[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]
नारी आंदोलन ,स्त्री समानता ,नारी विमर्श ,स्त्री के अधिकार , इन सबकी विभिन्न कलाओं से अभिव्यक्ति, अपना व्यवसाय के अलावा होता है` स्त्रियों की अपने घर परिवार में उनकी अहम भूमिका`। मेरे अभिमत के अनुसार कोई वाद ,कोई विमर्श ,कोई आंदोलन न उसे बदल सकता ,न मातृत्व या ग्रहणी के रोल का कोई पर्याय है जो उसके महत्व व उपयोगिता को कम कर सके । ये बात हर समझदार स्त्री समझती है चाहे उसे दोयम दर्ज़े का नागरिक समझा जाये, चाहे घर पर पड़ी चीज़। स्त्रियां पीढ़ी दर पीढ़ी इस रोल को निबाहती आ रहीं हैं।
बीसवीं सदी के उत्तर्रार्ध से कुछ अधिक मीडिया ,स्वयं सेवी संस्थाओं व सामाजिक संगठनों ने स्त्री को सशक्त होने का ,अपने पैरों पर खड़े होने का संकेत दिया ,प्रोत्साहन दिया।क्या इतना सरल होता है पैरों पर खड़े होना या नौकरी करना ?परिवार ,बच्चों की परवरिश व सामाजिक हदबंदी के ऑक्टोपस में जकड़ी वह कितना संघर्ष करती है , ये उससे जुड़े लोग भी नहीं समझ पाते। अक्सर जब हम किसी भी क्षेत्र की प्रथम शीर्षस्थ पद को तलाशने जायें तो हमारे हाथ में सिर्फ़ कुछ ही स्त्री नाम आएंगे। वैदिक काल के बारे में भ्राँति है कि स्त्री पुरुष समान थे लेकिन वेदों में हज़ार ऋषियों की रची ऋचाओं में नाममात्र की महिलाओं की रची ऋचायें हैं जिन्हें ब्रह्मवादिनी कहा जाता था।
अपने नन्हे को सुरक्षा देता , अपने कोमल हाथों की गिरफ़्त में लिये अपने उत्कट प्रेम की परिभाषा क्या सनातन मातृत्व बदल सकता है ?स्त्री ही समझ सकती है कि उसकी ऊँची उड़ान कितने लोगों की आँखों का ऐसा कांटा बन जाती है कि वे उसमें ही ज़हरीले कांटे चुभा देते हैं। हर समझदार स्त्री अपने पंख कतर कतर कर उड़ान भरती है ,अपनी सफ़लता के कम से कम ढिंढोरे पीटती है.उस पर मातृत्व की ज़िम्मेदारी हो तो अधिकतर पड़ला मातृत्व का ही भारी रहता है।
अपने जीवन की दूसरी पारी जीती आभासी दुनियां में अपने को तलाशती स्त्रियों से जिन्होंने कैरियर में ख़ुद ब्रेक लिया। अपने मातृत्व को सहेजा लेकिन उनके इस बलिदान को कौन समझता है ?
स्त्रियों ने जब घर की देहरी लांघी तो इस रोल व कैरियरिस्ट रोल में टकराव तो होने लगा। कभी किसी को नौकरी का त्याग करना पड़ा और कुछ स्त्रियों ने ब्रेक लिया।कैरियर की तरफ़ वापिस लौटीं तो लगा अपने साथियों से कितना पिछड़ गईं हैं।तो आइये स्त्री कलम से तलाश करते हैं उन गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स की जो परिवार की ज़रूरतें पूरे पूरे करते करते पता नहीं एक स्त्री से कहाँ गुम होते चलते हैं,उसे गुमान भी नहीं होता।
मैंने गुस्ताख़ी की है -बरसों पहले लिखी अपनी लघुकथा `गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स `को क्रमांक में सबसे पहले इसलिये रक्खा है कि इसे पढ़कर नारी की पीड़ा की उन सूक्ष्म से सूक्ष्म भावनाओं को आप सब समझ सकें कि आप स्त्री की किस व्यथा की कहानियां पढ़ने जा रहे हैं।जो वह `घर`नामक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये अपना समय ,अपनी भावनायें ,अपनी प्रगति ,बाहर निकलकर संगी साथियों से मिली ख़ुशियों को कुर्बान कर देती है फिर भी तमगा मिलता है -`घर पर पड़े पड़े क्या रहीं थीं ?`.
ये सम्पादन करने की निरंतर स्थगित हो रही इच्छा को बल मिला अचानक मिले प्रगति गुप्ता जी के फ़ोन से उन्होंने बताया कि उन के पति डॉक्टर थे इसलिए बच्चों के लिए उन्हें अपना मनोवैज्ञानिक चिकत्सा के लिए बनाया अपना क्लीनिक बंद करना पड़ा। सोचिये उस महिला की अपने बच्चों के लिए बलिदान भरी तकलीफ़ जिसके क्लीनिक में चौदह कर्मचारी काम करते हों । मुझे ख़ुशी है मैंने उन्हें प्रेरणा दी कि इस विषय पर कहानी लिखें।
मैंने एफ़ बी की अपनी टाइमलाइन पर इस लघुकथा के साथ इस विषय पर दो बार कहानियां आमंत्रित की थीं। मुझे लगा कि बहुत सी कहानियाँ मुझे मिलेंगी । मेरे पास वरिष्ठ व कनिष्ठ दोनों रचनाकारों के बहुत से फ़ोन, मैसेज एफ़ बी पर ,वॉट्स एप पर आ रहे थे लेकिन बहुत सी रचनाकारों को ग़लतफ़हमी थी कि मैंने ` माँ `पर केंद्रित कहानी आमंत्रित की है।मुझे ख़ुशी है ऐसे चुनौतीपूर्ण विषय की महीन बारीकी को समझकर इस पर कहानियां भेजीं सुप्रसिद्ध संतोष श्रीवास्तव को छोड़कर उन रचनाकारों ने जिन्होंने अभी अभी हिंदी साहित्य में अपनी पहचान बनाई है या बना रहीं हैं। इन सभी को मेरा प्यार भरा हार्दिक आभार कि मैंने जो भी सुझाव देकर इनकी कहानी में बदलाव चाहा इन्होंने बहुत धीरज के साथ वह सुधार करके दिया। किसी किसी ने तो दो बार भी इनमें सुधार करके भेजा। मैंने भी नहीं सोचा था कि गर्भ में संतान धारण करने वाली स्त्री या नर्सरी में दाख़िल करवाने स्त्री से दादी बन जाने तक वाली स्त्री के खोये हुये वजूद , फिर पाने की जद्दोजेहद की दास्तान बन जाएगा ये दुर्लभ कहानियों का संग्रह।
संतोष श्रीवास्तव की कहानी `पद्मश्री `में एक कत्थक डांसर की सफ़लता जानिये -` मृणालिनी राय का कहा सच साबित हुआ। आलोक और देविका ने हिंदू माइथोलॉजी के विषयों को आधार बना खूब मेहनत की और जर्मनी , फ़्राँस ,इंग्लैंड, सिंगापुर, मलेशिया ,हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया में सफ़लतम शो की श्रंखला ही गूंथ दी। भारत में उड़ीसा का कोणार्क मंदिर ,मुंबई की एलिफ़ेंटा केव्स और खजुराहो महोत्सव में नृत्य पेश कर तो जैसे जग ही जीत लिया देविका ने। कामयाबी, शोहरत और समृद्धि उसके कदम चूम रही थी ।`
सोचिये जब ऐसी सफ़ल नारी संतान के गर्भ में आते ही कैरियर छोड़ देती है।जानिये उसके लिए `पद्मश्री `का क्या अर्थ है।
जबकि प्रभा मुजुमदार व सीमा जैन की नायिका को तंज कसा जा रहा है ,`` तुम मेन स्ट्रीम से बहुत पीछे या बाहर ही हो जाओगी! तुम कैसे संभाल पाओगी खुद को? आज सब आगे बढ़ने के लिए भाग रहे हैं! और तुम खुद को ही पीछे धकेल रही हो!”
डॉ .जया आनंद की नायिका का उसके नाल से जुड़ा बच्चा कोख में करवटें लेकर उस में बहुत महीन बुनावट से बुनी कहानी में मातृत्व की हिलोरें पैदा करता है[मैं नहीं तू ही ---]--- `बाद में उसमें इतना अंतर आता जा रहा था कि जब बच्चा उसकी कोख में तेज़ तेज़ घूमता तो उसका दिल पता नहीं क्यों` कुछ `मोह में पगा धड़कने लगता लेकिन वह उस ` कुछ` को लैपटॉप पर तेज़ तेज़ उंगली चलाकर कुचल डालती है । ` लेकिन कब तक ?
शेली खत्री की पत्रकार नायिका बच्चा होने के बाद कैसे बदल जाती है - -`-जब स्वस्ति का जन्म हुआ था;उसे लगा था बस इस दुनियाँ में वह है और स्वस्ति। दिन- रात, देश -दुनियाँ की ख़बरों के पीछे पड़ी रहने वाली शुभ्रा को स्वस्ति के अलावे दिखता ही कहां था कुछ। स्वस्ति की मुस्कुराहट ही उसकी ‘हैडलाइन ’ थी, स्वस्ति को नहलाना- मालिश करना उसकी ‘एंकरिंग’, स्वस्ति की नींद, दूध का पूरा ध्यान रखना ‘चौबीस घंटे की खबर’ और स्वस्ति की रूलाई उसके लिए ‘ब्लंडर न्यूज़’ थी। `
`हंस `एप्रिल २०२१ में जोया पीरज़ाद एक ईरानी लेखिका की यादवेंद्र द्व्रारा अनुवादित कहानी आई है जिसकी लेखिका नायिका कुछ दिन से कहानी लिखने के नोट्स लिखकर किचेन में दीवार पर लगाना चाहती है जिससे जब इसे लिखे तो उसे सुविधा रहे लेकिन अंतत;टमाटर की सूची वहां लगा देती है क्योंकि फ्रिज में वे ख़त्म हो रहे हैं। यही है एक गृहणी का कोलाज।जिन स्त्रियों की इच्छाशक्ति प्रबल है वही इसके पार जा सकतीं हैं।
अंजु खरबन्दा की नायिका क्रेच देखते ही विचलित हो जाती हैकि यहाँ नहीं पलेगी मेरी बच्ची। वह बीच का रास्ता निकलती है की उसका काम भी न छूटे ,बच्ची आँखों के सामने बड़ी हो।
मैं जब सन 1976 में शादी होकर बड़ौदा आई थी तो शौकिया पत्रकारिता के दौरान बहुमंज़िली इमारतों में देखती थी आयायें फ़्लैट्स में ज़मीन पर बैठी बोतल से बच्चे को दूध पिला रहीं हैं। मैंने उसी समय तय कर लिया था कि मेरे बच्चे इस तरह से आया की गोद में नहीं पलेंगे। मैंने स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन करने का निर्णय अपने बच्चों की ख़ातिर लिया था ,सच मानिये ये परिवार व बच्चों के लिये बहुत सही निर्णय था। इस निर्णय के लिए खुद ही खुश होती रही कि मैंने अपने अपने कैरियर का कितना बड़ा बलिदान किया है ,हाँलाकि अंदर से मैं कुंठित ख़ूब थी ,ख़ूब तड़फड़ाती थी कि मैं जो अपना काम करना चाहतीं हूँ ,वह नहीं कर पा रही।
इसी कोरोनाकल में युवा आई टी प्रोफेशनल लड़कियों के लाइव देखकर समझ में आया है कि मातृत्व नूर की बूँद है जो सदियों से बह रहा है ,बहता रहेगा क्योंकि ये ही नहीं आज की बहुत सी युवा माँयें भी समझदार माँ की तरह कैरियर ब्रेक ले रहीं हैं. अपने मातृत्व को एक उत्सव की तरह आनंद से जी रहीं हैं।आपको नहीं लगता इस नैट के कुछ भी परोसने के कारण ,मोबाइल ,लैपटॉप व तरह तरह के गेजेट्स की दुनियां में बच्चों पर नज़र रखना कितना ज़रूरी हो गया है.जब तक वे इस मायाजाल को समझने लायक नहीं हो जायें। उस कैरियर ब्रेक के बीच एक माँ की कैरियर के प्रति तड़प व बच्चों के प्रति उनकी अनमोल ज़िम्मेदारी के बीच के द्वन्द व तकलीफ़ को समाज समझ पाये व उस स्त्री के जीवन के इस नाज़ुक मोड़ पर वह व परिवार साथ खड़ा हो पाये तब ही इस संग्रह की सार्थकता है। काश ! इस संग्रह को पढ़ने वाले पाठक ही स्त्री के रोल को समझ उसे दोयम दर्ज़े का नागरिक समझना छोड़ दें.
जो संदेश अवकाश प्राप्त अधिकारी डॉ प्रभा मुजुमदार ने अपनी कहानी में दिया है। वे आज की बहुत लड़कियाँ स्वयं सीख चुकीं हैं ,` पूरे आत्मबल और विश्वास के साथ जीना सीखना ही होगा हर माँ को। अपने अरमानों और सपनों का वह उत्सव मनाएगी, न की कंधों पर उनकी गठरी टांग कर मातम और शहादत। उसकी मुस्कान असली होगी और आँखों मेँ आँसू नहीं, संकल्प और हौसले होंगे। ``
ये उन औरतों की कहानियां हैं जो अपने `संदूक में सपना `[पूनम गुजरानी ] बंद कर देतीं हैं। कुछ वर्ष घर पर निकालने के बाद सोचतीं हैं इसी कहानी की नायिका की तरह --`समय का चक्र घूमता रहा....मैं पिसती रही.... अपना ही कोरमा बनाती रही....सेकती रही वक्त की भट्टी में हकीकत की रोटियां.... परोसती रही अपने ही अरमानों को सबकी थालियों में.``
बरसों बाद वे कहती है -`` सरगम को जीवन में आने वाली चुनौतियों के लिए भी तैयार करना था। मैनें बरसों पहले के अपने सपनों को इस संदुक में बंद कर दिया था जो आज मेरे सामने खुला पङ़ा था।``
अनीता दुबे की कहानी `एक चिठ्ठी `की नायिका ---` पति की पुरानी फटी टी शर्ट झट से उठाई और बक्से [बरसों पहले जिसमें अपने बनाये हैंडीक्राफ़्ट बंद कर दिए थे ] की धूल साफ़ करने लगी ।`
------ --यही है बच्चों को थोड़ा बड़ा करके अपने वजूद की तलाश।
प्रभा मुजुमदार व शेली खत्री की कहानी में स्पष्ट द्वंद दिखाई देता है कि पितृ सत्ता मानने को तैयार नहीं है कि बच्चे पालना उसकी ज़िम्मेदारी है लेकिन हमारी पीढ़ी से नई पीढ़ी में कुछ बदलाव आ ही रहे हैं। प्रभा जी के शब्द हर माँ के दिल का आइना हैं- `आरुष की बीमारी में, उस दिन क्यों नहीं वह कह सकी कि अरुण, यह बच्चा तुम्हारा भी है और आज मुझे जाना ही होगा। थोड़ी सी प्रतिकूल टिप्पणियों से बचाव की मुद्रा में क्यों आ जाती थी वह और हमेशा ? अपने को सर्वगुण सम्पन्न कुशल स्त्री और सर्वश्रेष्ठ माँ साबित करने का ठेका क्यों ले रखा था उसने ?`
डॉ .रंजना जायसवाल की कहानी में वही जद्दो जेहद है --` रोज़ सुबह आँख खुलते ही ज़िंदगी उसका इम्तिहान लेने के लिए खड़ी रहती ...और अपने आप से सवाल करती... आज मैं पास तो हो जाऊँगी न...?
उसने वही किया वही जो हर आम औरत करती है -`विश्व के मानचित्र को हटाकर वर्णमाला और पहाड़े के पोस्टर चिपका दिए। ` रंजना की `आधे अधूरे `कहानी से कुछ नीचे दये सूक्ति वाक्य पढ़िए जो कमोबेश हर लड़की के जीवन का हिस्सा हैं :
------आज कल की लड़कियों को अपने सारे सपनें ससुराल में ही पूरे करने होते हैं... मायके वालों से क्यों नहीं कहते कि हमारे कुछ सपने है पहले उसे पूरा कर दो फिर ब्याहना...सारे सपनें पूरा करने का ठेका ससुराल वालों ने ले रखा है ? "
-----लड़कियों के सपने हम नहीं समझेंगे तो फिर उन अनजान लोगों से क्या उम्मीद रखना ?
----पुरुष के सपनें पूरा करने के लिए औरत हमेशा परछाईं की तरह उसके पीछे खड़ी रहती है पर एक औरत के लिए?
-------पुरूष या तो स्त्री को जूते की नोंक पर रखते हैं या फिर सीधे सिर पर ही चढ़ाते हैं .बराबरी का हक देना तो उन्हें आता ही नहीं.
ये बहुत बड़ा संकेत है समाज व परिवार पति के लिए कि उसे कहां पर अपने में सुधार करना है।
अनीता दुबे की `एक चिठ्ठी `की नायिका के अनुभव हैं ----` पत्नी के लिए पति तो जंगल का राजा सिंह के समान था. जो दो कदम कमरे में रखे तो धरती कांप जाये . दिशा के सारे सपने छूमंतर हो जाते रहे। कभी भी दिशा मन मुताबिक़ काम ना कर सकी। दिशा के मन में कम पढ़े लिखे दूधवाले तेजसिंह का स्थान किसी फ़िल्मी हीरो से कम नहीं था। जो अपनी पत्नी को पूरी सुरक्षा के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए चल पड़ा था।`
ये अपनी सेविका दिशा, कम पढी लिखी लड़की को आँखे फाड़ कर सुनती और सोचती है- इसके पास छत ज़रूर किराये की है लेकिन इसकी उर्जा,संसार,शरीर और मन उसका ही है । दिशा तब स्वयं के बारे में भी सोचती कि इधर उसकी उर्जा बस स्वयं को छुपाने, नक़ली खुशी का संसार दिखाने में लगा था और शरीर जैसे बिना धड़कन के मिट्टी और मन कठपुतली बन चुका था । क्रांक्रीट की छत तो खुद की थी पर उसमें रहने वाली दिशा का मन किसी खाई की गहराई में गुम क़ैदी सा था। `` -- ये उलझन ,ये तड़प उस स्त्री दिल की है जो चाहकर भी अपनी ज़िंदगी में कोई काम नहीं कर पा रही।
कितनी ही स्त्रियों को शादी के बाद सुनना पड़ता है - `तुम नौकरी नहीं करोगी क्योंकि नौकरी करते ही स्त्री चालू हो जाती है।` या शादी के कुछ बरसों बाद -``इतना बड़ा शहर है तुम एक नौकरी भी नहीं ढूँढ़ सकतीं ?``या `` रूपा [पति की मित्र की पत्नी ]को पचास हज़ार रूपये बोनस मिला है। ``[आँखें जता रहीं होतीं हैं - एक तुम हो जो मुफ़्त में रोटी तोड़ रही हो. ]. ये बात और हैं की रूपा के बच्चों व नायिका के बच्चों के व्यक्तित्व में ज़मीन आसमान का अंतर है। यही बात इन कहानियों में पढ़ने को मिलेगी। स्त्री नौकरी करती है तो ताने --नौकरी छोड़ती है तो घरवालों की बौखलाहट।
` ग्यारहवीं कक्षा की, छमाही परीक्षा वाली कापियां जांचकर, शीघ्रातिशीघ्र जमा करनी थीं. रिपोर्ट- कार्ड में नम्बर चढ़ाने का काम तो स्कूल के फ़्री - पीरियड में भी हो सकता था ---. `` ये ताना विनीता शुक्ला की नायिका को मिल रहा है . घर में स्कूल के काम में समय लगना था...और अपेक्षित थी मानसिक शांति भी! उसके भाग्य में, दोनों नहीं थे. `
बकौल विनीता शुक्ला कि सुहागन कहलाने के लिए, खुशियों की बलि देनी होगी. विनीता शुक्ला की कहानी बहुत अलग उस जी तोड़ मेहनत करने वाली उस अध्यापिका की है जो डेली अपडाउन करती है। बदले में उसे क्या मिलता है ?
प्रभा जी की कहानी से --`-याद आता है स्त्री अधिकार पर किसी परिचर्चा के दौरान उसकी सीनियर रेखा दी बोली थीं- “सिमोन दा बाऊवा के ही कथन को थोड़ा और विस्तारित करें, तो- `माँ` पैदा नहीं होती, बनाई जाती हैं। `सच, पैदा होते ही घरों के निर्देशों- संस्कारों से, स्कूल की शिक्षा से, समाज धर्म के विधि विधानों से, कविता-कहानी, गीतों से, फ़िल्मों और धारावाहिकों के घिसे-पिटे संवादों से, हर औरत के मन में `आंचल में है दूध और आँखों में पानी ` वाली माँ की ऐसी अमिट छवि उकेरी गई है कि उससे जरा भी दांये बांये होना, अक्षम्य अपराध जैसा लगता है। ``
मैं इस बात से अर्द्ध सहमत हूँ क्योंकि स्त्री के दिल में कोमलता ,ममत्व प्रकृति दत्त है लेकिन सिमोन की इस बात का प्रमाण है सीमा जैन की `रेवा और रंग `की नायिका के पति की ये हिदायत ,``, बाद में यह ना हो कि तुम्हारा सारा फ्रस्ट्रेशन हमारे उस मासूम बच्चे पर निकले। तुम उससे यह कहो कि ‘मेरा कैरियर इसके कारण बर्बाद हो गया। तुम्हें उस पर झुंझलाहट होने लगे। उसका आना कैरियर से भी ऊपर है। यदि तुम ऐसा सोचती हो तभी बच्चा होना चाहिए!”
हाँलाँकि स्वत : अधिकतर स्त्रियों में बच्चे का आना कैरियर से ऊपर हो ही जाता है।
इसी कहानी की नायिका आज की सास है इसलिये बहू को उसके कैरियर व परिवार में पूरा सहयोग करने की बात करती है। हाँलाँकि उसकी बहिन नसीहत देती है ,``साफ़ मना क्यों नहीं कर देती उसको? तूने कबीर के जन्म के समय अपनी पेंटिंग छोड़ी थी ना! तेरी सास ने भी तो साफ़ मना कर दिया था कि अब तुम्हें ही घर और बच्चे को देखना है।”
अब दूसरी पारी यानि की संतान को पालकर बड़ा कर देना ।जिनके पास कैरियर नहीं होता वे डॉ .लता अग्रवाल की नायिका की तरह घर में उलझी रहती है ---` बाज़ारवाद एवं देश दुनिया से बेखबर रोज इसी ताने-बाने में रहती रोहित को क्या पसंद है.... आज राहुल की क्या फरमाइश है, उनके स्कूल के आने का वक्त हो गया है, उन्हें होमवर्क कराना है, रात को सोते वक्त कहीं चादर तो नहीं सरक गई बच्चों पर से.`
डॉ. लता अग्रवाल की नायिका की वृद्धावस्था में बच्चे परदेस बस गये हैं. इन महिला अवसाद में घिरा देखकर पड़ौसी व एक डॉक्टर के संवादों से - ‘‘ममता के छले जाने और अरमानों के टूटने का ग़म है आंटी को.``
घर को समर्पित स्त्री की दूसरी पारी की व्यथा किस तरह ज्योत्सना कपिल की कहानी में छलकी है ये आपको `और कितने युद्ध ?`पढ़कर पता लगेगा----- " पागल हो गई हो क्या ? इतनी बढ़िया नौकरी छोड़ दी ! पर मुझसे पूछती तो। " अम्बर को उसकी मोटी सैलरी से वंचित रह जाने का बेहद मलाल हो रहा था। " ऐसी स्त्री बहू की नौकरी के कारण पोते पोती भी पालती है लेकिन उसे क्या मिलता है ?
बेटे जब छोटे थे कुछ शैतानी करते तो मैं कहती कि ,``जब पता लगेगा जब मम्मी सुबह से शाम तक की नौकरी कर लेगी। ``मेरा छोटा बेटा पांच वर्ष का हो गया था. उसने कमर पर दोनों हाथ रखकर जवाब दिया ,``जाइये कर लीजिये नौकरी।ओये --होये हम तो बड़े हो गये हैं। ``बात साधरण थी लेकिन ये बात मेरे कि दिल में एक ज़बरदस्त घूँसे की तरह लगी थी। बस ऐसा लगा कि घर में मेरा कोई रोल नहीं बचा है। मैंने कहानी लिखी थी ,`लौटी हुई वह `जिसमें नायिका को लगता है कि वह अँधेरे कुँये के तल में जी ही है ,दुनियाँ के उजाले में अपनी हिस्सेदारी के लिये तड़प उठी है।
और संतान पालकर वापिस लौटने की यात्रा इतनी आसान है ? बाहर की दुनियाँ में आकर लगता है हर स्त्री को कि वह अपने को ज्ञान शून्य उजबक सा क्यों महसूस कर रही है ?या प्रगति गुप्ता की नायिका किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ के हाथ ऑपरेशन थिएटर में बरसों बाद जाकर औज़ार पकड़ने पर कांपने लगते हैं। क्यों ?
समय बदला है इसलिए अब सिर्फ़ अध्यापिका, प्राध्यापिका या डाक्टर की कहानियां ही नहीं लिखीं जातीं हैं।बहुत सी महिलायें घर पर अपना कुछ आमदनी का ज़रिया ढूंढ़ लेतीं हैं। आप इस संग्रह में इनके साथ मिलिये कत्थक ,भारत नाट्यम नृत्यांगना ,कवयित्री , पेंटर ,हैंडी क्राफ़्ट मेकर , एक संस्थान की उच्चाधिकारी ,पत्रकार व अपने जीवन की दूसरी पारी जीती आभासी दुनियां में अपने को तलाशती स्त्रियों से जिन्होंने कैरियर में ख़ुद ब्रेक लिया। अपने मातृत्व को सहेजा है. कहना होगा ये संग्रह वर्तमान में स्त्री जीवन में हुए बदलाव का भी दस्तावेज है।
स्त्री जीवन के इन्हीं दुखते बिंदुओं पर ऊँगली रखना भी इस पुस्तक का उद्देश्य है। बस थोड़ी होशियारी की ज़रूरत है। स्त्रीं दोनों नावों पर सवार होकर जीवन यात्रा कर सकती है। ज़िम्मेदारी निबाहना बहुत अच्छी बात है लेकिन कहीं स्त्री का निजत्व न खो कर रह जाए। वह उसे बंद आँखों में ,किसी कोने में संभालकर ज़रूर रक्खे जिससे वह अपनी संतानों से कह सके,``बस तू ही नहीं ,मैं भी। ``
नीलम कुलश्रेष्ठ
अहमदाबाद
Mo.no.--99925534694
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