bed of memories in Hindi Short Stories by Rinki Singh books and stories PDF | स्मृतियों की खाट

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स्मृतियों की खाट

दरवाज़े के बगल में रखी पुरानी सी खाट पर बैठकर हरिप्रसाद जी हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ सूरज को निकलते देखते, और शाम को उसी सूरज के पीछे छिपती उम्मीदें |

कभी यही खाट आँगन में होती थी..जहाँ उनके चारों बेटे-बेटियाँ बचपन में उनसे लिपटकर कहानियाँ सुनते थे।
अब वही खाट एक कोने में खिसका दी गई थी, जैसे कोई चीज़ जो जगह तो घेरती है पर ज़रूरी नहीं लगती |

हरिप्रसाद जी अब 78 के हो चले थे |शरीर झुक गया था, लेकिन स्मृतियाँ सीधी खड़ी थीं |

वो यादें जब बेटे की फीस भरने के लिए उन्होंने अपनी घड़ी बेच दी थी |
जब बहू के मायके वालों के आने पर उन्होंने खुद खिचड़ी खाकर मेहमानों को मेवा परोसा था |
जब बेटी के ब्याह के लिए उन्होंने अपने पिता की दी हुई ज़मीन बेच दी थी -और बस मुस्कुरा कर कहा था, “बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, बस थोड़ा ज्यादा आशीर्वाद ले जाती हैं |"

लेकिन अब?
अब हर दिन एक ही ढर्रा-सुबह उठना, थर्मस से बची हुई चाय पीना, दरवाज़े की तरफ़ मुंह करके बैठना, और इंतज़ार करना...

घर अब बदला नहीं था, लेकिन उसके लोग बदल चुके थे।
उनका पोता, आरव, अब बड़ा हो गया था |
उसकी दौड़ अब उस बुज़ुर्ग उँगली की पकड़ से निकल चुकी थी, जिसे पकड़ कर उसने चलना सीखा था |
आरव अब दरवाज़ा खोलकर हरिप्रसाद जी को देखकर बस हल्की गर्दन हिला देता—"Hi Dadu!"
और फिर मोबाइल में खो जाता |

बहू पूजा अब किचन की रानी थी, पर उसकी बातों में कभी दवाई का ज़िक्र नहीं होता।
कभी-कभी तो हरिप्रसाद जी खुद अपनी पर्ची लेकर पूजा की रसोई में खड़े हो जाते --
"बहू, ये दवा कब देनी है?"
और जवाब आता - "हाँ बाबूजी, रख दीजिए, देती हूँ…"

और बेटा, शैलेश...
अब बस “बिजी” था.. दफ्तर, फोन, मीटिंग, ड्राइव |
 हरिप्रसाद जी को अब सबसे ज़्यादा डर शाम से लगता था |
क्योंकि जब घर के सारे लोग घर में होते,
तो वो सबसे ज़्यादा अकेले होते |
एक दिन शाम को तेज़ बारिश आई |
बिजली गई।
और साथ ही हरिप्रसाद जी की बैसाखी भी फिसल गई।

वो दरवाज़े की ओर झुके, पर आवाज़ देने से पहले रुक गए...
“कहीं किसी को परेशानी न हो "
वो वहीं ज़मीन पर बैठ गए |

भीतर से हँसी की आवाजें आ रही थीं...
"Netflix on करो!"
"मां, गरमागरम पकोड़े बना दो न!"
"कितनी सुहानी बारिश है |"

पर बाहर...
हरिप्रसाद जी की झुर्रियों से पानी नहीं,
बारिश और कुछ अनकहे आँसू बह रहे थे |

अगले दिन दरवाज़े पर खाट नहीं थी |
कुछ देर तक किसी को ध्यान नहीं गया |

फिर दोपहर के बाद डाकिए ने पुकारा,
"हरिप्रसाद जी... चिट्ठी आई है |"
पूजा ने अनमने भाव से दरवाज़ा खोला |
डाकिया बोला -
"हरिप्रसाद जी कहाँ हैं? रोज़ यहीं बैठते थे |"
पूजा ने कहा, "अंदर हैं शायद |"

शैलेश उस वक्त ड्रॉइंग रूम में कुछ खोज रहा था |
आरव बोला, "Dadu शायद अस्पताल गए होंगे |"
पर किसी ने पूछा नहीं।
किसी ने तलाश नहीं की |
रात को जब सब खाना खा रहे थे, तभी डोरबेल बजी |

बाहर एक ऑटो था |
हरिप्रसाद जी उसमें थे..भीग चुके, थरथराते हुए |

ड्राइवर ने कहा,
"इनका नाम-पता लिखे कागज़ में था जेब में। पार्क में बेहोश मिले थे। मैंने खुद ही अस्पताल ले गया... अब होश में हैं |"

पूजा सन्न रह गई |
शैलेश दौड़ कर आए |
आरव खड़ा रह गया |
हरिप्रसाद जी को अंदर लाया गया |
सारे लोग चुप |

हरिप्रसाद जी ने धीमे स्वर में कहा...
"मैं सोचा शायद मैं भूल गया हूँ घर का रास्ता…
पर घर भी शायद मुझे भूल गया है…"
अगले दिन, हरिप्रसाद जी फिर उसी दरवाज़े के पास बैठे थे |

पर अब उनके चेहरे पर कोई प्रतीक्षा नहीं थी |
ना कोई शिकायत, ना कोई उम्मीद |

बस एक ख़ामोशी थी जो किसी पुराने रेडियो की तरह बजती थी — कभी आवाज़ आती, कभी सिर्फ़ फुसफुसाहट. |

शाम को अचानक, आरव चुपचाप आया, और कुछ पल उनके पास बैठ गया |
कई दिनों बाद पहली बार उसने खुद से उनका हाथ थामा।
फिर अपनी जेब से एक पुराना रूमाल निकाला—जिस पर कभी हरिप्रसाद जी ने उसके नाम के पहले अक्षर खुद काढ़े थे..और धीरे से उनकी उँगलियाँ उसमें लपेट दीं।

कहा कुछ नहीं...
हरिप्रसाद जी ने उसकी ओर देखा—एक लंबी, थकी हुई नज़र...
फिर अपनी हथेली उस रूमाल पर थोड़ी और कस ली |

उस शाम, पहली बार
दरवाज़े के पास बैठा वह बूढ़ा आदमी
घर का हिस्सा नहीं,
घर का कलेजा लग रहा था |

और यह कहानी यहीं नहीं रुकती..
क्योंकि कोई-कोई स्पर्श,
कभी खत्म नहीं होता,
बस… धीरे-धीरे घर की दीवारों में उतर जाता है |


~रिंकी सिंह