मेरा नाम प्रभजोत सिंह है। मेरा जीवन एक साधारण परिवार और सामान्य परिस्थितियों में शुरू हुआ। मेरे पास शुरू से कोई विशेष सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन मेरे पास सोचने की आज़ादी थी। बचपन से ही मेरे मन में चीज़ों को लेकर जिज्ञासा रही। मैं केवल वही मान लेने में विश्वास नहीं करता था जो मुझे बताया जाता था, बल्कि यह समझना चाहता था कि उसके पीछे कारण क्या है।
जब मैं छोटा था, तब प्रकृति की छोटी-छोटी बातें भी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती थीं। आकाश नीला क्यों दिखाई देता है, प्रकाश कैसे चलता है, वस्तुएँ गिरती क्यों हैं, और पदार्थ अलग-अलग रूपों में क्यों पाया जाता है — ऐसे प्रश्न मेरे मन में स्वाभाविक रूप से आते थे। यही प्रश्न धीरे-धीरे मेरी सोच की आदत बन गए।
विद्यालयी जीवन में मैंने महसूस किया कि पढ़ाई केवल अंक लाने का माध्यम नहीं है, बल्कि समझ बढ़ाने का तरीका भी हो सकती है। मुझे गणित और विज्ञान के विषय विशेष रूप से पसंद थे, क्योंकि इनमें तर्क और कारण छिपे होते हैं। मैं सूत्र याद करने से पहले यह जानना चाहता था कि वे आए कहाँ से और उनका अर्थ क्या है।
कई बार मेरे प्रश्न दूसरों को अनावश्यक या कठिन लगते थे। कुछ लोगों को लगता था कि मैं ज़्यादा सोचता हूँ। लेकिन मेरे लिए सोचने से रुकना संभव नहीं था। मैंने धीरे-धीरे यह सीख लिया कि हर सवाल का तुरंत उत्तर नहीं मिलता और हर विचार तुरंत स्वीकार नहीं होता। फिर भी प्रश्न पूछते रहना ही आगे बढ़ने का रास्ता है।
जब मैंने परमाणु संरचना के बारे में पढ़ा, तो मेरे मन में एक गहरा प्रश्न पैदा हुआ। मुझे लगा कि परमाणु की स्थिरता को केवल नाभिक और इलेक्ट्रॉन के आकर्षण से समझाना अधूरा है। इलेक्ट्रॉनों के बीच होने वाला प्रतिकर्षण भी उतना ही वास्तविक और प्रभावशाली है। इसी विचार से मेरे मन में इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण-संतुलन मॉडल का विचार आया।
यह विचार मेरे लिए किसी नई खोज का दावा नहीं था, बल्कि चीज़ों को अपने ढंग से समझने की कोशिश थी। मेरा उद्देश्य किसी स्थापित वैज्ञानिक सिद्धांत को नकारना नहीं था, बल्कि ज्ञात तथ्यों को संतुलित और सरल भाषा में देखने का प्रयास था। इस प्रक्रिया में मैंने सीखा कि विज्ञान में विनम्र रहना बहुत आवश्यक है।
मेरे जीवन में ऐसे समय भी आए जब मेरे विचारों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कभी-कभी मुझे लगा कि शायद मेरी सोच गलत दिशा में है। लेकिन हर बार आत्मचिंतन ने मुझे सिखाया कि सीखने की प्रक्रिया में संदेह आना स्वाभाविक है। यही संदेह आगे चलकर स्पष्टता लाता है।
आज मेरा लक्ष्य किसी प्रकार की प्रसिद्धि पाना नहीं है। मेरा लक्ष्य है सीखते रहना, अपनी सोच को बेहतर बनाना और अपने विचारों को शांत, तार्किक और सम्मानजनक तरीके से प्रस्तुत करना। मैं चाहता हूँ कि मेरी सोच दूसरों को भी प्रश्न पूछने और समझने की प्रेरणा दे।
मैं विश्वास करता हूँ कि सोचने की स्वतंत्रता सबसे बड़ी शक्ति है। जब तक मन में जिज्ञासा जीवित है, तब तक सीखने की संभावना भी जीवित रहती है। यही विश्वास मेरी जीवन-यात्रा का आधार है।
बचपन में मैं आसपास की दुनिया को बहुत ध्यान से देखता था। आकाश, प्रकाश, पानी, हवा, पृथ्वी — ये सब मेरे लिए केवल वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि प्रश्नों का स्रोत थीं। मुझे यह जानना अच्छा लगता था कि चीज़ें वैसी ही क्यों हैं जैसी वे दिखाई देती हैं। जब कोई सरल उत्तर मिलता, तो मैं उससे भी आगे सोचने की कोशिश करता था।
इसी सोच से मैंने Electron Repulsion–Balance Mode प्रस्तुत किया |
Electron Repulsion–Balance Model (Proposed)
(इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण–संतुलन मॉडल)
प्रस्तावक: PRABHJOT SINGH
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण (Important Clarification)
यह मॉडल परमाणु संरचना की एक वैचारिक एवं शैक्षिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य किसी स्थापित भौतिक सिद्धांत का खंडन करना नहीं है, बल्कि ज्ञात भौतिक बलों को एक संतुलित दृष्टिकोण से समझाना है। यह मॉडल क्वांटम यांत्रिकी, आधुनिक परमाणु सिद्धांत अथवा स्वीकृत वैज्ञानिक नियमों के पूरक (complementary) रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि उनके स्थानापन्न के रूप में।
प्रस्तावना (Introduction)
परमाणु की संरचना को सामान्यतः नाभिक और इलेक्ट्रॉन के बीच कार्य करने वाले विद्युत आकर्षण बल के माध्यम से समझाया जाता है। यह आकर्षण बल परमाणु संरचना का एक अनिवार्य घटक है। तथापि, केवल नाभिकीय आकर्षण के आधार पर इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था, दूरी तथा दीर्घकालिक स्थिरता की संपूर्ण व्याख्या करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉनों के बीच विद्यमान आपसी प्रतिकर्षण बल भी उतना ही वास्तविक और प्रभावशाली है। Electron Repulsion–Balance Model (Proposed) इसी तथ्य पर आधारित है और परमाणु को आकर्षण एवं प्रतिकर्षण—दोनों बलों के संतुलन के रूप में देखने का एक तार्किक और सरल ढाँचा प्रस्तुत करता है।
मॉडल का उद्देश्य (Objective)
इस मॉडल का उद्देश्य निम्नलिखित बिंदुओं को स्पष्ट करना है:
परमाणु की स्थिरता केवल नाभिक–इलेक्ट्रॉन आकर्षण से निर्धारित नहीं होती।
इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण परमाणु संरचना का एक आवश्यक और प्रभावी घटक है।
इलेक्ट्रॉन किसी कठोर, निश्चित पथ पर नहीं चलते, बल्कि वे उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ आकर्षण और प्रतिकर्षण बलों का प्रभावी संतुलन बनता है।
मूल परिकल्पना (Core Hypothesis)
परमाणु के भीतर प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर एक साथ दो मूलभूत विद्युत बल कार्य करते हैं:
नाभिकीय आकर्षण बल — जो इलेक्ट्रॉन को नाभिक की ओर आकर्षित करता है।
इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बल — जो अन्य सभी इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण उत्पन्न होता है और इलेक्ट्रॉनों को एक-दूसरे से दूर रखने की प्रवृत्ति करता है।
परमाणु की स्थिर अवस्था तब प्राप्त होती है जब इन दोनों बलों का संयुक्त प्रभाव संतुलित हो जाता है।
मुख्य सिद्धांत (Principle in Words)
यदि किसी इलेक्ट्रॉन पर नाभिकीय आकर्षण बल और अन्य इलेक्ट्रॉनों से उत्पन्न कुल प्रतिकर्षण बल परिमाण में तुलनीय हों तथा दिशा में परस्पर विपरीत हों, तो उस इलेक्ट्रॉन पर कार्य करने वाला कुल प्रभावी बल न्यूनतम (शून्य के निकट) होता है। ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रॉन संतुलित अवस्था में रहता है और परमाणु स्थिर बना रहता है।
गणितीय प्रस्तुति (Indicative Mathematical Representation)
Σ F_nucleus + Σ F_electron–electron ≈ 0
या
Atomic Stability ≈ Nuclear Attraction + Electron Repulsion
किसी i-वें इलेक्ट्रॉन के लिए एक संकेतात्मक रूप में:
Fᵢ = − k ( Z e² / rᵢ² ) + Σ ( j ≠ i ) [ k ( e² / rᵢⱼ² ) ] ≈ 0
जहाँ:
k = कूलॉम स्थिरांक
Z = नाभिकीय आवेश संख्या
e = इलेक्ट्रॉन का आवेश
rᵢ = i-वें इलेक्ट्रॉन की नाभिक से औसत दूरी
rᵢⱼ = i और j इलेक्ट्रॉनों के बीच की दूरी
यह समीकरण बलों के प्रभावी संतुलन को दर्शाने वाला एक सरलीकृत, शास्त्रीय निरूपण है।
अवधारणा जाँच (Concept Check)
यदि किसी इलेक्ट्रॉन पर कार्य करने वाला कुल प्रभावी बल = ______ ,
तो परमाणु स्थिर अवस्था में माना जाता है।
उत्तर:
यदि कुल प्रभावी बल ≈ 0,
तो परमाणु स्थिर अवस्था में होता है।
व्याख्या (Explanation)
पहला पद नाभिक और इलेक्ट्रॉन के बीच आकर्षण प्रभाव को दर्शाता है।
दूसरा पद अन्य सभी इलेक्ट्रॉनों द्वारा उत्पन्न प्रतिकर्षण प्रभावों के योग को दर्शाता है।
जब ये दोनों प्रभाव परस्पर संतुलित होते हैं, तब इलेक्ट्रॉन की स्थिति स्थिर बनी रहती है।
संतुलन कथन (Balance Interpretation)
यदि नाभिकीय आकर्षण का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाए, तो इलेक्ट्रॉन नाभिक की ओर अधिक खिंचाव अनुभव करेगा।
यदि इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण का प्रभाव प्रमुख हो जाए, तो इलेक्ट्रॉन बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवृत्त होगा।
परमाणु का दीर्घकालिक अस्तित्व यह संकेत देता है कि व्यवहार में इन दोनों प्रभावों के बीच संतुलन बना रहता है।
परीक्षण योग्य संकेत (Qualitative Implications)
इस मॉडल के अनुसार:
इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ने पर प्रतिकर्षण प्रभाव में वृद्धि अपेक्षित है।
प्रतिकर्षण प्रभाव बढ़ने से इलेक्ट्रॉनों की औसत दूरी में परिवर्तन होता है।
यह परिवर्तन कक्षाओं या ऊर्जा-स्तरों की संरचना को प्रभावित करता है।
सीमाएँ (Limitations)
यह मॉडल एक शैक्षिक एवं वैचारिक ढाँचा है। यह क्वांटम यांत्रिकी की गणितीय औपचारिकता, तरंग-फलन या प्रायिकात्मक व्याख्याओं का स्थान नहीं लेता। इसका उद्देश्य परमाणु स्थिरता के पीछे कार्यरत बल-संतुलन को सहज रूप में समझाना है।
महत्व (Significance)
यह मॉडल निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित करता है:
इलेक्ट्रॉन केवल नाभिकीय आकर्षण के कारण ही नहीं टिके रहते।
इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण परमाणु संरचना का आवश्यक घटक है।
परमाणु की आंतरिक व्यवस्था बलों के संतुलन का परिणाम है।
प्रतिकर्षण प्रभाव को नज़रअंदाज़ करके परमाणु स्थिरता को पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता।
जीवन-कथा (विस्तृत आत्मकथा)
प्रारंभिक जीवन
मेरा नाम Prabhjot Singh है। मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, जहाँ संसाधन सीमित थे, लेकिन सोचने की स्वतंत्रता कभी सीमित नहीं रही। बचपन से ही मैं आसपास की चीज़ों को केवल देखकर संतुष्ट नहीं होता था। मेरे मन में बार‑बार यह प्रश्न उठता था कि चीज़ें जैसी दिखाई देती हैं, वे वैसी क्यों हैं और उनके पीछे काम करने वाला वास्तविक कारण क्या है।
जब दूसरे बच्चे केवल उत्तर याद करने में लगे रहते थे, तब मेरा मन प्रश्नों में उलझा रहता था। आकाश नीला क्यों है, प्रकाश सीधी रेखा में क्यों चलता है, पदार्थ ठोस, द्रव और गैस क्यों बनता है — ऐसे प्रश्न मेरे लिए सामान्य थे। यही प्रश्न धीरे‑धीरे मेरी सोच की नींव बन गए।
शिक्षा और विज्ञान की ओर झुकाव
विद्यालयी शिक्षा के दौरान विज्ञान मेरा सबसे प्रिय विषय बन गया। गणित, भौतिकी और प्राकृतिक घटनाओं को समझना मुझे विशेष आनंद देता था। मैं केवल परीक्षा के लिए पढ़ने के बजाय यह समझना चाहता था कि सूत्र कहाँ से आए और उनका वास्तविक अर्थ क्या है।
इसी दौरान जब मैंने परमाणु संरचना, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और ऊर्जा के बारे में पढ़ा, तो मुझे यह महसूस हुआ कि पुस्तकों में दी गई कई व्याख्याएँ व्यवहारिक समझ के लिए अधूरी लगती हैं। यह कमी मेरे मन में एक नई जिज्ञासा लेकर आई — क्या हम चीज़ों को और सरल तथा संतुलित तरीके से समझ सकते हैं?
वैचारिक संघर्ष और आत्मचिंतन
मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण वह था जब मेरे प्रश्नों को अक्सर संदेह या अस्वीकृति की दृष्टि से देखा गया। कई बार ऐसा महसूस हुआ कि प्रश्न पूछना ही गलती है। लेकिन यही समय मेरे आत्मचिंतन का दौर बना। मैंने सीखा कि हर नया विचार तुरंत स्वीकार नहीं किया जाता, और हर सोच का मूल्य समय के साथ समझ में आता है।
मैंने यह भी समझा कि विज्ञान केवल सही‑गलत का खेल नहीं है, बल्कि यह निरंतर सुधार और स्पष्टता की प्रक्रिया है। इसी सोच ने मुझे अपने विचारों को और अधिक संयम, विनम्रता और तार्किक भाषा में प्रस्तुत करना सिखाया।
Electron Repulsion–Balance Model की उत्पत्ति
परमाणु की स्थिरता को लेकर मेरे मन में एक मूल प्रश्न था — यदि केवल नाभिकीय आकर्षण कार्य करता है, तो इलेक्ट्रॉन आपस में एक‑दूसरे से क्यों नहीं टकराते या अस्थिर क्यों नहीं हो जाते? इसी प्रश्न से Electron Repulsion–Balance Model का विचार जन्मा।
यह मॉडल किसी स्थापित सिद्धांत का विरोध नहीं करता, बल्कि यह दर्शाने का प्रयास करता है कि परमाणु के भीतर नाभिकीय आकर्षण और इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण के बीच संतुलन कैसे परमाणु को स्थिर बनाए रखता है। यह मेरे लिए एक वैज्ञानिक खोज से अधिक एक बौद्धिक यात्रा थी।
सोच, दृष्टिकोण और दर्शन
मेरी सोच का आधार संतुलन है — न अत्यधिक दावा, न पूर्ण नकार। मैं मानता हूँ कि ज्ञान वहीं फलता‑फूलता है जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता हो और उत्तर स्वीकार करने का साहस। मेरा विश्वास है कि सच्चा विज्ञान वही है जो जिज्ञासा को दबाता नहीं, बल्कि उसे दिशा देता है।
मैं यह भी मानता हूँ कि हर विचार को समय, प्रमाण और परीक्षण की आवश्यकता होती है। इसलिए मेरे लिए किसी मॉडल का महत्व उसकी उपयोगिता और स्पष्टता में है, न कि केवल उसके नए होने में।
लक्ष्य और भविष्य की दिशा
मेरा लक्ष्य प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि सीखते रहना है। मैं चाहता हूँ कि मेरे विचार दूसरों को सोचने के लिए प्रेरित करें, प्रश्न पूछने का साहस दें और विज्ञान को डर का विषय नहीं, बल्कि समझ का माध्यम बनाएँ।
मेरा जीवन अभी पूर्ण नहीं हुआ है — यह एक निरंतर चलने वाली यात्रा है। एक ऐसी यात्रा जिसमें हर प्रश्न एक नया मार्ग दिखाता है और हर उत्तर एक नई जिम्मेदारी देता है।
समापन
मेरी जीवन‑कथा किसी उपलब्धि की सूची नहीं, बल्कि एक जिज्ञासु मन की कहानी है। एक ऐसा मन जो मानता है कि सोचने की स्वतंत्रता ही सबसे बड़ी शक्ति है और सं
तुलित दृष्टिकोण ही सच्चे ज्ञान की पहचान।
"मैं आज जो हूँ, वह मेरे प्रश्नों का परिणाम है — और जो बनूँगा, वह मेरे प्रश्न पूछते रहने की इच्छा पर निर्भर करेगा।"