एक प्रेम कर रहे व्यक्ति के जीवन में चांद की भूमिका क्या रहती होगी? आखिर क्यों हो जाता है दो प्रेमियों के बीच संवाद का माध्यम वो आसमान में तक रहा इकलौता चांद?मैने इसे बेहद करीब से महसूस किया तब जब कुछ ही दिनों पहले मै किसी शादी में थी।
नीचे महफिल जमी हुई थी ,जोर शोर से डीजे बज रहा था।वो साज सज्जा वो लड़ियों से चमचमाहट...जो मेरे आंखों को अनायास ही चुभने लगी और फिर ये खुशनुमा और उत्सवपूर्ण माहौल में इक घना सन्नाटा पसर गया हो जैसे।
ऐसा नहीं था कि वो सन्नाटा मेरे दिल को झकझोर दे और मेरे आंखों से झरझर अश्रु बहने लगे।पर ऐसा जरूर था कि उस सन्नाटे ने मुझे कुछ पल के लिए स्तब्ध और शून्य जरूर कर दिया था।
शायद शारीरिक रूप से तो मैं वहाँ उपस्थित थी,
पर मेरी उपस्थिति कहीं और ही दर्ज हो रही थी।
क्या तुम्हारे पास मेरे होने का एहसास आया होगा?
नहीं, शायद नहीं।
यह भी तो संभव है कि यह केवल मेरा भ्रम हो।
फिर भी हर दिन के हुल्लास को अनदेखा कर , औरों से खुद को अकेला कर मै एक टक उस चांद को निहार जरूर लिया करती।
क्या रिश्ता है मेरा चंदा से शायद इतना की वो उस रात धरती पर रहता तो नीचे जो सूनापन,जो अधूरापन मुझे दिख रहा था वो छट जाता तुम्हारे इर्द गिर्द फैले रौशनी की छटाओं से, और विलुप्त हो जाती मेरे मन की सारी निराशाएं।
शायद प्रेम कर रहे व्यक्ति के जीवन में चांद चांद न होकर हो जाता है प्रेमी का पर्यायवाची एक शब्द जैसे शशि के जगह पर लिख दिया जाए शशांक और जबरन बना दिया जाए उसे चंद्रमा का पर्यायवाची जो पल भर के लिए ही सही एक विद्यार्थी को दे जाए सही उत्तर लिखने का दिलासा
या फिर होता होगा चंद्रमा किसी प्रेमी के जीवन में प्रिय व्यक्ति के आंखों का वो तारा जिससे नज़रे मिलाने के जतन तो लाख किए जाए पर हर बार हो जाता है ये प्रेमी हृदय असफल जैसे कि असंभव है इस धरती पर चांद का उतर जाना..।
बात सिर्फ यहीं समाप्त नहीं होती ये चांद बनता है साक्षी हमारे उन पलों का जिसमें प्रेमी की नामौजूदगी में हम संपर्क में आते है किसी अन्य पुरुष के और उनके हाथों से हाथ मात्र छू जाने पर से उत्पन्न हुई वो असहजता वो छुड़ाया गया हाथ ,उस पल शरीर में दौड़ जाने वाली असहज ऊर्जा जो सीधे सीने पे वार करती है बेशक इन सब को छुपा लेते है हम बनावटी मुस्कुराहटों से पर क्या छुपा पाते है हम उस चंद्रमा से जिसने महसूस की हो हमारे भीतर की उस झनझनाहट को..? शायद यहां सभी शब्द अपने मुंह फेर लेते है और आंखों की चमक में पड़ रही चांदनी दे जाती है कुछ बूंद अश्रुओं के हमारे आंखों के कोर में और समाहित कर जाती है फिर से सारी भावनाएं हमारे भीतर ही ।
इस वक्त मुझे याद आता है इक स्त्री द्वारा कही बात की "मेरा प्रेमी और कहीं नहीं उस चांद में है बहिन" उस समय शायद मैं पहली बार समझ पाई उस शब्द के मर्म को और सहेज पाई अपने भीतर ये बात की शायद चांद सिर्फ किसी एक का नहीं बल्कि हम जैसे अनन्य दिलजले आशिकों का आधार है वो हम सबका पहला और आखिरी प्यार है वो ।