Your and my story - 4 in Hindi Love Stories by smita books and stories PDF | तेरी मेरी कहानी - 4

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तेरी मेरी कहानी - 4

अर्शित गुस्से और बेचैनी के बीच अपने घर पहुँचता है। उसके दिमाग़ में सिर्फ़ सिया का चेहरा घूम रहा था—सिया की चुप्पी, उसकी मजबूरी और उसकी आँखों का दर्द। सब कुछ अर्शित के दिमाग़ में लगातार चल रहा था। वह बार-बार खुद से पूछ रहा था—
“ये कैसी माँ है जो अपनी ही बेटी के बारे में ऐसी बातें कर रही थी और उस पर हाथ उठा रही थी?”
यह सवाल उसके ज़ेहन में बार-बार गूंज रहा था।
उस रात अर्शित सो नहीं पाया।
सुबह ऑफिस पहुँचते ही उसने सिया को अपने केबिन में आने को कहा। सिया जैसे ही केबिन में गई , अर्शित ने अपने पी.ए. को बुलाया और कहा—
“मिस शर्मा के लिए एक कप कॉफी भेजिए… और हाँ, आज उनका काम थोड़ा कम रखिए।”
उसकी आवाज़ पहले से ज़्यादा नरम थी और उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था
सिया जब केबिन में आई तो उसकी आँखें झुकी हुई थी। कल रात के निशान अब भी उसकी कलाई पर हल्की-सी नीली लकीरों की तरह साफ़ दिखाई दे रहे थे। अर्शित की नज़र वहीं अटक गई।
“सिया…”
उसने पहली बार उसे सिर्फ़ “सिया” कहकर बुलाया। सिया चौंक कर सिर उठाती है और अर्शित की तरफ़ देखती है।
“तुम ठीक हो?”
अर्शित का यह सवाल औपचारिक नहीं, बल्कि इंसानियत से भरा था।
सिया बस हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश करती है—
“जी सर… मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
अर्शित को उसका झूठ साफ़ दिखाई दे रहा था, लेकिन वह उसे मजबूर नहीं कर पाया और फिर ।
अर्शित ने बहुत प्यार से सिया से कहा—
“कल जो भी हुआ… उसके लिए मुझे अफ़सोस है। लेकिन तुम अकेली नहीं हो, सिया। मुझे बताओ क्या बात है, मैं तुम्हारा साथ दूँगा।”
यह कहकर वह फ़ाइल उसकी तरफ़ बढ़ा देता है।
सिया की आँखें भर आई, लेकिन उसने अपने आँसुओं को संभाला । उसे समझ नहीं आया कि आख़िर अर्शित उसके लिए इतना कुछ क्यों कर रहा है। लड़खड़ाती ज़ुबान से उसने अर्शित को कहा —
“थैंक यू, सर।”
और वह केबिन से बाहर चली गई 
उस दिन सिया ने पहली बार महसूस किया कि शायद कोई है जो उसकी इज़्ज़त करता है और बिना बोले उसके दर्द को समझता है।
ऑफिस के बाद सिया अपनी दोस्त नंदिनी से मिलने गई, लेकिन वहाँ भी वह बहुत खोई-खोई और उदास थी। तभी नंदिनी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और पूछा —
“सिया, तू ठीक तो है ना? कल तूने फोन भी नहीं उठाया।”
सिया ने नंदिनी को सब कुछ बता दिया। नंदिनी गुस्से में कहती है—
“अब बहुत हो गया, सिया! उस घर में तुझे सिर्फ़ ज़ख़्म ही मिल रहे हैं।”
उसी वक्त अर्शित अपनी गाड़ी से उन दोनों को देख रहा था । वह उनके पास गया और उसने सिया से कहा —
“सिया, अगर तुम्हें कभी किसी चीज़ की ज़रूरत हो… तो बिना सोचे मुझसे बात करना।”
सिया कुछ नहीं कह पाई , बस अपना सिर हिला दिया ।
पास खड़ी नंदिनी सब कुछ देखती है और मन-ही-मन सोचने लगती है—
“एक बॉस को अपनी इंटर्न की इतनी फ़िक्र?”
शायद अर्शित ही सिया की मदद कर सकता है।
और नंदिनी अर्शित से मिलने का फ़ैसला किया …

अगले दिन ऑफिस में सिया चुपचाप अपने काम में लगी थी तभी नंदिनी सिया के ऑफिस पहुँचती है। उसका चेहरा गंभीर था उसने रिसेप्शन से सीधे अर्शित के केबिन में जाने की इजाज़त मांगा और अर्शित से बात करने चली गई.....
अरशित उसे अंदर बुलाता है।
“सर… मुझे आपसे सिया के बारे में बात करनी है,”
नंदिनी बिना भूमिका बाँधे सीधे मुद्दे पर आती है।
अरशित कुर्सी पर सीधा बैठ जाता है,
“कहिए।”
नंदिनी की आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों होते हैं।
“सर, सिया की ज़िंदगी उस घर में नर्क बन चुकी है। उसकी सौतेली माँ रोज़ उसे ताने देती है, मारती है, उसकी इज़्ज़त तक उछाल देती है। कल जो आपने देखा… वो पहली बार नहीं था।”
पहले तो अर्शित चौंक जाता है फिर उसने नंदिनी से पूछा— 
"सौतेली माँ?"
नंदिनी ने कहा— "हां सर! सिया की मां उसके बचपन में ही गुजर गई थी और सिया की परवरिश के लिए उसके पापा ने दूसरी शादी कर ली लेकिन फिर भी सिया को कुछ नहीं मिल वो छोटी सी उम्र से ही ये सब बर्दाश्फ कर रही है"
अर्शित की मुट्ठियाँ भींच जाती हैं। वो गुस्से में लाल हो जाता फिर उसकी नजर सिया की तरफ गई वो भावुक हो गया और मन ही मन सोचने लगा — इतनी छोटी उम्र से ही इतनी तकलीफ कोई कैसे बिना कुछ बोले, बिना किसी को कुछ बताए बर्दाश्त कर सकता है?" सिया के लिए उसकी जिंदगी कितनी कठिन रही होगी , शायद यही कारण है वक्त से पहले सिया के समझदार होने का".....
 तभी नंदिनी ने कहा—
“सिया बाहर से जितनी मज़बूत दिखती है, अंदर से उतनी ही टूटी हुई है,”
नंदिनी आगे बोलती है,
“सर, अगर हो सके तो… उसका ट्रांसफर किसी और शहर में करवा दीजिए। यहाँ रहकर वो कभी खुलकर जी नहीं पाएगी।”
कमरे में कुछ पल की चुप्पी छा जाती है।
अर्शित को नंदिनी की हर बात सही लगती है। वो गहरी साँस लेकर कहता है,
“आप सही कह रही हैं।”
उसी दिन अर्शित एक बड़ा फैसला लेता है।
उसने सिया का ट्रांसफर अपने ही शहर के जयपुर ब्रांच में करवा दिया ताकि उसे किसी चीज की तकलीफ न हो और वह वो अपनी पढ़ाई और काम दोनों आराम से कर सके और खुशी खुशी आगे की जिन्दगी जी सके—
जब सिया को मेल के ज़रिए ट्रांसफर की जानकारी मिला, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई ,उसका दिल तेज़-तेज़ धड़कने लगा उसे आपनी सौतेली मां का डर सताने लगा वो बार बार सोचती —" अगर मां को पता चला तो वो पता नहीं क्या करेंगी?" मुझे सर से बात करनी होगी.....
अगले दिन डरते-डरते वो अर्शित के केबिन में गई और लड़खड़ाती आवाज में अर्शित से कहा—
“सर… क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”
उसकी आवाज़ काँप रही होती है।
“हाँ, आइए सिया।”
सिया हाथ जोड़कर कहती है,
“सर, प्लीज़… मेरा ट्रांसफर रद्द कर दीजिए। मैं यहाँ ठीक हूँ। मैं जयपुर नहीं जा सकती।”
अर्शित जानता था कि सिया जयपुर जाने से क्यों मना कर रही है? उसने सख़्त आवाज में सिया से कहा— 
“सिया, ये फैसला बदला नहीं जाएगा।”
“लेकिन सर…”
सिया की आँखें भर आती हैं।
अरशित सीधा उसकी तरफ़ देखता है,
“अगर तुम जयपुर नहीं जाओगी, तो यहाँ भी नौकरी नहीं कर पाओगी।”
ये शब्द सिया के दिल पर किसी पत्थर की तरह गिरते हैं।
वो बिना कुछ कहे केबिन से बाहर चली गई और ऑफिस के बाद वो सीधे नंदिनी के पास गई और रोते हुए नंदिनी को सब कुछ बताया....
नंदिनी ने उसका हाथ थाम कर उसे समझाया—
“सिया, मेरी बात मान। ट्रांसफर एक्सेप्ट कर ले। ये तेरे लिए एक मौका है… इस ज़हर भरे माहौल से दूर जाने का।”
“लेकिन घर पर क्या कहूँगी?”
सिया सिसकते हुए पूछती है।
“घर में किसी को कुछ मत बता,”
नंदिनी ने धीरे से सिया से कहा..... 
सिया घर आई और सारी बातें सोच सोच कर परेशान थी तभी उसके कमरे उसके पापा आए और सिया को परेशान देख कर पूछा— " बेटा क्या बात है? इतनी रात तक जागी है सब ठीक तो है न?.......



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