब थोड़ी सख्त हो गई थी। "मज़ाक की भी हद होती है। आज 15 जून, 1996 है। कल ही तो इंडिया हारी है इंग्लैंड से, वो सौरव गांगुली की सेंचुरी के बावजूद। पूरा मूड ऑफ है और आप यहाँ साल बदलकर मज़ाक कर रहे हैं?"
रोकी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। 1996? सौरव गांगुली का डेब्यू? ये लड़की या तो बहुत बड़ी एक्ट्रेस है जो 24 घंटे कैरेक्टर में रहती है, या फिर कुछ बहुत गड़बड़ है।
"सुनिए," रोकी ने अपनी 'Logical' बुद्धि लगाने की कोशिश की। "मैं नहीं जानता आप कौन हैं, लेकिन ये कोई प्रैंक है तो प्लीज़ बंद करिये। मैं रोकी बोल रहा हूँ।"
"मैं रानी," उसने जवाब दिया। "और मैं कोई प्रैंक नहीं कर रही। मैं इसी विला के ऊपर वाले कमरे में हूँ। 'सुकून विला' में। मेरे पापा ने ये विला गर्मियों की छुट्टियों के लिए रेंट पर लिया है।"
रोकी की साँसें अटक गईं। "ऊपर वाले कमरे में?"
रोकी ने रिसीवर कान पर लगाए रखा और धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमराईं। "मैं... मैं भी इसी विला में हूँ रानी। और ऊपर वाला कमरा... खाली है।"
"झूठ!" रानी चिल्लाई। "मैं अभी बेड पर बैठकर 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कैसेट सुन रही हूँ। वॉकमेन पर। रुकिए..."
अचानक फोन में से एक गाना सुनाई देने लगा। कुमार सानू की आवाज़— 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...'
रोकी दौड़कर ऊपर वाले कमरे में पहुँचा। दरवाज़ा धड़ाम से खोला।
कमरा खाली था। वीरान। धूल से भरा हुआ। वहां कोई रानी नहीं थी। कोई वॉकमेन नहीं था।
"रानी?" रोकी हाँफते हुए बोला। "मैं कमरे में हूँ। यहाँ कोई नहीं है। सिर्फ धूल है और अँधेरा।"
"मैं भी कमरे में हूँ रोकी," रानी की आवाज़ अब डर से कांप रही थी। "लाइट गई हुई है, मैंने मोमबत्ती जलाई है। आप कहाँ हैं? मुझे डर लग रहा है।"
रोकी ने टॉर्च जलाई। और तभी... उसकी नज़र कमरे के बीचो-बीच रखे एक पुराने लकड़ी के टेबल पर पड़ी।
"रानी," रोकी ने थूक निगला। "तुम कहाँ बैठी हो?"
"मैं स्टडी टेबल पर बैठी हूँ," रानी ने कहा।
"क्या तुम्हारे पास कोई नुकीली चीज़ है? कोई पेन? या कुछ?" रोकी का दिल हथौड़े की तरह बज रहा था।
"हाँ, मेरे पास मेरा 'हेयरपिन' है। क्यों?"
"उस टेबल पर... उस टेबल पर अपना नाम लिखो। अभी।"
"आप पागल तो नहीं हैं? पापा डांटेंगे।"
"प्लीज़ रानी! डू इट! मेरे लिए। अगर तुम सच में वहाँ हो... तो लिखो।"
एक पल की खामोशी। फिर फोन पर 'खुरचने' की आवाज़ आने लगी। खच... खच... खच...
रोकी ने अपनी टॉर्च की रौशनी उस पुराने, धूल भरे टेबल पर डाली। सदियों पुरानी धूल थी उस पर।
और फिर, रोकी की आँखों के सामने जो हुआ, उसने विज्ञान, तर्क और समय के सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ा दीं।
धूल अपने आप हट रही थी। जैसे कोई अदृश्य हाथ वहां कुछ लिख रहा हो। पुरानी लकड़ी पर ताज़ा, बिल्कुल ताज़ा खरोंचें उभरने लगीं। लकीरें गहरी होती गईं।
पहले 'R' बना। फिर 'A'. फिर 'N'. और आखिर में 'I'.
RANI - 1996
रोकी चीखना चाहता था, लेकिन गला सूख चुका था। वो खरोंचें ताज़ी थीं, उनमें से लकड़ी का बुरादा निकल रहा था, लेकिन लिखने वाला कोई नहीं था।
"मैंने लिख दिया," फोन पर रानी की आवाज़ आई। "खुश? अब बताइये आप कहाँ छिपे हैं? क्या आप कोई जादूगर हैं?"
रोकी घुटनों के बल गिर पड़ा। हाथ में रिसीवर अभी भी था। उसकी आँखों में अविश्वास और खौफ था। वो 2026 में था। वो 1996 में थी। 30 साल का फासला। लेकिन ये फोन... ये फोन वो पुल था जिसने वक्त की नदी के दो किनारों को जोड़ दिया था।
"रानी..." रोकी फुसफुसाया। "मैं जादूगर नहीं हूँ। मैं... मैं शायद तुम्हारे 'भविष्य' में हूँ।"
"भविष्य?" रानी हंसी, पर इस बार हंसी में डर था। "कैसा भविष्य? क्या वहां उड़ने वाली कारें हैं?"
"नहीं," रोकी की आँखों से एक आंसू गिरा। "उड़ने वाली कारें तो नहीं हैं, लेकिन... यहाँ अकेलेपन का बहुत शोर है। रानी, हम दोनों एक ही जगह पर हैं, लेकिन हमारा 'वक्त' अलग है। तुम 1996 में हो, और मैं 2026 में।"
दूसरी तरफ सन्नाटा था। शायद रानी इसे हज़म करने की कोशिश कर रही थी। या शायद... कनेक्शन टूट रहा था।
फोन में 'Static' शोर बढ़ने लगा।
खर... खर... खर...
"रोकी? रोकी आपकी आवाज़ कट रही है!" रानी चिल्लाई।
"रानी! फोन मत काटना!" रोकी चिल्लाया। "मुझे जानना है ये कैसे हो रहा है!"
"रोकी... मुझे डर लग रहा है... खिड़की के बाहर... कोई है..." रानी की आवाज़ थरथराई। "बारिश में... एक परछाई..."
"कौन है रानी? दरवाजा लॉक करो!"
"वो... वो मुझे देख रहा है... उसकी आँखें... रोकी, वो कह रहा है... 'वक्त के साथ खिलवाड़ मत करो'..."
क्लिक।
फोन कट गया। डेड। फिर से वही सन्नाटा।
रोकी ने पागलों की तरह रिसीवर को हिलाया। "हेलो? हेलो! रानी!"
कोई जवाब नहीं। सिर्फ बाहर बर्फीले तूफ़ान की आवाज़। और मेज़ पर लिखा वो ताज़ा नाम—RANI - 1996.
रोकी वहीं बैठा रहा, सुन्न। उसे पता नहीं था कि उसने अभी-अभी क्या शुरू कर दिया है। उसने वक्त के एक ऐसे दरवाज़े को खटखटाया था, जो बंद ही रहना चाहिए था।
उसे नहीं पता था कि 1996 की उस रात, रानी की खिड़की के बाहर खड़ा वो शख्स कौन था। लेकिन एक बात तय थी—नियति ने अपना खेल शुरू कर दिया था। और इस खेल में, समय ही सबसे बड़ा विलेन बनने वाला था।
क्रमशः

रानी की खिड़की के बाहर कौन था? क्या वो कोई इंसान था या समय का कोई रक्षक?
क्या फोन दोबारा बजेगा?
सुकून विला का इतिहास क्या है? दादाजी ने ये फोन क्यों रखा था?
क्या रोकी 30 साल पुरानी किसी घटना को बदल सकता है?