Eternal love of two states - 1 in Hindi Love Stories by Akshay Tiwari books and stories PDF | दो राज्यों का अमर प्रेम - 1

Featured Books
Categories
Share

दो राज्यों का अमर प्रेम - 1

अध्याय -- 1

दो राज्यों की दुश्मनी, दो दिलों की अनजानी नियति

इतिहास में कुछ युद्ध ऐसे होते हैं जो तलवारों से नहीं,
बल्कि गलतफहमियों से जन्म लेते हैं।
और कुछ शत्रुताएँ ऐसी होती हैं, जो समय के साथ कमज़ोर नहीं होतीं,
बल्कि पीढ़ियों के रक्त में बहने लगती हैं।

पीतमगढ़ और रायगढ़ की शत्रुता भी कुछ ऐसी ही थी।

उत्तर दिशा की ऊँची पहाड़ियों के बीच बसा "पीतमगढ़"
जहाँ किले की दीवारें इतनी मजबूत थीं कि सूरज की किरणें भी अनुमति लेकर भीतर आती थीं।
यह राज्य अनुशासन, सैन्य शक्ति और कठोर निर्णयों के लिए जाना जाता था।
यहाँ भावनाओं से अधिक कर्तव्य को महत्व दिया जाता था।

दक्षिण की हरियाली में फैला "रायगढ़"
जहाँ नदियाँ गीत गाती थीं और महलों की बालकनियों में संगीत बसता था।
यह राज्य कला, सौंदर्य और मानवीय मूल्यों के लिए प्रसिद्ध था।
यहाँ दिल की आवाज़ को भी उतनी ही अहमियत दी जाती थी जितनी राजाज्ञा को।

दोनों राज्य महान थे।
दोनों शक्तिशाली थे।
पर एक-दूसरे के लिए.. असहनीय।

बहुत कम लोग जानते थे कि जिस दुश्मनी ने दो राज्यों को बाँट रखा था, उसकी शुरुआत कभी मित्रता से हुई थी।

पीतमगढ़ के राजा "महाराज देवव्रत" और रायगढ़ के राजा "महाराज वीरसेन"
कभी एक ही गुरुकुल में पढ़े थे।
दोनों ने एक ही गुरु से नीति, शास्त्र और शस्त्र सीखे थे।
एक ही आग के सामने बैठकर भविष्य के सपने देखे थे।

देवव्रत गंभीर थे, कम बोलते थे, पर जो कहते थे उसमें अडिग रहते थे।
वीरसेन हँसमुख थे, भावुक थे, और मित्रता को जीवन से भी ऊपर रखते थे।

गुरुकुल के उस समय में, वे एक-दूसरे को “राजा” नहीं,
बस मित्र कहते थे।

पर सत्ता..
सत्ता मित्रता को भी परीक्षा में डालती है।

गलतफहमी जिसने इतिहास बदल दिया
राज्याभिषेक के कुछ ही वर्षों बाद,
सीमावर्ती क्षेत्र में एक भयानक घटना घटी।
रायगढ़ का एक महत्वपूर्ण किला रातों-रात नष्ट हो गया।
सैकड़ों सैनिक मारे गए।

दरबारियों ने बिना जाँच के दोष पीतमगढ़ पर मढ़ दिया।
एक नकली दस्तावेज़, एक झूठा संदेश,
और कुछ स्वार्थी लोगों की महत्वाकांक्षा,
इतना ही काफी था।

वीरसेन ने देवव्रत को संदेश भेजा।
देवव्रत ने अपमान महसूस किया।
संदेशों की भाषा बदलती गई,
और मित्रता की जगह अहंकार ने ले ली।

जब पहली तलवार उठी,
तब किसी को समझ नहीं आया कि
वह तलवार दो राज्यों के बीच नहीं,
दो दिलों के बीच गिरी थी।

साल बीतते गए।
युद्ध रुकता, फिर शुरू होता।
कभी सीमा पर, कभी जंगलों में, कभी निर्दोष गाँवों में।

इसी युद्धकाल में पीतमगढ़ में जन्म हुआ
 "राजकुमार नील" का।

जब वह पैदा हुआ,
तब महल में शंखनाद नहीं,
प्रजा, पशु, पक्षी सब झूम रहे थे 
मानो जैसे स्वयं नारायण ने जन्म लिया हो।

नील की माँ महारानी "शारदा देवी"
ने पहली बार अपने पुत्र को गोद में लिया,
तो उसकी आँखों में खुशी से ज़्यादा चिंता थी।

“यह बच्चा प्रेम देख पाएगा या सिर्फ युद्ध?”
यह प्रश्न उसके मन में हमेशा के लिए बस गया।

नील बचपन से ही अलग था।
वह तलवार चलाना सीखता,
पर खून देखकर उसकी आँखें झुक जातीं।
वह युद्ध की कहानियाँ सुनता,
पर रात को चुपचाप रोता।

रायगढ़ की प्रेम-रानी, उसी समय,
रायगढ़ के महल में जन्मी एक बालिका 
राजकुमारी "मीनाक्षी"

उसके जन्म पर महल में संगीत गूँजा।
नर्तकियाँ नाचीं।
लोगों ने कहा
“यह बालिका केवल राजकुमारी नहीं,
यह तो प्रेम की प्रतीक है।”

मीनाक्षी बड़ी हुई तो उसकी आँखों में अजीब सी गहराई थी। 
वह युद्ध के घायलों के पास बैठती।
उनके घाव धोती। उनकी कहानियाँ सुनती।

प्रजा उसे प्रेम से प्रेम रानी कहती,
पर कोई नहीं जानता था कि
जिस प्रेम की वह प्रतीक बनेगी,
वही प्रेम उसे सबसे अधिक पीड़ा देगा।

अनजानी नियति की पहली आहट थी,
नील और मीनाक्षी..
दो शत्रु राज्यों के वारिस,
दो अलग दुनिया के बच्चे,
एक-दूसरे के अस्तित्व से अनजान थे।
पर नियति, वह बहुत पहले से
अपनी कहानी लिख चुकी थी।

पीतमगढ़ और रायगढ़ के बीच
एक घना जंगल था।
कहा जाता था कि
वहाँ देवता बसते हैं,
और युद्ध की आवाज़ें वहाँ पहुँचकर
खामोश हो जाती हैं।

वही जंगल एक दिन इतिहास का साक्षी बनेगा।
पर अभी नहीं।
अभी तो यह केवल शुरुआत थी,
दुश्मनी की, युद्ध की, और उस प्रेम की
जिसका नाम तक किसी ने नहीं लिया था।

Next Part Soon.........