कहते है दुनियां हर पल एक इतिहास रचती है। हर नई चीज टाइम के साथ बदल जाती है। और पुरानी हो जाती है।
ये बात बहुत सही भी है।आज टाइम के साथ लगभग हर चीज बदल चुकी है। बहुत बार याद आता है ये बदलाव हर जगह के लिए शायद मुमकिन नहीं है।
क्या परिवर्तन केवल शहरों के लिए है ?
क्या शिक्षा केवल शहर की महिलाओं के लिए है?
क्या ये बदलाव किसी गांव या एक कस्बे के लिए नहीं है?
आज भी दौसा के उन गलियों मे मैने जातिवाद पलता देखा। आज भी दौसा की हर गली में एक औरत काम करके आने के बाद अपने ही घर में अपने पति से मार खाती है। और हर सुबह वही औरत घर से बाहर निकल कर अपने चरित्र का प्रमाण मोहल्ले की औरतों के मुंह से सुनती है। ओर उस चरित्र प्रमाण पत्र का कारण उसका घर से बाहर निकाल कर अपने परिवार के लिए कमाना है। जिसका कारण उसके बच्चे है, जिनके पेट की पूर्ति के लिए वह घर से बाहर काम करने जाती है।
और वह पति जो पूरे दिन घर में बैठ कर अपने दोस्तों के साथ शराब पीता है और अगले दिन शराब के पैसों का इंतजाम न होने के कारण अपनी पत्नी से मारपीट करता है। समझ नहीं आता क्या सोच कर घर की बहु को लक्ष्मी की उपाधि से विभूषित किया गया था।
जब मंदिर में जाकर देखो तो एक मूर्ति पर दर्जनों मालाएं सजी दिखेंगी और घर में देखने के बाद एक लक्ष्मी के गालों पर तमाचे सजे मिलेंगे पर गलती इसमें मर्दों की नहीं इस जगह की महिलाओं की है ,जो अपने हक के लिए खड़ी नहीं होती बल्कि दूसरी औरत का चरित्र का प्रमाण पत्र तैयार करती है। यहां औरतों को आजादी तो चाहिए लेकिन लेकिन शिक्षा के लिए नहीं गैर मर्दों से बात कारण के लिए, रात में बाहर घूमने के लिए।
समझ नहीं आता इस स्थिति का जिम्मेदार किसे ठहराया जाए ,किसी महिला को या किसी आदमी को, या इस बदलते समय को जो ना तो महिलाओं की गिरी हुई सोच को उठा पा रहा है न पुरुषों की दकियानूसी सोच को बदल पा रहा है।
जहां एक तरफ बड़े शहरों की औरतों को घर से बाहर घूमने फिरने के लिए किसी तरह की परमिशन की जरूरत नहीं होती, बड़े शहरों की लड़कियों को पढ़ने के लिए दूसरे शहर ही नहीं बल्कि दूसरे देश में भेज दिया जाता है।वही गांव की लड़की को आज भी शाम को देर तक बाजार में नहीं भेजा जाता बाजार तो शायद दूर की बात यहां तो एक लड़की को अपने ही घर की छत पर घूमने में पाबंदी लगाई जाती है। और इसकी वजह क्या समझी जाए आदमियों की गंदी नजर या फिर माता पिता को अपनी परवरिश पर भरोसा नहीं रह जाता ।
जब भी किसी लड़की से ये बात की जाए तो वो इसे अपनी किस्मत बता कर टाल देती है हम इसे बदल सकते है, अगर बिना दूसरी लड़की को नीचा दिखाए खुद को उठाने की कोशिश करे और मां बाप अपनी बेटी को पराया धन न समझ कर अपनी जिंदगी का सहारा समझे।
बेटी भी बुढ़ापे की लाठी बन सकती है। बस जरूरत है तो दो चीजों की एक विश्वास ओर दूसरी उसे उड़ान भरने की समझ देना ।