“मैं सिनेमा जा रही हूं,”गली के नुक्कड़ पर उस बुद्धवार जैसे ही मां अपने झोलों के साथ प्रकट हुईं,अपनी साइकल पर सवार हो कर अगले ही पल मैं उन के पास पहुंच ली।
हर बुद्धवार को मेरा सिनेमा देखना लगभग तय रहता।
हमारे कस्बापुर के तीनों हाल उस दिन अपने मैटिनी शो को लेडीज़ शो के रूप में आयोजित करते और टिकट भी आधे दाम पर रखते।
इधर मां लखनऊ से कस्बापुर पहुंचती, उधर मैं अपनी फ़िल्म देखने निकल पड़ती।
पिछले वर्ष से मां ने अपनी नर्सिंग में मिली तरक्की के अंतर्गत कस्बापुर छोड़ कर लखनऊ के अस्पताल में काम शुरू कर रखा था।
यहां से पचासी किलोमीटर दूर।
सप्ताह में बृहस्पतिवार की जो एक छुट्टी मिलती तो वह बुद्धवार की अपनी छः से डेढ़ तक की अपनी मार्निंग ड्यूटी खत्म करने के बाद लखनऊ के लिए चल देतीं और तीन साढ़े तीन बजे तक घर पहुंच जातीं।
पिछले चौदह महीनों से मां के इस नियम में कभी विघ्न नहीं पड़ा था।
न बारिश में, न ओले में, न सर्दी में, न गर्मी में, न खांसी में, न बुखार में।
“पहले घर चल,” मां ने अपने हाथ का बड़ा झोला मेरे साइकल के कैरियर पर लगा दिया, “तेरा हरा स्वैटर तैयार कर लाई हूं।”
लखनऊ से मां हमेशा भरी बाहों के साथ लौटतीं।
लखनऊ के अपने खाली घंटों में अपने हाथ से तैयार की गई घर की सज्जा- सामग्री अथवा हमारे पहनने के लिए हमारे ‘हैंडमेड रेडी- टु- वियर’ तो लाती हीं, साथ में लखनऊ के विभिन्न बाज़ारों से भी विशिष्ट खाद्य पदार्थ अवश्य लिवातीं।
कभी रेवड़ी व गुड़ की गच्चक तो कभी ढोकला और छोटे समोसे।
अपनी तनख्वाह वाले पहले बुद्धवार को लाल पेड़े लाना तो उनके लिए अनिवार्य ही रहता।
“मुझे सिनेमा जाना है,” मैं ने कहा। हालांकि अपने उस स्वैटर को तैयार अवस्था में देखने और पहनने की मैं उत्सुक रही थी।उस स्वैटर की डबल निट की ऊन और डिज़ाइन मेरी ही फ़रमाइश पर पिछले सप्ताह मां इधर कस्बापुर से ले कर गईं थीं।
“अभी तो नहीं। मैं लौट कर देखती हूं।उधर उमा और रेणु मेरी टिकट लेकर सिनेमाहाल के बाहर मेरी राह देख रही होंगी। वे तभी अंदर जांएगी जब मैं वहां पहुचूंगी…..”
“हर हफ़्ते तेरा फ़िल्म देखना ज़रूरी है क्या?” मां ने त्योरी चढ़ाई।
“यह फ़िल्म तो मुझे ज़रूर देखनी है,” मैं ने कहा।
स्कूल की मेरी नवमीं कक्षा की सभी लड़कियां इस की दोनों नायिकाओं के परिधान और केश- विन्यास की बात करती अघातीं न थीं और उन की बात में शरीक होने की मुझे जल्दी थी।
“आज उस का आखिरी दिन है,” मैं अड़ गई, “मुझे जाना है।”
हमारे कस्बापुर में फ़िल्में बृहस्पतिवार के दिन बदली जातीं थीं।
“नहीं,” मां अपने चेहरे पर वह बिगाड़ ले आयीं जो अपनी ढिठाई दिखाते समय वह लाया करतीं, “आज तू नहीं जाएगी।”
जी में आया मां का कहा उसी समय बेकहा कर दूं । उन का झोला वहीं गली में पटक दूं। और अपनी साइकल मोड़ कर सिनेमाहाल की सड़क पकड़ लूं, लेकिन मां का गुस्सा अकेले झेल पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। वह गुस्सा तानतीं तो उस का फैलाव पूरे घर पर प्रतिपादित करतीं। कई- कई दिन।
“मैं बाबूजी से पूछ कर चली जाऊंगी,”मां को वहीं गली में छोड़ कर मैं साइकल पर सवार हो ली।
“बाबूूजी,” अपनी साइकिल रसोई की दीवार से टिका कर मैं सीधी सीढ़ियों की ओर लपक ली।
कस्बापुर के इस नए बस-अड्डे वाले इस इलाके में बाबूजी ने अपना यह मकान पांच साल पहले बनवाया था। नीचे दो कमरों के साथ एक रसोई और ऊपर खुली छत पर अपना कमरा।
पैंतीस वर्ष की आयु में सूबेदार मेजर के पद से बाबूूजी ने स्वैच्छिक सेवा- निवृत्ति उसी वर्ष ली थी। और अब उन का अधिकांश समय वहीं अपने कमरे में बीतता था। केवल उन्हीं दिनों वह नीचे बैठक में सोने आते जिन दिनों मां लखनऊ में रहतीं।
पिछले दो वर्ष से वह अपने उपन्यास पर काम कर रहे थे।
“मां मुझे आज सिनेमा नहीं जाने दे रहीं,” बाबूजी की मेज़ पर पहुंचते ही मैं रो पड़ी।
“बुलाओ उसे,” बाबूजी ने अपना रजिस्टर बंद कर दिया और अपने हाथ की कलम कलम- दान में टिका दी।
“मां,” मैं चिल्लाई, “बाबूजी तुम्हें ऊपर बुला रहे हैं।”
“मैं चाय बना रही हूं अभी,” घर में दाखिल होते ही मां रसोई में घुस जातीं।
“मेरी फ़िल्म चार बजे शुरू हो जाएगी,” मैं अधीर हो उठी, “और तीन चालीस हो गया है…..”
“पद्मा,” बाबूजी ने मां को आवाज़ दी।
“आ रही हूं,” लाल पेड़ों की एक तश्तरी के साथ मां ऊपर आ गईं।
“इसे फ़िल्म देख लेने दो,पद्मा,” बाबूजी ने एक पेड़ा ले कर तश्तरी मेरी ओर बढ़ा दी, “पहले यह तो ले लो।”
मिठाई में हम पिता- पुत्री को लाल पेड़े सर्वाधिक पसंद थे।
“मैं लौट कर खाऊंगी। अभी मुझे अपनी फ़िल्म देखनी है,” रोंआसी हो कर उन के हाथ की तश्तरी मैं ने उन की मेज़ पर धर दी ।
“क्यों?” मां ने पूछा।
“क्योंकि हफ़्ते में छः दिन मैं आठों पहर आप के काम करती हूं।और सातवें दिन छुट्टी मनाना चाहती हूं,” मैं ने जवाब दिया। उन की चुनौती के जवाब में।
“पद्मा के सारे काम?” मां की ओर देख कर बाबूजी हंसे।
“और नहीं तो क्या?” मैं चिढ़ गई, “मैं ही जानती हूं मेरे दिन कैसे कटते हैं।आप खुद तो मनीष और सतीश की आधी बात नहीं पूछते। उल्टे उन के होम- वर्क और उन के टिफ़िन के समय अपनी चाय या नींबू- शर्बत का आर्डर देने लगते हैं…..”
“बड़ी नहीं तू?” मां चीखीं, “लड़की नहीं तू? क्या चाहती है तू? तेरे बाबूजी रसोई करें? या चौदह साल का मनीष रसोई करे? या फिर बारह साल का सतीश?”
“बड़ी तो मैं हूं ही,” मां के अंदाज़ में मैं ने अपना माथा पीटा – मां जब भी गुस्से में होतीं, आवेश में अपना माथा पीटा करतीं– “अकेेली बड़ी हूं? मेरे साथ की वे लड़कियां बड़ी नहीं हैं? जो दिन भर घूमती हैं? नए- नए कपड़े बनवाती हैं ? एक ही फ़िल्म तीन- तीन बार देखती हैं ?”
“मुन्नी,” बाबूजी ने मेरे हाथ दबोच लिए। बाबूजी का कद मुझ से डयोढ़ा बड़ा है और उनकी काठी मुझ से दुगुनी तगड़ी।
“कैसे अबड़- धबड़ बोलती है,”
मां ने मेरा कंधा झिंझोड़ा, “यह नहीं सोचती अगले ही साल इस का दसवीं के बोर्ड का इम्तिहान है और इसे घर बैठ कर पढ़ाई करनी चाहिए…..”
“आप को मुझे पढ़ाई ही करानी होती तो आप कस्बापुर छोड़ कर लखनऊ नहीं चली जातीं। आप के कस्बापुर छोड़ने के हक में तो बाबूजी भी न थे!....”
“लखनऊ मैं अपना वक्त बर्बाद करने गई हूं क्या?” मां ने अपने हाथ नचाए,“या इस घर के लिए ढाई हज़ार की अतिरिक्त वसूली करने?”
“छोड़ो उस पुरानी बहस को, पद्मा,” बाबूजी ने मेरे हाथ मुक्त कर दिए, “मुन्नी को फ़िल्म के लिए जाने दो।”
“ठीक है,जाए,” मां ने हथियार डाल दिए।
मैं ने उन्हें ठीक घेरा था।
हंस कर मैं ने अपने आंसू पोंछे और सीढ़ियों की ओर बढ़ ली।
“लड़की की ज़ुबान बहुत चलती है,” मां ने कहा।
“तुम्हारी तरह?” बाबूजी का उत्तर सीढ़ियों पर मेरे साथ उतरा, “लखनऊ जाने के लिए तुम ने क्या कम ज़ुबान चलाई थी? कम माथा पीटा था? आज़ादी और गुलामी की कम व्याख्याएं दी थीं?”
“अब जा रही हो?” दरवाज़े पर मुझे मनीष और सतीश मिले। उन का स्कूल दो बजे छूटता था, किंतु अपनी ट्यूशनों की वजह से वे घर पौने चार बजे के आसपास ही पहुंचते थे।
“हां,” मैं दोबारा हंसी और अपनी साइकल सिनेमाहाल की दिशा में भगाने लगी।