duel in Hindi Adventure Stories by Arijit Bhattacharya books and stories PDF | द्वंद्व

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द्वंद्व

सभामध्य में विराजमान वीरशिरोमणि अजमेर और दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान—चौहान वंश के कुलगौरव। पृथ्वीराज सिंहासन पर बैठे मृदु-मृदु मुस्कुरा रहे हैं और अपने सभासदों की ओर नजर दौड़ा रहे हैं। तराइन की विजय के बाद पहली राजसभा की बैठक।

ताबरहिंद दुर्ग से कुछ दूरी पर एक अस्थायी छाउनी लगाई गई है। बाहर से हू-हू करती ठंडी हवा अंदर महल में प्रवेश कर रही है। इस सर्दी ने उन्हें मुहम्मद घोरी के विरुद्ध विजय प्राप्त करने में कई प्रकार से सहायता की, यद्यपि सर्दी की मार चौहानों को भी कुछ कम नहीं सहनी पड़ी।

सभाकवि चंद बरदाई, जिनकी भाषा झरने के समान है, वे इस विजय पर एक कविता रच रहे हैं चुपचाप बैठे। जब वे मग्न होते हैं, तब स्वयं पृथ्वीराज भी अपने इस बाल्यसखा को परेशान नहीं करते।
तोमर राजकुमार वीर गोविंद राय और सम्राट के मामा भुवनैकमल्ल एक ओर विराजमान हैं; उनके चेहरे पर चिंता की स्पष्ट छाप है।
“मातुल भुवनैकमल्ल, आपको इतना चिंतित क्यों दिखाई दे रहा है? अब तो उत्सव का दिन है।” — पृथ्वीराज भुवनैकमल्ल की ओर देखकर पूछते हैं।
“सम्राट, यह बहुत गर्व एवं आनंद की बात है कि हमने अपने एक भयंकर शत्रु पर विजय प्राप्त की है। किंतु यदि आप ध्यान दें, तो घोरी हमारे हाथों से बच निकला। उसे वीर गोविंद राय ने बहुत दूर तक पीछा किया, फिर भी दुख की बात है कि उसे पकड़ नहीं सका।”

सम्राट कुछ क्षण चुप रहे, क्या सोचते रहे, फिर धीरे-धीरे गंभीर स्वर में बोले — “गोविंद राय सच्चा वीर है। चौहान वंश के साथ तोमर वंश का मान आज उसने और बढ़ाया है और सुसंस्कार स्थापित करने में उसने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। उसकी इस कृति को यद्यपि धन या किसी चीज से मोल नहीं लिया जा सकता, तथापि उसके पुरस्कारस्वरूप मैं उसे स्वर्ण मुद्राओं से लाद देना चाहता हूँ।”

गोविंद राय तलवार हाथ में लिए घोरी के साथ युद्धरत थे, परिणामस्वरूप उनके सामने के दो दाँत टूट गए, किंतु वीर गोविंद राय ने भी प्रत्याघात में घोरी की पीठ पर ऐसा प्रहार किया कि वह घाव बहुत दिनों तक उसका निशान छोड़ जाएगा।
गोविंद राय के मुँह पर लेप लगा हुआ है और रुमाल से बंधा हुआ है, फिर भी वे सभाकक्ष में उपस्थित हैं। वे धीरे-धीरे अपना विचार व्यक्त करते हैं—
“सम्राट, मैंने तो बस अपना क्षत्रिय धर्म निभाया है, इससे अधिक कुछ भी नहीं। और आपकी कृपादृष्टि मुझ पर है, इसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ। किंतु सम्राट, मेरी चिंता कुछ और विषय में है।”
“निःसंकोच कहो, गोविंद राय।” — सम्राट ने कहा।
“सम्राट, हम जो समय अभी ताबरहिंद दुर्ग के घेरे में व्यतीत कर रहे हैं, उससे बेहतर होगा यदि हम पराजित घोरी के पीछे लगकर अफगानिस्तान की ओर बढ़ें, तो मुझे लगता है कि यह उचित कार्य होगा।”
“हुम्मम, किंतु पश्चिमी पंजाब से दूसरा राज्य प्रारंभ होता है। वहाँ यदि हम अभियान चलाएँ, तो हमें बहुत-सी प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ेगा। और ताबरहिंद दुर्ग को छोड़ देने से घोरियों के लिए पुनः आक्रमण का मार्ग सरल हो जाएगा। यही मेरा मत है।”

पर्दा हटाकर सेनाप्रमुख करण सिंह का प्रवेश। सबकी नजरें आगंतुक की ओर।
“कोई नया समाचार, सेनाप्रमुख?” — भुवनैकमल्ल का प्रश्न।
“हम आवश्यकतानुसार रसद संग्रह कर रहे हैं, क्योंकि दुर्ग को कितने दिनों तक घेरना पड़ेगा, इसका कोई निश्चित समय बताना बहुत कठिन है। और यह मौसम भी हमारी सेना के लिए उतना अनुकूल नहीं लग रहा है।”

सब कुछ क्षण चुप। सब निस्तब्ध।
“सम्राट, मेरी तराइन की विजय पर रचना तैयार है। यदि आज्ञा दें, तो मैं उसे सबके समक्ष पढ़ दूँ?”
“हाँ, चंद, सुनाओ। सबके भारी मन में थोड़ी-सी शक्ति का संचार हो।”
चंद बरदाई ने अपने उदात्त कंठ से भावुकता के साथ पाठ आरंभ किया।
उनकी आवाज सभामध्य में गूँज रही है, और सब मग्न होकर उसे सुन रहे हैं। किंतु प्रत्येक के मन में, विजय की आनंद के पीछे, आने वाले दिनों की अज्ञात छाया लेकर मौन चिंता घूम रही है।