अगले दिन शाम को
पुराने स्पोर्ट्स ग्राउंड की बाउंड्री वॉल के पास
आर्यन के दोस्त जमा थे—
रघु, अमन और तीन–चार और लड़के।
हवा ठंडी थी,
माहौल अजीब-सी बेचैनी से भरा।
सबके चेहरों पर तनाव था—
जैसे कोई बड़ा फैसला लेना हो।
रघु ने सिगरेट बुझाई,
चुप्पी तोड़ते हुए बोला—
“यार… कल रात देखा न?
आर्यन घंटों हॉस्टल के बाहर खड़ा था।”
अमन ने सिर हिलाया—
उसकी आँखों में चिंता थी।
“हाँ… वह आर्यन नहीं था।
वह कोई और आदमी था—
पज़ेसिव, पागल, डरावना।”
एक और दोस्त बोला—
“कार्तिक ने इसे क्या बना दिया है?”
रघु ने तुरंत पलटकर कहा—
“गलती कार्तिक की नहीं…
गलती उस रात की है।”
अमन ने आँखें तरेरीं—
“कौनसी रात?”
रघु ने धीमे स्वर में जवाब दिया—
“जिसके बाद से आर्यन कार्तिक पर पागल हो गया है।”
लड़के एक-दूसरे को देखते रहे—
कुछ सहानुभूति,
कुछ डर,
और बहुत सारा गुस्सा लिए।
अमन ने बूट से जमीन पर पत्थर किक मारा।
“हमें कुछ करना पड़ेगा।”
सब चुप हो गए।
रघु ने आँखें संकरी कर कहा—
“अगर कार्तिक यहाँ रहा…
तो आर्यन का दिमाग पूरी तरह खराब हो जाएगा।
वह हमारी सुनना भी छोड़ देगा।”
एक लड़के ने कहा—
“वह अब हम पर भरोसा भी कम कर रहा है…
सिर्फ़ कार्तिक पर।”
दूसरा बोला—
“और अगर वह कार्तिक के लिए हमसे भिड़ गया तो?”
यह सवाल
हवा में भारी होकर लटक गया।
अमन ने कड़वी आवाज़ में कहा—
“तो?
क्या हम बैठे रहेंगे?
एक लड़का आकर हमारी पूरी गैंग तोड़ देगा?”
रघु ने होंठ दबाकर कहा—
“मैं नहीं चाहता कि आर्यन हमसे दूर हो।
वो हमारे साथ बचपन से है…
और अब एक नया लड़का उसकी दुनिया हिला रहा है।”
एक और दोस्त फुसफुसाया—
“हम कुछ करेंगे…
पर चुपचाप।”
अमन की आँखों में एक खतरनाक चमक उभरी।
“हाँ…
कार्तिक को हमारी गैंग को दूर से सलाम करना चाहिए।
पास नहीं आना चाहिए।”
रघु ने कहा—
“उसे डराना पड़ेगा…
या जितना जरूरी हो,
उतना ‘संदेशा’ देना पड़ेगा।”
उनकी बातें
हिंसा नहीं थीं,
पर धमकी, घुटन, और अंधेरी नीयतों से भरी थीं।
वे कार्तिक को चोट पहुँचाने की बातें नहीं कर रहे थे—
पर उनका हर वाक्य
उसी दिशा की ओर इशारा कर रहा था।
उन्हें पता नहीं था
कि दूर पेड़ के पीछे
खड़ा एक लड़का
यह सब सुन रहा था।
वह कार्तिक नहीं था।
पर पास का एक स्टूडेंट
जिसने इन्हें पहचान लिया था—
और उसके चेहरे पर केवल एक भय था:
अगली सुबह
.................
यूनिवर्सिटी के गलियारों में हलकी धूप बिखरी थी।
स्टूडेंट्स हँसते-बोलते घूम रहे थे,
क्लास बदलने की घंटी बजने वाली थी।
लेकिन कार्तिक…
आज बहुत अलग था।
वह धीमे कदमों से चल रहा था,
नज़रें ज़मीन पर,
हाथ अपनी शर्ट की आस्तीन को बार-बार मोड़ते हुए—
जैसे उसकी उँगलियाँ बेचैन हों,
और उसका मन कहीं अटका हो।
भले ही अंदर उसका दिमाग़
आर्यन को तोड़ने की नई योजनाएँ बना रहा था…
पर बाहर का कार्तिक सिर्फ़ एक ही चेहरा दिखा रहा था—
“डरा हुआ, कमजोर, और टूटता लड़का।”
जैसे ही वह कैंटीन के पास पहुँचा,
आर्यन पहले से वहाँ खड़ा था—
दीवार से टिककर,
सिगरेट जलाए बिना उँगलियों में पकड़े हुए।
वो कार्तिक को आते ही देख चुका था।
उसकी आँखों में
एक अजीब-सी नरमी आई—
नहीं, नरमी नहीं…
कब्ज़े की खुशी।
वह तुरंत सीधा हुआ।
“तुम रात ठीक से सोए?”
उसकी आवाज़ में एक अधिकार भरा था—
ऐसा अधिकार जो सिर्फ़ मालिक जताते हैं।
कार्तिक हल्की दबी मुस्कान लाया,
लेकिन बहुत शर्माई हुई।
उसने आँखें उठाई भी नहीं।
“मैं… कोशिश की…”
यह जवाब सुनते ही
आर्यन के दिल में एक अंधेरा-सा संतोष भर गया।
“मेरी वजह से नींद नहीं आई,
है न?”
उसने थोड़ा और झुककर पूछा।
कार्तिक की साँस रुक गई—
पर यह रुकना अभिनय था।
नाज़ुक सा,
डरा हुआ सा।
“हूँ… शायद… थोड़ी…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी—
इतनी कि कोई भी उसे वास्तविक समझ ले।
आर्यन मुस्कुराया।
खतरनाक मुस्कान।
“फिक्र मत किया करो।
मैं हूँ न।”
यह कहते हुए
उसने कार्तिक के बैकपैक की स्ट्रैप
हल्के-से पकड़ ली—
जैसे उसे अपने पास खींचना चाहता हो।
उसी समय
आर्यन के दोस्त भी आए।
अमन ने कार्तिक को देखते ही सोचा—
“ये?
ये इतना सादा, इतना डरपोक लड़का?
ये तो आर्यन के सामने बोल भी नहीं पा रहा!”
रघु ने मन में गहरी राहत महसूस की—
“यह कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता…
आर्यन बस ज्यादा जुड़ गया है।
लड़का तो सीधा-साधा है।”
उनकी आँखों में घिनौनी योजनाएँ
धीरे-धीरे धुँधली पड़ने लगीं—
क्योंकि अब उन्हें दिख रहा था
कि कार्तिक कमजोर है,
टूटा हुआ है,
और खतरा नहीं है।
उसी समय
आर्यन ने सबके सामने
कार्तिक की कलाई पकड़कर कहा—
“चलो, आज साथ में क्लास चलते हैं।”
उसकी आवाज़ में
सिर्फ़ प्यार नहीं था…
बल्कि एक बेचैन, पागल हक़ था।
कार्तिक ने अभिनय पूरी संवेदनशीलता से किया—
नज़रें नीचे, गालों पर हल्की लाली,
और आवाज़ बहुत धीमी:
“ठीक है… अगर तुम कहो तो…”
यह “अगर तुम कहो तो”
आर्यन के लिए सबसे बड़ा नशा बन गया।
उसके भीतर की पज़ेसिवनेस
अब पागलपन की हद छूने लगी।
दोस्तों ने एक-दूसरे को देखा—
“भाई…
कार्तिक इससे डरता है,
बचता है…
और मान भी जाता है।
ये तो हमारे लिए खतरा ही नहीं।”
......……....
क्लासरूम में हल्का शोर था।
स्टूडेंट्स अपनी-अपनी सीट ढूँढ रहे थे,
कोई नोट्स निकाल रहा था,
कोई पिछली बेंच पर हँस रहा था।
आर्यन सबसे पहले अंदर आया।
सीधा बीच की रो में,
वहाँ जहाँ सबकी नज़र जाती है।
उसने बैग रखा—
और पलटकर देखा।
कार्तिक अभी खड़ा था।
आर्यन की भौंहें सिकुड़ीं।
उसने बिना आवाज़ के हाथ से इशारा किया—
“यहाँ।”
कार्तिक एक पल को रुका।
उसकी नज़रें चारों ओर घूमीं—
जैसे उसे डर हो कि कोई देख रहा है।
फिर वह चुपचाप आकर
आर्यन के बगल वाली सीट पर बैठ गया।
यह छोटा-सा दृश्य था,
पर क्लास में कई नज़रों ने इसे पकड़ लिया।
पीछे बैठा एक लड़का फुसफुसाया—
“यार… आर्यन तो ऐसे बैठा रहा है
जैसे कार्तिक उसकी ज़िम्मेदारी हो।”
दूसरे ने कहा—
“या उसकी चीज़।”
लेक्चर शुरू हुआ।
प्रोफेसर बोर्ड पर लिख रहे थे।
कार्तिक नोट्स निकालने लगा—
हाथ हल्के काँपते हुए,
पेन थोड़ा फिसलता हुआ।
आर्यन ने यह देखा।
उसके चेहरे पर वही संतोष आया
जो किसी को कमज़ोर देख कर आता है।
उसने धीरे से कहा—
“आराम से लिखो।
अगर समझ न आए तो मैं हूँ।”
कार्तिक ने सिर झुकाकर
बहुत धीमे से कहा—
“ठीक है…”
और लिखने लगा।
आर्यन उसकी तरफ देख रहा था।
कभी यह देखने के लिए कि वह वहीं है या नहीं,
कभी यह देखने के लिए कि वह किसी और से बात तो नहीं कर रहा।
जब कार्तिक ने
पीछे बैठे स्टूडेंट से पेन माँगा,
आर्यन का जबड़ा कस गया।
उसने तुरंत अपना पेन आगे बढ़ाया—
थोड़ा ज़ोर से।
“मुझसे पूछना था।”
आवाज़ धीमी थी,
पर उसमें गुस्सा छिपा नहीं था।
कार्तिक ने झेंपते हुए कहा—
“सॉरी… मुझे लगा—”
“मत लगाओ,”
आर्यन ने बीच में ही कहा।
“मैं यहाँ हूँ।”
यही वह पल था
जब कार्तिक को
सच साफ़ दिख गया।
आर्यन ताक़तवर नहीं था।
वह डरा हुआ था।
डरा हुआ कि कार्तिक उसे छोड़ न दे।
डरा हुआ कि उसका “कब्ज़ा” ढीला न पड़ जाए।
डरा हुआ कि जिसे वह जीत समझ रहा है
वह हाथ से फिसल न जाए।
कार्तिक के अंदर
कुछ ठंडा-सा मुस्कुराया।
“यही है तेरी कमजोरी, आर्यन,”
उसने मन ही मन कहा।
“तू मुझे खोने से डरता है।
और मैं इसी डर से
तुझे तोड़ूँगा।”
लेक्चर खत्म हुआ।
स्टूडेंट्स उठने लगे।
आर्यन तुरंत खड़ा हुआ
और कार्तिक के सामने आकर बोला—
“लंच साथ में।”
यह सवाल नहीं था।
यह आदेश था।
कार्तिक ने पलभर को हिचकिचाया—
फिर वही अभिनय।
धीमी आवाज़,
थोड़ा डर,
थोड़ी शर्म।
“अगर तुम चाहो तो…”
आर्यन मुस्कुराया।
उसने दोस्तों की तरफ देखा—
मानो कह रहा हो:
“देखा?
यह मेरा है।”
दोस्तों ने अब विरोध नहीं किया।
उनके दिमाग़ में कार्तिक
पूरी तरह “कमज़ोर” साबित हो चुका था।
और इसी भरोसे में—
उन्हें पता भी नहीं चला
कि उन्होंने अपनी सबसे बड़ी गलती कर दी है।