जब खामोशी ने सवाल पूछा पाँच साल बाद…मुंबई अब भी वही थी—भागती हुई, शोर से भरी हुई।लेकिन आदित्य और अन्या की ज़िंदगीअब एक नई लय में चल रही थी।Silent Voice Foundationआज एक बड़ा नाम बन चुका था।सैकड़ों ऐसे लोगजो बोल नहीं सकते थे,आज अपने सपनों को आवाज़ दे रहे थे।नई सुबहसुबह की धूपबालकनी में रखे पौधों पर पड़ रही थी।अन्या कॉफी बनाते हुए बोली—“आज बहुत बड़ा दिन है…फाउंडेशन की नई ब्रांच का उद्घाटन।”आदित्य ने मुस्कुराकरउसकी हथेली पर लिखा—“हमने बहुत दूर तक सफ़र किया है।”अन्या ने उसकी तरफ देखा—वो गर्व से भरा था।एक अधूरापनसब कुछ ठीक होते हुए भीअन्या के दिल मेंएक खाली जगह थी।शाम कोवो देर तक खिड़की के पास बैठी रही।आदित्य ने पास आकर पूछा—इशारों में।अन्या की आवाज़ काँप गई—“क्या तुम्हें कभी लगता है…कि हमारी खुशी मेंकुछ कमी है?”आदित्य समझ गया।उसने लिखा—“क्या तुम माँ बनना चाहती हो?”अन्या की आँखों में आँसू भर आए।उसने सिर हिला दिया।किस्मत का जवाबडॉक्टर की रिपोर्टटेबल पर रखी थी।शब्द कम थे,पर मतलब भारी“प्राकृतिक रूप से संभव नहीं।”कमरा चुप हो गया।अन्या की उम्मीदएक पल में बिखर गई।“शायद…ये हमारी कहानी में नहीं लिखा,”वो धीमे से बोली।आदित्य ने उसका हाथ पकड़ा।लिखा—“कहानी यहीं खत्म नहीं होती।”एक अनजान आवाज़उसी रातफाउंडेशन के मेल परएक मैसेज आया—“मुझे आपकी मदद चाहिए।मैं बोल नहीं सकती…और घर में कोई मुझे समझता नहीं।”सिग्नेचर“मीरा (16 साल)”अन्या ने स्क्रीन पढ़ी।दिल ज़ोर से धड़का।“आदित्य…शायद जवाब आ गया है।”आदित्य ने स्क्रीन की ओर देखाऔर पहली बार उसकी आँखों में एक नया सपना जागा।शुरुआत एक नए रिश्ते कीआदित्य ने लिखा—“क्या हम किसी की ज़िंदगी बन सकते हैं?”अन्या ने बिना सोचे कहा“हाँ…शायद माँ–बाप बनने का यही रास्ता है।”दूर कहीं किस्मत मुस्कुरा रही थीं✨(मीरा की खामोशी, एक अनसुना दर्द)बारिश की हल्की फुहार मुंबई की सड़कों को भिगो रही थी।अन्या और आदित्य फाउंडेशन के ऑफिस में बैठे थे।लैपटॉप की स्क्रीन परमीरा का मेल खुला था—छोटे-छोटे वाक्य,पर हर शब्द भारी।“मैं बोल नहीं सकती।माँ नहीं रहीं।पापा कहते हैं—मैं बोझ हूँ।”अन्या का दिल कांप गया।पहली मुलाकातदो दिन बादमीरा फाउंडेशन पहुँची।सोलह साल की लड़की,पतले कंधे,आँखों में डर और थकान।वो बोल नहीं सकती थी,पर उसकी आँखेंसब कुछ कह रही थीं।आदित्य ने धीरे सेकागज़ और पेन आगे बढ़ाया।मीरा ने लिखा—“अगर यहाँ भी मुझे नहीं समझा गया,तो मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”अन्या झुककरउसके सामने बैठ गई।“यहाँ शब्द ज़रूरी नहीं होते,”वो मुस्कुराई,“यहाँ दिल काफी है।”मीरा की आँखों मेंपहली बार हल्की चमक आई।घर की सच्चाईमीरा ने लिखकर बताया—माँ के जाने के बादघर में सन्नाटा नहीं,ताने गूंजते थे।“गूंगी लड़की किस काम की?”“इसका भविष्य क्या है?”पिता की चुप्पीसबसे ज़्यादा चुभती थी।अन्या की आँखें भर आईं।आदित्य का आईनाआदित्य ने मीरा की ओर देखा।उसने अपनी हथेली पर लिखा—“मैं भी कभी ऐसा ही महसूस करता था।”मीरा चौंक गई।उसने पहली बारसीधे आदित्य की आँखों में देखा।वो समझ गई—वो अकेली नहीं है।एक नया डरशाम कोमीरा को घर छोड़ने की बात आई।मीरा ने लिखा—“क्या मैं कल फिर आ सकती हूँ?”अन्या का दिल पिघल गया।आदित्य ने अन्या की ओर देखा—एक सवाल, एक उम्मीद।अन्या ने गहरी सांस ली—“क्यों न…मीरा कुछ दिन हमारे साथ रहे?”मीरा की उँगलियाँ काँप गईं।उसने लिखा—“सच?”आदित्य ने मुस्कुराकर लिखा“घर शब्दों से नहीं,अपनापन से बनता है।”लेकिन…उसी रातमीरा के पिता का फोन आया।आवाज़ सख्त थी—“मेरी बेटी से दूर रहिए।उसे भड़काइए मत।”फोन कट गया।कमरे में सन्नाटा छा गया।अन्या ने धीमे से कहा—“ये आसान नहीं होगा…”आदित्य ने लिखा“कोई भी सही काम आसान नहीं होता।”✨ (सामना, सच और सबसे कठिन फैसला)सुबह का समय था।आसमान साफ़ था,लेकिन अन्या के मन में बादल घिरे हुए थे।मीरा उनके घर मेंखिड़की के पास बैठी थी।हाथ में एक स्केचबुक—जिसमें अधूरी आकृतियाँ थीं,जैसे उसका अपना जीवन।पिता का आगमन दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक हुई।अन्या ने दरवाज़ा खोला।सामने खड़ा था—मीरा का पिता, महेश शर्मा।चेहरे पर गुस्सा,आँखों में थकान और हार।“मेरी बेटी कहाँ है?”उसने सख़्त लहजे में पूछा।आदित्य आगे आया।उसने शांति सेहाथ जोड़कर नमस्ते किया।मीरा डरते हुएपीछे से झाँकी।सच की टकराहटमहेश ने चिल्लाया—“तुम लोगों ने इसे मेरे खिलाफ भड़काया है!”अन्या ने संयम से कहा—“हमने बस उसे सुना है।”मीरा आगे आई।कागज़ पर तेज़ी से लिखा—“मैं भागी नहीं।मुझे समझा गया।”महेश ठिठक गया।बीते ज़ख्मआदित्य नेमहेश को बैठने का इशारा किया।उसने अपने मोबाइल परएक पुरानी फोटो दिखाई—अपनी माँ की।फिर लिखा—“मेरी माँ भी कहती थीं—कमज़ोरी छुपाओ मत,उसे ताकत बनाओ।”महेश की आँखें भर आईं।पिता का टूटनामहेश की आवाज़ भर्रा गई—“मुझे नहीं पता थाकि मैं उसे तोड़ रहा हूँ।उसकी माँ के जाने के बादमैं खुद से हार गया…”मीरा की आँखों सेआँसू बहने लगे।वो आगे बढ़ीऔर पहली बारअपने पिता का हाथ थामा।एक कठिन सच्चाईलेकिन सच यहीं खत्म नहीं हुआ।महेश ने सिर झुकाकर कहा—“डॉक्टर ने कहा है—मीरा को एक ऐसे स्कूल की ज़रूरत हैजहाँ उसे समझा जाए।मैं अकेला ये सब नहीं कर पा रहा।”कमरे में खामोशी छा गई।अन्या और आदित्यएक-दूसरे की ओर देख रहे थे।सबसे बड़ा फैसलाअन्या ने गहरी सांस ली।“अगर आप चाहें…मीरा कुछ समय हमारे साथ रह सकती है।पढ़ाई, थेरेपी—सब हम देखेंगे।”महेश चौंक गया“क्यों?”आदित्य ने लिखा“क्योंकि कोई हमें भीकभी यूँ ही संभाल गया था।”मीरा की आँखों मेंआँसू और रोशनी एक साथ चमकी।नई शुरुआत की शर्तमहेश ने काँपते हाथों से कहा—“अगर…अगर वो खुश रहेगी…तो मैं राज़ी हूँ।”मीरा ने लिखा—“पापा,मैं आपको छोड़ नहीं रही।मैं बस खुद को ढूँढ रही हूँ।”महेश ने उसे गले लगा लिया।पर कहानी में अभी मोड़ बाकी है…रात कोअन्या के फोन परएक सरकारी नोटिस आया—“नाबालिग कोबिना कानूनी अनुमतिघर में रखने पर आपत्ति।”अन्या का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।आदित्य ने नोटिस पढ़ा।फिर उसकी हथेली पर लिखा—“अब लड़ाई प्यार की नहीं,कानून की भी है।” (कानून की लड़ाई और दिल का इम्तिहान)नोटिस का सफ़ेद काग़ज़ अन्या के हाथों में काँप रहा था।शब्द सख़्त थे,पर उनके पीछे छुपा डरमीरा का था।मीरा चुपचाप कमरे के कोने में बैठी थी।आँखें झुकी हुईं—जैसे खुद को ही दोष दे रही हो।आदित्य ने उसके पास बैठकर धीरे से लिखा“गलती तुम्हारी नहीं है।”मीरा ने स्केच बुक खोलीऔर पहली बारएक पूरा चेहरा बनाया—एक घर,जिसके दरवाज़े खुले थे।वकील की सलाहअगले दिनअन्या और आदित्य एक सामाजिक वकील, शिल्पा देशमुख, से मिले।शिल्पा ने फाइल देखते हुए कहा“कानून साफ़ है।मीरा नाबालिग है।या तो पिता की लिखित अनुमति,या कोर्ट का आदेश।”अन्या ने पूछा“अगर पिता तैयार हैं?”“तो मामला मज़बूत हो सकता है,”शिल्पा बोली।“पर समाज और सिस्टम रास्ता आसान नहीं बनाएंगे।”मीरा का डरघर लौटकरअन्या ने मीरा को समझाया।मीरा ने लिखा—“अगर मैं वजह बनूँऔर आप दोनों को परेशानी हो?”अन्या ने उसे गले लगा लिया“तुम वजह नहीं,तुम जवाब हो।”आदित्य ने उसकी हथेली पर लिखा—“हम डर से नहीं,प्यार से फैसले लेते हैं।”मीरा की आँखों सेआँसू बह निकले।समाज की आवाज़पड़ोस में बातें शुरू हो गईं।“बिना बच्चे वाले दंपतिदूसरे की बेटी क्यों रखेंगे?”“कोई दिखावा होगा।”अन्या पहली बारसच में टूटने लगी।रात कोउसने आदित्य से कहा—“कभी-कभी लगता हैहम बहुत थक गए हैं…”आदित्य ने लिखा—“तो कुछ पल रुक जाएँ,पर पीछे नहीं हटेंगे।”कोर्ट का दिनकोर्टरूम मेंमीरा अपने पिता के पास खड़ी थी।महेश ने जज के सामने कहा“मैं अपनी बेटी से प्यार करता हूँ,पर मैं उसे वो नहीं दे पा रहाजो ये लोग दे सकते हैं—समझ और सहारा।”मीरा ने जज कोएक चिट्ठी दी।उस पर लिखा था—“मैं बोल नहीं सकती,पर यहाँ सुरक्षित हूँ।मुझे बस सीखने और जीने का मौका चाहिए।”जज ने ध्यान से पढ़ा।कमरा शांत था।अधूरा फैसलाजज ने कहा“अस्थायी रूप से,मीरा अन्या और आदित्य के साथ रह सकती है।लेकिन अगली सुनवाई तकनिगरानी रखी जाएगी।”मीरा की आँखों मेंराहत की सांस चमकी।अन्या और आदित्यएक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए।पर संकट अभी खत्म नहीं…कोर्ट के बाहरएक महिलाचुपचाप फोटो खींच रही थी।शिल्पा ने फुसफुसाकर कहा—“ये चाइल्ड वेलफेयर की नहीं…मीडिया की है।”अन्या का दिल बैठ गया।आदित्य ने लिखा—“अब हमारी खामोशीसबसे ऊँची आवाज़ बनेगी।”नेक्स्ट पार्ट पढ़ने के लिए मुझे फॉलो करे या कंमेंट् करे........