The light of South India - 1 in Hindi Spiritual Stories by Ashish jain books and stories PDF | दक्षिण का गौरव - 1

Featured Books
Categories
Share

दक्षिण का गौरव - 1


प्रस्तावना: रक्त से शांति का महाकुंभइतिहास केवल तारीखों और युद्धों का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि यह उन आत्माओं की यात्रा है जिन्होंने समय की धारा को मोड़ने का साहस किया। 'रक्त और प्रतिज्ञा' एक ऐसी ही गाथा है, जो दक्षिण भारत के महान सेनानायक और प्रधानमंत्री चामुंडराय के जीवन पर आधारित है। यह कहानी हमें दसवीं शताब्दी के उस कालखंड में ले जाती है जहाँ तलवारों की खनक और साम्राज्यों की भूख के बीच एक योद्धा अपने भीतर के बुद्ध को खोजता है।यह पुस्तक चामुंडराय के उस रूपांतरण की कहानी है, जो पल्लव और क्रूर पांड्य राजाओं के विरुद्ध 'वीर मार्तंड' बनकर खड़ा होता है, लेकिन अंततः करुणा के सागर में डूबकर 'गोमट' बन जाता है। गंग साम्राज्य की रक्षा से शुरू होकर, गोमांतक के रहस्यमयी समुद्रों और पोदनपुर की दिव्य नगरी तक फैला यह सफर, पाठक को शौर्य, रोमांच, प्रेम और परम त्याग के एक ऐसे लोक में ले जाएगा जहाँ चमत्कार और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यह मात्र एक जीवनी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की कहानी है जो अपने जीवन के युद्धों के बीच शांति की एक स्थायी 'गोमटेश्वर' प्रतिमा स्थापित करना चाहता है।आभार: श्रद्धा और सृजन का संगमइस महागाथा का सृजन उन पूर्वजों के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं था, जिन्होंने शिलालेखों और स्थापत्य कला के रूप में अपनी विरासत हमारे लिए छोड़ी।सर्वप्रथम, मैं उन प्राचीन जैन मुनियों और इतिहासकारों का आभारी हूँ, जिनके ग्रंथों ने चामुंडराय जैसे महान व्यक्तित्व के धुंधले पड़ चुके इतिहास को फिर से जीवंत करने की प्रेरणा दी। मैं ऋणी हूँ उस पावन भूमि श्रवणबेलगोला और गोमांतक के उन तटों का, जिनकी हवाओं में आज भी यह कहानी जीवित महसूस होती है। विशेष आभार मेरे उन सभी पाठकों और मार्गदर्शकों का, जिन्होंने इस कथा के हर अध्याय में रोमांच और ऐतिहासिक सत्यता के बीच संतुलन बनाए रखने में मेरा सहयोग किया।चामुंडराय की पत्नी 'अजिता' जैसे पात्रों के माध्यम से त्याग की जो परिभाषा इस पुस्तक में उकेरी गई है, वह उन सभी मूक बलिदानों को समर्पित है जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए हैं। अंततः, यह पुस्तक उन गुमनाम शिल्पियों के प्रति एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने छेनी और हथौड़े से पत्थरों में प्राण फूँके।उपसंहार: समय की शिला पर अमिट पदचिह्नहज़ारों साल बीत गए। साम्राज्य आए और धूल में मिल गए। पांड्य राजाओं का अहंकार और उदियान की क्रूरता अब केवल पुरानी कहानियों का हिस्सा है। लेकिन विंध्यगिरि की चोटी पर खड़ी वह ५७ फीट ऊँची दिगंबर प्रतिमा आज भी उसी शांत मुस्कान के साथ खड़ी है, जैसी चामुंडराय ने उसे पोदनपुर के दिव्य प्रकाश में देखा था।चामुंडराय ने जो 'विजय स्तंभ' गोमांतक के तट पर अदृश्य रूप में स्थापित किया था, वह आज भी भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सीमाओं की रक्षा कर रहा है। उनकी उपाधि 'गोमट' आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि अहिंसा और सृजन का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है। यह कहानी हमें सिखाती है कि वास्तविक विजय वह नहीं जो रक्त बहाकर हासिल की जाए, बल्कि वह है जो आने वाली पीढ़ियों के हृदय में शांति और करुणा का बीज बो सके।जब तक श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के मंत्र गूँजेंगे और जब तक कोंकण का समुद्र अपनी लहरों से तट को छुएगा, 'वीर मार्तंड' चामुंडराय और उनके द्वारा रचित 'ईश्वर' की यह गाथा जीवित रहेगी। पत्थर मर सकते हैं, पर एक योद्धा की वह प्रतिज्ञा कभी नहीं मरती जो मानवता के कल्याण के लिए ली गई हो।कोंकण के वज्रवीर मार्तंड से गोमट चामुंडराय की महागाथाविषय-सूचीभाग १: युद्ध और साम्राज्य की रक्षाअध्याय १: रक्त और प्रतिज्ञा – गंग साम्राज्य पर हमला और चामुंडराय का बिजली की गति से प्रवेश।अध्याय २: गरुड़ व्यूह और विश्वासघात – पांड्य सेना की चक्रव्यूह रचना और अपनों की गद्दारी।अध्याय ३: अमावस्या का काल – चामुंडराय का गुप्त 'छापामार' प्रहार और सामरिक कौशल।अध्याय ४: कोंकणी तट का महासंग्राम – क्रूर सेनापति उदियान के साथ जल-युद्ध।अध्याय ५: राजमाता का संदेश – पोदनपुर का मानचित्र और संकल्प की नई ऊर्जा।अध्याय ६: विंध्यगिरि की ढाल – 'वीर मार्तंड' का उदय और पत्थरों की वर्षा।अध्याय ७: अंतिम द्वंद्व – राजा राचमल्ल की प्राण रक्षा और चामुंडराय का पराक्रम।अध्याय ८: विजय का सन्नाटा – युद्ध का अंत और वैराग्य के अंकुर।भाग २: वैराग्य और आंतरिक युद्धअध्याय ९: आत्मा का प्रतिक्रमण – रणभूमि में शवों को देखकर ग्लानि और क्षमा याचना।अध्याय १०: अजिता का मरहम – महल वापसी और पत्नी अजिता का मूक संवाद।अध्याय ११: राजसी सुख का बोझ – पुत्र के हाथों में तलवार और मोह का त्याग।अध्याय १२: त्याग की अंतिम पूर्णिमा – महल से विदाई और अजिता का महान बलिदान।अध्याय १३: विंध्यगिरि का पथ – सांसारिक वस्तुओं का त्याग और साधक का जन्म।भाग ३: खोज और दिव्यताअध्याय १४: गोमांतक का रहस्य – कुडने मंदिर और समुद्र के नीचे जल-यक्षों से संघर्ष।अध्याय १५: सह्याद्री की दुर्गम चोटी – विद्याधर 'सत भद्र' की माया और पत्थरों के दानव।अध्याय १६: महासूत्र का शंखनाद – माया का विनाश और पोदनपुर का उदय।अध्याय १७: बादलों के ऊपर तैरती नगरी – पोदनपुर की भव्यता और विद्याधरों का निवास।अध्याय १८: बाहुबली का विराट स्वरूप – ५०० फीट की प्रकाश प्रतिमा और दिव्य संवाद।भाग ४: सृजन और अमरताअध्याय १९: विंध्यगिरि का संकल्प – शिला को तराशने की शुरुआत और प्रथम प्रहार।अध्याय २०: गोमांतक का अंतिम स्तंभ और अमर विरासत________________________________________प्रमुख पात्र (Key Characters)चामुंडराय (वीर मार्तंड/गोमट): कहानी के केंद्रीय नायक। एक महान सेनापति और राजनीतिज्ञ, जो युद्ध की विभीषिका से निकलकर शांति और सृजन के पथ पर चलते हैं।अजिता: चामुंडराय की पत्नी। वह प्रेम और गरिमा का प्रतीक हैं, जो अपने पति को उनके महान लक्ष्य के लिए सहर्ष विदा करती हैं।सत भद्र (मायावी विद्याधर): सह्याद्री की चोटियों का शक्तिशाली रक्षक और तांत्रिक। वह पोदनपुर के द्वार का रक्षक है जो अपनी मायावी विद्या और 'पत्थरों के दानवों' से चामुंडराय की कठिन परीक्षा लेता है। उसका अहंकार ही चामुंडराय के आत्मबल से टकराता है।राजा राचमल्ल: गंग साम्राज्य के न्यायप्रिय शासक और चामुंडराय के मित्र, जिनके लिए चामुंडराय ने कई युद्ध जीते।राजमाता कालला देवी: चामुंडराय की माता और आध्यात्मिक मार्गदर्शिका, जिन्होंने उन्हें पोदनपुर की खोज का गुप्त लक्ष्य दिया। उदियान: पांड्यराजा उदियन की सेना का क्रूर और अहंकारी सेनापति, जो चामुंडराय का मुख्य युद्ध-विरोधी है।_____________________________________अध्याय १: रक्त और प्रतिज्ञाआकाश का रंग सिंदूरी से गहरा लाल हो चुका था, मानो प्रकृति भी आने वाले महाविनाश का संकेत दे रही हो। गंग साम्राज्य की पवित्र मिट्टी आज अपनों के रक्त से भीग चुकी थी।रणभूमि का दृश्य: नरक का सायापल्लव और पांड्य राजाओं की संयुक्त सेनाओं ने एक ऐसा घेरा बनाया था जिसे तोड़ना असंभव प्रतीत हो रहा था। हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की हिनहिनाहट के बीच केवल एक ही ध्वनि स्पष्ट थी—मृत्यु की।राजा राचमल्ल, जिनके शरीर पर अनगिनत घाव थे, अपनी टूटी हुई ढाल के सहारे खड़े थे। उनके चारों ओर उनके सबसे विश्वसनीय अंगरक्षक एक-एक करके गिर रहे थे।"राचमल्ल!" पांड्य राजा अट्टहास करते हुए आगे बढ़ा। "तुम्हारी वीरता की गाथाएँ आज इसी कीचड़ में समाप्त होंगी। देखो! तुम्हारी सेना के अवशेष भाग रहे हैं। आत्मसमर्पण कर दो, शायद मैं तुम्हें एक त्वरित मृत्यु का दान दे दूँ!"राचमल्ल ने थूकते हुए अपनी तलवार सीधी की। "पांड्य! गंग साम्राज्य के राजा मरना जानते हैं, झुकना नहीं। हमारी राख भी तुम्हारे विनाश का मार्ग प्रशस्त करेगी।""तो फिर मरो!" पांड्य राजा ने अपनी भारी गदा उठाई।वज्र का आगमनठीक उसी क्षण, उत्तर की दिशा से एक ऐसी गर्जना सुनाई दी जिसने युद्ध के शोर को भी मौन कर दिया। वह किसी बादल के फटने की आवाज़ नहीं थी, वह तो चामुंडराय के आने की आहट थी।क्षितिज पर धूल का एक विशाल बवंडर उठा। और उस बवंडर के मध्य से निकली 'मेघवर्णा'—चामुंडराय की वह श्वेत घोड़ी जो हवा से बातें करती थी।"जय महावीर जय बाहुबली! गंग साम्राज्य की जय!"चामुंडराय का स्वर बिजली की तरह कौंधा। उनके हाथ में 'वज्रमुष्टि' तलवार थी, जो डूबते सूर्य की किरणों को परावर्तित कर शत्रुओं की आँखों को चौंधिया रही थी।युद्ध टिप्पणी: चामुंडराय का आगमन मात्र एक सैनिक का आना नहीं था, वह पराजित हो रही सेना में प्राण फूंकने वाला एक दैवीय चमत्कार था।संवाद और संहारचामुंडराय ने मेघवर्णा को एड़ लगाई और वह शत्रु सेना की अग्रिम पंक्ति में सीधे जा घुसी।चामुंडराय: (पांड्य सैनिकों को काटते हुए) "कायरों! निहत्थों और थके हुए योद्धाओं पर वार करना वीरता नहीं है। यदि साहस है, तो चामुंडराय के सम्मुख आओ!"एक पांड्य सेनापति ने उन पर भाला फेंका, जिसे चामुंडराय ने हवा में ही पकड़ लिया और उसी गति से वापस उसके सीने के पार कर दिया।पांड्य सेनापति: (मरते हुए) "यह... यह मनुष्य नहीं... यमराज है!"चामुंडराय: "मैं यमराज नहीं, मैं गंग साम्राज्य का संकल्प हूँ!"वे बिजली की गति से शत्रु के चक्रव्यूह को छिन्न-भिन्न कर रहे थे। 'वज्रमुष्टि' तलवार जहाँ से गुजरती, वहां कटे हुए सरों और अंगों का ढेर लग जाता।राजा का उद्धार और भीषण प्रतिज्ञाजैसे ही पांड्य राजा अपनी गदा राचमल्ल पर चलाने ही वाला था, चामुंडराय की तलवार ने बीच में हस्तक्षेप किया। 'धातु पर धातु' टकराने की गूँज पूरे मैदान में फैल गई।पांड्य राजा: (चौंककर) "कौन है तू?"चामुंडराय: "तेरा काल। पीछे हट जा, इससे पहले कि मेरा धैर्य समाप्त हो जाए।"चामुंडराय ने एक शक्तिशाली प्रहार किया जिससे पांड्य राजा का संतुलन बिगड़ गया। उन्होंने तुरंत झुककर गिरते हुए राजा राचमल्ल को अपने बाएं हाथ से सहारा दिया।राजा राचमल्ल: (कांपते स्वर में) "चामुंडराय... तुम आ गए? मुझे लगा सब समाप्त हो गया..."चामुंडराय: "महाराज, जब तक आपके इस सेवक के शरीर में रक्त की एक भी बूंद शेष है, गंग ध्वज कभी नीचे नहीं झुक सकता। आप मेघवर्णा पर सवार हों, शेष मैं संभाल लूँगा।"चामुंडराय ने दूसरे हाथ में गंग साम्राज्य का ध्वज थाम लिया। उन्होंने अपनी तलवार आसमान की ओर उठाई। उनकी आँखों में प्रतिशोध की अग्नि धधक रही थी।चामुंडराय की प्रतिज्ञा:"साक्षी है यह रणभूमि! साक्षी है यह रक्त! मैं, चामुंडराय, आज यह भीषण प्रतिज्ञा करता हूँ—जब तक पांड्य कुल का यह झूठा घमंड और उनकी सेना का अस्तित्व इस धूल में नहीं मिल जाता, तब तक मैं चैन की नींद नहीं सोऊँगा। मेरी तलवार तब तक म्यान में नहीं जाएगी, जब तक पांड्य साम्राज्य के अहंकार का अंतिम दीपक बुझ नहीं जाता!"रोमांचक टिप्पणी: उस क्षण ऐसा लगा मानो समय रुक गया हो। शत्रु सेना के पैर पीछे हटने लगे। चामुंडराय का वह तेज इतना प्रचंड था कि साक्षात काल भी उनके सामने झुकने को विवश हो जाए।युद्ध का नया मोड़चामुंडराय के शब्द सुनकर पांड्य राजा क्रोध से काँप उठा।पांड्य राजा: "अहंकारी सेनापति! तेरी प्रतिज्ञा तेरी चिता बनेगी। सैनिकों! घेर लो इसे!"चामुंडराय: (मुस्कुराते हुए, पर वह मुस्कान डरावनी थी) "घेरा तुमने नहीं बनाया है राजा, घेरा तो मैंने खींचा है—तुम्हारी मृत्यु का!"चामुंडराय ने अपनी तलवार घुमाई और एक ही झटके में तीन सैनिकों के सर धड़ से अलग कर दिए। अब युद्ध का दूसरा चरण प्रारंभ होने वाला था, जहाँ एक ओर पूरी सेना थी और दूसरी ओर अकेला 'वज्रमुष्टि' चामुंडराय।

______________________________________

अध्याय २: गरुड़ व्यूह और विश्वासघात की कड़वाहट

रात का तीसरा पहर था। आकाश में चंद्रमा किसी टूटे हुए चांदी के बर्तन की तरह आधा लटका था। पांड्य शिविर से आती मशालों की रोशनी दूर से ऐसी लग रही थी मानो कोई विशाल अजगर अपनी आंखें खोलकर गंग सेना को निगलने का इंतजार कर रहा हो। पांड्यों ने आज 'गरुड़ व्यूह' की रचना की थी—एक ऐसी सैन्य संरचना जिसके पंख मीलों तक फैले थे और जिसकी 'चोंच' साक्षात मृत्यु का द्वार थी।

चामुंडराय अपने खेमे में मानचित्र पर झुके हुए थे। उनके चेहरे पर छाई शांति किसी आने वाले तूफान का संकेत थी। तभी, सेनापति अजवा ने हांपते हुए प्रवेश किया।

"महाराज! अनर्थ हो गया," अजवा की आवाज कांप रही थी। "उत्तर दिशा से आने वाली रसद गाड़ियां रोक दी गई हैं। पहरेदारों के गले रेत दिए गए हैं।"

चामुंडराय की उंगलियां मानचित्र पर 'विजयादित्य' के सामंत प्रदेश पर आकर रुक गईं। उन्होंने सर उठाया, उनकी आंखों में कोई आश्चर्य नहीं था, केवल एक ठंडी चमक थी। "विश्वासघात की जड़ें अक्सर स्वर्ण मुद्राओं की चमक में छिपी होती हैं, अजवा। विजयादित्य ने अपनी निष्ठा का सौदा कर लिया है।"

षड्यंत्र का जाल

तभी अंधेरे कोने से एक रहस्यमयी आकृति उभरी। वह गुप्तचर प्रमुख 'कालवेध' था, जिसकी उपस्थिति का पता तब तक नहीं चलता जब तक वह स्वयं न चाहे।

"स्वामी," कालवेध की आवाज सूखी पत्तियों के रगड़ने जैसी थी। "पांड्य दूत और विजयादित्य के बीच गुप्त संधि हो चुकी है। भोर होते ही जब हम गरुड़ व्यूह के केंद्र में होंगे, विजयादित्य हमारी रसद और पीछे की टुकड़ी पर प्रहार करेगा। हम दो पाटों के बीच पिस जाएंगे।"

अजवा ने आवेश में अपनी तलवार खींच ली। "मैं अभी जाकर उस गद्दार का सिर कलम कर दूंगा!"

"रुको,अजवा!" चामुंडराय की आवाज बिजली की कड़क जैसी थी। "क्रोध तार्किकता का शत्रु है। गरुड़ व्यूह में घुसना आत्मघाती है, लेकिन वहां न जाना कायरता। हम दोनों करेंगे। हम व्यूह को उसकी अपनी ही भूख से हराएंगे।"

सामरिक बिसात

चामुंडराय ने तेजी से निर्देश दिए। उनकी योजना किसी पहेली की तरह पेचीदा थी। "अजवा, तुम सेना की मुख्य टुकड़ी लेकर सूर्योदय के समय गरुड़ के 'मुख' पर प्रहार करोगे। शोर इतना होना चाहिए कि पांड्यों को लगे कि पूरी गंग सेना वहीं है। लेकिन याद रखना, तुम्हें केवल उलझाए रखना है, भीतर नहीं धंसना।"

"और आप, स्वामी?" अजवा ने संशय से पूछा।

चामुंडराय के होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई। "मैं और कालवेध की 'छाया टुकड़ी' उस मार्ग से जाएंगे जिसे यमराज ने भी भुला दिया है—कालिख घाटी। हम विजयादित्य के शिविर में अतिथि बनकर जाएंगे, निमंत्रण के बिना।"

रक्त और न्याय

विजयादित्य अपने शिविर में स्वर्ण मुद्राओं के ढेरों को गिन रहा था। वह मन ही मन गंग साम्राज्य के पतन के बाद मिलने वाले नए पद के सपने बुन रहा था। अचानक, उसके खेमे की मशालें फड़फड़ाईं और बुझ गईं।

"कौन है वहां?" विजयादित्य चिल्लाया। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही धड़कन सुनाई दे रही थी।

"सोना बहुत भारी होता है, विजयादित्य," अंधेरे से एक गूंजती हुई आवाज आई। "इतना भारी कि यह आत्मा को पाताल तक ले जाता है।"

विजयादित्य ने तलवार उठाई, लेकिन अंधेरे से एक हाथ निकला और उसकी कलाई को लोहे की पकड़ की तरह जकड़ लिया। वह चामुंडराय थे। उनकी आंखों में कोई क्रोध नहीं था, केवल एक न्यायप्रिय राजा की कठोरता थी।

"स्वामी... मुझे क्षमा..." विजयादित्य के शब्द उसके गले में ही घुट गए।

"क्षमा जीवितों के लिए होती है, गद्दारों के लिए केवल विस्मृति है," चामुंडराय ने धीमे स्वर में कहा।

एक बिजली सी कौंधी। तलवार के एक ही वार ने विश्वासघात का अध्याय समाप्त कर दिया। कक्ष फिर से शांत हो गया, केवल फर्श पर गिरने वाली खून की बूंदों की 'टप-टप' सुनाई दे रही थी।

संदेश का प्रेषण

भोर की पहली किरण फूटने ही वाली थी। पांड्य राजा का दूत विजयादित्य के शिविर की ओर बढ़ा, यह देखने कि रसद कब नष्ट की जाएगी। लेकिन शिविर के मुख्य द्वार पर उसे जो दिखा, उसने उसके रक्त को बर्फ कर दिया।

एक लकड़ी के थाल में विजयादित्य का कटा हुआ सिर रखा था, जिसके मुंह में वही स्वर्ण मुद्राएं ठूंसी गई थीं जिनके लिए उसने सौदा किया था। उसके पास एक पत्र था, जिस पर चामुंडराय की मुहर थी:

"पांड्य नरेश, गरुड़ व्यूह का शिकार करने के लिए गरुड़ जैसा जिगर चाहिए। रसद रुक गई है, पर भोजन के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे अहंकार के अंतिम संस्कार के लिए। तुम्हारी प्रतीक्षा रणभूमि में है।"


गरुड़ व्यूह का विखंडन

जब यह सूचना पांड्य शिविर में पहुँची, तो वहां खलबली मच गई। पांड्य सेनापति को लगा कि विजयादित्य मारा गया है तो शायद गंग सेना ने पीछे से हमला कर दिया है। इसी भ्रम में उन्होंने गरुड़ व्यूह के 'पंखों' को पीछे मोड़ने का आदेश दिया ताकि वे पीछे से आने वाले संभावित हमले को रोक सकें।

यही वह क्षण था जिसका चामुंडराय को इंतजार था। गरुड़ व्यूह अपनी संरचना खो चुका था।

चामुंडराय अपनी गुप्त टुकड़ी के साथ पांड्यों के पार्श्व भाग (Flank) से बिजली की गति से टूटे। उधर नागार्जुन ने सामने से भीषण प्रहार किया।

"जय महावीर जय बाहुबली!" के उद्घोष से धरती कांप उठी।

विश्वासघात की कड़वाहट अब प्रतिशोध की ज्वाला में बदल चुकी थी। चामुंडराय अपनी तलवार से रक्त की गाथा लिख रहे थे। उनकी हर चाल तार्किक थी, हर प्रहार रहस्यपूर्ण। वे युद्ध के मैदान में एक सेनापति नहीं, बल्कि एक नियति बनकर उभरे थे।

पांड्य सेना जो कल तक अजेय लग रही थी, आज अपने ही बनाए जाल में उलझकर छिन्न-भिन्न हो रही थी। लेकिन चामुंडराय जानते थे कि यह केवल एक मोर्चे की जीत है। असली रहस्य तो अभी भी उस 'अदृश्य शत्रु' के पास था जो पांड्यों के पीछे खड़ा था।

_________________________________________

अध्याय ३: अमावस्या का काल — गुप्त प्रहार

अमावस्या की वह रात साधारण रात नहीं थी। आकाश में चाँद का अस्तित्व मिट चुका था, जैसे प्रकृति ने स्वयं चामुंडराय के गुप्त प्रहार के लिए अंधकार का कफ़न बुन दिया हो। पांड्य सेना का शिविर विंध्य की तलहटी में किसी विशाल अजगर की भांति फैला हुआ था। हज़ारों मशालें जल रही थीं, अट्टहास गूँज रहे थे, और मदहोश सैनिक अपनी संख्या के अहंकार में डूबे हुए थे।

परंतु, कुछ मील दूर, घने जंगलों के बीच चामुंडराय के ५०० चुनिंदा योद्धा पत्थर की मूर्तियों की भांति शांत खड़े थे। उनके घोड़ों के खुरों पर मोटे ऊनी वस्त्र बँधे थे।

चामुंडराय ने अपनी म्यान से तलवार निकाली। उसकी चमक अंधेरे को चीर रही थी। उन्होंने अपने सेनापति अजवा की आँखों में देखा।

चामुंडराय: "अजवा, क्या मौत की आहट को सुना है कभी?"

अजवा: "महाराज, आज तक तो केवल मौत का शोर सुना है।"

चामुंडराय (धीमी और गंभीर आवाज़ में): "आज मौत शोर नहीं करेगी। आज मौत खामोशी से आएगी। याद रहे, हमारी संख्या उनकी एक उंगली के बराबर भी नहीं है, लेकिन हमारा संकल्प हिमालय से ऊँचा है। आज पांड्य सेना को यह ज्ञात होना चाहिए कि युद्ध केवल सिर गिनकर नहीं, बल्कि साहस तौलकर जीता जाता है।"

एक युवा योद्धा: "महाराज, क्या हम बिना मशालों के शत्रुओं को देख पाएंगे?"

चामुंडराय: "जब धर्म का मार्ग धुंधला हो, तब आँखों की नहीं, अंतरात्मा की ज्योति से देखा जाता है। आज तुम्हारी तलवारें तुम्हारी आँखें बनेंगी। याद रखना, हमें केवल उन्हें मारना नहीं है, उन्हें डराना है। डर, जो तलवार से भी गहरा घाव करता है।"

अंधकार का तांडव

आधी रात बीत चुकी थी। पांड्य शिविर में सन्नाटा छाने लगा था। तभी, हवा का रुख बदला। धूल के गुबार के साथ ५०० परछाइयाँ काल बनकर पांड्य शिविर की सीमा में प्रवेश कर गईं। घोड़ों की टापों की आवाज़ तक नहीं आई, केवल हवा के चीरने की सरसराहट थी।

चामुंडराय सबसे आगे थे। उन्होंने इशारे से सैनिकों को विभाजित किया। अचानक, एक संतरी की नींद खुली, उसने काली परछाई को देखा, लेकिन इससे पहले कि वह चिल्ला पाता, चामुंडराय की तलवार उसके गले को पार कर गई।

चामुंडराय: "खामोश! यमराज को शोर पसंद नहीं।"

तभी अचानक, शिविर के एक कोने से चीख गूँजी। पांड्य सैनिक हड़बड़ाकर उठे।

पांड्य सैनिक १: "आक्रमण! कौन है? कहाँ से आ रहे हैं?"

पांड्य सैनिक २: "दिखाई नहीं दे रहा! क्या यह प्रेत हैं?"

अंधेरे में चामुंडराय की आवाज़ गूँजी, जो किसी गुफा से आती हुई प्रतीत हो रही थी।

चामुंडराय: "पांड्यों! तुम्हारी उद्दंडता का अंत आ गया है। देखो, काल तुम्हारे सम्मुख खड़ा है, और उसके पास आँखें नहीं हैं!"

चामुंडराय की ज्वाला

युद्ध भीषण हो उठा था। चामुंडराय सीधे पांड्य राजा के मुख्य तंबू की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में पांड्य सेनापति ने उन्हें रोका।

पांड्य सेनापति: "कायरों की तरह अंधेरे में वार करते हो चामुंडराय? दम है तो सूर्य की प्रतीक्षा करते!"

चामुंडराय (अट्टहास करते हुए): "मूर्ख! युद्ध नीति समय नहीं देखती, परिणाम देखती है। सूर्य तो कल भी उगेगा, लेकिन क्या तुम उसे देखने के लिए जीवित रहोगे? जो अपनी शक्ति के मद में सो जाते हैं, उन्हें जगाने के लिए मृत्यु ही सबसे उत्तम साधन है।"

तलवारें टकराईं। चिंगारियां उठीं। चामुंडराय का एक प्रहार और पांड्य सेनापति की ढाल के दो टुकड़े हो गए।

चामुंडराय: "यह वार चामुंडराय का नहीं, उन हज़ारों निर्दोषों की आह का है जिन्हें तुमने कुचला है।"

उन्होंने जलती हुई एक मशाल उठाई और उसे पांड्य राजा के स्वर्णजड़ित तंबू पर फेंक दिया। लपटें आसमान छूने लगीं। आग की रोशनी में पांड्य सैनिकों ने देखा—चारों ओर केवल लाशें थीं और उनके बीच लहूलुहान चामुंडराय किसी रुद्र अवतार की भांति खड़े थे।

अंतिम प्रहार और विजय

पांड्य सेना में भगदड़ मच गई। हज़ारों सैनिक अपनी ही तलवारों से अपनों को काट रहे थे, क्योंकि अंधेरे और डर ने उनकी बुद्धि हर ली थी।

वीरसेन: "महाराज! वे भाग रहे हैं! शत्रु रणछोड़ हो गया है!"

चामुंडराय: "उन्हें भागने दो, वीरसेन। जो सैनिक अपनी धरती के लिए नहीं, केवल वेतन के लिए लड़ता है, वह मृत्यु की पहली आहट पर पीठ ही दिखाता है। आज की रात इतिहास में लिखी जाएगी—कि जब अधर्म का पलड़ा भारी था, तब मुट्ठी भर सत्य के उपासकों ने अमावस्या को भी प्रकाशमय कर दिया।"

जैसे-जैसे भोर की पहली किरण फूटने लगी, पांड्य शिविर श्मशान में बदल चुका था। हज़ारों सैनिक वन की ओर भाग गए थे। चामुंडराय ने अपनी तलवार साफ़ की और आकाश की ओर देखा।

चामुंडराय: "अहिंसा परमो धर्मः, लेकिन जब धर्म पर संकट आए, तो शस्त्र उठाना ही सबसे बड़ी अहिंसा है। यह विजय पांड्य की हार नहीं, अहंकार की हार है।"

समस्त रणभूमि एक ही जयकारे से गूँज उठी:

"जिन शासन की जय! भगवान

महावीर की जय! चामुंडराय की जय!"

_________________________________________



अध्याय ४: कोंकणी तट का महासंग्राम और क्रूर उदियान

आसमान में धूल और बारूद का गुबार छाया था। कोंकणी तट की रेतीली भूमि आज किसी शांत किनारे जैसी नहीं, बल्कि कुरुक्षेत्र जैसी प्रतीत हो रही थी। पांड्य सेना का सबसे खूंखार चेहरा, सेनापति उदियान, अपनी विशाल घुड़सवार सेना और पैदल टुकड़ियों के साथ तट पर उतर चुका था। उदियान कोई साधारण योद्धा नहीं था; वह एक नरपिशाच था जो शत्रु सैनिकों की उँगलियाँ काटकर उनकी माला बनाकर अपने गले में पहनता था। उसका मानना था कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि रूह कपा देने वाले डर से जीता जाता है।

गंग वंश के प्रधानमंत्री चामुंडराय अपने घोड़े पर सवार तट के ऊँचे टीले से स्थिति का जायजा ले रहे थे। उनके पीछे गंग सेना के वीर 'जय जिनेंद्र' के उद्घोष के साथ खड़े थे। चामुंडराय जानते थे कि उदियान की शक्ति उसकी क्रूरता में है, और उसकी कमजोरी उसका अहंकार।

रेत पर बिछाया गया मौत का जाल

"प्रधानमंत्री जी, उदियान की सेना ने तट के पूर्वी हिस्से को घेर लिया है," एक दूत ने हाँफते हुए कहा।

चामुंडराय की नज़रें समुद्र के किनारे की गीली रेत पर जमी थीं। उन्होंने शांत स्वर में आदेश दिया, "उदियान को लगने दो कि हम रक्षात्मक युद्ध लड़ रहे हैं। अपनी सेना को दलदली इलाके की ओर पीछे खींचो। याद रहे, हमारा लक्ष्य उसे रेत के उस हिस्से में लाना है जहाँ घोड़े धंस जाते हैं।"

सैनिकों ने संशय जताया, "पर श्रीमान, वह हम पर टूट पड़ेगा!"

चामुंडराय ने अपनी तलवार 'वीर-नारायण' को म्यान से बाहर निकाला। उसकी चमक सूर्य की किरणों से टकराकर उदियान की सेना की आँखों को चौंधिया रही थी। उन्होंने गरजकर कहा, "अहिंसा परमो धर्म: का अर्थ कायरता नहीं है। जब धर्म पर संकट आए, तो शस्त्र उठाना ही सबसे बड़ा पुण्य है। जय जिनेंद्र!"

महासंग्राम का प्रारंभ

उदियान ने अपनी गदा हवा में लहराई। उसके गले में लटक रही उँगलियों की माला आपस में टकराकर एक वीभत्स ध्वनि कर रही थी। "चामुंडराय! आज तुम्हारी हड्डियाँ इस रेत में दफन होंगी!" उसने चिल्लाकर आदेश दिया, "आक्रमण!"

पांड्य सेना एक सुनामी की तरह आगे बढ़ी। चामुंडराय ने अपनी सेना को पीछे हटने का संकेत दिया। उदियान को लगा कि गंग सेना डरकर भाग रही है। वह अपने चुनिंदा घुड़सवारों के साथ तट के उस हिस्से में घुस गया जहाँ मछुआरों ने रात भर मेहनत करके पानी की छोटी धाराओं को मोड़कर रेत को एक गहरे दलदल में बदल दिया था।

जैसे ही उदियान के भारी घोड़े वहां पहुँचे, उनके पैर रेत में धंसने लगे। सेना में अफरा-तफरी मच गई।

"अभी! प्रहार करो!" चामुंडराय का आदेश गूँजा।

झाड़ियों और टीलों के पीछे छिपे गंग सैनिक अचानक बाहर निकले। तीरों की ऐसी वर्षा हुई कि आसमान ढंक गया। चामुंडराय स्वयं अपने घोड़े को बिजली की गति से दौड़ाते हुए सीधे उदियान की ओर बढ़े।

रेत के मैदान में खूनी द्वंद्व

उदियान अपने फंस चुके घोड़े से कूदकर जमीन पर आ गया। उसने अपनी भारी लोहे की गदा घुमाई और चामुंडराय के घोड़े पर वार करना चाहा। चामुंडराय ने फुर्ती से लगाम खींची और घोड़े से कूदकर सीधे उदियान के सामने खड़े हो गए।

उदियान: "तुम एक ब्राह्मण मंत्री हो चामुंडराय, कलम पकड़ना तुम्हारा काम है। यह गदा झेलना तुम्हारे बस की बात नहीं!"

चामुंडराय: "कलम से भाग्य लिखता हूँ उदियान, और तलवार से उन लोगों का अंत जो निर्दोषों का रक्त बहाते हैं। जय जिनेंद्र!"

उदियान ने पूरी ताकत से गदा का प्रहार किया। चामुंडराय ने ढाल से उसे रोका, लेकिन वार इतना शक्तिशाली था कि वे दो कदम पीछे खिसक गए। उदियान फिर झपटा, लेकिन इस बार चामुंडराय ने रेत का एक मुट्ठा उसकी आँखों की ओर फेंका और नीचे झुककर अपनी तलवार से उदियान के जांघ पर गहरा घाव कर दिया।

उदियान चीख पड़ा। उसका घुटना जमीन से जा टकराया। खून से सनी रेत लाल काली पड़ने लगी। चामुंडराय की तलवार अब उदियान की गर्दन पर थी।

उदियान की सेना भाग खड़ी हुई थी। तट पर केवल पांड्य सैनिकों की लाशें और गंग सेना की जयकार बाकी थी।

हार का कलंक और न्याय

"मार दो मुझे कायर!" उदियान ने थूकते हुए कहा। "तुम्हारे धर्म में तो क्षमा दान की बात होती है न? दिखाओ अपनी महानता।"

चामुंडराय ने अपनी तलवार हटा ली। उन्होंने उदियान के गले से वह घृणित माला खींचकर तोड़ दी और मोतियों की तरह उँगलियों को रेत में फेंक दिया।

"उदियान, मौत तुम्हें उन परिवारों के दुख से मुक्त कर देगी जिन्हें तुमने उजाड़ा है। मैं तुम्हें जीवित छोड़ता हूँ ताकि तुम अपनी हार और इस अपंग शरीर के साथ हर दिन मरो। जाओ, अपनी सेना के बचे हुए टुकड़ों को लेकर वापस लौट जाओ और कहना कि गंग वंश का प्रधानमंत्री न केवल संधि करना जानता है, बल्कि न्याय करना भी जानता है।"

चामुंडराय ने अपनी सेना की ओर मुड़कर हाथ जोड़े और कहा, "विजय हमारी नहीं, धर्म की हुई है। सभी घायलों का उपचार करो, चाहे वे हमारे हों या शत्रु के। जय जिनेंद्र!"

कोंकणी तट का वह सूर्यास्त एक नए युग का गवाह था, जहाँ एक मंत्री ने शस्त्र और शास्त्र के

मेल से विजय गाथा लिखी थी।

_________________________________________


अध्याय ५: राजमाता का गुप्त संदेश और पोदनपुर का मानचित्र

गंगवाड़ी की सेना महीनों से कावेरी के तटों और विंध्य की घाटियों में संघर्षरत थी। युद्ध की विभीषिका ने वीर सैनिकों के हृदय में थकान भर दी थी। रक्त से सनी धरती और शस्त्रों की झंकार के बीच, महाबली चामुंडराय अपने शिविर में विचारमग्न थे। उनके सम्मुख रखा दीप मंद पड़ रहा था, मानो थके हुए सैनिकों के मनोबल का प्रतीक हो।

तभी, शिविर के द्वार पर एक दिव्य प्रकाश पुंज सा प्रकट हुआ। वह कोई साधारण दूत नहीं, बल्कि श्वेत वस्त्रों में लिपटे एक सिद्ध साधक थे। उनके चेहरे पर वह सौम्यता थी जो केवल 'अहिंसा' और 'तप' से आती है। उन्होंने झुककर वंदन किया और चामुंडराय के हाथों में एक प्राचीन भोजपत्र सौंपा।

"सेनापति," साधक की वाणी में गंभीरता थी, "यह संदेश राजमाता कालला देवी ने भेजा है। यह केवल अक्षर नहीं, बल्कि पूर्वजों का संकल्प है।"

राजमाता का संदेश

चामुंडराय ने कांपते हाथों से उस भोजपत्र को खोला। उस पर अंकित मानचित्र हज़ारों वर्षों की धूल झाड़कर साक्षात खड़ा था—पोदनपुर। वह नगरी, जिसे प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के पुत्र बाहुबली ने अपनी तपस्या से पवित्र किया था। पत्र के शब्द चामुंडराय के कानों में राजमाता की आवाज़ बनकर गूँजने लगे:

"प्रिय वत्स चामुंडराय, जैन धर्म का सार 'जीओ और जीने दो' है। किंतु जब अधर्म का अंधकार सत्य को ढंकने लगे, तब शस्त्र उठाना क्षत्रिय का धर्म बन जाता है। याद रखना, यह युद्ध केवल भूमि के एक टुकड़े के लिए नहीं है, बल्कि उस संस्कृति की रक्षा के लिए है जो जीव मात्र में परमात्मा देखती है। रक्त की इन नदियों से परे, वह पवित्र पोदनपुर है जो लुप्त हो चुका है। वहां हिंसा का लेश भी नहीं है। वत्स, जाओ और उस सत्य की खोज करो, क्योंकि भारतवर्ष की आत्मा अब शांति का नया सूर्य मांग रही है।"


मर्मस्पर्शी संवाद

चामुंडराय की आँखों में अश्रु भर आए। उन्होंने अपने प्रमुख सेनापतियों को बुलाया। शिविर में सन्नाटा पसरा था। चामुंडराय ने मानचित्र की ओर संकेत करते हुए कहा:

चामुंडराय: "मित्रों, हमने अब तक केवल शत्रुओं को परास्त करने के लिए तलवारें चलाई हैं। पर आज मेरी माता ने मुझे युद्ध का वास्तविक अर्थ समझाया है। हम केवल विजेता नहीं, हम रक्षक हैं—उस अहिंसा के मार्ग के, जिसे भगवान जिनेंद्र ने प्रशस्त किया था।"

सेनापति अजबा: "किंतु स्वामी, सैनिक थक चुके हैं। युद्ध की इस ज्वाला में शांति की बातें क्या हमें और निर्बल नहीं कर देंगी?"

चामुंडराय: (दृढ़ता से) "नहीं अजबा! शांति निर्बलता नहीं, बल्कि वीरता की पराकाष्ठा है। सोचो, महाबली बाहुबली ने सब कुछ जीतकर भी सब कुछ त्याग दिया था। वह बलवान थे, इसलिए क्षमा कर सके। हमें लड़ना है ताकि आने वाली पीढ़ियां शांति से 'सामायिक' (प्रार्थना) कर सकें। हमें पोदनपुर का वह वैभव वापस लाना है जहाँ शेर और हिरण एक ही घाट पर पानी पीते थे।"

तभी एक घायल सैनिक, जो पास ही लेटा था, उठकर बैठने का प्रयास करने लगा।

घायल सैनिक: "सेनापति, यदि हमारा गंतव्य वह पवित्र नगरी है, तो मेरे घाव अब मुझे दर्द नहीं दे रहे। मुझे फिर से अपनी 'पिच्छी' और 'कमंडल' की मर्यादा याद आ गई है। हम अपनी संस्कृति की बलि नहीं चढ़ने देंगे।"

गंग वंश और जैन गौरव

चामुंडराय ने शिविर से बाहर निकलकर अपनी सेना को संबोधित किया। चंद्रमा की चांदनी उनके स्वर्ण कवच पर पड़कर उसे धवल बना रही थी, मानो वह स्वयं एक 'दिगंबर' साधु की आभा को ओढ़ने का प्रयास कर रहे हों।

चामुंडराय का उद्घोष: "हे गंग वंश के वीरों! याद करो आचार्य सिंहनंदी का वह आशीर्वाद, जिन्होंने इस वंश की स्थापना 'दया' और 'धर्म' की नींव पर की थी। हमारा झंडा केवल जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का ध्वज है। पोदनपुर का वह मानचित्र केवल एक रास्ता नहीं, हमारी मुक्ति का द्वार है। क्या तुम अपने पूर्वजों की उस लुप्त विरासत को पुनः जीवित करने के लिए मेरे साथ चलोगे?"

पूरी सेना का स्वर एक साथ गूँज उठा—"जयतु जैन शासनम! जयतु गंग वंश!"

वह थकान, जो महीनों से सैनिकों के कंधों पर बोझ बनी हुई थी, क्षण भर में संकल्प की शक्ति में बदल गई। सैनिकों ने महसूस किया कि वे केवल एक राजा के लिए नहीं, बल्कि एक शाश्वत सत्य के लिए लड़ रहे हैं। चामुंडराय ने उस रात मानचित्र को अपने हृदय से लगा लिया। उन्हें आभास हो गया था कि उनका जीवन अब केवल युद्धों तक सीमित नहीं रहेगा।

इसी संदेश ने आगे चलकर 'श्रवणबेलगोला' में भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा के निर्माण की नींव रखी। राजमाता का वह संदेश चामुंडराय के लिए केवल निर्देश नहीं, बल्कि एक 'दीक्षा' बन गया था।

उस रात आकाश के तारे भी पोदनपुर की उस दिव्य आभा का साक्षी बन रहे थे, जिसे चामुंडराय की सेना अब खोजने निकल पड़ी थी। युद्ध अब केवल रक्त का खेल नहीं, बल्कि सत्य की खोज का एक

अनुष्ठान बन चुका था।


________________________________________


अध्याय ६: विंध्यगिरि की ढाल - 'वीर मार्तंड' का अवतार

श्रवणबेलगोला की शांत फिजाओं में आज बारूद और रक्त की गंध घुली हुई थी। गंग वंश की प्रतिष्ठा का प्रश्न अब विंध्यगिरि की उन चट्टानी ढालों पर टिका था, जो राजधानी की रक्षा के लिए किसी प्रहरी की भांति खड़ी थीं। पांड्य राजा ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी। उनके लिए यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि गंगों के गौरव को कुचलने का अंतिम प्रयास था।

युद्ध की कूटनीति

गंग साम्राज्य के प्रधानमंत्री और महासेनापति चामुंडराय विंध्यगिरि की चोटी पर खड़े होकर नीचे घाटी की ओर देख रहे थे। उनके माथे पर चिंता की लकीरें नहीं, बल्कि जैन धर्म के 'सम्यक चारित्र' का तेज था। वे जानते थे कि अहिंसा परम धर्म है, परंतु प्रजा और संस्कृति की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना एक क्षत्रिय का 'कुलधर्म' है।

तभी पीछे से अश्वों की टाप सुनाई दी। महाराज राचमल्ल अपने अंगरक्षकों के साथ वहां पहुंचे।

महाराज राचमल्ल: "चामुंडराय, पांड्य सेना की संख्या हमारी कल्पना से कहीं अधिक है। वे टिड्डी दल की तरह ढलान की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हमारी सैन्य व्यूह रचना उन्हें रोक पाएगी?"

चामुंडराय (विनम्रतापूर्वक झुकते हुए): "महाराज, जैन आगम सिखाते हैं कि विजय संख्या बल से नहीं, बल्कि धैर्य और विवेक से प्राप्त होती है। विंध्यगिरि केवल एक पहाड़ नहीं, हमारा दुर्ग है। पांड्य सेना संकरे मार्ग से आ रही है, और यही उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। आप निश्चिंत रहें, गंग वंश का ध्वज झुकने नहीं पाएगा।"

पहाड़ियों का चक्रव्यूह

चामुंडराय ने अपनी रणनीति को गुप्त रखा था। उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया था कि जब तक शत्रु पहाड़ी के मध्य भाग तक न पहुंच जाए, कोई तीर नहीं चलाएगा। पांड्य सेनापति ने इसे गंगों की कमजोरी समझा और अपने सैनिकों को तेजी से ऊपर चढ़ने का आदेश दिया।

जैसे ही पांड्य सेना उस संकरे मोड़ पर पहुंची जहां से पीछे हटना असंभव था, चामुंडराय ने अपना दाहिना हाथ हवा में लहराया। यह संकेत था— 'पत्थरों की वर्षा' का।

चामुंडराय का गर्जनापूर्ण आदेश: "हे वीरों! जिन शासन की रक्षा हेतु प्रहार करो! विंध्यगिरि को शत्रु की कब्रगाह बना दो!"

विशालकाय पत्थर, जिनका वजन हज़ारों मन था, ऊपर से नीचे की ओर लुढ़काए गए। पहाड़ की ढलान पर ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ मानो प्रलय आ गई हो। पांड्य सैनिक संभल पाते, उससे पहले ही विशाल चट्टानों ने उनकी पंक्तियों को छिन्न-भिन्न कर दिया। चीख-पुकार से घाटी गूंज उठी।

'वीर मार्तंड' का उदय

दोपहर का सूर्य अपने चरम पर था। चामुंडराय स्वयं अग्रिम पंक्ति में आकर खड़े हो गए। उन्होंने स्वर्ण जड़ित कवच धारण कर रखा था और उनके हाथ में एक चमकती हुई तलवार थी। जब सूर्य की प्रखर किरणें उनके स्वर्ण कवच से टकराईं, तो एक ऐसा दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ जिसने शत्रु की आंखों को चौंधिया दिया।

मैदान में लड़ रहे एक घायल पांड्य सैनिक ने ऊपर की ओर देखा और चिल्लाया, "देखो! पहाड़ की चोटी पर स्वयं सूर्य देव उतर आए हैं!"

सैनिकों के बीच यह बात बिजली की तरह फैल गई। उस दिन चामुंडराय केवल एक सेनापति नहीं लग रहे थे, वे साक्षात 'मार्तंड' (सूर्य) प्रतीत हो रहे थे, जो युद्ध के अंधकार को चीरने आए थे।

सेनापति अजवा (चामुंडराय के सहायक): "स्वामी! शत्रु पीछे हट रहा है। आपकी चमक ने उनके मनोबल को भस्म कर दिया है।"

चामुंडराय: "अजवा, यह मेरी चमक नहीं, यह सत्य और न्याय की चमक है। याद रहे, हम विजय का उत्सव मनाएंगे, लेकिन अहंकार का नहीं। युद्ध समाप्त होते ही हमें घायलों की सेवा और जिन-पूजन का प्रबंध करना है।"

विजय और उपाधि

सूर्यास्त होते-होते विंध्यगिरि की ढालें शत्रु के रक्त से लाल हो चुकी थीं, लेकिन गंग साम्राज्य सुरक्षित था। महाराज राचमल्ल ने चामुंडराय के पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखा।

महाराज राचमल्ल: "आज तुमने न केवल राज्य बचाया, बल्कि यह सिद्ध कर दिया कि एक सच्चा जैन श्रावक युद्ध के मैदान में भी अडिग रह सकता है। आज से यह प्रजा और यह सेना तुम्हें एक नए नाम से जानेगी।"

महाराज ने अपनी तलवार ऊंची की और घोषणा की:

"आज से चामुंडराय को 'वीर मार्तंड' की उपाधि दी जाती है। वह योद्धा, जो शत्रुओं के लिए प्रलयंकारी सूर्य है और अपनी प्रजा के लिए रक्षक!"


चारों ओर 'वीर मार्तंड की जय' के नारे गूंजने लगे। चामुंडराय ने अपनी आंखें बंद कीं और मन ही मन तीर्थंकरों का स्मरण किया। उनके लिए यह उपाधि कोई गर्व का विषय नहीं थी, बल्कि अपनी मिट्टी और धर्म के प्रति एक बड़ी जिम्मेदारी थी। विंध्यगिरि की वे पहाड़ियां गवाह थीं कि एक महान प्रधानमंत्री ने अपने राजा के प्रति निष्ठा और अपने धर्म के प्रति समर्पण का अनूठा उदाहरण पेश किया था।

________________________________________


अध्याय ७: अंतिम द्वंद्व - राजा राचमल्ल की रक्षा

रणभूमि का आकाश धूल और धुएं से अटा पड़ा था। सूर्यास्त की लालिमा अब रक्त की आभा जैसी प्रतीत हो रही थी। गंग वंश के प्रतापी राजा राचमल्ल चतुर्थ इस समय अपने जीवन के सबसे कठिन संकट में थे। पल्लव और पांड्य राजाओं ने अपनी कूटनीतिक चाल चलते हुए अपनी सबसे घातक और गुप्त टुकड़ी 'अकाल' को सीधे राजा के खेमे की ओर भेज दिया था।

राजा राचमल्ल घायल थे। उनके दाहिने कंधे से रक्त की धारा बह रही थी, जिसने उनके श्वेत उत्तरीय को लाल कर दिया था। उनके पास केवल मुट्ठी भर अंगरक्षक बचे थे। शत्रु ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। पांड्य सेनापति ने अट्टहास करते हुए कहा, "आज गंग वंश का सूर्य अस्त होकर ही रहेगा!"

अगले ही पल, बाणों की भीषण वर्षा शुरू हो गई। राजा के अंगरक्षक एक-एक कर वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। तभी पांड्य दल का एक सामंत तलवार ऊँची किए राजा की ओर झपटा। तलवार राजा के गले को स्पर्श करने ही वाली थी कि हवा को चीरती हुई एक सनसनाहट गूँजी। एक भारी और चमकीला भाला उस सामंत के सीने को पार करता हुआ उसे जमीन पर ले गिरा।

"नमो जिणाणं!" की गूँज के साथ चामुंडराय ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया।

चामुंडराय ने अपनी विशाल ढाल राजा राचमल्ल के आगे अड़ा दी। उनकी आँखों में साक्षात महाकाल का तेज था, किंतु वाणी में जैन संस्कारों की अडिग शांति और संकल्प था। उन्होंने अपने पीछे खड़े सेनापति अजवा को आदेश दिया।

"सेनापति अजवा! राजा को घेरे में लें। जब तक चामुंडराय के शरीर में श्वास है, शत्रु की एक परछाईं भी महाराज के प्रभामंडल को स्पर्श नहीं कर पाएगी।"

सेनापति अजवा ने अपनी तलवार म्यान से निकाली और गरजते हुए कहा, "जो आज्ञा महामात्य! गंग सेना अब भी जीवित है। हम अहिंसा के पुजारी हैं, परंतु धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना हमारा परम कर्तव्य है।"

शत्रु के सात बड़े सामंतों ने चामुंडराय को घेर लिया। चामुंडराय ने अपनी 'वज्रमुष्टि' तलवार म्यान से बाहर निकाली। तलवार की चमक ऐसी थी कि शत्रुओं की आँखें चौंधिया गईं। चामुंडराय ने एक गहरी सांस ली और मन ही मन तीर्थंकरों का स्मरण किया। उनके लिए यह युद्ध केवल राज्य का विस्तार नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध एक यज्ञ था।

शत्रु सामंतों ने एक साथ प्रहार किया, किंतु चामुंडराय की गति मानवीय नहीं लग रही थी। उनकी वज्रमुष्टि तलवार इतनी तीव्रता से घूम रही थी कि रणभूमि में उपस्थित सैनिकों को ऐसा भ्रम होने लगा जैसे चामुंडराय के पास एक नहीं, बल्कि दस हाथ हों। उनकी तलवार कभी ढाल बनकर प्रहार रोकती, तो कभी बिजली की फुर्ती से शत्रु के कवच को भेद देती।

एक सामंत ने चिल्लाकर कहा, "इसे मारो! यह अकेला क्या कर पाएगा?"

चामुंडराय ने शांत भाव से उत्तर दिया, "सामंत, शरीर विनाशी है, परंतु आत्मा अजर-अमर है। मैं मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि मैं सत्य के पथ पर हूँ। परंतु तुम सावधान रहो, क्योंकि आज तुम्हारी तलवार एक ऐसे रक्षक से टकराई है जिसने सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को अपना कवच बनाया है।"

अगले ही क्षण, चामुंडराय ने एक अद्भुत पैंतरा बदला। उन्होंने एक साथ तीन सामंतों के शस्त्रों को अपनी तलवार की एक ही चोट से खंडित कर दिया। उनकी वीरता देख सेनापति अजवा के नेतृत्व में गंग सैनिकों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुँच गया। अजवा ने अपनी टुकड़ी के साथ 'अकाल' दस्ते पर धावा बोल दिया।

"सैनिकों!" अजवा की आवाज़ गूँजी, "महाराज राचमल्ल हमारे धर्म के संरक्षक हैं। आज हमें सिद्ध करना है कि जैन संस्कृति का अनुयायी जितना दयावान होता है, रणभूमि में उतना ही अजेय भी।"

इधर चामुंडराय ने सातवें सामंत को धूल चटा दी थी। पांड्य सेना ने जब देखा कि उनके सर्वश्रेष्ठ योद्धा धराशायी हो चुके हैं और चामुंडराय साक्षात यमराज की भाँति अडिग खड़े हैं, तो उनके पैर उखड़ने लगे। चामुंडराय की वीरता ने हारी हुई बाजी को पलट दिया था।

राजा राचमल्ल ने घायल अवस्था में भी चामुंडराय के इस अद्भुत कौशल को देखा। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "चामुंडराय, तुम्हारी भक्ति और वीरता ने आज केवल मेरा जीवन नहीं, बल्कि गंग वंश का गौरव भी बचा लिया।"

चामुंडराय ने तुरंत तलवार म्यान में डाली और राजा के चरणों में झुक गए। उन्होंने विनम्रता से कहा, "महाराज, यह मेरी विजय नहीं है। यह आपके पुण्य प्रताप और हमारे धर्म की विजय है। शत्रु भाग खड़ा हुआ है। अब हमें युद्ध के उन्माद को त्याग कर घायलों की सेवा की ओर ध्यान देना चाहिए, चाहे वे हमारे हों या शत्रु के।"

पांड्य सेना रणभूमि छोड़कर भाग चुकी थी। सेनापति अजवा ने आकर सूचना दी, "महामात्य, शत्रु सीमा के पार जा चुका है। 'अकाल' दस्ता पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।"

चामुंडराय ने आकाश की ओर देखा। युद्ध समाप्त हो चुका था। उन्होंने सेनापति अजवा को निर्देश दिया कि युद्ध क्षेत्र में जो भी घायल सैनिक हैं, उन्हें जल और उपचार उपलब्ध कराया जाए। राजा राचमल्ल की रक्षा सुनिश्चित हो चुकी थी। चामुंडराय की 'वज्रमुष्टि' ने इतिहास के पन्नों पर एक ऐसा अध्याय लिख दिया था, जहाँ शक्ति और शांति का अद्भुत संगम था।

गंग साम्राज्य का झंडा अब भी शान से लहरा रहा था, और उसके नीचे खड़े थे चामुंडराय—एक महान योद्धा, एक कुशल राजनीतिज्ञ और जैन संस्कृति के सच्चे ध्वजवाहक।

___________________________________


अध्याय ८: विजय का सन्नाटा और वैराग्य की ओर कदम

रणभूमि का दृश्य विभत्स था। विजय का शंखनाद तो हुआ, पर उसकी गूँज चामुंडराय के कानों में किसी क्रंदन की भाँति चुभ रही थी। पांड्य सेना पराजित होकर पीछे हट चुकी थी, धूल का गुबार छँट रहा था, लेकिन पीछे छोड़ गया था रक्त से सनी मिट्टी और हज़ारों निस्प्राण शरीर।

चामुंडराय, जिन्हें दुनिया 'समर परशुराम' और 'वीर मार्तंड' के नाम से जानती थी, अपनी तलवार म्यान में डाले खड़े थे। तभी उनके सेनापति अजवा घोड़े पर सवार होकर हर्षोल्लास के साथ समीप आए।

अजवा: "सेनापति! बधाई हो! पांड्यों का अहंकार मिट्टी में मिल गया। गंग ध्वज आज आकाश की ऊँचाइयों को चूम रहा है। आपकी कूटनीति और पराक्रम ने इतिहास रच दिया है!"

चामुंडराय ने कोई उत्तर नहीं दिया। उनकी आँखें दूर एक गिद्ध को देख रही थीं जो एक निर्जीव सैनिक के पास उतर रहा था।

अजवा: (थोड़ा ठिठकते हुए) "सेनापति? आप मौन क्यों हैं? महाराज राचमल्ल आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। पूरे तलकाडु में उत्सव की तैयारियाँ हो रही हैं।"

चामुंडराय: (धीमे और भारी स्वर में) "अजवा, इस उत्सव की कीमत जानते हो? उन हज़ारों स्त्रियों की सिसकियाँ, जिनके सुहाग इस धूल में मिल गए। उन बच्चों की पुकार, जिनके पिता कभी लौटकर नहीं आएंगे। क्या यही विजय है? रक्त से सनी हुई भूमि पर खड़ा होकर मुस्कुराना क्या वीरता है?"

अजवा: "स्वामी, क्षत्रिय का धर्म युद्ध है। आपने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए हैं।"

चामुंडराय: "धर्म की रक्षा या सीमाओं का विस्तार? अजवा, राजमाता कालला देवी ने मुझसे कहा था—'साम्राज्य जीत लिया, अब सत्य को जीतो।' आज मुझे उस सत्य का अर्थ समझ आ रहा है। यह तलवार अब और भारी होती जा रही है।"

गंगा तट पर आत्म-साक्षात्कार

संध्या की लालिमा गंगा (कावेरी की उपधारा) के जल में घुल रही थी। चामुंडराय जल के समीप पहुँचे। उन्होंने अपनी तलवार निकाली, जिस पर अब भी रक्त के सूखे निशान थे। उन्होंने उसे जल में धोया। लाल रंग धीरे-धीरे पानी में विलीन हो गया।

चामुंडराय: (स्वयं से) "जैसे यह रक्त पानी में बह गया, वैसे ही यह नश्वर शरीर और अहंकार भी एक दिन विलीन हो जाएगा। युद्ध बाहर नहीं, भीतर लड़ना था।"

तभी राजा राचमल्ल अपने लाव-लश्कर के साथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने चामुंडराय के पराक्रम की प्रशंसा करने के लिए अपने हाथ फैलाए।

राजा राचमल्ल: "वीर मार्तंड! आज गंग साम्राज्य का मस्तक गर्व से ऊँचा है। मांगो, क्या पुरस्कार चाहते हो? स्वर्ण, भूमि या कोई नया पद?"

चामुंडराय मुड़े। उनके चेहरे पर वह तेज नहीं था जो युद्ध की शुरुआत में था, बल्कि एक असीम शांति थी। उन्होंने धीरे से अपना रत्नजड़ित मुकुट उतारा और राजा के चरणों में रख दिया।

राजा राचमल्ल: (आश्चर्यचकित होकर) "यह क्या है चामुंडराय? यह अपमान है या वैराग्य?"

चामुंडराय: "महाराज, यह न तो अपमान है और न ही त्याग का प्रदर्शन। यह केवल एक बोध है। अब तक मैंने तलवार से शत्रुओं को जीता है, अब मैं मौन से स्वयं को जीतना चाहता हूँ। महाराज, मुझे अनुमति दें, अब मुझे उस नगरी की ओर जाना है जहाँ कोई युद्ध नहीं होता।"

राजा राचमल्ल: "कौन सी नगरी? क्या तुम काशी जाना चाहते हो?"

चामुंडराय: "नहीं महाराज। मुझे पोदनपुर की खोज करनी है। मुझे उस महान बाहुबली की छवि को साकार करना है, जिन्होंने चक्रवर्ती सम्राट बनने के अवसर को त्याग कर अहिंसा का मार्ग चुना। मेरी माता का स्वप्न और मेरी आत्मा की शांति अब उसी मार्ग पर है।"

वैराग्य का संकल्प

सेनापति अजवा और राजा राचमल्ल स्तब्ध थे। जिस सेनापति के नाम से दुश्मन काँपते थे, वह आज एक सन्यासी की भाँति सरल होने का संकल्प ले रहा था।

अजवा: "स्वामी, क्या आप हमें छोड़कर चले जाएंगे? इस सेना को आपकी आवश्यकता है।"

चामुंडराय: "अजवा, सेना को सेनापति की नहीं, अनुशासन की आवश्यकता होती है। तुम एक कुशल योद्धा हो, अब तुम संभालो। मेरी यात्रा अब स्थूल से सूक्ष्म की ओर है। जैन धर्म के उन सिद्धांतों की ओर, जो सिखाते हैं कि संसार को जीतना सरल है, लेकिन अपनी इंद्रियों को जीतना ही वास्तविक विजय है।"

राजा राचमल्ल: "चामुंडराय, तुम्हारी निष्ठा पर संदेह नहीं, पर क्या तुम प्रशासनिक दायित्वों से मुक्त हो पाओगे?"

चामुंडराय: "महाराज, मैं प्रधानमंत्री और सेनापति के रूप में अपना अंतिम कार्य पूर्ण करूँगा। मैं विंध्यगिरि की पहाड़ियों पर उस महान प्रतिमा का निर्माण करवाऊँगा, जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियाँ युद्ध नहीं, त्याग की प्रेरणा लेंगी। वह प्रतिमा, जो 'गोमतेश्वर' कहलाएगी, मेरे पश्चाताप और मेरी भक्ति का प्रतीक होगी।"

उस रात, तलकाडु के शिविर में उत्सव की मशालें जल रही थीं, लेकिन चामुंडराय के तंबू में केवल एक छोटा सा दीपक जल रहा था। उन्होंने अपने राजकीय वस्त्रों का त्याग कर सादे वस्त्र धारण किए। उनकी आँखों में अब युद्ध के नक्शे नहीं, बल्कि श्रवणबेलगोला की पहाड़ियों पर बनने वाली उस विशाल प्रतिमा का स्वप्न था, जो सदियों तक अहिंसा का संदेश देने वाली थी।

यहीं से 'वीर मार्तंड' चामुंडराय का सफर समाप्त हुआ और एक महान 'निर्माता और साधक' चामुंडराय का जन्म हुआ।

_________________________________________


अध्याय ९: रक्त की नदी और आत्मा का प्रतिक्रमण

अमावस की काली चादर ने रणभूमि को ढक लिया था, लेकिन धरती का रंग काला नहीं, गहरा लाल था। युद्ध के कोलाहल के स्थान पर अब एक ऐसी भयावह खामोशी थी जो कानों के पर्दों को फाड़ रही थी। चामुंडराय, जिन्हें पूरी दुनिया 'वीर मार्तंड' के नाम से जानती थी, आज एक टूटे हुए वृक्ष की भांति रणभूमि के बीचों-बीच खड़े थे।

उनके वस्त्र फट चुके थे, कवच पर अनगिनत प्रहारों के निशान थे, और उनकी प्रसिद्ध तलवार 'वज्रमुष्टि' से अभी भी रक्त की आखिरी बूंदें टपक रही थीं।

मेघवर्णा का अंतिम संलाप

चामुंडराय के चरणों के पास उनकी सबसे प्रिय संगिनी, उनकी घोड़ी मेघवर्णा अपनी अंतिम सांसें ले रही थी। मेघवर्णा केवल एक पशु नहीं थी; वह चामुंडराय की छाया थी, जिसने अनगिनत युद्धों में उनकी जान बचाई थी। उसके सुंदर सफेद शरीर पर अब गहरे घाव थे और उसकी सांसें उखड़ रही थीं।

चामुंडराय घुटनों के बल उसके पास बैठ गए और उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। "मेघवर्णा..." उनका स्वर कांप रहा था।

मेघवर्णा ने अपनी बड़ी-बड़ी, मटमैली होती आँखों से अपने स्वामी को देखा। उसकी आँखों में कोई उलाहना नहीं था, बस एक असीम पीड़ा और विदाई का दुःख था। उसने एक बार धीरे से चामुंडराय के हाथ को सूंघा, मानो कह रही हो कि उसने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है।

"नहीं, मेघवर्णा! मुझे छोड़ कर मत जाओ," चामुंडराय ने उसके कान में फुसफुसाया। "तुम्हारे बिना इस रक्त रंजित संसार में मैं अकेला रह जाऊँगा।"

मेघवर्णा ने एक लंबी, ठंडी सांस ली और उसका शरीर शिथिल पड़ गया। उसकी निष्प्राण आँखें आकाश के तारों की ओर जम गईं। चामुंडराय को ऐसा लगा जैसे उनके अस्तित्व का एक हिस्सा आज मर गया हो। उन्होंने उसकी ठंडी होती गर्दन पर अपना माथा टिका दिया और पहली बार उस कठोर योद्धा की आँखों से आंसू की एक बूंद मेघवर्णा के घाव पर गिरी।

श्मशान बनी रणभूमि

मेघवर्णा को विदा देकर जब चामुंडराय खड़े हुए, तो उन्हें चारों ओर केवल मृत्यु का नग्न नाच दिखाई दिया। सियार और गिद्धों की आवाज़ें रात के सन्नाटे को और अधिक वीभत्स बना रही थीं। उनके पैर अचानक एक ढाल से टकराए। उन्होंने नीचे देखा—एक युवा पांड्य सैनिक, जिसकी उम्र शायद अठारह वर्ष भी नहीं रही होगी, उसकी पथराई आँखें शून्य में ताक रही थीं।

उसके पास ही एक अधजला पत्र पड़ा था। चामुंडराय ने उसे उठाया। उसमें लिखा था— "पुत्र, इस बार फसल अच्छी हुई है। तेरी छोटी बहन के विवाह की चिंता मत करना, बस तू विजय पाकर शीघ्र घर लौट आना।"

चामुंडराय का हृदय कांप उठा। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई—हज़ारों शव, कटी हुई भुजाएं, और मिट्टी में सने हुए वे सपने, जो कभी इन सैनिकों की आँखों में रहे होंगे। उन्हें महसूस हुआ कि हर कटी गर्दन के पीछे एक बिलखता हुआ परिवार है, एक वृद्ध पिता है, और एक ऐसी पत्नी है जिसका संसार आज उजड़ गया।

अंतरात्मा का झंझावात

"क्या यही विजय है?" उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया। "क्या कुछ मील भूमि के लिए हज़ारों माताओं की कोख सूनी कर देना ही पुरुषार्थ है? क्या इस सिंहासन की नींव मासूमों की हड्डियों पर रखी जानी चाहिए?"

तभी उनके सेनापति अजवा मशाल लेकर उनके पास आए। "महाराज! बधाई हो, हमने पांड्य सेना को धूल चटा दी है। कल सुबह हम राजधानी में विजय उत्सव मनाएंगे।"

चामुंडराय ने धीरे से अपना सिर उठाया। उनकी आँखों में विजय की चमक नहीं, बल्कि श्मशान की राख जैसी उदासी थी। "किसकी विजय, अजवा? इन लाशों की? या इस बहते हुए रक्त की? देखो इस लड़के को, इसकी माँ घर पर इसके लौटने की प्रतीक्षा कर रही है, और हम यहाँ उत्सव की तैयारी कर रहे हैं?"

अजवा ठिठक गए। "परंतु महाराज, युद्ध तो क्षत्रिय का धर्म है..."

"धर्म?" चामुंडराय दहाड़े। "जिस धर्म में करुणा न हो, वह धर्म नहीं, अहंकार का खेल है। आज मुझे अपनी 'वज्रमुष्टि' से घृणा हो रही है। यह रक्षक नहीं, भक्षक बन चुकी है।"

आत्मा का प्रतिक्रमण

चामुंडराय उसी रक्त-रंजित मिट्टी पर घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं और जैन धर्म के पवित्र संस्कार 'प्रतिक्रमण' (क्षमा याचना) में डूब गए।

"खामेमि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।" (मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, और सभी जीव मुझे क्षमा करें।)

उनकी वाणी में एक अलौकिक दर्द था। "हे अरिहंत! मैंने अनजाने में, पद और प्रतिष्ठा के मद में जितने भी जीवों को कष्ट पहुँचाया है, मैं उन सबसे क्षमा मांगता हूँ। मैंने आज अपनी आत्मा को इस रक्त की नदी में डुबो दिया है। मुझे प्रकाश दिखाओ, प्रभु!"

उन्होंने अपनी म्यान से वह तलवार निकाली जिसने अनगिनत बार शत्रु के रक्त का पान किया था। उस शांत रात में उन्होंने तलवार को अपनी पूरी शक्ति से दूर फेंक दिया। पत्थरों से टकराकर तलवार के गिरने की आवाज़ उनके पुराने जीवन के अंत की घोषणा थी।

एक नया संकल्प

"अजवा," चामुंडराय ने शांत स्वर में कहा, "आज 'वीर मार्तंड' इस रणभूमि की राख में दफन हो गया। अब यहाँ से एक 'श्रावक' (गृहस्थ उपासक) घर लौटेगा। अब यह हाथ तलवार नहीं उठाएंगे। अब मैं पत्थरों के सीने में उस अनंत शांति को उकेरूँगा जो सदियों तक मानवता को अहिंसा का पाठ पढ़ाएगी।"

उन्होंने मेघवर्णा के पार्थिव देह को अंतिम प्रणाम किया और उस दिशा में चल दिए जहाँ से सूरज उगने वाला था—एक नया सूर्य, जो विनाश का नहीं, बल्कि निर्माण और करुणा का प्रतीक था। उनके पदचिह्न अब रक्त में नहीं, बल्कि वैराग्य की धूल में छप रहे थे।

किया।

प्रतिक्रमण

"हे अरिहंत! मैंने अनजाने में, पद और प्रतिष्ठा के मद में जितने भी जीवों को कष्ट पहुँचाया है, मैं उन सबसे क्षमा मांगता हूँ। मेरा यह शस्त्र, जो रक्षक था, आज मुझे भक्षक लग रहा है।" उन्होंने अपनी तलवार म्यान से निकाली और उसे दूर फेंक दिया। उस शांत रात में तलवार के गिरने की आवाज़ उनके पुराने जीवन के अंत की घोषणा थी। उन्होंने संकल्प लिया कि अब वे किसी का रक्त नहीं बहाएंगे, बल्कि पत्थर के सीने में उस अनंत शांति को उकेरेंगे जो सदियों तक मानवता को अहिंसा का पाठ पढ़ाएगी। 'वीर मार्तंड' का अहंकार उस रात रणभूमि की राख में दफन हो गया

और एक 'श्रावक' का जन्म हुआ।

______________________________________

अध्याय १०: अंतर्द्वंद्व का अभिषेक

(स्थान: गंग साम्राज्य का राजप्रासाद। युद्ध के बाद की पहली रात। बाहर विजय के नगाड़े बज रहे हैं, भीतर कक्ष में सन्नाटा है।)

चामुंडराय: (पीड़ा में कराहते हुए) आह! अजिता... इस कवच को उतारने में सहायता करो। यह धातु अब शरीर में धँस रही है।

अजिता: (शांत भाव से पास आकर) धैर्य रखें स्वामी। यह कवच भारी नहीं है, इसे पहनने का कारण आज भारी हो गया है। स्थिर रहें, मैं पट्टियाँ खोलती हूँ।

चामुंडराय: (कवच उतरते ही) देखो मेरे शरीर को। ऐसा कोई अंग नहीं जहाँ शत्रु के प्रहार के चिह्न न हों। आज की जीत महँगी पड़ी, अजिता।

अजिता: (घावों पर औषधि का लेप लगाते हुए) ये घाव गहरे हैं, पर प्राणघातक नहीं। चिंता उन घावों की है जो आपकी आँखों में दिखाई दे रहे हैं। आप विजय के रथ पर आए हैं, फिर चेहरे पर हार जैसा सन्नाटा क्यों?

चामुंडराय: (आह भरकर) विजय? क्या इसे विजय कहोगी? जब मेरी तलवार शत्रु का गला काट रही थी, तब मुझे केवल अपना पराक्रम दिख रहा था। किंतु लौटते समय जब मैंने उन विधवाओं के विलाप सुने, तो मेरा हृदय कांप उठा। क्या जैन श्रावक का यही धर्म है?

अजिता: (उनके रक्त रंजित हाथों को थामकर) स्वामी, जैन संस्कृति का मार्ग कायरता का नहीं, वीरता का है। किंतु वीरता का अर्थ केवल शत्रु का मर्दन नहीं, अपनी वृत्तियों का दमन भी है। आपने देश की रक्षा की, वह आपका राजधर्म था।

चामुंडराय: (ग्लानि से) पर उस रक्त का क्या, जो इन हाथों पर सूख चुका है? अजिता, मुझे आज शस्त्रों की झंकार में भगवान महावीर की 'जीओ और जीने दो' की वाणी सुनाई दे रही थी। क्या मैं अपराधी हूँ?

अजिता: (दृढ़ता से) अपराधी वह है जो हिंसा में आनंद ले। आप तो करुणा से भर रहे हैं। यह पश्चाताप ही आपके मोक्ष का द्वार बनेगा। स्वामी, शरीर के घावों का उपचार तो यह लेप कर देगा, किंतु आत्मा की शांति के लिए आपको एक महान कार्य करना होगा।

चामुंडराय: (जिज्ञासा से) कैसा कार्य? क्या दान-पुण्य? या तपस्या?

अजिता: (खिड़की से दूर श्रवणबेलगोला की पहाड़ियों की ओर संकेत करते हुए) नहीं। आपको उस त्याग को अमर करना होगा जो युद्ध से बड़ा हो। एक ऐसा प्रतीक बनाना होगा जो सदियों तक मनुष्य को यह बताए कि संहार से बड़ा त्याग है। जैसे बाहुबली ने युद्ध जीतकर भी सब कुछ त्याग दिया था।

चामुंडराय: (सोचते हुए) गोमटेश्वर बाहुबली! हाँ अजिता... तुमने सत्य कहा। मेरी इस तलवार ने जितना विनाश किया है, अब मेरा संकल्प उससे बड़ा निर्माण करेगा।

अजिता: (मुस्कुराते हुए) देखिए, आपके चेहरे की कांति लौट रही है। जब उद्देश्य पवित्र होता है, तो पीड़ा भी भक्ति बन जाती है।

चामुंडराय: (अजिता का हाथ पकड़कर) तुम केवल मेरी पत्नी नहीं हो अजिता, तुम मेरा विवेक हो। आज मुझे समझ आया कि तुम युद्ध में मेरे साथ क्यों नहीं थी, क्योंकि तुम्हें घर पर रहकर मेरी वापसी के बाद मेरी भटकती आत्मा को 'घर' लौटाना था।

अजिता: (विनम्रता से) स्वामी, नारी का धर्म पुरुष को युद्ध के लिए प्रेरित करना ही नहीं, बल्कि युद्ध के बाद उसे 'मनुष्य' बनाए रखना भी है। चलिए, अब इन औषधियों को अपना कार्य करने दें। कल का सूर्य एक योद्धा का नहीं, एक धर्म-पुत्र का होगा।

चामुंडराय: (शांत होकर) सत्य कहा। अब न कोलाहल है, न ग्लानि। केवल एक संकल्प है— 'अहिंसा'। नमो जिणाणं!

अजिता: नमो जिणाणं।

______________________________________


अध्याय ११: राजसी सुख का बोझ

विजय का कोलाहल शांत हो चुका था, परंतु चामुंडराय के भीतर का द्वंद्व अब एक नए और अधिक सूक्ष्म युद्ध में बदल गया था। वह युद्ध जो तलवारों से नहीं, बल्कि स्मृतियों और चेतना के धरातल पर लड़ा जा रहा था। गंगावेड़ी की धरती पर अधिकार तो पा लिया गया था, किंतु क्या उस अधिकार की कीमत वह रक्त था जो अब भी चामुंडराय के मानस-पटल पर ताजा था?

एक सुनहरी दोपहर, जब सूर्य की किरणें महल के प्रांगण में बिखरी हुई थीं, महाबली चामुंडराय अपने नन्हे पुत्र के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। बालक अपनी अबोध चेष्टाओं से पिता के मर्म को स्पर्श कर रहा था। खेलते-खेलते बालक की दृष्टि चामुंडराय की उस विशाल और भारी तलवार पर जा टिकी, जो म्यान में बंद बगल के स्तंभ के सहारे टिकी थी। वह तलवार, जिसने अनगिनत युद्धों का निर्णय किया था, जिसे छूते ही शत्रुओं के कंठ सूख जाते थे, आज एक अबोध बालक की जिज्ञासा का केंद्र थी।

बालक ने अपनी नन्ही, कोमल उंगलियों से उस शीतल धातु के स्पर्श को महसूस किया। यह देखते ही चामुंडराय के भीतर जैसे बिजली कौंध गई। उनका कलेजा काँप उठा। उस मासूम स्पर्श ने चामुंडराय को भविष्य के एक भयानक दृश्य से रूबरू करा दिया। उन्हें उस कोमल स्पर्श में भविष्य के भीषण युद्धों की गूँज, हाथियों की चिंघाड़ और मरते हुए सैनिकों का करुण क्रंदन सुनाई दिया।

उनके अंतर्मन में एक प्रश्न तीव्र वेग से उठा— "क्या मैं अपने इस निर्दोष पुत्र को भी इसी रक्तपात, इसी हिंसा और इसी प्रतिशोध की विरासत सौंप कर जाऊँगा? क्या इस स्वर्ण सिंहासन की नींव हमेशा मानव रक्त से ही सिंचित होगी?"

उस रात्रि, महल का वह वैभव, जो कभी गौरव का प्रतीक था, उन्हें काटने को दौड़ रहा था। कक्ष के झरोखों से आती शीतल वायु भी उनके हृदय की जलन को शांत नहीं कर पा रही थी। मखमली बिस्तरों पर लेटे हुए भी उन्हें नींद कोसों दूर लग रही थी। आँखें बंद करते ही उन्हें उन विधवाओं की करुण सिसकियाँ और अनाथ हुए बालकों की मौन चित्कार सुनाई देती, जिनके पतियों और पिताओं को उन्होंने युद्ध के मैदान में अपने धर्म और कर्तव्य के नाम पर धराशायी किया था। उन्हें प्रतीत हुआ कि वह जिस सिंहासन पर बैठे हैं, वह लकड़ी या स्वर्ण का नहीं, बल्कि अनगिनत प्राणों की बलि पर टिका हुआ एक भार है।

अजिता, जो चामुंडराय के मौन को उनकी वाणी से अधिक समझती थी, ने उन्हें बालकनी में उदास खड़ा देखा। चंद्रमा की धवल चांदनी उनके चेहरे की झुर्रियों में छिपी पीड़ा को और भी स्पष्ट कर रही थी। वह शांत कदमों से उनके पास आई।

अजिता ने बिना किसी भूमिका के, अत्यंत गंभीर और करुणा भरे स्वर में कहा, "आप इस स्वर्ण सिंहासन पर जबरन बैठे हैं, स्वामी। संसार को लग रहा है कि चामुंडराय विजेता हैं, पर मैं देख पा रही हूँ कि आप स्वयं की आत्मा से पराजित हो रहे हैं। आपकी देह यहाँ इन भव्य भित्तियों के भीतर है, पर आपकी चेतना कहीं दूर उन शांत धवल पहाड़ों और श्रवणबेलगोला की उन वीथियों में भटक रही है, जहाँ पूज्य राजमाता ने आपको जाने का संकेत दिया था।"

चामुंडराय मौन रहे, उनकी दृष्टि क्षितिज पर टिकी थी। अजिता ने आगे कहा, और उसके शब्द जैन संस्कृति के उस त्याग और वैराग्य के रंग में रंगे थे, जहाँ प्रेम का अर्थ बांधना नहीं, मुक्त करना होता है।

वह बोली, "हे महाबली! मेरा मोह, मेरी ममता आपको रोक तो लेगी, पर आप भीतर ही भीतर तिल-तिल कर मर जाएंगे। यदि आप केवल मेरे और कुल के सुख के लिए रुक गए, तो आप देह रूप में तो मेरे सन्निकट रहेंगे, पर शायद आप स्वयं को, अपने उस 'स्व' को कभी नहीं पा पाएंगे जिसे प्राप्त करने की प्रेरणा आपको पूर्वजों और गुरुओं से मिली है। जैन धर्म सिखाता है कि जो मोह को जीत ले, वही वास्तविक जिन है। आज आपके मोह की परीक्षा नहीं, मेरे प्रेम की पराकाष्ठा है। मैं आपको इस सुंदर कारागार से मुक्त करती हूँ।"

चामुंडराय ने मुड़कर अपनी संगिनी को देखा। उनकी आँखों में अश्रु नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चमक थी। उन्हें बोध हुआ कि परिवार का यह असीम सुख, यह पुत्र का प्रेम, यह पत्नी का अनुराग, अब उनके आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग में एक स्वर्णमयी बेड़ी बन चुका है। वह समझ गए कि संसार के सुख अंततः दुखों के ही बीज हैं।

उन्होंने अनुभव किया कि राजसी सुख का यह बोझ अब उनके कंधों से उतरकर उनकी आत्मा को कुचलने लगा है। अजिता का यह बलिदान, उसका यह वैराग्यपूर्ण प्रेम, चामुंडराय के लिए उस अंतिम धक्के के समान था, जिसने उन्हें सांसारिक मोह के किनारे से हटाकर आध्यात्मिक महासागर की ओर धकेल दिया।

उस रात, उस बालकनी में खड़े होकर, चामुंडराय ने राजा नहीं, बल्कि एक साधक के रूप में अपनी नियति को स्वीकार किया। वैभव का वह चमकता हुआ संसार अब उन्हें निष्प्राण और धूल के समान लग रहा था। उनके हृदय में केवल एक ही संकल्प शेष था—उस परम शांति की खोज, जहाँ न शस्त्र हो, न शास्त्र की व्याख्या, केवल आत्मा का शुद्ध साक्षात्कार हो।

________________________________________


अध्याय १२: त्याग की वह अंतिम पूर्णिमा

आकाश मण्डल में शरद पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ उदित था। धवल चांदनी की शीतल रश्मियाँ गंग साम्राज्य के राजप्रासाद के धवल कंगूरों से टकराकर मानों धरती पर अमृत की वर्षा कर रही थीं। किंतु सेनापति चामुंडराय के अंतर्मन में द्वंद्व का एक भीषण ज्वार उठा हुआ था। आज की यह रात्रि केवल चंद्रमा के पूर्ण होने की साक्षी नहीं थी, बल्कि यह चामुंडराय के भीतर के 'योद्धा' के विसर्जन और एक 'साधक' के उदय की संधि-बेला थी।

त्याग का निर्णय लेना जितना कठिन था, उसे क्रियान्वित करना उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण था। मोह की सूक्ष्म तंतुएँ हृदय को इस प्रकार जकड़े हुए थीं जैसे कोई बेल विशाल वृक्ष को आलिंगन में ले लेती है। चामुंडराय ने शयनकक्ष की खिड़की से बाहर देखा; चारों ओर व्याप्त वह दूधिया रोशनी उन्हें याद दिला रही थी कि संसार की समस्त संपदा और संबंध इसी चांदनी की भांति क्षणभंगुर हैं—उदित होते हैं और फिर अंधकार में विलीन हो जाते हैं।

उन्होंने मन ही मन दृढ़ निश्चय किया— "मोह ही परिग्रह है और परिग्रह ही समस्त दुखों का मूल है। यदि मुझे उस अनंत सत्य को पाना है, तो इन जंजीरों को तोड़ना ही होगा।" चामुंडराय ने सोचा था कि वे अपनी पत्नी अजिता और सुख की निद्रा में लीन अपने पुत्र को बिना सूचित किए, बिना बताए, निशब्द भाव से निकल जाएंगे। उन्हें भय था कि यदि पुत्र की सुकुमार मुस्कान या पत्नी की करुण पुकार उनके कानों में पड़ी, तो कहीं उनके वैराग्य का बांध टूट न जाए।

उन्होंने धीरे से अपने शरीर से राजसी वैभव के प्रतीक रत्नजड़ित अंगरखे और स्वर्ण आभूषण उतारे। वे शस्त्र जिन्होंने शत्रुओं के हृदय कांपा दिए थे, आज एक कोने में मौन रखे थे। उन्होंने साधारण श्वेत सूती वस्त्र धारण किए। वह शुभ्र वस्त्र उनके भीतर बढ़ रही निर्मलता का प्रतीक था। जैसे ही वे कक्ष के भारी काष्ठ द्वार को खोलकर अत्यंत सावधानी से बाहर निकले, उनके कदम ठिठक गए।

सामने अजिता खड़ी थी। उसके हाथ में एक स्वर्ण थाल था जिसमें जलता हुआ घी का दीपक झिलमिला रहा था। वह सोई नहीं थी। उसकी आँखों की लालिमा बता रही थी कि उसने पूरी रात जागकर अपनी आत्मा को इस वियोग के लिए तैयार किया है। वह जानती थी कि आज उसका संसार, उसका सर्वस्व, उससे दूर जाने वाला है।

अजिता की आँखों में वेदना का गहरा सागर हिलोरें ले रहा था, पर उन आँखों में एक अपूर्व शांति भी थी। उसने न तो विलाप किया, न ही आंसुओं से उनके मार्ग को अवरुद्ध करने का प्रयास किया। एक जैन श्राविका की भांति उसने अपने धैर्य को अपनी शक्ति बनाया।

चामुंडराय विस्मित होकर बोले, "अजिता! तुम जागी हो? मैंने सोचा था..."

अजिता ने मंद स्वर में, किंतु स्थिरता के साथ कहा, "स्वामी, क्या सूर्य के उदय होने की आहट कमल को नहीं होती? मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ, आपकी आत्मा के स्पंदन को भला कैसे न पहचानती? जिस मार्ग पर आप कदम बढ़ा चुके हैं, वहां विलाप करना मेरा धर्म नहीं, बल्कि आपके संकल्प को संबल देना मेरा कर्तव्य है।"

अजिता ने बड़े धैर्य से आगे बढ़कर चामुंडराय के भाल पर तिलक लगाया। वह तिलक केवल विदाई का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विजय का प्रतीक था। उसने झुककर उनके चरणों की धूल अपने माथे से लगाई। चामुंडराय का हृदय भावविभोर हो उठा, पर उनके संकल्प की अग्नि और प्रज्वलित हो गई।

अजिता ने भारी स्वर में, पर गरिमा के साथ कहा, "जाइए 'वीर मार्तंड'! आज एक साम्राज्य का सेनापति विदा नहीं हो रहा, बल्कि एक ऐसा महामानव निकल रहा है जो आने वाली अनगिनत पीढ़ियों का मार्गदर्शक बनेगा। संसार को अब रक्त से सनी विजयों की और एक योद्धा की आवश्यकता नहीं है, उसे अब बुद्धत्व और सम्यक दर्शन की आवश्यकता है। उसे त्याग की उस पराकाष्ठा की आवश्यकता है जो दिगंबरत्व की ओर ले जाती है।"

उसने अपनी दृष्टि कक्ष के भीतर सोते हुए पुत्र की ओर डाली और पुनः चामुंडराय से मुखातिब होकर कहा, "आप निश्चिंत होकर प्रस्थान करें। मैं आपके पीछे आपके कुल की मर्यादा और आपके पुत्र को आपकी ही तरह अजेय बनाऊँगी। मैं उसे शस्त्रों के साथ-साथ शास्त्रों की शिक्षा भी दूँगी, ताकि जब आप आत्म-कल्याण के मार्ग से लौटें—या यदि आप मोक्ष के मार्ग पर बढ़ते हुए कभी न भी लौटें—तो आपको अपने गृह पर, अपनी संस्कृति पर और अपनी जीवनसंगिनी पर गर्व हो।"

वह वियोग का क्षण था, पर उसमें एक अलौकिक गरिमा और पवित्रता थी। चामुंडराय ने मौन रहकर अपनी पत्नी के इस असीम त्याग को स्वीकार किया। उनके हृदय में अजिता के प्रति सम्मान और बढ़ गया। उन्होंने अंतिम बार उस गृह को देखा, अपना सिर श्रद्धा से झुकाया और भारी मन से किंतु दृढ़ कदमों के साथ महल की सीढ़ियाँ उतरने लगे।

पीछे खड़ी अजिता दीप लिए उन्हें तब तक देखती रही, जब तक कि श्वेत वस्त्र धारी वह महान आत्मा रात्रि की उस चांदनी में विलीन नहीं हो गई। वह पूर्णिमा वास्तव में त्याग की पराकाष्ठा की साक्षी बन गई थी।


अंतिम विदाई और संवाद


महल के गलियारे में दीपक की लौ थिरक रही थी, जो अजिता के चेहरे पर पड़कर उसके संकल्प और उसकी पीड़ा को बारी-बारी से उजागर कर रही थी। चामुंडराय, जो कल तक हज़ारों की सेना के नायक थे, आज एक साधारण यायावर की भाँति मौन खड़े थे।

जब अजिता ने उनके माथे पर तिलक लगाया, तो चामुंडराय ने उसकी स्थिर आँखों में देखा और धीमे स्वर में कहा, "अजिता, इस त्याग में मेरा संकल्प तो है ही, पर तुम्हारी सहमति ने इसे महाव्रत बना दिया है। मुझे भय था कि ममता और मोह कहीं मेरे वैराग्य को विचलित न कर दें, इसीलिए मैं बिना बताए निकलना चाहता था।"

अजिता ने दीपक को स्थिर करते हुए उत्तर दिया, "आर्यपुत्र! जैन कुल की स्त्रियाँ मोह से मोहभंग करना जानती हैं। यदि आप बिना कहे चले जाते, तो संसार कहता कि वीर मार्तंड अपनी पत्नी के अश्रुओं से हार गए। मैं नहीं चाहती कि इतिहास आपके महान त्याग पर कोई भी संदेह करे। आप मोक्ष मार्ग के पथिक हैं, और पथिक को पीछे मुड़कर देखने की व्याकुलता नहीं होनी चाहिए।"

उसने एक लंबी श्वास ली और पुनः कहा, "स्वामी, जिसे आप पीछे छोड़ रहे हैं, वह अधूरा नहीं रहेगा। पुत्र के भीतर मैं आपके शौर्य को जीवित रखूँगी और आपके द्वारा स्थापित धर्म की मर्यादाओं को सींचूँगी। आप जाइये और उस परम सत्य की खोज कीजिये जहाँ युद्धों का अंत होता है और आत्मिक शांति का उदय होता है। आज से मेरे लिए आपकी स्मृति ही मेरा संयम होगी।"

चामुंडराय ने देखा कि अजिता की वाणी में अटूट धैर्य था, किंतु उसके हाथ की कांपती हुई उंगलियाँ उसके हृदय के भीतर उठते वियोग के हाहाकार को बयां कर रही थीं। उन्होंने गहरी संवेदना के साथ अपना सिर झुकाया। उस क्षण महल की सीढ़ियाँ उतरते हुए चामुंडराय को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे केवल पत्थर की सीढ़ियाँ नहीं, बल्कि संसार के अंतिम वैभव को त्याग कर अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर की ओर बढ़ रहे हों।

पीछे खड़ी अजिता मौन खड़ी रही। उसने आंसुओं को गिरने नहीं दिया, क्योंकि जैन परंपरा में मंगल प्रस्थान के समय अश्रु शुभ नहीं माने जाते। उसने मन ही मन 'णमोकार मंत्र' का जाप किया और उस चांदनी में विलीन होती अपने पति की आकृति को तब तक निहारा जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए।

_______________________________________


अध्याय १३: परिवार का विसर्जन और अपरांत का पथ

महल की सुख-सुविधाओं, दास-दासियों और अजिता के उस निस्वार्थ प्रेम को पीछे छोड़ते हुए चामुंडराय जब नगर की सीमा से बाहर निकले, तो उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें डर था कि यदि एक बार भी पीछे देखा, तो अजिता की वह शांत मुस्कान और पुत्र का चेहरा उनके संकल्प को मोम की तरह पिघला देगा। यह उनकी ओर से कोई 'निर्दयता' नहीं थी, बल्कि एक विशाल मानवतावादी लक्ष्य के लिए अपने व्यक्तिगत 'मोह' का विसर्जन था। मार्ग में जो भी कीमती आभूषण उनके शरीर पर थे, उन्होंने एक-एक कर एक निर्धन दरिद्र को दान कर दिए।

उन्होंने अपनी रेशमी चादर एक वृक्ष की शाखा पर टांग दी और नंगे पैर कंकरीले रास्तों पर चल पड़े। अब उनके पास न सेना थी, न तलवार, और न ही कोई उपाधि। उनके मन के आकाश पर अब केवल दो ही चित्र स्पष्ट थे—एक राजमाता कालला देवी की वह आज्ञा जिसमें सत्य की खोज का आदेश था, और दूसरा अजिता की वह त्यागपूर्ण विदाई, जिसने उन्हें मोह से मुक्त कर दिया था। जैसे-जैसे वे अपरांत नगरी की ओर जाने वाले धूल भरे मार्ग पर बढ़ रहे थे, उन्हें अनुभव हो रहा था कि एक योद्धा के भीतर अब एक जिज्ञासु श्रावक का जन्म हो रहा है।

श्रावक चामुंडराय के भीतर इस समय विचारों का मंथन चल रहा था। उन्होंने मन ही मन चिंतन किया, "हे आत्मन! तूने अब तक केवल शत्रुओं को जीतने का पुरुषार्थ किया, किंतु अब तुझे स्वयं को जीतना है। राजमाता ने जिस सत्य की खोज का उत्तरदायित्व सौंपा है, वह किसी सिंहासन पर नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के भीतर ही मिलेगा। अपरांत की यह यात्रा केवल भूगोल की यात्रा नहीं, बल्कि भावों की शुद्धि का मार्ग है।"

नंगे पैर चलते हुए जब कंकड़ उनके तलवों में चुभते, तो वे तनिक भी विचलित नहीं होते। वे इसे 'परीषह जय' (कष्टों पर विजय) का एक छोटा सा अभ्यास मान रहे थे। उन्होंने विचार किया कि जिस प्रकार एक स्वर्णकार सोने को तपाकर उसकी अशुद्धियाँ दूर करता है, उसी प्रकार इस दुर्गम यात्रा का कष्ट उनके भीतर के 'अहंकार' को भस्म कर देगा।

मार्ग में उन्हें एक श्रावक समूह मिला जो तीर्थवंदना से लौट रहा था। चामुंडराय ने हाथ जोड़कर उन्हें 'जय जिनेंद्र' कहा। समूह के वृद्ध नायक ने उनके धूल-धूसरित किंतु तेजस्वी चेहरे को देखकर पूछा, "भद्र! आपकी वेशभूषा साधारण है, किंतु आपकी चाल में किसी कुलीन पुरुष जैसा धैर्य है। अपरांत की ओर जाने वाला यह मार्ग बहुत लंबा और एकाकी है। क्या आप अकेले ही इस पथ के राही हैं?"

चामुंडराय ने धीर भाव से उत्तर दिया, "महानुभाव, सत्य की खोज में निकलने वाला कभी अकेला नहीं होता। उसके साथ उसके संकल्प और धर्म की साक्षी होती है। मैं तो केवल अपनी माता के आदेश का पालन करने वाला एक साधारण सेवक हूँ। अपरांत की भूमि पर मुझे उन संकेतों की प्रतीक्षा है, जो मुझे उस सत्य तक ले जाएँ जिसकी आज्ञा मुझे मिली है।"

उनकी वाणी में जैन श्रावक की वह विनम्रता थी, जो बड़प्पन को सहज ही त्याग देती है। उन्होंने मार्ग में मिलने वाले किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाने का पूर्ण ध्यान रखा। 'ईर्या समिति' (चलने की सावधानी) का पालन करते हुए वे प्रत्येक कदम देख-परख कर रख रहे थे। अपरांत नगरी की ओर बढ़ते हुए उनके मन में किसी प्रकार का परिग्रह शेष नहीं रहा था। उन्होंने सोचा कि यदि वे साथ में धन या अस्त्र रखते, तो उनकी चिंता उस धन की रक्षा में लगी रहती, किंतु अब वे पूर्णतः 'निर्भय' थे।

धूप प्रखर होती जा रही थी, किंतु चामुंडराय का निश्चय उससे भी अधिक प्रखर था। वे अपरांत के उस क्षितिज की ओर देख रहे थे जहाँ सत्य की कोई किरण फूटने वाली थी। उनके लिए अब 'मैं महामात्य हूँ' या 'मैं सेनापति हूँ' जैसे पद गौण हो चुके थे। वे केवल एक ऐसे अन्वेषक थे जो अपनी जड़ों से कटकर अब परम सत्य की शाखाओं को छूना चाहते थे।

अपरांत की सीमा के पास पहुँचते-पहुँचते उनके भीतर का 'योद्धा' पूरी तरह शांत हो चुका था। उनके मुख पर अब क्रोध या विजय की रेखाएँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी करुणा थी जो समस्त चराचर जगत के प्रति थी। पत्थरों की कठोरता अब उन्हें डरा नहीं रही थी, बल्कि उन्हें बुला रही थी कि आओ और मुझमें उस सत्य को खोजो जिसकी तुम्हें तलाश है। अपरांत नगरी के द्वार अब निकट थे, और चामुंडराय के हृदय में एक ही मंत्र गूँज रहा था—"अप्पा सो परमप्पा" (आत्मा ही परमात्मा है)। इसी सत्य की खोज में वे अपनी थकान को विस्मृत कर आगे बढ़ते रहे।

_______________________________________


अध्याय १३: गोमांतक का बुलावा और गुप्त अभियान

राजा राचमल्ल के दरबार में उस दिन एक असामान्य व्याकुलता छाई हुई थी। उत्तर दिशा से आए एक रहस्यमयी दूत ने दरबार की शांति को भंग कर दिया था। दूत ने अत्यंत गुप्त सूचना दी कि चोल साम्राज्य के चतुर गुप्तचर उस प्राचीन मानचित्र की सरगर्मी से तलाश कर रहे हैं, जो 'पोदनपुर' के पवित्र और लुप्त मार्ग को प्रशस्त करता है। राजा राचमल्ल जानते थे कि यदि यह मानचित्र शत्रुओं के हाथ लग गया, तो साम्राज्य की प्रतिष्ठा और वह प्राचीन सत्य संकट में पड़ जाएगा जिसे सदियों से सहेज कर रखा गया है। चामुंडराय, जो पहले ही अपनी खोज में निकल चुके थे, उन्हें इस नए खतरे से अवगत कराना अनिवार्य था।

राजा ने तुरंत अपने सबसे द्रुतगामी पत्र वाहक को बुलाया। उसे एक गुप्त राजकीय पत्र सौंपा गया जिसमें चामुंडराय के लिए गोमांतक जाने का स्पष्ट आदेश था। पत्र वाहक अपने तेज घोड़े पर सवार होकर बिजली की गति से चामुंडराय की खोज में निकल पड़ा। कई दिनों की कठिन यात्रा और जंगलों को पार करने के बाद, उसने चामुंडराय को बीच मार्ग में खोज निकाला और राजा का संदेश उन्हें सुपुर्द किया। पत्र पढ़ते ही चामुंडराय की आँखों में दृढ़ता की चमक आ गई। उन्होंने बिना क्षण गँवाए अपने अश्व की दिशा बदली और गोमांतक की ओर कूच कर दिया।

चामुंडराय अपने तेज तर्रार अश्व पर सवार होकर कोंकण के ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम रास्तों से होते हुए गोमांतक की सीमा पर पहुँचे। यह मार्ग चट्टानों, गहरी घाटियों और सघन वनस्पतियों से भरा था, लेकिन चामुंडराय का संकल्प अटूट था। जैसे ही वे गोमांतक की भूमि पर पहुँचे, वहाँ की हवा का मिजाज पूरी तरह बदल गया। हवा में समुद्र के नमक की तीखी गंध थी और फिजाओं में एक प्राचीन तंत्र की गूँज महसूस होती थी। गोमांतक की यह प्राचीन भूमि अपने भीतर न जाने कितने अनसुलझे रहस्य छुपाए हुए थी।

चामुंडराय जानते थे कि मानचित्र तक पहुँचना सरल नहीं होगा। घने और अभेद्य जंगलों के बीच भटकते हुए, जहाँ दिन में भी अंधेरे का आभास होता था, उन्हें अंततः 'कुडने' का प्राचीन जैन मंदिर मिला। यह मंदिर स्थापत्य कला का एक ऐसा चमत्कार था जो समय की मार झेलने के बाद भी गर्व से खड़ा था। इसकी दीवारों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी सामान्य अलंकरण नहीं थी; उनमें छिपे हुए संकेत और आकृतियाँ किसी महान रहस्य की ओर इशारा कर रहे थे। चामुंडराय ने मंदिर की नक्काशी का बारीकी से निरीक्षण किया, जिससे उन्हें आभास हुआ कि वे सही स्थान पर पहुँच चुके हैं।

वहाँ के मुख्य पुजारी ने चामुंडराय के आगमन का उद्देश्य भांप लिया था। उन्होंने चामुंडराय की वीरता और उनके इरादों की कड़ी परीक्षा ली। पुजारी यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि जिस गुप्त ज्ञान की वे रक्षा कर रहे हैं, वह किसी योग्य हाथों में ही जाए। चामुंडराय के अटूट धैर्य और साहस से प्रभावित होकर, पुजारी उन्हें मंदिर के सबसे पवित्र और एकांत हिस्से, गर्भगृह की ओर ले गए।

गर्भगृह के भीतर का वातावरण अत्यंत रहस्यमयी और दिव्य था। पुजारी ने एक विशेष मंत्र का उच्चारण करते हुए दीवार के एक गुप्त हिस्से को दबाया। अचानक, गर्भगृह के फर्श के नीचे से एक गुप्त मार्ग प्रकट हुआ। यह मार्ग कोई साधारण सुरंग नहीं थी; यह अंधेरा और संकरा रास्ता सीधे समुद्र की अथाह गहराइयों की ओर नीचे उतरता था। चामुंडराय ने एक गहरी सांस ली और अपनी मशाल जलाकर उस गुप्त मार्ग में कदम रखा, जहाँ पोदनपुर का भाग्य उनका इंतजार कर रहा था।

_________________________________________


अध्याय १४: जल-यक्षों का प्रहार और समुद्र के नीचे का पीछा

समुद्र के गुप्त मार्ग का जल किसी ठंडी शिला की भांति शरीर को जड़ कर देने वाला था। चामुंडराय ने जैसे ही अपना पहला कदम उस अथाह जलराशि में रखा, काल के प्रवाह ने उनकी गति रोकनी चाही। फेफड़ों में वायु कम होने लगी थी, परंतु तभी उन्हें राजमाता का वह दिव्य आशीष स्मरण हो आया।

उन्होंने मुख में रखी उस विशेष जड़ी-बूटी को जिह्वा से स्पर्श किया। क्षण भर में, एक शीतल लहर उनके कंठ से होते हुए रक्त की धमनियों में उतर गई। अब जल उनके मार्ग में अवरोध नहीं, बल्कि प्राणवायु का स्रोत बन गया था।

जलीय नगरी का रहस्यमय दृश्य

अंतहीन गहराई में तैरते हुए, गुफा का मुहाना एक विशाल प्रकाशमान नगरी में खुला। वहां का दृश्य अकल्पनीय था। चारों ओर स्फटिक जैसी चट्टानें थीं, जिनसे मंद नीला प्रकाश फूट रहा था। वहां 'जल-यक्ष' पहरा दे रहे थे—ऐसे जीव जिनकी काया अर्ध-मानव की थी और निचला भाग किसी भयानक समुद्री जंतु सा।

तभी चामुंडराय की दृष्टि उस प्राचीन संदूक पर पड़ी, जो मणियों से जड़ित एक वेदी पर रखा था। यही वह नक्शा था, जो उन्हें पोदनपुर के लुप्त वैभव और भगवान बाहुबली की उस प्रथम प्रतिमा तक ले जा सकता था, जिसकी प्रतिष्ठा भरत चक्रवर्ती ने स्वयं की थी।

संवाद और संघर्ष की ज्वाला

जैसे ही चामुंडराय के दृढ़ हाथों ने उस संदूक को स्पर्श किया, शांति भंग हो गई। जल-यक्षों का सेनापति, जिसकी आंखें रक्त के समान लाल थीं, हाथ में त्रिशूलनुमा भाला लेकर आगे बढ़ा।

जल-यक्ष: "ठहर मानव! यह संदूक पूर्वजों की धरोहर है। इसे स्पर्श करने का अर्थ है स्वयं अपनी मृत्यु को निमंत्रण देना।"

चामुंडराय ने अपनी 'वज्रमुष्टि' तलवार की मूठ पर पकड़ मजबूत की। पानी के भीतर भी उनकी आवाज गूंजी, "हे जल-रक्षक! मेरा प्रयोजन विनाश नहीं, बल्कि उस सत्य की खोज है जो युगों से विस्मृत कर दिया गया है। पोदनपुर की गरिमा और अहिंसा के मार्ग को पुनः जीवित करने के लिए मुझे इस नक्शे की आवश्यकता है।"

जल-यक्ष: "सत्य की बातें शस्त्रधारियों के मुख से शोभा नहीं देतीं! प्रहार करो!"

एक साथ दर्जनों यक्षों ने भाले चलाए। चामुंडराय ने जल की गति का उपयोग करते हुए एक अद्भुत कलाबाजी खाई। जैन संस्कृति के 'सम्यक चारित्र' का पालन करने वाला योद्धा अनावश्यक जीव हिंसा से बचता है, इसलिए चामुंडराय ने यक्षों के प्राण लेने के बजाय उनकी ढालों और शस्त्रों पर प्रहार किया।

तिमि-मकर का भीषण पीछा

तभी एक भयावह गर्जना हुई। समुद्र की रेत उड़ने लगी और एक विशाल 'तिमि-मकर' (प्राचीन समुद्री दैत्य) अंधकार से बाहर निकला। वह साक्षात यमराज का वाहन प्रतीत हो रहा था। उसकी एक पूंछ के झटके से गुफा के स्तंभ भरभराकर गिरने लगे।

चामुंडराय (स्वयं से): "यह केवल शारीरिक बल का खेल नहीं है, यह एकाग्रता की परीक्षा है।"

शुरू हुआ एक भीषण 'चेस सीक्वेंस'। चामुंडराय पानी के भीतर बिजली की गति से तैर रहे थे। पीछे-पीछे वह विशाल दैत्य पत्थरों को चूर्ण करता हुआ आ रहा था। मार्ग संकरा था और गुफा की छत ढह रही थी। यक्षों के नुकीले औजार उनके पृष्ठ भाग को भेदने का प्रयास कर रहे थे।

एक क्षण ऐसा आया जब चामुंडराय दो विशाल शिलाओं के बीच फंस गए। सामने तिमि-मकर का खुला हुआ जबड़ा था और पीछे ढहती हुई दीवार।

वज्रमुष्टि का चमत्कार

"हे जिनेंद्र! मुझे वह शक्ति दें कि मैं इस धरोहर की रक्षा कर सकूं," चामुंडराय के मन में मंत्र गूंजा।

उन्होंने अपनी प्रसिद्ध 'वज्रमुष्टि' तलवार निकाली। यह साधारण धातु नहीं थी, इसमें मंत्रों और संकल्पों का बल था। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति झोंकते हुए तलवार को सामने की एक पतली दरार में गाड़ दिया।

कड़कड़ाहट...

तलवार के प्रहार से उस दरार ने एक विशाल द्वार का रूप ले लिया। दबाव के कारण पानी का प्रवाह तीव्र हुआ और चामुंडराय को उस भंवर ने बाहर की ओर धकेल दिया। तिमि-मकर उस संकरे मार्ग में फंस गया और क्रोध से दहाड़ने लगा।

सतह पर वापसी

जब चामुंडराय समुद्र की सतह पर वापस आए, तो सूर्य की सुनहरी किरणें उनका स्वागत कर रही थीं। उनके हाथ में वह प्राचीन संदूक सुरक्षित था। उनके वस्त्र भीगे थे, देह थकी थी, परंतु आंखों में एक अलौकिक चमक थी।

उन्होंने संदूक खोलकर देखा—वह नक्शा सुरक्षित था। अब पोदनपुर का मार्ग प्रशस्त था। वह प्राचीन तीर्थ, जहाँ चक्रवर्ती भरत ने अपने भाई की अजेय शक्ति को नमन किया था, अब चामुंडराय की प्रतीक्षा कर रहा था।

_________________________________________


अध्याय १५: सह्याद्री की दुर्गम चोटी और विद्याधर की माया

सह्याद्री की वह चोटी केवल एक भौगोलिक ऊँचाई नहीं, बल्कि चामुंडराय के धैर्य की अंतिम सीमा थी। यहाँ वायु भी बोझिल थी और आकाश इतना निकट कि प्रतीत होता था जैसे किसी ने अनंत नीला चादर ओढ़ रखा हो। गोमांतक की स्मृतियों को पीछे छोड़, चामुंडराय अकेले ही उस दुर्गम मार्ग पर बढ़ रहे थे जहाँ पग-पग पर मृत्यु नहीं, बल्कि 'भ्रम' प्रतीक्षा कर रहा था। नक्शे के पुराने संकेतों ने उन्हें इस स्थान तक पहुँचाया था, जिसे संसार ने भुला दिया था।

अचानक, प्रकृति का व्यवहार बदल गया। शांत आकाश से दहकते हुए अंगार गिरने लगे। कोई सेना नहीं थी, कोई कोलाहल नहीं था; केवल एक योद्धा था और उसके विरुद्ध स्वयं प्रकृति का प्रकोप। चामुंडराय ने अपनी ढाल कस ली। हर गिरता हुआ गोला उनके संकल्प को परख रहा था। अग्नि की उस वर्षा के बीच वे रुके नहीं, क्योंकि रुकना उस सत्य को खो देना था जिसे वे खोजने निकले थे।

जैसे-जैसे वे शिखर के निकट पहुँचे, वायु में एक विचित्र गंध घुलने लगी। तंत्र की माया ने अपना जाल बुना। शून्य से आकृतियाँ उभरने लगीं। चामुंडराय के सम्मुख उनके पूर्वज खड़े थे, जो उन्हें धिक्कार रहे थे। फिर अचानक, उनकी पत्नी अजिता का करुण और अश्रुपूर्ण चेहरा दिखाई दिया। वह पुकार रही थी, "स्वामी! लौट आइये, यह मार्ग केवल विनाश का है।"

चामुंडराय की आँखों में एक क्षण के लिए तरलता आई, किंतु उनके भीतर के जैन श्रावक और योद्धा ने तुरंत उसे पहचान लिया। "अजिता मेरी शक्ति है, मेरी निर्बलता नहीं। जो मुझे कर्तव्य से विमुख करे, वह छवि मेरी प्रिया की नहीं हो सकती!" उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं और केवल अंतरमन की ध्वनि पर विश्वास किया।

तभी, शिखर की धुंध छँटी और प्रकट हुआ—काल सत भद्र।

एक मायावी विद्याधर, जिसका अस्तित्व ही उस प्राचीन जैन वैभव की रक्षा के लिए समर्पित था। उसकी देह पर प्राचीन लिपियों के चिन्ह थे और आँखों में सदियों का एकांत।

काल सत भद्र: (स्वर में बिजली जैसी कड़क थी) "पग रोक ले, मरणशील मनुष्य! यह भूमि तेरे पदचाप के योग्य नहीं है। तू जिस पोदनपुर के द्वार खोज रहा है, उसे मैंने अपनी तंत्र-विद्या के सात पर्दों में लपेटा है। वह सत्य अब संसार के लिए मृत हो चुका है।"

चामुंडराय: (बिना विचलित हुए) "विद्याधर! सत्य कभी मृत नहीं होता, वह केवल तुम्हारी जैसी हठधर्मिता के पीछे ओझल हो जाता है। मैं यहाँ किसी राज्य की सीमा विस्तार के लिए नहीं, अपितु उस विस्मृत संस्कृति के पुनरुद्धार के लिए आया हूँ।"

काल सत भद्र: (अट्टहास करते हुए) "पुनरुद्धार? मनुष्य जिस वस्तु को स्पर्श करता है, उसे अपने अहंकार से मलिन कर देता है। मैंने इस पावन जैन धरोहर को तुम जैसे लोभी मनुष्यों की पहुँच से दूर रखा है ताकि इसकी शुचिता अक्षुण्ण रहे। मेरी शत्रुता तुझसे नहीं, तेरी जाति की चंचलता से है।"

चामुंडराय: "यदि शुचिता का अर्थ उसे केवल गुफाओं और तंत्र के बंधनों में जकड़ कर रखना है, तो वह शुचिता नहीं, कायरता है। तीर्थंकरों का मार्ग लोक-कल्याण का था, लोक-त्याग का नहीं। तुम रक्षक होकर भी भक्षक बन रहे हो, क्योंकि तुम संसार को उस अमृत से वंचित रख रहे हो जिसका वह अधिकारी है।"

काल सत भद्र: "संवादों की प्रखरता तुझे यहाँ जीवित नहीं रखेगी, योद्धा! यहाँ की वायु में मंत्रों का विष है और यहाँ की शिलाओं में मेरा संकल्प। यदि तू एक पग भी और आगे बढ़ा, तो सह्याद्री की यह चोटी तेरी समाधि बन जाएगी।"

चामुंडराय: "समाधि से वह डरे जिसका कार्य अपूर्ण हो। मेरा संकल्प उस बाहुबली की प्रतिमा के समान अचल है, जिसे मुझे स्थापित करना है। तुम्हारे तंत्र की माया मेरे आत्मबल को स्पर्श भी नहीं कर सकती।"

काल सत भद्र ने अपने हाथ आकाश की ओर उठाए। पर्वत का सीना कांपने लगा और एक भीषण ऊर्जा चामुंडराय की ओर बढ़ी। संवाद समाप्त हो चुका था। अब उस निर्जन शिखर पर एक रक्षक की मर्यादा और एक खोजी की निष्ठा के मध्य वह महायुद्ध प्रारंभ होने वाला था, जिसे इतिहास ने कभी अंकित नहीं किया।

_________________________________________


अध्याय १६: पत्थरों के दानव और महासूत्र का शंखनाद

विंध्यगिरि की चोटियों पर आज रात नियति का एक विलक्षण युद्ध हो रहा था। यह युद्ध केवल दो पुरुषों के बीच नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं के बीच था। एक ओर चामुंडराय थे—संयम और आत्मिक बल के प्रतीक; दूसरी ओर विद्याधर था—एक ऐसा दार्शनिक जो यह मान चुका था कि मानवता केवल भय और शक्ति की भाषा समझती है।

सत भद्र (विद्याधर) ने अपनी जटाओं को झटकते हुए आकाश की ओर हाथ फैलाए। उसकी आँखों में क्रोध नहीं, बल्कि एक गहरी हताशा मिश्रित दृढ़ता थी। "देखो चामुंडराय! इन जंगलों को देखो, इन पवित्र पर्वतों को देखो। मनुष्य जहाँ भी कदम रखता है, उसे दूषित कर देता है। वे धर्म के नाम पर अधर्म करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी कोमलता इस संस्कृति को बचा पाएगी? नहीं! इस पावन भूमि को बचाने के लिए मुझे स्वयं 'दानव' बनना होगा ताकि मैं इन भक्षक मानवों को बाहर रख सकूँ।"

उसकी उंगलियों के इशारे पर पहाड़ की देह में हलचल हुई। गुरुत्वाकर्षण के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए भारी भरकम शिलाखंड हवा में तैरने लगे। जैसे कोई अदृश्य मूर्तिकार सेकंडों में पत्थर गढ़ रहा हो, वैसे ही तीन विशाल 'अश्म-दानव' (Stone Golems) खड़े हो गए। उनकी भुजाएं बरगद के तनों जैसी और धड़ पहाड़ के टुकड़ों जैसे थे।

तर्क और तलवार: एक वैचारिक द्वंद्व

चामुंडराय ने अपनी तलवार 'वज्रमुष्टि' खींच ली। बिजली की चमक में तलवार की धार चमक उठी। "विद्याधर! रक्षा के नाम पर किया गया विनाश भी विनाश ही कहलाता है। तुम जड़ पदार्थों को चेतना देकर प्रकृति का अपमान कर रहे हो।"

"अपमान?" विद्याधर अट्टहास कर उठा, उसकी आवाज़ पहाड़ों से टकराकर लौट रही थी। "मनुष्य ने अपनी लालसाओं से इस धरा का जो चीरहरण किया है, क्या वह अपमान नहीं है? मैं इन पत्थरों में प्राण फूँक रहा हूँ ताकि वे अपनी गरिमा की रक्षा कर सकें। तुम्हारी तलवार क्या करेगी? ये पत्थर तुम्हारी धातु को खा जाएंगे!"

विद्याधर ने संकेत किया और एक दानव ने प्रहार किया। चामुंडराय ने हवा में गोता लगाया और बिजली की गति से दानव के घुटने पर वार किया। चिंगारियां निकलीं, कान फाड़ देने वाली आवाज़ हुई, पर पत्थर पर एक खरोंच तक न आई। चामुंडराय ने अनुभव किया कि उनकी भौतिक शक्ति यहाँ व्यर्थ है।

वज्रमुष्टि का त्याग और महासूत्र का आह्वान

चामुंडराय पीछे हटे। उन्होंने महसूस किया कि विद्याधर के पास तर्क है, पर उस तर्क में 'अहिंसा' का प्रकाश नहीं है। उन्होंने एक साहसी निर्णय लिया। अपनी प्रिय तलवार 'वज्रमुष्टि' को उन्होंने पूरी शक्ति से पर्वत की चोटी की दरार में गाड़ दिया।

विद्याधर चकित रह गया। "यह क्या पागलपन है, योद्धा?"

चामुंडराय पद्मासन में बैठ गए। उनके चेहरे पर एक अलौकिक शांत भाव था। उन्होंने कहा:

"विद्याधर, तुम संस्कृति को पत्थरों से बचाना चाहते हो, मैं उसे संस्कारों से बचाना चाहता हूँ। तुम मनुष्य से नफरत करते हो, मैं मनुष्य के भीतर के अंधकार को मिटाना चाहता हूँ। तुम्हारी माया का उत्तर शस्त्र नहीं, 'शमन' है। यह लोहे का नहीं, 'लौकिक सत्य' का समय है।"


चामुंडराय ने अपनी आँखें मूँद लीं। उनके होंठ हिले और 'महासूत्र' का दिव्य पाठ आरंभ हुआ।

शंखनाद: ध्वनि का रहस्य

"नमो अरिहंताणं... नमो सिद्धाणं..."

जैसे ही प्रथम पद गूँजा, पहाड़ की वायु का घनत्व बदलने लगा। मंत्रों का कंपन मात्र शब्द नहीं थे, वे ब्रह्मांड की मौलिक ध्वनि (Cosmic Resonance) थे। मंत्रों की लहरों ने एक नीला प्रकाश उत्सर्जित किया जो चामुंडराय के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाने लगा।

विद्याधर ने चिल्लाकर कहा, "इसे कुचल दो! यह मौन मुझे विचलित कर रहा है!"

दानवों ने अपने भारी पैर उठाए, लेकिन जैसे ही वे मंत्रों के घेरे के पास पहुँचे, उनकी गति धीमी पड़ गई। जैन संस्कृति की वह महान भावना, जो 'जिय' और 'अजिय' (जीव और अजीव) के संतुलन की बात करती है, वहाँ साकार हो रही थी। मंत्रों की कंपन पत्थरों के परमाणुओं के साथ एक लय (Frequency) बनाने लगी।

चामुंडराय का स्वर अब एक गर्जना बन चुका था:

"हे पाषाण! अपनी जड़ता को पहचान। तू किसी की वासना का औजार नहीं, तू इस पृथ्वी का शांत आधार है। मुक्त हो जा इस आसुरी बंधन से!"


माया का विलीनीकरण और सत्य का उदय

अचानक, एक भयंकर नीला धमाका हुआ। यह किसी शस्त्र का प्रहार नहीं था, बल्कि 'महासूत्र' की ऊर्जा का चरम विस्फार था। इस प्रकाश ने विद्याधर की काली माया को उसी तरह सोख लिया जैसे सूर्य कोहरा सोख लेता है।

पत्थरों के दानव ढहने लगे। वे टूटे नहीं, बल्कि ऐसा लगा जैसे वे कृतज्ञता में झुक रहे हों। कुछ ही पलों में वे पुनः साधारण शिलाओं में बदल गए। पहाड़ के ऊपर का वह घना, डरावना अंधेरा छँट गया और चाँद की शीतल चांदनी चारों ओर बिखर गई।

विद्याधर (सत भद्र) घुटनों के बल गिर पड़ा। उसका अहंकार नहीं टूटा था, पर उसकी धारणा डगमगा गई थी। "यह... यह कैसे संभव है? मेरे तंत्र को किसी मंत्र ने नहीं, बल्कि एक 'भाव' ने हरा दिया?"

चामुंडराय ने धीरे से आँखें खोलीं। उनकी आवाज़ में जीत का मद नहीं, बल्कि सात्विक गुरुता थी:

"विद्याधर, तुम पत्थरों को दानव बनाकर संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते। संस्कृति की रक्षा तब होती है जब पत्थर 'प्रतिमा' बन जाते हैं और मानव 'साधक'। तुमने पत्थरों को लड़ना सिखाया, मैंने उन्हें शांत होना सिखाया। तुम्हारी सुरक्षा जेल जैसी थी, मेरी सुरक्षा मोक्ष के द्वार जैसी है।"


पर्वत अब मौन था। विद्याधर ने चामुंडराय की ओर देखा—एक योद्धा जिसने बिना रक्त बहाए ब्रह्मांड के सबसे कठिन शत्रु 'स्वयं के अहंकार' और 'भय' को जीत लिया था। विंध्यगिरि की हवाओं में अब भी महासूत्र की मिठास घुली हुई थी।

_________________________________________


अध्याय १७: बादलों के ऊपर तैरती नगरी - पोदनपुर

उस अलौकिक प्रकाश पुंज के विलीन होते ही चामुंडराय की पलकें धीरे से झपकीं, और जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो काल और स्थान की मर्यादाएँ टूट चुकी थीं। वह किसी युद्ध क्षेत्र या किसी धूल भरी राह पर नहीं थे। उनके पैरों के नीचे की भूमि अदृश्य थी, क्योंकि वे बादलों के धवल समुद्र के ऊपर खड़े थे। उनके सामने जो दृश्य था, वह मानव कल्पना की परिधि से परे था—सामने साक्षात 'पोदनपुर' नगरी विद्यमान थी।

दिव्य स्थापत्य और मणियों की आभा

पोदनपुर कोई सामान्य नगर नहीं था, जिसे ईंटों या गारे से चुना गया हो। चामुंडराय ने विस्मय से देखा कि नगर के ऊँचे-ऊँचे बुर्ज और प्राचीरें हीरे और वैदूर्य मणियों से निर्मित थे। जैसे ही सूर्य की रश्मियाँ इन पारदर्शी दीवारों से टकरातीं, संपूर्ण आकाश एक अनंत इंद्रधनुष की आभा से भर जाता। वह प्रकाश आँखों को चुभने वाला नहीं, बल्कि आत्मा को शीतलता प्रदान करने वाला था। जैन दर्शन की उस शुद्धता का यहाँ जीवंत रूप था, जहाँ प्रत्येक कण अपनी नैसर्गिक चमक में प्रतिष्ठित था।

चामुंडराय ने मन ही मन विचार किया:

"क्या यह वही नगरी है जिसके वैभव के गीत पुराणों में गाए गए हैं? यहाँ की ईंटें पत्थर नहीं, बल्कि शुद्ध पुद्गल परमाणुओं का उत्कृष्ट मेल हैं। यह वैभव भौतिक संचय नहीं, बल्कि तप का प्रतिफल प्रतीत होता है।"


सुगंधित वायु और अलौकिक वातावरण

वहाँ की गलियों में बहने वाली वायु साधारण हवा नहीं थी। उसमें एक ऐसी दिव्य सुगंध तैर रही थी जो नासिका के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे हृदय में उतर रही थी। उस गंध का प्रभाव ऐसा था कि चामुंडराय को अपने भीतर एक अभूतपूर्व परिवर्तन महसूस हुआ। उनके मन के सारे विकार—क्रोध, मान, माया और लोभ—क्षण भर में शांत हो गए। वह वातावरण राग-द्वेष से मुक्त था।

वे स्वयं से बोले:

"आश्चर्य! इस नगरी की वायु में वह सामर्थ्य है जो बड़े-बड़े योगियों को वर्षों की साधना के बाद प्राप्त होता है। यहाँ आकर चित्त स्वतः ही निर्मल हो गया है। क्या उच्च चेतना के बिना ऐसी सुगंध संभव है?"


विद्याधरों का निवास और उच्च चेतना

नगर के निवासी कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि 'विद्याधर' थे। वे अत्यंत सुंदर, कांतिमान और तेजपुंज वाले जीव थे। उनकी देह से निकलने वाला प्रकाश यह सिद्ध कर रहा था कि वे संयम और विद्या के बल पर ऊर्ध्वगामी हुए हैं। वहाँ न तो किसी के चेहरे पर युद्ध की विभीषिका का भय था, न ही भूख की व्याकुलता। वहाँ लालच का कोई स्थान नहीं था, क्योंकि वहां अभाव ही नहीं था।

यह नगरी उच्च चेतना और तपस्या के अटूट बल पर टिकी हुई थी। गुरुत्वाकर्षण के नियम यहाँ मौन थे, क्योंकि यहाँ चेतना का भारहीन आनंद व्याप्त था।

चामुंडराय का अंतर्मन इस सत्य को स्वीकारते हुए काँप उठा:

"यह नगरी ईंट-पत्थरों के आधार पर नहीं, बल्कि सम्यक दर्शन और चरित्र की आधारशिला पर खड़ी है। यहाँ का ऐश्वर्य आत्मिक उन्नति का प्रतिबिंब है।"


चामुंडराय का आत्म-बोध

पोदनपुर की उस दिव्यता को निहारते हुए चामुंडराय को एक कटु सत्य का बोध हुआ। उन्हें लगा कि जिस संसार से वे आए हैं, वह अभी इस अलौकिक सत्य को स्वीकार करने के योग्य नहीं हुआ है। मनुष्य की बुद्धि अभी भी संकुचित है, वह ईर्ष्या और संघर्षों में उलझी है।

उन्होंने गहरी सांस लेते हुए स्वयं से संवाद किया:

"हे आत्मन! क्या मानव जाति इस दिव्यता के तेज को सह पाएगी? नहीं, अभी नहीं। यह नगरी केवल उन आँखों के लिए है जिन्होंने अपने भीतर के अंधकार को जीत लिया है। हम अभी केवल इस दिव्यता के स्वप्न देख सकते हैं, इसे सीधे स्वीकार करने की पात्रता अभी शेष है।"


जैन संस्कृति की मर्यादा के अनुरूप, पोदनपुर का यह वर्णन सादगी और दिव्यता का संगम था। चामुंडराय वहां एक मूक साक्षी बनकर खड़े रहे, जहाँ भौतिकता समाप्त होती थी और आध्यात्मिक साम्राज्य का उदय होता था। वह बादलों के ऊपर तैरती नगरी, अपनी भव्यता और शांति के साथ, उनकी चेतना में सदैव के लिए अंकित हो गई।

_________________________________________


अध्याय १८: बाहुबली का विराट स्वरूप और दिव्य संवाद

पोदनपुर की उस मायावी नगरी के केंद्र में पहुँचते ही समय जैसे ठहर गया। चामुंडराय, जो अब तक सैकड़ों युद्धों के विजेता और अजेय सेनापति रहे थे, यहाँ आकर स्वयं को एक तुच्छ तिनके के समान अनुभव कर रहे थे। चारों ओर व्याप्त वह नीलाभ प्रकाश किसी भौतिक दीपक का नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक महासागर था। उनके सामने जो दृश्य उभरा, उसने मानवीय कल्पना की सीमाओं को ध्वस्त कर दिया।

वहाँ कोई पाषाण प्रतिमा नहीं थी, कोई जड़ पदार्थ नहीं था। उनके सम्मुख भगवान बाहुबली का ५०० फीट ऊँचा वह विराट स्वरूप खड़ा था, जो केवल प्रकाश की रश्मियों से निर्मित प्रतीत होता था। वह पुंज इतना विशाल था कि उसका मस्तक सीधे आकाश गंगा के नक्षत्रों को स्पर्श कर रहा था। बाहुबली की वह दिगंबर मुद्रा, वह निश्चल कायोत्सर्ग मुद्रा, अनंत शांति का उद्घोष कर रही थी। उनके चरणों से निकलने वाली धवल रश्मियाँ चामुंडराय के अस्तित्व को भेदकर उनकी आत्मा को शुद्ध कर रही थीं।

तभी, उस निस्तब्धता को चीरते हुए एक गंभीर, प्रतिध्वनित होने वाली ध्वनि गूँजी। यह ध्वनि कानों से नहीं, बल्कि सीधे चामुंडराय के अंतर्मन में सुनाई दे रही थी। इस संवाद का माध्यम वही रहस्यमयी सत भद्र विद्याधर था, जिसे चामुंडराय ने पिछले पड़ाव पर रक्षक खलनायक के रूप में पाया था। विद्याधर की उपस्थिति अब और भी प्रखर हो गई थी, मानो वह बाहुबली की चेतना और चामुंडराय के विवेक के बीच का सेतु बन गया हो।

सत भद्र विद्याधर ने अपने हाथ ऊपर उठाए और उसकी वाणी में स्वयं बाहुबली की आत्मा का ओज उतर आया। उसने कहा:

"हे वीर मार्तंड! हे भद्र साधक ! एकाग्र चित्त होकर सुनो। जिस सत्य की खोज में तुम इस अदृश्य नगरी तक आए हो, वह अब तुम्हारे सम्मुख है। देख इस भव्यता को, जो न जन्म लेती है और न ही जिसका विनाश संभव है। किंतु नियति का चक्र अपरिवर्तनीय है। कलयुग का घनघोर अंधकार निकट है। लोभ, मद और हिंसा की ज्वाला मनुष्यों के विवेक को भस्म करने वाली है।"

चामुंडराय विस्मित होकर उस प्रकाशपुंज को देख रहे थे। विद्याधर के मुख से निकलते शब्द साक्षात दिव्य आज्ञा बन रहे थे। विद्याधर ने आगे कहा:

"यह पोदनपुर नगरी, जो सतयुग की शांति को संजोए हुए है, अब मनुष्यों की दृष्टि से ओझल होने वाली है। यह दिव्य नगरी शून्य में विलीन हो जाएगी क्योंकि आने वाला समय इस पावनता को सहन करने की क्षमता खो देगा। किंतु, अहिंसा का यह सूर्य अस्त नहीं होना चाहिए। संसार को एक ऐसे प्रतीक की आवश्यकता है, जिसे देखकर भटकती हुई मानवता पुनः संयम और त्याग के मार्ग पर लौट सके।"

चामुंडराय ने गदगद कंठ से पूछा, "प्रभो! मुझ जैसे साधारण मनुष्य की क्या सामर्थ्य कि मैं इस विराट सत्य को संसार तक ले जाऊं?"

विद्याधर की आँखों में एक अलौकिक चमक कौंधी, उसने बाहुबली के उस ५०० फीट ऊंचे प्रकाश-स्तंभ की ओर संकेत करते हुए कहा:

"तुम्हें इस दिव्य छवि को पृथ्वी की मिट्टी और पाषाण में उतारना होगा। तुम्हें इस विराट स्वरूप को वह आकार देना होगा जो युगों-युगों तक अडिग रहे। विंध्यगिरि की उन चट्टानों को ढूंढो, जहाँ प्रकृति स्वयं इस प्रतीक्षा में है कि तुम अपनी भक्ति की छेनी से बाहुबली को पुनः अवतरित करो। जब मनुष्य उस विशाल पाषाण प्रतिमा को देखेगा, तो उसे आभास होगा कि काम, क्रोध और लोभ से ऊपर उठकर ही जीव शिव बन सकता है। वह प्रतिमा केवल पत्थर नहीं होगी, वह मुक्ति का मार्ग होगी।"

उस क्षण, चामुंडराय को आभास हुआ कि उनकी वीरता और उनके ऐश्वर्य का एकमात्र उद्देश्य यही था—उस दिव्य शांति को जन-जन तक पहुँचाना। सत भद्र विद्याधर का शरीर उस प्रकाश पुंज में धीरे-धीरे विलीन होने लगा, लेकिन उसकी अंतिम वाणी चामुंडराय के हृदय पर अंकित हो गई: "उठो हे भद्र साधक ! तुम्हारा रणक्षेत्र अब बदल गया है। अब तुम्हें तलवार से नहीं, त्याग और सम्यक दर्शन से धर्म की विजय पताका फहराानी है।"

प्रकाश का वह महापुंज धीरे-धीरे मद्धम होने लगा और पूरी पोदनपुर नगरी एक रहस्यमयी धुंध में लिपटने लगी। चामुंडराय के भीतर अब एक नई अग्नि प्रज्वलित थी—एक ऐसी प्रतिमा के निर्माण की प्रतिज्ञा, जो समय के अंत तक बाहुबली के संदेश को जीवित रखेगी।

_________________________________________


अध्याय १९: विंध्यगिरि का संकल्प – शिला में प्राणों का स्पंदन

पोदनपुर की वह दिव्य धरा, जहाँ समय ठहर गया था, आज एक महासंवाद की साक्षी बन रही थी। चामुंडराय उस ५०० धनुष ऊँची प्रकाश-प्रतिमा के सम्मुख ऐसे खड़े थे जैसे अनंत सागर के सामने एक छोटी सी लहर। उनकी आँखों में वह अक्स उतर आया था जिसने उनके भीतर के 'महामात्य' को पूरी तरह विसर्जित कर दिया था। वहाँ न कोई राजकीय ठाट था, न कोई पद, थे तो बस एक साधक और उनके आराध्य।

आत्मा का मौन संवाद

चामुंडराय ने जब प्रतिमा के उन विशाल चरणों को स्पर्श किया, तो उन्हें पाषाण में भी स्पंदन अनुभव हुआ। उनके भीतर एक ऐसी तरंग उठी जिसने उनके अस्तित्व को झकझोर दिया। वे स्वयं से कहने लगे—

"हे प्रभु ! यह कैसी माया है? आप यहाँ इस निर्जन में, इस अदृश्य लोक में अपनी करुणा लुटा रहे हैं, और वहाँ संसार तृष्णा की अग्नि में जल रहा है। क्या यह संभव है कि आपकी इस वीतरागी मुस्कान की एक किरण मैं दक्षिण की उस विंध्यगिरि की पहाड़ी तक ले जा सकूँ? क्या मैं पात्र हूँ कि आपके इस अलौकिक रूप को उस धरती पर उतार सकूँ जहाँ काल की गतियाँ मनुष्यों के भीतर से धर्म का लोप कर रही हैं?"

तभी उनके अंतर्मन की गहराइयों से एक गंभीर स्वर उभरा, जो किसी बाहरी कान ने नहीं सुना, केवल उनकी आत्मा ने महसूस किया— "चामुंडराय, संकल्प की शक्ति पत्थर को जल बना देती है और जल को शिला। यदि तेरे भीतर का गोम्मट (श्रद्धा) जाग गया है, तो पत्थर को बोलने से कोई नहीं रोक सकता। तू माध्यम बन, कर्ता तो स्वयं सत्य है।"

जैन संस्कृति का गौरवमयी चिंतन

चामुंडराय का हृदय उस गौरव से भर उठा जिसे केवल एक सच्चा जैन श्रावक ही अनुभव कर सकता है। उन्हें याद आया वह इतिहास, जहाँ बाहुबली ने अपने भाई भरत के विरुद्ध युद्ध जीतकर भी सब कुछ त्याग दिया था। उन्हें गर्व हुआ कि वे उस संस्कृति के अंश हैं जिसने शस्त्र पर शास्त्र की और विजय पर त्याग की प्रतिष्ठा की है।

उन्होंने बुदबुदाते हुए कहा— "यह ५०० धनुष की ऊँचाई केवल एक नाप नहीं है, यह मानव की ऊँची उठती आत्मा का प्रतीक है। मैं शपथ लेता हूँ कि विंध्यगिरि की चोटी पर जो प्रतिमा उभरेगी, वह केवल पाषाण का टुकड़ा नहीं होगी; वह जैन इतिहास का वह अखंड अध्याय होगा जिसे आने वाली हज़ारों सदियाँ श्रद्धा के अश्रुओं से पढ़ेंगी। वह गोम्मटेश्वर कहलाएंगे—वह जो गोम्मट (चामुंडराय) के ईश्वर हैं और संसार के पथ-प्रदर्शक हैं।"

संकल्प की शुचिता

चामुंडराय की आँखों में अब एक नए युग का स्वप्न था। उन्होंने महसूस किया कि पोदनपुर की वह ऊर्जा धीरे-धीरे उनके भीतर समाहित हो रही है। वे वहाँ से मुड़े, लेकिन उनके कदम अब एक साधारण मनुष्य के नहीं थे। वे अब उस संकल्प के रथ पर सवार थे जिसे विंध्यगिरि की ओर प्रस्थान करना था।

उन्होंने आकाश की ओर देखते हुए कहा— "इतिहास गवाह रहेगा कि एक राजा के मंत्री ने साम्राज्य नहीं माँगा, बल्कि उस 'महान मौन' को पत्थर में ढालने का दुस्साहस किया। मेरी छेनी का हर प्रहार एक मंत्र होगा, और पत्थर से निकलने वाला हर कण एक प्रार्थना। विंध्यगिरि अब केवल एक पर्वत नहीं रहेगा, वह जैन धर्म के अजेय गौरव का साक्षात् प्रमाण बनेगा।"

पोदनपुर की उस विराट प्रतिमा के चरणों की धूल मस्तक पर लगाकर, चामुंडराय ने जब अपना मुख मोड़ा, तो उनके चेहरे पर वही अलौकिक तेज था जो केवल आत्म-साक्षात्कार के बाद आता है। वे अभी पोदनपुर में ही थे, लेकिन उनकी आत्मा विंध्यगिरि की उस शिला को तराशने के लिए छटपटाने लगी थी।

_________________________________________


अध्याय २०: गोमांतक का अंतिम स्तंभ और अमर विरासत

स्थान: विंध्यगिरी की उत्तुंग चोटी, श्रवणबेलगोला।

समय: ईस्वी सन् ९८१ का प्रभात।

आकाश में केसरिया आभा बिखरी थी। विंध्यगिरी पर्वत के शिखर पर सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा रिक्त नहीं, बल्कि पूर्ण था। शताब्दियों की प्रतीक्षा अंततः पाषाण में साकार हो चुकी थी। ५७ फीट ऊँचे अखंड पाषाण खंड से निर्विवाद शांति, असीम त्याग और अनंत करुणा की मूर्ति उभर आई थी।

चामुंडराय (जिन्हें अब सेनापति से अधिक एक साधक के रूप में देखा जा रहा था) प्रतिमा के चरणों में नतमस्तक थे। उनके साथ उनकी माता कालला देवी और महान आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती खड़े थे।

आचार्य नेमिचंद्र: (गंभीर स्वर में) "राय, आज केवल पत्थर नहीं जागा है, आज भारत की आत्मा ने आँखें खोली हैं। देखो इन नेत्रों को—इनमें न क्रोध है, न मोह, केवल संसार के प्रति एक अनासक्त करुणा है।"

चामुंडराय: (रुंधे गले से) "गुरुदेव, जब मैंने पहली बार पोदनपुर की उस लुप्त प्रतिमा का स्वप्न देखा था, तब मुझे नहीं पता था कि नियति मुझसे क्या चाहती है। क्या यह वास्तव में पूर्ण हो गया? क्या भगवान बाहुबली अब यहीं निवास करेंगे?"

आचार्य नेमिचंद्र: "बाहुबली तो सर्वत्र हैं, चामुंडराय। किंतु तुमने उन्हें इस युग के लिए सुलभ कर दिया। तुम्हारी श्रद्धा इतनी अनन्य है कि आज से यह प्रतिमा तुम्हारे नाम से भी जानी जाएगी। चूंकि तुम 'गोमट' (सुंदर और मनभावन) हो, इसलिए पाषाण का यह महामानव आज से 'गोमतेश्वर' कहलाएगा। और तुम, केवल सेनापति नहीं, आज से इतिहास तुम्हें 'गोमट' की उपाधि से अलंकृत करता है।"

राजा राचमल्ल ने आगे बढ़कर चामुंडराय के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में गर्व था।

राजा राचमल्ल: "राय, मैंने साम्राज्य जीते हैं, सीमाएं बढ़ाई हैं। लेकिन तुमने समय को जीत लिया है। गंगा वंश के इतिहास में मेरा नाम इसलिए अमर होगा क्योंकि मेरे पास तुम्हारे जैसा मित्र और सेनापति था। यह गोमतेश्वर की प्रतिमा युगों-युगों तक मानवता को अहिंसा का मार्ग दिखाएगी।"

गोमांतक की ओर अंतिम प्रस्थान

अभिषेक के उत्सव के पश्चात, गोमट (चामुंडराय) का मन अशांत था। उनकी यात्रा जहाँ से प्रारंभ हुई थी, वहीं एक अंतिम कर्तव्य शेष था। वे अपनी सेना और ऐश्वर्य को त्यागकर, केवल कुछ चुने हुए रक्षकों के साथ पुनः गोमांतक (गोवा) के उन तटों की ओर बढ़े, जहाँ की लहरों ने कभी उन्हें पोदनपुर का रहस्य बताया था।

स्थान: गोमांतक का पश्चिमी तट। अरब सागर की गर्जना पत्थरों से टकरा रही थी।

सूर्यास्त का समय था। चामुंडराय तट पर खड़े थे, उनके हाथ में पोदनपुर के उस दिव्य पाषाण का अंतिम खंड था जो प्रतिमा निर्माण के समय बचा रह गया था। उनके साथ उनका विश्वसनीय सारथी और मित्र खड़ा था।

सारथी: "प्रभु, प्रतिमा स्थापित हो गई, साम्राज्य सुरक्षित है। फिर इस निर्जन तट पर यह उदासी कैसी?"

चामुंडराय: (समुद्र की क्षितिज की ओर देखते हुए) "यह उदासी नहीं, चिंता है मित्र। मैं देख पा रहा हूँ कि आने वाली शताब्दियों में इन लहरों पर सवार होकर कुछ ऐसी शक्तियाँ आएँगी जो इस भूमि की सुगंध को पहचान नहीं पाएँगी। वे मंदिर तोड़ेंगे, वे संस्कृति को ललकारेंगे। भारत की रक्षा केवल भूमि पर नहीं, इन सीमाओं पर भी होनी चाहिए।"

सारथी: "तो क्या आप पुनः शस्त्र उठाएंगे?"

चामुंडराय: (मुस्कुराते हुए) "नहीं। अब शस्त्रों का समय बीत गया। अब संकल्प का समय है। मैंने विंध्यगिरी पर 'शांति' स्थापित की है, अब गोमांतक के इस द्वार पर मैं 'शक्ति' को कीलित करूँगा।"

विजय स्तंभ का निर्माण और अंतिम संवाद

अमावस्या की उस धवल रात्रि में, चामुंडराय ने अपनी बची हुई तांत्रिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को उस पाषाण खंड में समाहित किया। आधी रात को, जब समुद्र का जलस्तर बढ़ा, तब उन्होंने तट की एक विशाल चट्टान के भीतर उस ऊर्जा को स्थापित कर एक स्तंभ खड़ा किया—'विजय स्तंभ'।

यह स्तंभ दृश्य रूप में साधारण था, किंतु उसकी आभा अलौकिक थी।

चामुंडराय: (स्तंभ को संबोधित करते हुए) "हे गोमांतक के प्रहरी! तू साक्षी रहना। तू पोदनपुर की उस दिव्य अग्नि का अंतिम अंश है। जब तक यह समुद्र रहेगा, तू अदृश्य रूप में भारत की समुद्री सीमाओं का रक्षक बनेगा। जो भी इस संस्कृति को नष्ट करने के उद्देश्य से इन लहरों को पार करेगा, उसे तेरी शक्ति का सामना करना होगा।"

तभी आकाशवाणी सी हुई या शायद यह उनकी अंतरात्मा की आवाज़ थी: "गोमट! तुम्हारा कार्य पूर्ण हुआ।"

चामुंडराय धीरे-धीरे समुद्र की लहरों की ओर बढ़े। उनके पैर पानी में थे।

सारथी: (घबराकर) "स्वामी! आप कहाँ जा रहे हैं? जल बहुत गहरा है!"

चामुंडराय: (मुड़कर देखते हुए, मुख पर एक दैवीय शांति के साथ) "मिट्टी मिट्टी में मिल रही है, जल जल में। राजा राचमल्ल ने राज्य संभाला, मैंने ईश्वर को पत्थर में जीवित किया। अब समय है कि 'गोमट' स्वयं उस अनंत में विलीन हो जाए। याद रखना, जब तक श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर मुस्कुरा रहे हैं, भारत का मस्तक झुक नहीं सकता। और जब तक गोमांतक के इस तट पर यह अदृश्य स्तंभ खड़ा है, समुद्र की लहरें हमारी संस्कृति को डुबो नहीं पाएंगी।"

उपसंहार: अमर विरासत

इतिहास गवाह है कि उसके बाद चामुंडराय फिर कभी किसी राजदरबार में नहीं देखे गए। कुछ कहते हैं उन्होंने जल समाधि ली, कुछ कहते हैं वे तपस्या के लिए हिमालय की कंदराओं में चले गए। लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।

विंध्यगिरी पर खड़े भगवान गोमतेश्वर आज भी हज़ारों वर्षों से बिना हिले-डुले खड़े हैं, जो दुनिया को सिखाते हैं कि त्याग ही सबसे बड़ी विजय है। और गोमांतक के उस तट पर, आज भी नाविकों और मछुआरों को कभी-कभी आधी रात में एक दिव्य प्रकाश दिखाई देता है—वह अंतिम स्तंभ, जो आज भी भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा कर रहा है।

राजा राचमल्ल और महाबली चामुंडराय—एक ने भूगोल की रक्षा की, दूसरे ने संस्कृति की रचना की। इतिहास के पन्नों में यह गाथा स्वर्ण अक्षरों में नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की चेतना में अंकित हो गई।

क्रमशः