PURANI HAVELI KA RAAZ - 3 in Hindi Horror Stories by smita books and stories PDF | पुरानी हवेली का राज - 3

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पुरानी हवेली का राज - 3

28 साल पहले, एक गाँव में यशवंत प्रताप सिंह नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह अत्यंत अमीर था, पैसों की उसे कोई कमी नहीं थी। लेकिन करोड़ों की दौलत होने के बावजूद भी उसके भीतर धन का लोभ भरा हुआ था। दरअसल, यशवंत उसी भव्य हवेली का मालिक था। हवेली में नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी। यशवंत के परिवार में केवल उसकी पत्नी और एक छोटा सा बच्चा था।यशवंत प्रताप काले जादू और तंत्र-मंत्र में गहरा विश्वास रखता था। उसे डर रहता था कि कहीं उसकी दौलत और हवेली को किसी की नज़र न लग जाए, इसलिए वह हमेशा तांत्रिकों को बुलवाकर तरह-तरह के टोटके करवाता रहता था। उसकी पत्नी को यह सब बिल्कुल भी पसंद नहीं था, लेकिन जब भी वह यशवंत को समझाने की कोशिश करती, वह उसे जानवरों की तरह मारता-पीटता। उसे बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई उसके काम में बाधा बने।एक दिन अचानक उसकी तबीयत खराब रहने लगी। हज़ारों तरह की जड़ी-बूटियाँ और अंग्रेज़ी दवाइयाँ आज़माईं गईं, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। तब एक दिन वह एक तांत्रिक के पास गया और अपनी सारी परेशानी उसे बता दी। तांत्रिक ने कहा,“तेरी अचानक बिगड़ती तबीयत इस बात का संकेत है कि तेरी हवेली पर कोई काला साया मंडरा रहा है। इसका केवल एक ही इलाज है—किसी बच्चे के खून की बलि।”यशवंत और उस तांत्रिक का अंधविश्वास था कि यदि किसी छोटे बच्चे की बलि चढ़ा दी जाए, तो हवेली का मालिक हमेशा के लिए अमर हो जाएगा और कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर पाएगा। अमर होने का यह अंधविश्वास यशवंत के सिर पर इस कदर सवार हो गया कि उसने अपने ही बच्चे की बलि देने का फैसला कर लिया।जब यह बात यशवंत की पत्नी मीरा को पता चली कि उसके बच्चे को इस अनुष्ठान का हिस्सा बनाया जाने वाला है, तो वह अपने बच्चे को लेकर हवेली से भागने की कोशिश करने लगी। लेकिन हवेली के दरवाज़े अपने आप बंद हो गए। अनुष्ठान करने वालों ने मीरा को पकड़ लिया। मीरा चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन यशवंत के सिर पर अमरता का खून सवार था।अनुष्ठान शुरू हुआ। मीरा चीखते हुए बोली, “आरव, भाग जाओ!”लेकिन आरव बहुत छोटा था, उसे कुछ समझ नहीं आया। अपनी माँ की हालत देखकर वह बस रोता रहा। तभी मीरा ने अपने खून से ज़मीन पर एक रेखा खींची और आरव को बाहर की ओर धक्का दे दिया। अनुष्ठान के बीच आरव के न होने के कारण अनुष्ठान अधूरा रह गया और हवेली पर श्राप लग गया। उस कमरे में मौजूद सभी लोगों की आत्माएँ वहीं क़ैद हो गईं।उधर आरव तीन दिनों तक हवेली के बाहर बैठा रोता-बिलखता रहा, अपनी माँ का इंतज़ार करता रहा, लेकिन कोई वापस नहीं आया। जब गाँव वालों ने उस बच्चे को इस हालत में अकेला देखा तो उन्हें उस पर तरस आ गया। वे आरव को अपने साथ ले गए। ताकि उसे अपनी माँ की याद न सताए और बीता हुआ कल उसे परेशान न करे, गाँव वालों ने उसे शहर से बाहर भेज दिया।28 साल बाद, जब आरव वापस लौटा, तो उसे अपने अतीत की कोई याद नहीं थी। लोगों के मुँह से हवेली की बातें सुनकर उसके मन में उसे देखने की इच्छा जाग उठी। जैसे ही वह पहली बार हवेली के पास पहुँचा, माँ ने अपने बच्चे को पहचान लिया।हवेली के भीतर एक डायरी थी, जिसमें सारी बातें अपने आप लिखी जा रही थीं और आरव उन्हें पढ़ता चला गया। उसके कानों में वही रोने और चीखने की आवाज़ें गूँजने लगीं। उसने अपने कान ज़ोर से पकड़ लिए, लेकिन आवाज़ें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। तभी उसकी नज़र एक आकृति पर पड़ी, जो धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी। वह डर गया और काँपते हुए बोला,“आ… आप कौन हो?”तभी उसके पीछे से किसी के फुसफुसाने की आवाज़ आई,“तुम्हारी माँ…”मीरा की आत्मा अब भी आरव की रक्षा कर रही थी, क्योंकि यशवंत की आत्मा हवेली से बाहर निकलना चाहती थी और बाहर आने के लिए उसे किसी जीवित शरीर की ज़रूरत थी। आरव डर गया, लेकिन अब उसे सब कुछ समझ आने लगा।तभी अचानक लाल घेरा ज़ोर से चमका, दीवारें काँपने लगीं, परछाइयाँ चीख उठीं। तभी आरव ने देखा कि डायरी अपने आप लिख रही है—“आरव, शाम होने में कुछ ही समय बाकी है। फिर तुम हमेशा के लिए यहाँ क़ैद हो जाओगे।”डर के मारे आरव ने हवेली से बाहर निकलने की कोशिश की और भागता हुआ हवेली से बाहर आ गया। उसने कहा,“मेरी माँ ने अपनी जान देकर मेरी जान बचाई है, मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता।”उसने उस डायरी को हमेशा के लिए बंद कर दिया और कसम खाई कि वह कभी दोबारा इस हवेली के अंदर नहीं जाएगा।