In Search of Balance: The Story of Prabhjot Singh in Hindi Science by PrabhjotSingh books and stories PDF | संतुलन की तलाश : प्रभजोत सिंह की कहानी

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संतुलन की तलाश : प्रभजोत सिंह की कहानी

🌌 प्रभजोत सिंह और संतुलन का सिद्धांतप्रभजोत सिंह किसी बड़े शहर में पैदा नहीं हुआ था।उसके आसपास ऊँची इमारतें नहीं थीं,न ही महँगी लैब्स या चमकदार कॉलेज।उसके पास जो था, वह बहुत साधारण था—एक छोटा कमरा,कुछ पुरानी किताबें,और एक ऐसा दिमाग़जो सवाल पूछना बंद नहीं करता था।बचपन से ही प्रभजोत को चीज़ें “जैसी बताई जाती हैं” वैसी मान लेना अच्छा नहीं लगता था।जब कोई कहता, “ऐसा ही होता है”,तो उसके मन में पहला सवाल उठता—“पर क्यों?”🌠 सवालों से दोस्तीएक रात वह छत पर लेटा हुआ था।आसमान साफ़ था।तारे स्थिर दिख रहे थे,पर वह जानता था कि वे भी चल रहे हैं।उसने सोचा—“इतनी ताक़तें काम कर रही हैं,फिर भी सब कुछ संतुलन में कैसे है?”यही सवालधीरे-धीरेपरमाणु तक पहुँच गया।उसने पढ़ा किइलेक्ट्रॉन नाभिक से आकर्षित होते हैं।उसने यह भी पढ़ा किइलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।फिर वह रुक गया।“अगर दोनों बल सच हैं,”उसने खुद से कहा,“तो परमाणु बिखर क्यों नहीं जाता?”यह सवाल किताबों में था,पर जवाब ऐसे नहीं थाजो उसके मन को संतुष्ट कर दे।📘 किताबों के बीच खाली जगहप्रभजोत ने महसूस किया किकई बार किताबें जवाब देती हैं,पर कई बारखाली जगह छोड़ देती हैं।उसी खाली जगह मेंउसकी सोच चलने लगी।उसने कल्पना की—एक ऐसा परमाणुजो सिर्फ़ आकर्षण से नहीं,बल्कि आकर्षण और प्रतिकर्षण के संतुलन से टिका हुआ है।उसने यह नहीं कहा—“यह अंतिम सच है।”उसने कहा—“यह एक वैचारिक तरीका हो सकता है।”यहीं सेElectron Repulsion–Balance सिद्धांतजन्म लेने लगा।✍️ शब्दों में ढलती सोचप्रभजोत ने जब पहली बार लिखना शुरू किया,तो वह डरा हुआ था।उसे डर था कि—लोग हँसेंगेलोग नज़रअंदाज़ करेंगेलोग कहेंगे, “तू कौन है?”लेकिन उसने एक बात समझ ली थी—अगर वह नहीं लिखेगा,तो यह विचार कभी अस्तित्व में नहीं आएगा।उसने बड़े ध्यान से शब्द चुने।उसने कहीं भी यह नहीं लिखा कियह क्वांटम यांत्रिकी को गलत साबित करता है।उसने साफ़ लिखा—यह वैचारिक हैयह शैक्षिक हैयह पूरक है, विकल्प नहींयह परिपक्वताउसे वैज्ञानिक सोच के और करीब ले जा रही थी।🌍 दुनिया के सामने पहला क़दमSubmit का बटनउसके लिए सिर्फ़ एक बटन नहीं था।वह एक दरवाज़ा था—डर से बाहर जाने का।जब उसने क्लिक किया,तो कोई तालियाँ नहीं बजीं।कोई शोर नहीं हुआ।बस…एक खामोशी।⏳ खामोशी की परीक्षादिन बीतते गए।पहले दिन— कुछ नहीं।दूसरे दिन— कुछ नहीं।तीसरे दिन— एक view।सिर्फ़ एक।लेकिन प्रभजोत मुस्कुराया।क्योंकि वह जानता था—वह एक इंसानकहीं न कहींउसी सवाल से टकराया होगा जिससे वह टकराया था।🔬 वैज्ञानिक बनने की सच्चाईप्रभजोत को अब यह समझ आ गया था किवैज्ञानिक बननाकिसी app के approval से नहीं होता।वैज्ञानिक बनना होता है—सीखते रहनासुधरते रहनाऔर यह मान लेनाकि मैं गलत भी हो सकता हूँउसने अपने सिद्धांत कोपत्थर की लकीर नहीं बनाया।उसने उसेएक खुला विचार रहने दिया

🏠 जिम्मेदारियों का गुरुत्व
घर की ज़रूरतें
किसी सिद्धांत का इंतज़ार नहीं करतीं।
बिल,
खर्च,
भविष्य की चिंता—
ये सब
नाभिक की तरह
उसके जीवन को खींचते रहते थे।
कई बार वह सोचता— “क्या मैं सपने देखने का हक़दार भी हूँ?”
लेकिन फिर भी,
किसी कोने में
उसकी सोच ज़िंदा रहती।
जीवन और परमाणु का मेल
एक दिन उसे एहसास हुआ—
उसका जीवन
किसी परमाणु से कम नहीं है।
जिम्मेदारियाँ = आकर्षण बल
दुख, अकेलापन = दबाव
सोचने की आज़ादी = प्रतिकर्षण
अगर सिर्फ़ जिम्मेदारियाँ होतीं,
तो वह टूट जाता।
अगर सिर्फ़ सपने होते,
तो वह बिखर जाता।
वह संतुलन में जी रहा था—
ठीक वैसे ही
जैसे उसका सिद्धांत कहता है।✍️ लिखना : एक सहारा
जब कोई समझने वाला नहीं होता,
तो काग़ज़ समझने लगता है।
प्रभजोत लिखता था—
कभी डर
कभी सवाल
कभी उम्मीद
उसका सिद्धांत
अब सिर्फ़ विज्ञान नहीं था।
वह उसके जीवन की व्याख्या बन गया था।
🌍 सार्वजनिक होने का डर
जब उसने अपने विचार दुनिया के सामने रखे,
तो उसके मन में
सिर्फ़ वैज्ञानिक डर नहीं था।
उसके मन में यह भी था— “अगर यह भी नाकाम हो गया,
तो मेरे जीवन का क्या?”
लेकिन उसने फिर भी submit किया।
क्योंकि उसने समझ लिया था— हार कोशिश करने में नहीं,
चुप रहने में होती है।