'नक्षत्र यात्री: हिमालय की कलाकृति' (सम्पूर्ण कहानी)अध्याय 1: एक साहसी पुरातत्ववेत्ता
Pl l एक प्राचीन, भूरे पत्थर का मुहाना था—भगवान शिव से जुड़ी एक रहस्यमय कलाकृति को ढूंढने का पहला कदम।
गुफा का प्रवेश द्वार संकरा था। जैसे ही उसने पहला कदम भीतर रखा, गुफा के अंदर एक अजीब, तेज़ गूँज उठने लगी। यह गूँज इतनी तीव्र थी कि सिर में दर्द होने लगा, और ऐसा लगा जैसे गुफा उसे भीतर जाने से मना कर रही हो।
गुफा की दीवार पर प्राकृत भाषा में एक शिलालेख दिखा, जिसे माया ने तुरंत पढ़ लिया: "शांत रहो, यात्री। जब मन स्थिर होगा, तब ही मार्ग खुलेगा।"
माया ने समझा—यह चुनौती शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक थी। उसने अपनी आँखें बंद कीं। बाहर की ठंडी हवा और अंदर की डरावनी गूँज के बीच, उसने गहरी साँस ली और ध्यान केंद्रित किया। उसके होठों से एक प्राचीन मंत्र धीरे-धीरे फूट पड़ा:
"ॐ नमः शिवाय शान्ताय..."
जैसे ही मंत्र की शुद्ध, लयबद्ध ध्वनि गूँज से मिली, एक अद्भुत घटना हुई। गूँज धीरे-धीरे शांत होने लगी। हवा स्थिर हो गई, और पूरे कक्ष में एक स्वर्गीय शांति फैल गई। शांत होने पर, गुफा की दीवारें हिलने लगीं और आगे का रास्ता उजागर हो गया।
आगे एक संकरी दरार थी, जो एक गहरे कक्ष की ओर जाती थी। दरार के ठीक सामने, पाँच अलग-अलग मुद्रा में बनीं शिव की पत्थर की मूर्तियाँ थीं। उन्हें एक खास क्रम में छूने पर ही दरार खुल सकती थी।
माया ने अपने ज्ञान का उपयोग किया। उसे याद था कि ये मूर्तियाँ शिव के पंच-मुखों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उसने क्रमशः उन्हें सक्रिय किया:
सद्योजात (पृथ्वी तत्व): उसने पहली मूर्ति को छुआ, जिससे वह हरी रोशनी से चमक उठी।
वामदेव (जल तत्व): दूसरी मूर्ति नीली रोशनी से चमकी।
अघोर (अग्नि तत्व): तीसरी मूर्ति ने नारंगी और लाल रंग का प्रकाश छोड़ा।
तत्पुरुष (वायु तत्व): चौथी मूर्ति छूते ही सफेद, अदृश्य शक्ति से भर गई।
ईशान (आकाश तत्व): अंतिम मूर्ति ने जैसे ही सुनहरी रोशनी छोड़ी—एक साथ सभी मूर्तियों से शक्ति निकली, और संकरी दरार एक बड़े, भव्य द्वार में बदल गई।
माया ने साहस से उस द्वार के पार कदम रखा। लेवल 1 (हिमालय की गूँज) पूरा हुआ।अध्याय 2: छाया का अभ्यारण्य
नए कक्ष में प्रवेश करते ही माया का सामना एक विशाल, भूमिगत मंदिर से हुआ। हवा में नमी और सड़ी हुई गंध थी।
अचानक, उसकी टॉर्च की रोशनी एक ऐसी चीज़ पर पड़ी जिसने उसे चौंका दिया। मंदिर के बीचों-बीच, पत्थरों के एक टीले पर, एक विशालकाय नागिन कुंडली मारकर बैठी थी। इसकी खाल पुरानी चट्टान जैसी दिख रही थी और आँखें पीली, जहरीली चमक से भरी थीं। यह थी नागिनी, कलाकृति तक जाने वाले मार्ग की रक्षक रानी।
नागिनी ने एक तेज़ फुफकार छोड़ी, जिसकी गूँज ने पूरे मंदिर को थर्रा दिया। माया जानती थी कि उसकी पत्थर जैसी खाल पर सामान्य हथियारों का कोई असर नहीं होगा। उसे नागिनी को हराने के लिए उसकी अपनी शक्ति का उपयोग करना होगा।
माया की नज़रें मंदिर की छत पर पड़ीं, जहाँ जंजीरों से तीन बड़े पीतल के घंटे लटके हुए थे। उसने सोचा—नागिनी की गूँजती फुफकार ही उसकी ताकत है, और यही उसकी कमजोरी भी हो सकती है।
उसने फुर्ती से पहला घंटा बजाया। उसकी ध्वनि से नागिनी ने सिर हिलाया। उसने दूसरे घंटे की रस्सी खींची, और ध्वनि और तेज़ हुई। नागिनी अब गुस्से में थी और उसने ज़ोर से फुफकारना शुरू किया।
ठीक उसी पल, माया ने आखिरी घंटा बजाया।
ट्रिंग!
तीनों घंटों की संयुक्त, अत्यंत तीव्र ध्वनि नागिनी की फुफकार से टकराई और एक ऐसी गूँज पैदा हुई जिसने नागिनी के अंदरूनी संतुलन को भंग कर दिया। नागिनी दर्द से तड़पी, और एक पल के लिए वह पत्थर की मूर्ति की तरह निष्क्रिय हो गई।
यही वह क्षण था!
नागिनी जब निष्क्रिय हुई, तो उसकी पत्थर जैसी खाल के बीच उसकी आँखें अचानक सुनहरी हो गईं—यह उसका एकमात्र कमजोर बिंदु था।
माया ने बिना समय गंवाए, अपनी पुरातत्ववेत्ता वाली छोटी कुल्हाड़ी निकाली। उसने ज़ोर लगाकर नागिनी की सुनहरी आँखों पर निशाना साधा और वार कर दिया।
एक भयानक चीख के साथ, नागिनी धराशायी हो गई। उसकी विशाल देह पत्थरों के बीच लुढ़क गई और रास्ते से हट गई। नागिनी के हटने से एक गुप्त द्वार खुला।अध्याय 3: भ्रम की भूलभुलैया
गुप्त द्वार के उस पार, माया ने एक ऐसे कक्ष में प्रवेश किया जहाँ दीवारें और फर्श धुएँ और तैरती हुई रोशनी से बने थे—यह थी भ्रम की भूलभुलैया।
भ्रम 1: अतीत का आह्वान
अचानक, उसके सामने एक ऐसी छवि आई जो उसके सबसे गहरे डर को दर्शाती थी—एक अतीत की असफलता जिसने उसके करियर को लगभग खत्म कर दिया था। भ्रम उसे फुसला रहा था, "तुम इस खोज के योग्य नहीं हो। वापस जाओ।"
लेकिन माया ने अपनी आँखें बंद कीं और अपने इरादे को मज़बूत किया। उसने अपने द्वारा किए गए सबसे अच्छे तीन कामों को याद किया—वह समय जब उसने एक प्राचीन सभ्यता को गलत हाथों में पड़ने से बचाया, वह क्षण जब उसने अपनी टीम के एक सदस्य की जान बचाई, और वह दिन जब उसने अपने ज्ञान से एक ऐतिहासिक झूठ को उजागर किया।
जैसे ही उसने अपने दिल से उन उपलब्धियों को महसूस किया, उसकी सकारात्मक ऊर्जा ने भ्रम को चीर दिया। डरावनी छवि हवा में विलीन हो गई, और भूलभुलैया का अगला रास्ता खुल गया।
भ्रम 2: कलाकृति का लालच
अगले मार्ग पर माया को तीन रास्ते मिले। हर रास्ते के अंत में एक चमकदार वस्तु रखी थी: एक मुकुट, एक रत्न जड़ित त्रिशूल, और एक सादा, पत्थर का डमरू।
माया जानती थी कि शिव की शक्ति भौतिकता में नहीं, बल्कि प्रतीकवाद और सादगी में निहित है। उसने तुरंत समझ लिया कि चमकदार वस्तुएँ केवल लालच थीं।
माया ने तीसरे रास्ते को चुना और सादे डमरू को छुआ, जो सृष्टि और समय का प्रतीक था।
जैसे ही उसके हाथ डमरू पर पड़े, बाकी दोनों भ्रमित करने वाली कलाकृतियाँ पिघलकर गायब हो गईं। भूलभुलैया का धुंआ छंट गया। वह अब एक छोटे, शांत कक्ष में खड़ी थी, जहाँ केवल एक पत्थर की वेदी थी।
उसने डमरू को वेदी पर रखा। वह जानती थी कि यह केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि असीम शक्ति का केंद्र है। उसकी खोज पूरी हुई थी।समाप्त।