You before the rain in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | बारिश से पहले तुम

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बारिश से पहले तुम


शहर को अक्सर लोग भीड़ से पहचानते हैं,
लेकिन कुछ लोग शहर को उसकी तन्हाइयों से पहचानते हैं।
वह भी उन्हीं लोगों में से थी।
उस सुबह बारिश नहीं हो रही थी,
लेकिन हवा में वह नमी थी
जो बिना बोले बता देती है
कि आज कुछ बदलने वाला है।
खिड़की के शीशे पर हल्की धुंध जम रही थी,
और सामने वाली सड़क पर लोग अपनी-अपनी ज़िंदगी उठाए
तेज़ क़दमों से चल रहे थे।
वह कैफ़े के अंदर बैठी थी,
हमेशा की तरह खिड़की के पास।
यह उसकी आदत नहीं,
ज़रूरत थी।
यहाँ बैठ कर उसे लगता था
कि दुनिया को देखा जा सकता है
बिना उसका हिस्सा बने।
उसके सामने डायरी खुली हुई थी।
कुछ पन्ने भरे हुए थे,
कुछ बिल्कुल खाली—
जैसे उसका मन।
वह लिखती थी,
लेकिन रोज़ नहीं।
सिर्फ़ तब,
जब दिल में इतना कुछ भर जाता
कि चुप रहना मुश्किल हो जाता।
कॉफ़ी ठंडी हो रही थी,
लेकिन उसने अभी तक पहला घूँट नहीं लिया था।
उसकी नज़र बार-बार बाहर जा रही थी,
जैसे किसी का इंतज़ार हो—
जबकि वह जानती थी
कि उसने किसी को बुलाया ही नहीं है।
तभी कैफ़े का दरवाज़ा खुला।
घंटी हल्की सी बजी,
और ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आ गया।
उस झोंके के साथ
वह भी आया।
उसने पहले उसे ठीक से नहीं देखा।
बस इतना महसूस हुआ
कि किसी की मौजूदगी
हवा को थोड़ा भारी कर गई है।
फिर जब उसने नज़र उठाई,
तो नज़र अपनी जगह से हिली नहीं।
वह कोई फ़िल्मों जैसा हीरो नहीं लग रहा था।
ना ज़्यादा लंबे बाल,
ना परफ़ेक्ट मुस्कान।
बस एक सादगी थी—
कपड़ों पर हल्की सी सिलवट,
आँखों में थकान,
और चेहरे पर वह शांत सा भाव
जो सिर्फ़ उन लोगों के पास होता है
जो ज़िंदगी से लड़ चुके होते हैं,
लेकिन शिकायत नहीं करते।
उसने इधर-उधर देखा,
फिर उसकी मेज़ की तरफ़ देखा।
एक पल रुका,
जैसे सोच रहा हो
पूछना ठीक होगा या नहीं।
“यहाँ बैठ सकता हूँ?”
उसकी आवाज़ धीमी थी,
लेकिन साफ़।
वह कुछ पल के लिए बस उसे देखती रही।
फिर अपनी डायरी बंद की
और हल्का सा मुस्कुरा दी।
“जी।”
बस एक शब्द—
लेकिन उस शब्द के साथ
एक दरवाज़ा खुल गया।
वह सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
कुछ पल तक दोनों चुप रहे।
ना असहजता थी,
ना बेचैनी।
सिर्फ़ एक शांत सी ख़ामोशी,
जैसे दोनों उस चुप को पहले से जानते हों।
बारिश शुरू हो गई।
पहले हल्की-हल्की बूँदें,
फिर धीरे-धीरे तेज़ आवाज़।
खिड़की के शीशे पर गिरती बूँदें
जैसे किसी पुराने गाने का पृष्ठभूमि संगीत बन गई हों।
“तुम रोज़ यहाँ आती हो?”
उसने कॉफ़ी मँगवाते हुए पूछा।
“रोज़ नहीं,”
वह बोली,
“बस जब मन भरा हो।”
“अच्छा लगता है?”
उसने पूछा।
वह थोड़ी देर सोचती रही।
फिर बोली,
“यहाँ बैठ कर
अपनी आवाज़ सुनाई देती है।”
उसने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
उसके बोलने का अंदाज़
बिल्कुल वैसे ही था
जैसे कोई बात लिख रहा हो।
“तुम लिखती हो?”
उसने पूछा।
वह थोड़ा चौंकी।
“कैसे पता?”
उसने उसकी डायरी की तरफ़ देखा,
फिर मुस्कुरा दिया।
“आँखों से।”
वह हँस पड़ी—
पहली बार उस दिन
दिल से।
बातों का सिलसिला
बिना कोशिश के शुरू हो गया।
नाम पूछे गए,
लेकिन सिर्फ़ उतना ही
जितना ज़रूरी था।
उसने बताया
कि उसे भीड़ से थकान होती है,
इसलिए अक्सर अकेला निकल जाता है।
वह बोली
कि उसे लोग पसंद हैं,
लेकिन उनका शोर नहीं।
कभी-कभी दोनों चुप हो जाते,
और फिर बारिश की आवाज़
उनके बीच आ जाती।
पर वह आवाज़
खाली जगह नहीं लगती थी।
वक़्त का अंदाज़ा ही नहीं हुआ।
कैफ़े धीरे-धीरे खाली होने लगा,
लेकिन उन दोनों के लिए
अभी शाम शुरू हुई थी।
“तुम्हें लगता है,”
उसने अचानक पूछा,
“कि लोग अक्सर ग़लत जगह
सही लोग ढूँढते हैं?”
वह उसकी तरफ़ देखती रही।
फिर धीरे से बोली,
“शायद लोग ग़लत नहीं होते…
बस थक जाते हैं।”
उसने सिर हिला दिया।
जैसे वह जवाब
काफ़ी पहले से जानता हो।
जब कैफ़े बंद होने का वक़्त आया,
तो बारिश और तेज़ हो चुकी थी।
बाहर निकलते हुए
उसने अपनी जैकेट उतारी
और बिना पूछे
उसके कंधों पर रख दी।
“अरे—”
वह कुछ कहने वाली थी।
“रख लो,”
उसने कहा,
“बारिश से नहीं,
बीमार पड़ने से डर लगता है।”
सड़क पर निकलते ही
ठंडी हवा ने उन्हें घेर लिया।
स्ट्रीट लाइटें पानी में चमक रही थीं,
और शहर एक पल के लिए
बिल्कुल नया लग रहा था।
दोनों एक ही तरफ़ चल पड़े।
ना किसी ने पूछा,
ना बताया—
बस क़दम अपने-आप
एक ही रास्ते पर आ गए।
“तुम हमेशा ऐसी ही चुप रहती हो?”
उसने पूछा।
“सिर्फ़ उन लोगों के साथ
जो सुनना जानते हैं,”
वह बोली।
उसने उसकी तरफ़ देखा,
और पहली बार महसूस किया
कि यह सिर्फ़ एक शाम नहीं है।
जब रास्ता अलग होने वाला था,
तो दोनों रुक गए।
“क्या फिर मिलेंगे?”
उसने पूछा—
बिना दबाव के,
बिना उम्मीद जताए।
वह मुस्कुराई।
“बारिश अगर फिर आई,
तो शायद।”
वह भी मुस्कुरा दिया।
कोई नंबर का आदान-प्रदान नहीं हुआ,
कोई वादा नहीं—
सिर्फ़ एक एहसास
जो दोनों के साथ घर तक गया।
उस रात,
वह लड़की डायरी खोल कर बैठी।
इस बार क़लम रुक नहीं रहा था।
और शहर के दूसरे कोने में,
वह खिड़की के पास खड़ा,
बारिश को देख रहा था—
यह जानते हुए
कि कुछ मुलाक़ातें
सिर्फ़ याद बनने के लिए नहीं होतीं।

अगले दिन बारिश नहीं हुई।
शहर वही था,
सड़कें वही,
लोग भी वही—
लेकिन उसके लिए कुछ अलग हो चुका था।
वह कैफ़े गई,
बिना किसी वजह के।
ख़ुद को समझाने के लिए
कि कल बस एक इत्तेफ़ाक़ था।
खिड़की के पास वाली मेज़ खाली थी।
उसने बैठकर कॉफ़ी ऑर्डर की,
और ख़ुद पर हल्की-सी हँसी आई—
जैसे दिल किसी को ढूँढ रहा हो
और दिमाग़ उसे टोक रहा हो।
दस मिनट गुज़रे।
फिर पंद्रह।
वह अपनी डायरी खोलकर लिखने लगी,
लेकिन शब्द फिसल रहे थे।
तभी घंटी बजी।
वह आया।
इस बार कपड़े सूखे थे,
बाल थोड़े सँभले हुए,
लेकिन चेहरे पर वही शांत-सी मुस्कान।
उसकी नज़र सीधी उस पर पड़ी—
जैसे उसे पता हो
कि उसे यहीं बैठना था।
“बारिश नहीं है,”
उसने बैठते ही कहा।
“पर तुम आ गए,”
वह बोली—
बिना सोचे।
दोनों हँस पड़े।
उस दिन बातें ज़्यादा हुईं।
ज़्यादा खुली,
ज़्यादा सच्ची।
उसने बताया
कि उसका काम शहर के एक कोने में है—
समय ज़्यादा लेता है,
थकान भी देता है।
वह बोली
कि घर और ज़िम्मेदारियों के बीच
लिखना ही उसका अपना वक़्त है।
कभी-कभी वह उसकी बात सुनते हुए
बिल्कुल चुप हो जाता,
जैसे हर शब्द सँभालकर रख रहा हो।
वह उसे देखती,
और महसूस करती
कि कोई उसकी बातों को
सिर्फ़ सुन नहीं रहा—
समझ भी रहा है।
मिलना आदत बन गया।
रोज़ नहीं,
पर अक्सर।
कभी शाम को चाय के साथ,
कभी सिर्फ़ सड़क पर चलते हुए।
कभी दोनों के बीच इतनी बातें होतीं
कि वक़्त कम पड़ जाता,
कभी इतनी चुप्पी
कि वक़्त का एहसास ही नहीं होता।
शहर उनका हो गया।
उसने एक दिन कहा,
“तुम्हारी आँखों में
हमेशा कुछ अधूरा-सा होता है।”
वह थोड़ी देर चुप रही।
फिर बोली,
“अधूरा रहना
कभी-कभी सुरक्षा देता है।”
उसने उस पल कुछ नहीं कहा।
पर बाद में,
जब वह घर गया,
तो काफ़ी देर तक सोचता रहा
कि कोई अपने दिल को
ऐसे क्यों सँभालकर रखता है।
वह भी धीरे-धीरे खुल रही थी।
अपनी बातों में,
अपनी हँसी में।
एक शाम,
जब हवा थोड़ी तेज़ थी,
वह दोनों फुटपाथ पर चल रहे थे।
उसने अचानक कहा,
“तुम अगर चाहो
तो मैं तुम्हारी कहानी का हिस्सा बन सकता हूँ।”
वह रुक गई।
“कहानी लिखी नहीं जाती,”
उसने धीरे से कहा,
“जी जाती है।”
उसने सिर हिला दिया।
“फिर जीते हैं,”
वह बोला।
उस दिन उसने पहली बार
उसका हाथ पकड़ा।
ज़्यादा ज़ोर से नहीं,
जैसे पूछ रहा हो
कि ठीक है या नहीं।
उसने हाथ नहीं छुड़ाया।
दिन महीनों में बदलने लगे।
रिश्ते का नाम किसी ने नहीं रखा,
पर दोनों जानते थे
कि यह सिर्फ़ दोस्ती नहीं है।
कभी छोटी-सी बात पर ख़ामोशी आ जाती,
कभी बिना वजह हँसी।
पर दोनों ने सीख लिया था
एक-दूसरे को छोड़ना नहीं—
सिर्फ़ समझना।
फिर ज़िंदगी ने अपना असली रंग दिखाया।
उसका ट्रांसफ़र होने वाला था।
दूसरा शहर,
दूसरी दिनचर्या,
नया दबाव।
वह बात उसने धीरे से कही,
जैसे शब्द भी भारी हों।
वह कुछ नहीं बोली।
उस रात उसने डायरी नहीं लिखी,
सिर्फ़ बैठी रही।
अगली मुलाक़ात में
वह शांत थी,
लेकिन दूर नहीं।
“तुम जाओगे,”
उसने कहा,
“यह ठीक है।”
उसने उसे देखा।
“तुम रुक जाओगी?”
वह मुस्कुराई—
वह मुस्कान जिसमें दर्द छुपा होता है।
“मैं वहीं रहूँगी
जहाँ मैं ख़ुद को पहचान सकूँ।”
अलग होने का वक़्त आया।
न कोई नाटकीय आँसू,
न बड़े वादे।
सिर्फ़ एक बात—
“सच रहना,”
उसने कहा।
“वही तो प्यार है,”
उसने जवाब दिया।
दूरी आई।
कॉल कम हो गए,
पर जब होते,
तो असली होते।
कभी वह उसकी थकान सुनता,
कभी वह उसकी ख़ामोशी।
वक़्त ने सब कुछ आसान नहीं किया,
पर साफ़ ज़रूर कर दिया।
एक साल बाद,
बारिश फिर आई।
वह फिर उसी कैफ़े में थी।
दरवाज़ा खुला।
और इस बार
कोई सवाल नहीं था।
वह आया,
उसके सामने बैठ गया,
और बस इतना कहा—
“मैं यहीं हूँ।”
वह कुछ नहीं बोली।
सिर्फ़ अपना हाथ
उसके हाथ पर रख दिया।
ज़िंदगी परफ़ेक्ट नहीं थी।
पर सच्ची थी।
और कभी-कभी
बस इतना ही काफ़ी होता है।

उसके “मैं यहीं हूँ” कहने के बाद
कुछ पल तक दोनों ने कुछ नहीं कहा।
कैफ़े की आवाज़ें वापस लौट आईं—
कप रखने की हल्की-सी खनक,
बाहर गिरती बारिश,
और लोगों की अपनी-अपनी बातें।
पर उन दोनों के बीच
अब भी वही ख़ामोशी थी
जो सिर्फ़ उनकी अपनी थी।
“कितनी देर के लिए आए हो?”
वह बोली—
सवाल में बेचैनी नहीं,
सिर्फ़ जानने की इच्छा थी।
“पता नहीं,”
उसने सच्चाई से कहा।
“इस बार
भागने का मन नहीं था।”
वह समझ गई।
कुछ जवाब
सिर्फ़ समझने के लिए होते हैं,
पकड़ने के लिए नहीं।
उस दिन वह ज़्यादा बाहर नहीं गए।
बस कैफ़े में बैठे रहे,
जैसे बीच का वक़्त
उन दोनों के लिए ही बना हो।
उसने बताया
कि शहर बदलने से
सब कुछ नया नहीं होता—
सिर्फ़ ज़्यादा अकेला हो जाता है।
वह बोली
कि यहीं रहकर भी
कभी-कभी लगता है
जैसे ख़ुद से दूर हो रही हो।
“तुम लिख रही हो अभी भी?”
उसने पूछा।
वह मुस्कुरा दी।
“अब ज़्यादा सच लिखती हूँ।”
उसने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं कहानी में हूँ?”
वह थोड़ी देर चुप रही,
फिर बोली,
“नाम के साथ नहीं…
एहसास के साथ।”
वह समझ गया,
और उस समझने में
कोई शिकायत नहीं थी।
अगले कुछ हफ़्तों में
वह अक्सर मिलने लगे।
रोज़ नहीं—
पर जब भी मिलते,
तो पूरा वक़्त एक-दूसरे का होता।
कभी वह उसके घर के पास छोड़ने आता,
कभी वह उसके ऑफ़िस के बाहर इंतज़ार करती।
छोटी-छोटी चीज़ें—
लेकिन उनमें एक अपनापन था।
एक शाम,
जब शहर थोड़ा शांत था,
वह दोनों टैरेस पर खड़े थे।
आसमान में बादल थे,
लेकिन बारिश नहीं।
“तुम्हें लगता है,”
वह धीरे से बोली,
“कि प्यार हमेशा साथ रहने से ही होता है?”
उसने कुछ देर सोचा।
“प्यार शायद
एक-दूसरे को अपनी जगह देने से होता है।”
वह मुस्कुराई।
“फिर हम ठीक हैं।”
पर ज़िंदगी सिर्फ़ बातों से नहीं चलती।
उसके पास एक मौक़ा आया—
काम का,
बेहतर पद का।
इस बार शहर नहीं बदलना था,
पर ज़िम्मेदारी बढ़ने वाली थी।
वह बात उसने पहले ही दिन बता दी।
“तुम तैयार हो
इस सब के लिए?”
उसने पूछा।
वह सच बोलना चाहती थी।
“मैं तैयार हूँ
तुम्हारे साथ चलने के लिए,
लेकिन ख़ुद को छोड़कर नहीं।”
उसने उस पल
पहली बार उसे
पूरी तरह देखा—
न सिर्फ़ प्यार के साथ,
बल्कि इज़्ज़त के साथ।
“फिर चलते हैं,”
उसने कहा,
“दोनों अपनी-अपनी रफ़्तार में।”
वक़्त गुज़रा।
कुछ दिन अच्छे थे,
कुछ थोड़े थके हुए।
कभी वह देर से आता,
कभी वह लिखने में गुम हो जाती।
पर रिश्ते में
एक बात पक्की थी—
चुप रहकर दूर नहीं जाते थे।
एक रात,
जब शहर सो रहा था,
वह उसके पास बैठी थी।
“अगर कल सब बदल जाए,”
वह बोली,
“तो क्या हम फिर भी
एक-दूसरे को पहचान लेंगे?”
उसने उसका हाथ थामा—
आदत से,
वादे की तरह नहीं।
“हम एक-दूसरे को
रोज़ पहचान रहे हैं,”
उसने कहा।
“बस वही काफ़ी है।”
उस पल
कोई भविष्य की योजना नहीं बनी,
कोई क़सम नहीं खाई—
पर कहानी
अब अधूरी नहीं लग रही थी।

उस रात के बाद
चीज़ों ने अचानक से कोई नया रंग नहीं लिया।
बस इतना हुआ
कि दोनों ने ज़िंदगी को
थोड़ा ज़्यादा ध्यान से जीना शुरू कर दिया।
सुबह की चाय साथ नहीं होती थी,
पर दिन के बीच एक संदेश ज़रूर आ जाता—
“थक गए?”
“थोड़ा।”
“शाम को बात करेंगे।”
कभी वह लिखने में डूब जाती,
कभी वह बैठकों में।
मिलना कम था,
लेकिन जब मिलते
तो समय को बीच में आने नहीं देते।
शहर बदल रहा था—
नए फ्लाईओवर,
नए कैफ़े,
नए चेहरे।
पर उनका कैफ़े वही था।
खिड़की के पास वाली मेज़,
थोड़ी-सी पुरानी कुर्सी,
और कॉफ़ी जो अक्सर ठंडी हो जाती थी।
एक दिन उसने कहा,
“तुम्हें कभी लगता है
हम ज़्यादा समझदार हो गए हैं?”
वह हँस दी।
“लगता है हम
ज़िंदगी से लड़ना कम
और उसे समझना ज़्यादा सीख गए हैं।”
उस दिन दोनों ज़्यादा देर तक चुप रहे।
चुप अब भारी नहीं लगती थी—
वह घर जैसी लगती थी।
फिर एक दिन,
बिना किसी चेतावनी के,
उसकी नौकरी में दिक़्क़त आ गई।
कंपनी में कर्मचारियों की कटौती,
परियोजनाएँ रुक गईं।
वह पहली बार
थोड़ा टूट-सा गया।
उस शाम वह कुछ ज़्यादा नहीं बोला।
बस खिड़की के पास खड़ा रहा,
जैसे शब्द भी थक गए हों।
वह उसके पास जाकर बैठी।
कुछ पूछा नहीं।
सिर्फ़ उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें लगता है
मैं असफल हो गया?”
उसने धीरे से पूछा।
वह सीधी बात करती थी।
“तुम काम हो,
तुम्हारी नौकरी नहीं।”
वह उसकी तरफ़ देखता रहा।
शायद पहली बार
किसी ने उसे इतनी सीधी बात कही थी।
अगले कुछ महीने
आसान नहीं थे।
वह नए विकल्प ढूँढता रहा,
कभी हिम्मत के साथ,
कभी थकान के साथ।
वह भी बदली।
ज़्यादा लिखने लगी,
कम बोलने लगी।
उसकी कहानियों में
प्यार कम नाटकीय
और ज़्यादा सच्चा हो गया।
कभी-कभी
दोनों के बीच छोटी-सी ख़ामोशी आ जाती,
लेकिन अब उसे नाम देना नहीं पड़ता था।
एक शाम,
जब बारिश हल्की-सी हो रही थी—
बिलकुल पहली मुलाक़ात जैसी—
वह कैफ़े में साथ बैठे थे।
उसने कहा,
“तुम जानती हो
मैं तुमसे शादी का वादा नहीं कर रहा।”
वह मुस्कुराई।
“मैं माँग भी नहीं रही।”
“पर मैं यह कह रहा हूँ,”
उसने आगे कहा,
“कि जब ज़िंदगी थकाए,
तो मैं तुम्हारे पास ही आना चाहता हूँ।”
वह उसकी आँखों में देखती रही।
फिर बोली,
“और जब मैं ख़ुद से दूर हो जाऊँ,
तो मुझे तुम्हारा साथ याद दिलाना।”
उस दिन कोई अंगूठी नहीं थी,
कोई भविष्य की तारीख़ नहीं—
लेकिन एक फ़ैसला था
जो धीरे से लिया गया।
वक़्त ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली।
उसे काम मिल गया—
परिपूर्ण नहीं,
पर काफ़ी था।
वह लिखती रही।
कभी प्रकाशित हुई,
कभी सिर्फ़ डायरी में रह गई।
लोग पूछते थे—
“तुम लोग स्थिर कब हो रहे हो?”
वह बस मुस्कुराते थे।
क्योंकि वह जानते थे
स्थिर होना एक दिन का काम नहीं होता।
एक साल बाद,
उसी कैफ़े ने नवीनीकरण के लिए बंद होने की घोषणा की।
आख़िरी दिन
वह दोनों फिर खिड़की के पास बैठे थे।
“यहीं से शुरू हुआ था न?”
वह बोली।
उसने सिर हिला दिया।
“और यहीं तक आया।”
बारिश नहीं हो रही थी,
लेकिन हवा में वही नमी थी।
उठते समय
उसने कहा,
“जगह बंद हो रही है,
कहानी नहीं।”
वह उसके साथ चल पड़ी।
सड़क पर चलते हुए
उसने अपना हाथ उसके हाथ में रखा—
आदत की तरह,
हक़ की तरह नहीं।
शहर वही था,
ज़िंदगी वही—
पर दोनों थोड़े ज़्यादा साथ थे।
और अगर कोई पूछता
कि यह कहानी प्यार की थी या नहीं,
तो जवाब सरल होता—
यह प्यार की कहानी नहीं थी।
यह साथ रहना सीखने की कहानी थी।
क्योंकि वास्तविक जीवन में
सब कुछ मिल जाए,
यह ज़रूरी नहीं—
बस कोई हो
जिसके साथ
सब कुछ जिया जा सके।
और उन दोनों ने
वही चुना। 🌙💗