कहानी: दीपक शर्मा
“मेरी ट्विट अपनी पूरी उड़ान नहीं भर रही। आवाज़ भी इस की बीच ही में रुक रही है….”
बेटा मुझे अपनी इलैक्ट्रानिक चिड़िया दिखा रहा है। जो अभी पिछले ही माह मैं ने उसे उस के पांचवें जन्मदिन पर ले कर दी है। जिसे चाभी भरने पर उसे अपने पूरे पंख फैला लेने होते हैं और दो बार ‘ट्विट टवैट,’ ‘ट्विट टवैट’ बोलना होता है।
“इस की चाभी लाओ,” मैं बेटे की ओर हाथ बढ़ाता हूं।
चाभी भरता हूं और चौंक जाता हूं।
‘ट्विट टवैट’ दोहराने की बजाए वह एक ही बार ‘टिट फ़ौर टैट’ चटचटा कर चुपा गई है।
इंद्रधनुषी पंख भी उस के आधे ही फैल कर रुक गए हैं।
बाकी आधे उस की देहपिच्छ में सिमटे रहे हैं।
“देखें,” पास बैठी पत्नी उसे अपने हाथ में थाम लेती है।
उस की अधखुली लाल चोंच पर, गहरी नीली आंखोंवाले उस के शीर्ष पर, पीली उस की कलगी पर, भूरे उस के चारों पैरों पर, हरी उस की छाती पर, बैंजनी उस के कान वाले हिस्से पर, नारंगी उस के पेट पर और आसमानी उस के पुछल्ले पर बारी- बारी से हाथ फेरती है और फिर उस में चाभी भरती है।
ट्विट इस बार भी अपनी उड़ान और चहक में ढिलाई दिखाती है।
‘ट्विट टवैट’ दोहराती नहीं, एक ही बार टरटराती है, “टिट फ़ौर टैट।”
“अरे,” पत्नी उछलती है, “यह तो डच्च भाषा का ‘डिट एन डैट’ बोल रही है….”
“डिट एन डैट?” बेटा अपनी मां का मुंह ताकता है।
“मतलब, दिस फ़ौर दैट,” पत्नी हंस पड़ती है, “यह दो, वह लो। तुम भी बोलो, ‘डिट एन डैट’….”
“डिट एन डैट,” बेटा यंत्रवत बोल देता है। अनिष्ठापूर्वक।
“देखें,” पत्नी को नया खेल सूझ लिया है।
वह बेटे के ट्विट में दोबारा चाभी भरती है, “इस बार यह शायद कोई और भाषा बोल उठे…..”
पत्नी इस पब्लिक स्कूल में डच्च और फ़्रासीसी भाषाओं की अध्यापिका है। जिस के परिसर में हमारा यह क्वार्टर है। छः वर्ष पूर्व हम दोनों ने इस स्कूल में लगभग एक साथ नौकरी शुरू की थी। और उत्तरवर्ती दो माह के अन्दर ही झट मंगनी पट विवाह रचा डाला था। आवासी सुविधा पाने हेतु। स्कूल के ये क्वार्टर केवल विवाहित जन ही के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं।
“इस बार तो यह फ़्रासीसी बोल रही है,” ट्विट की ‘टिट फ़ौर टैट’ पर पत्नी फिर उछल ली है, “डूअ टौहक ओह टौहक….”
“डूूअ टौहक ओह टौहक?” बेटा पूछता है।
“सो मच्च फ़ौर सो मच्च,” पत्नी अपने हाथ फैलाती है और समेटती है, “जितना दोगो, उतना पाओगे। बोलो ‘सो मच्च फ़ौर सो मच्च’…..”
“सो मच्च फ़ौर सो मच्च,” बेटा मुस्कराता है। उसे पत्नी के इस खेल में मज़ा आने लगा है।
“मुझे दो,” पत्नी के हाथ से बेटे की ट्विट मैं अपने हाथों में लौटा लाता हूं।
बेटे का ध्यान अपने वश में रखना चाहता हूं। उस की मुस्कराहट का अनन्य संचालन करना चाहता हूं।
उस की ट्विट में चाभी भरता हूं और अपनी हथेली पर उस के पैर जमा देता हूं।
ट्विट के पंख इस बार भी आधे खुल कर भिड़ गए हैं और इस बार भी वह तड़तड़ाती है, ‘टिट फ़ौर टैट’।
“यह लातिनी भाषा बोल रही है,” मैं अकड़ लेता हूं, “कविड प्रो को।”
इस स्कूल में मैं अंग्रेजी पढ़ाता हूं और अंग्रेज़ी शब्दों एंव मुहावरों की उत्पत्ति अकसर लातिनी शब्दों से जोड़ा करता हूं। यथोचित सहसम्बद्धता के अनुरूप।
“कविड प्रो को, मतलब,एक चीज़ के बदले दूसरी चीज़। बोलो बेटे, बोलो। ‘कविड प्रो को’….”
“कविड प्रो को,” हंस कर बेटा मेरी गोद में आ बैठता है, “कविड प्रो को….”
“अंग्रेज़ी में इस का एक और पर्याय भी है : ‘मैयरर फ़ौर मैययर’। माप के बदले माप। जिस माप में लो, उसी माप में दो,” पत्नी कहती है।
“शेक्सपियर का एक नाटक भी है,’मैययर फ़ौर मैययर’,” पत्नी को चिढ़ाने का अच्छा अवसर मुझे अनायास मिल रहा है और मैं कहता हूं, “उस में एक एंजलो है और एक मैरियाना और एक सुन्दर प्रेम- गीत :
“टेक, ओ टेक यौर लिप्स अवे
दैट सो स्वीटली वर फ़ौरस्वौर्न
एंड आएज़ : द ब्रेक औव डे
एंड लाइट्स दैट मिसलीड मौर्न”
(ले जाओ,रे,ले जाओ उन होंठो को
जिन्हों ने मनभावनी मगर झूठी कसमें खायीं
और उन आंखों को : पौ फटने की पहली किरण
जैैसी जो सुबह हो जाने का भ्रम देती है).....”
शेक्सपियर के लगभग सभी मुख्य नाटक मुझे कंठस्थ हैं। कुछेक, इस पब्लिक स्कूल में आने से पहले के तीन वर्षों के दौरान देहली रंगमंच पर अपनी नाट्यकला के परीक्षण एंव प्रदर्शन के अंतर्गत। कुछेक, इस पब्लिक स्कूल में उन के सार्वजनिक मंचन के प्रभारी होने के कारण और कुछेक के यहां की विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित होने के कारण।
“ब्रेक औफ़ दाए सौंग, ( अपना गीत रोक लो),”अधीर हो कर पत्नी मुझे इस गीत के उत्तरवर्ती मैरियाना के शब्द दोहरा कर मुझे रोक देती है, “उस प्रॉब्लम प्ले ( समस्यामूलक नाटक) का हमारे वर्तमान प्रसंग से है कोई मतलब? मैं ने तो ‘मैययर फ़ौर मैययर’ का उल्लेख आप के ‘कविड प्रो को’ आप के समानार्थक प्रसंग में किया था। और उसी प्रसंग में मुझे एक फ़्रासिसी मुहावरा याद आ रहा है, ‘ए रौंलेंड फ़ौर एन औलिवर’….”
मेरी गोद में बैैठा बेटा मेरी ओर देख कर मुस्कराता है। उस की मुस्कराहट मुझे पत्नी के मुकाबले में उतर आने के लिए उकसाती है।
“फ़्रासिसी वे दो ऐसे योद्धा थे जो हर बात में समानता रखते थे….” बेटे की गाल थपथपा कर मैं शुरू हो लेता हूं, “एक बार राइन के एक टापू में वे दोनों एक दूसरे से पांच दिन तक तलवारबाज़ी करते रहे किंतु कोई भी एक दूसरे को हरा नहीं पाया। तुम्हारे ममी- पापा की तरह। वे भी एक दूसरे को कहां हरा पाते हैं?”
“हम रौंलेंड और औलिवर कैसे हुए?” पत्नी फिर मंच के केंद्र में आ खड़ी होती है, “स्कूल के क्षेत्र में हम बेशक एक जैसी क्षमताएं रखते हैं। एक समान तनख्वाह पाते हैं। लेकिन घर के काम में आप मेरी बराबरी नहीं कर सकते। आप गैस नहीं जला सकते। सब्ज़ी नहीं काट सकते।आटा नहीं सान सकते। कपड़े नहीं धो सकते। उन पर लोहा नहीं कर सकते….”
“अब नया राग कौन अलाप रहा है?” एक क्रोधोन्माद मेरे अंदर उतर रहा है, “टेढ़े - मेढ़े कौन बह रहा है? प्रसंग से कौन भटक रहा है?”
नाटकीय अंदाज़ में पत्नी मेरी हथेली से बेटे की ट्विट उठाती है और उस में चाभी भर कर बेटे को बीच वाली मेज़ पर आने का निमंत्रण देती है, “देखें, मेज़ पर पहुंच कर तुम्हारी ट्विट क्या बोलती है?”
बेटा मेरी गोदी से उतर लेता है और अपनी मां के पास जा खड़ा होता है।
“टिट फ़ौर टैट,” मेज़ से ट्विट चीखती है।
मेरा लहू अब उबल रहा है।
“टिप फ़ौर टैप,” पत्नी बेटे को एक हल्का टहोका देती है और हंसती है, “अब तुम मुझे धक्का दो। ‘टिप फ़ौर टैप’। मेरे झटके की जगह तुम्हारा झटका। बोलो, ‘टिप फ़ौर टैप’…..”
“टिप फ़ौर टैप,” बेटा हंसता है और अपनी मां की टांगो से जा चिपकता है।
उत्साह से भर कर पत्नी बेटे को मेरी बगल में ला बिठाती है और अपनी आंखों की पुतलियां फैला कर अपने हाथ खोल कर बेटे के चेहरे पर ले आती है, ‘ऐन आए फ़ौर एन आए’। तुम मेरी आंख फोड़ोगे तो मैं तुम्हारी आंख फोड़ दूंगी। ‘अ टुथ फ़ौर अ टुथ’।तुम मुझे चबाओगे तो मैं तुम्हें चबा जाऊंगी…..”
अपना मुंह खोल कर पत्नी अपने दांत निकालती है और चिंघाड़ती है।
उस की चिंघाड़ में मैं एक ललकार सुन रहा हूं। एक महाघोष : ‘मैं बलवती हूं। तुम्हें बराबर की टक्कर दे सकती हूं। तुम्हारे हर जोड़ का तोड़ रखती हूं…..’
मेरा लहू मेरे अंदर चिंगारियां छोड़ता है। ताबड़तोड़।
और मेरे हाथ उठ कर पत्नी के मुंह पर जा बरसते हैं।
ज़ोरदार और ज़बरदस्त।
“यह क्या है?” पत्नी चौंकती है। उस के मुंह से लहू टपकने लगा है।
“तुम्हारी नारेबाज़ी का जवाब। तुम्हारी बराबरी का हिसाब…..”
बेटा रोने लगा है।
पत्नी से उलझ रहे अपने हाथ मैं तत्काल रोक लेता हूं और उन्हें बेटे की ओर ला बढ़ाता हूं।
विपरीत निश्चय के साथ।
बेटे को अपनी बाहों के घेरे में लाकर चुमकारता हूं। पुचकारता हूं।
“तुम रोओ नहीं,बच्चे। चलो, मेरे साथ चलो।तुम्हारी ट्विट की दुकान पर चलते हैं। वहां दुकानदार इस की मरम्मत कर देगा। और यह ठीक हो जाएगी।और अपना यह चरचराना छोड़ कर फिर से ‘ट्विट टवैट’, ‘ट्विट टवैट’ गाने लगेगी…..”