The role of a housewife and its challenges in a changing society in Hindi Women Focused by kajal books and stories PDF | बदलते समाज में गृहिणी की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ

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बदलते समाज में गृहिणी की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ

आज की गृहिणी की ज़िंदगी विज्ञान और आधुनिक सुविधाओं के कारण जितनी आसान दिखाई देती है, उतनी ही समय के साथ जटिल भी होती जा रही है। वॉशिंग मशीन, गैस, मिक्सर और इंटरनेट जैसी सुविधाओं ने काम को तेज़ जरूर बनाया है, लेकिन अपेक्षाएँ भी उतनी ही बढ़ गई हैं। घर के काम आसान होने के बावजूद गृहिणियों की जिम्मेदारियाँ कम नहीं हुई हैं, बल्कि मानसिक दबाव पहले से अधिक बढ़ गया है।
जब एक नई नवेली दुल्हन विवाह के बाद अपने ससुराल आती है, तो हमारे भारतीय समाज में आज भी उससे यह उम्मीद की जाती है कि उसे घर के सभी काम आने चाहिए और वह पारंपरिक रीति-रिवाजों का पूरी निष्ठा से पालन करे। यह मान लिया जाता है कि घर को संभालना केवल उसी की जिम्मेदारी है। कई बार उसकी शिक्षा, सोच और इच्छाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
लेकिन समय अब पहले जैसा नहीं रहा। 2026 के इस दौर में केवल परंपराओं के सहारे घर और जीवन को संतुलित रखना आसान नहीं है। आज की लड़की सिर्फ़ एक बहू या गृहिणी ही नहीं होती, बल्कि वह एक स्वतंत्र सोच रखने वाली इंसान भी होती है, जिसके अपने सपने, लक्ष्य और करियर होते हैं। वह पढ़ी-लिखी है, दुनिया को समझती है और अपने भविष्य को लेकर सजग भी है।
किसी भी परिवार और पति की यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है कि वे यह समझें कि घर केवल एक व्यक्ति के प्रयासों से नहीं चलता। यदि घर की सारी जिम्मेदारियाँ एक ही व्यक्ति पर डाल दी जाएँ, तो थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन स्वाभाविक है। जब परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे का सहयोग करते हैं और जिम्मेदारियों को मिलकर निभाते हैं, तभी पारिवारिक जीवन संतुलित और सुखद बन पाता है।
पारिवारिक जीवन तभी सफल होता है, जब पति अपनी पत्नी को केवल ज़िम्मेदारियों तक सीमित न रखे, बल्कि उसे जीवन का बराबरी का साथी समझे। यदि वह नौकरी करना चाहती है, घर से काम करना चाहती है या अपने करियर को आगे बढ़ाना चाहती है, तो परिवार को उसका पूरा समर्थन देना चाहिए। इससे न केवल महिला आत्मनिर्भर बनती है, बल्कि पूरे परिवार का आत्मविश्वास और भविष्य भी मजबूत होता है।
आज समाज में यह स्थिति भी देखने को मिलती है कि एक ओर महिलाओं से पुराने तौर-तरीकों के अनुसार चलने की अपेक्षा की जाती है, वहीं दूसरी ओर उनके विचारों, भावनाओं और संघर्षों को समझने की कोशिश नहीं की जाती। इसी असंतुलन के कारण कई बार मानसिक तनाव, रिश्तों में दूरी और यहां तक कि तलाक जैसी गंभीर समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।
जब परिवार आपसी समझ, संवाद, सम्मान और सहयोग के साथ आगे बढ़ता है, तो घर का वातावरण अपने आप सकारात्मक हो जाता है। ऐसे घरों में बच्चे भी सुरक्षित और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। वे समानता, सम्मान और सहयोग जैसे मूल्यों को सीखते हैं, जो उनके भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं।
निष्कर्ष:
गृहिणी होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक बड़ी और सम्मानजनक जिम्मेदारी है। लेकिन इस जिम्मेदारी को सही ढंग से निभाने के लिए सहयोग, समझ और सम्मान उतना ही आवश्यक है। जब परिवार और समाज मिलकर महिला को आगे बढ़ने का अवसर देते हैं, तभी एक सशक्त परिवार और सशक्त समाज का निर्माण संभव हो पाता है।