Hi, दोस्तों! मेरा नाम सिद्धार्थ है, और मैं अभी अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित साक्रेमेंतो शहर में रहता हूँ| मैं यहाँ एक मल्टीनेशनल टेक कम्पनी में एंड्रॉइड एप डेवलपर के रूप में कार्य करता हूँ| आज मैं आपको अपने जीवन की उस घटना की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसका सम्बन्ध मुझसे जुड़े एक बेहद खास व्यक्ति से है| ये उस खास व्यक्ति के मेरे जीवन में आने की कहानी है, जो काफी ऊँचे-नीचे रास्तों से होते हुये अपने मुकाम तक पहुँचती है|
तो आइये, समय को बर्बाद किये बिना सीधे कहानी की शुरुआत करते हैं|
ये कहानी वर्ष 2005 में उस समय की है, जब मैं अपने द्वारा काफी रिसर्च करने के बाद चिन्हित की गयीं प्रमुख कनैडियन टेक यूनिवर्सिटीज द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कराई जाने वाली ऑनलाइन एडमिशन टेस्ट प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा था| मुझे इस ऑनलाइन एडमिशन टेस्ट की तैयारी करते हुये तीन साल का समय हो चुका था| इस दौरान मेने अपने माताजी-पिताजी के सुझाव पर इस प्रतियोगिता की तैयारी करने के साथ-साथ पिछले तीन वर्षों में बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से भारत के एक प्रसिद्ध मुक्त विश्वविद्यालय से पूर्ण कर ली थी|
मैं कनाडा जाकर तकनीकी की शिक्षा प्राप्त करना चाहता था, और आगे इसी क्षेत्र में अपना योगदान देना चाहता था| पिछले तीन वर्षों में मेने ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ-साथ इस ऑनलाइन एडमिशन टेस्ट के लिये जमकर तैयारी की थी| और आखिरकार अब वो समय आ गया था, जब मेरी तैयारी की जाँच इस प्रतियोगिता में होने वाली थी|
मेरा इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये एडमिट कार्ड आ चुका था| ये ऑनलाइन परीक्षा वर्ष 2005 के जून माह की 25वीं तारीख को आयोजित होने वाली थी| मेरा परीक्षा केन्द्र बेंगलुरु के एक डिग्री कॉलेज में पड़ा था| और यहीं से मेरी असल कहानी की शुरुआत होती है....
दरअसल, पहले तो मेरे माताजी-पिताजी ने तय किया था कि परीक्षा से एक या दो दिन पहले पिताजी और मैं ट्रेन से यात्रा करके बेंगलुरु पहुँच जायेंगे| परन्तु, हमारे इस प्लान में बदलाव उस समय हुआ, जब मेरे पिताजी ने बेंगलुरु में रहने वाले अपने स्कूल के दिनों के परम मित्र को मेरी ऑनलाइन प्रतियोगिता परीक्षा का केन्द्र बेंगलुरु में आने की बात बताई, और अपने वहाँ आने के प्लान के बारे में भी बताया|
ये खबर सुनकर पिताजी के मित्र ने उन्हें परीक्षा के लिये मुझे ट्रेन से अकेले उनके पास भेजने का आग्रह किया| पहले तो पिताजी ने सँकोच प्रकट किया, लेकिन अपने मित्र द्वारा बहुत जोर दिये जाने पर वो मुझे उनके घर भेजने के लिये तैयार हो गये|
अंत में दोनों मित्रों में ये राय बनी कि मुझे उनके यहाँ परीक्षा के बाद इस परीक्षा का परिणाम आने तक अगले पँद्रह से बीस दिनों तक रुकना था| ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि बाहर जाने से पहले मुझे अपने परिवार से अलग रहने का थोड़ा अनुभव हो जाये, जिससे जब मैं वास्तव में भारत को छोड़कर बाहर जाऊँ, तब मुझपर परिवार से दूर होने वाली बात का ज्यादा प्रभाव न पड़े|
ये मेरे पिताजी के वो मित्र थे, जिनके यहाँ हम लोग परिवार के साथ मिलने अक्सर अपनी छुट्टियों में बेंगलुरु जाया करते थे| वो भी अक्सर अपने परिवार को लेकर हमसे मिलने आया करते थे| दोनों परिवारों में बहुत बनती थी| दोनों ही परिवार जब भी आपस में मिला करते, तो एक-दूसरे में ऐसे घुल-मिल जाते, जैसे एक ही परिवार के सदस्य हों|
पहले तो मुझे भी उनके घर बेंगलुरु जाने में बहुत मजा आता था| मगर जब से मेने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की, उसके बाद से जब भी हम लोगों का प्लान बेंगलुरु में पिताजी के मित्र के घर पर जाने का बनता, तो मैं अक्सर उसे टाला करता| इसकी वजह थी, मेरे पिताजी के मित्र की एकलौती पुत्री रिया!.....
जब हम दोनों छोटे थे, तो एक-दूसरे के साथ बस ऐसे ही सारा-सारा दिन खेला करते, टेलीविजन पर कॉर्टून शो देखा करते| पर फिर हम जैसे-जैसे बड़े हुये, और दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा में पहुँचे, तो इस दरम्यान मेरी रिया के प्रति भावनायें बनने लगीं| पहले-पहले तो मुझे ये इस आयु में होने वाला आकर्षण ही प्रतीत हुआ| लेकिन समय गुजरने के साथ मैं अब रिया को पसन्द करने लगा था|
हालाँकि, अब हम लोग ज्यादा नहीं मिला करते थे, क्योंकि बड़ी कक्षा में पहुँचने के बाद बेंगलुरु में अब उसका भी फ्रैंड सर्किल बदला था| अब कभी-कभार मैं भी अपने परिवार के साथ बेंगलुरु में पिताजी के मित्र के परिवार से मिले उनके घर जाया करता, रिया थोड़ी-बहुत देर के लिये बैठकर मुझसे बातें किया करती, और फिर अपने नये-नये बने मित्रों में व्यस्त हो जाती|
अब रिया का ज्यादातर समय अपने इन नये मित्रों के बीच गुजरने लगा| हलाँकि, हम दोनों की दोस्ती में अभी भी कोई बदलाव नहीं आया था, पर अब वो अपने नये दोस्तों की वजह से मुझे ज्यादा समय नहीं दे पाती थी|
इसके विपरीत मेरा रिया के अलावा और कोई अन्य मित्र नहीं था, वही ले-देकर मेरी एकलौती मित्र थी| और इसी के चलते मैं कभी उससे अपने मन की बात कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया| मैं किसी भी वजह से अपनी दोस्ती को ख़राब नहीं करना चाहता था, और न ही अपनी एकलौती मित्र को खोना ही चाहता था|
दूसरी वजह ये थी कि मैं अपने पिताजी और उनके मित्र की वर्षों पुरानी मित्रता, और दोनों परिवारों के बीच के रिश्तों को ख़राब नहीं करना चाहता था| साथ ही मेरा स्वयं का ये मानना था, कि जब तक पढ़-लिखकर आप कुछ बन नहीं जाते, किसी अच्छे मुकाम तक नहीं पहुँच जाते, तब तक आपको इन सब बातों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये|
बस इन्हीं बातों की वजह से मेने कभी रिया को अपने मन की बात बताई ही नहीं, और इसी वजह से मैं बेंगलुरु में अँकल के घर जाना अवॉयड ही करता था| और इस बार भी कनाडा की तकनीकी यूनिवर्सिटी में एडमिशन की अपनी ऑनलाइन प्रतियोगिता परीक्षा के लिये उनके घर जाने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी|
लेकिन मैं अपने पिताजी की बात भी तो नहीं टाल सकता था, इसलिये मेने उनकी बात मान ली, और ‘हाँ’ कह दिया|
अगले ही दिन मेरे पिताजी ने रेलवे स्टेशन जाकर भोपाल से मेरा सेकण्ड एसी में परीक्षा से दो दिन पहले बेंगलुरु पहुँचने का रिजर्वेशन करा दिया| अब मैं सोचने लगा कि परीक्षा से दो दिन पहले मैं बेंगलुरु पहुँचकर क्या करूँगा? क्योंकि रिया तो अपने दोस्तों के साथ व्यस्त होगी, तो वो मुझे कहाँ समय दे पायेगी|
फिर मेने ये उपाय निकला कि मैं अपने साथ परीक्षा से सम्बन्धित कुछ नोट्स, जो काफी मेहनत करके मेने बनाये थे, उन्हें अपने साथ रख लूँगा, और दो दिन तक अँकल के घर पर रहकर उन्हें रिवाइज कर लूँगा| ऐसा विचार करके मैं अगले हफ्ते में अपने अँकल के यहाँ बेंगलुरु जाने के लिये तैयार हो गया|
अच्छा, इस यात्रा की कहानी भी बड़ी रोचक है| यह मेरे जीवन की पहली सोलो यात्रा होने वाली थी, और वो भी इतनी लम्बी….
दरअसल, उस समय मेरे पिताजी एक राष्ट्रीय स्तर की सरकारी बैंक में कार्यरत हुआ करते थे, और उनके कभी भी पूरे देश में किसी भी स्थान की ब्राँच पर स्थानान्तरण हो जाते थे| अच्छा, जिस समय की ये कहानी है, उस समय मेरे पिताजी की पोस्टिंग शिमला स्थित उनकी बैंक की ब्राँच पर थी|
तो इसलिये अब मुझे शिमला से बेंगलुरु के लिये सीधे रिजर्वेशन न मिल पाने की स्थिति में पहले शिमला से भोपाल तक का लम्बा और थका देने वाला सफर सड़क के रास्ते बस से पूरा करना था, और उसके बाद भोपाल पहुँचने वाली शाम में ही मुझे अकेले ही भोपाल रेलवे स्टेशन से अपनी बेंगलुरु की रेलगाड़ी को पकड़ना था| और ये सब मेरे लिए एकदम नया अनुभव होने वाला था|
यात्रा की तय तिथि को मेरे जीवन की पहली थका के रख देने वाली, और दिमाग को हिला के रख देने वाली एक लम्बी सोलो यात्रा आरम्भ हुयी, जिसका अन्त ऑनलाइन परीक्षा से दो दिन पहले, अर्थात 23 जून 2005 के दिन सुबह के लगभग 07:30 बजे बेंगलुरु रेलवे स्टेशन पर पहुँचने के साथ पूरी हुआ|
इस यात्रा के दौरान मेरा तरह-तरह के लोगों से मिलना हुआ, मुझे विभिन्न प्रकार के अनुभव हुये| कुल मिलाकर मेरी पहली सोलो यात्रा एक यादगार यात्रा बन गयी, जिसे मैं काफी लम्बे समय तक याद रखने वाला था|
जब मैं रेलवे स्टेशन से बाहर आया, तो वहाँ अँकल की बेटी रिया अपनी कार पर खड़ी हुयी मेरा इंतजार कर रही थी| जब मैं उसके पास पहुँचा, तो उसने मुझे देखकर मुस्कुराते हुये गले से लगा लिया|
उसका ऐसा व्यवहार देखकर मैं थोड़ा अचम्भित हो गया, मुझे रिया के द्वारा ऐसे व्यवहार की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी| न ही आज से पहले रिया ने मिलते समय ऐसा कुछ किया था| एक पल के लिये तो मुझे भी रिया का मुझे इस तरह से गले लगाना अच्छा लगा, लेकिन अगले ही पल मुझे पिताजी और अँकल की सच्ची दोस्ती की बात याद आते ही मेने रिया को अपने से अलग किया|
अब जिससे पहले मैं रिया से कुछ पूछ पाता, उससे पहले रिया ने ही मुझसे अपनी जोशीली आवाज में पूछा, “और भई सिड, हाऊ आर यू?”
उसकी बात का जवाब देते हुये मैं उससे बोला, “यार रिया, मैं तो एकदम अच्छा हूँ| तू बता तुझे क्या हुआ है? तू इस बार मुझे काफी बदली-बदली सी लग रही है? सब कुछ ठीक है न?”
इसपर रिया उत्साहित होते हुये अपने नटखट अन्दाज में मेरी तरफ ऊँगली से इशारा करते हुये बोली, “हैं न सिड! तुझे भी ऐसा ही लगा न| काफी दिनों से मैं भी अपने अंदर काफी चैंजेस को फील कर रही थी|”
फिर एक साँस भरकर मुझसे आगे बोली, “यार, सच कहूँ न तो ये बात मैं किसी से शेयर ही नहीं कर पा रही थी| बट अब तू जो आ गया है, मेरे चाइल्डहुड का ट्रू वाला फ्रैंड| तो तुझसे तो ये बात शेयर करनी बनती ही थी| आजकल न सबकुछ जैसे बदला-बदला सा लगता है| एकदम गुलाबी-गुलाबी सा….”
जब रिया मुझे ये सब बता रही थी न, तो उस समय उसके चेहरे पर उभर कर आई प्राकृतिक खुशी जैसे कह रही हो कि उसके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य हुआ है, जिससे वह बहुत खुश थी|
मगर उस समय मुझे उसकी कोई भी बात जैसे समझ ही नहीं आ रही थी| मैं बस अपना सामान अपने कन्धों पर लादे हुये, हक्की-बक्की अवस्था में खड़ा हुआ बस रिया की ओर देखे जा रहा था, बिना कुछ भी बोले| उस समय मैं सिर्फ ये बात जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर रिया के साथ हुआ क्या है? वो ऐसी बातें क्यों कर रही है?”
फिर जब मुझसे रहा नहीं गया, तब मेने रिया से पूछ ही लिया, “रिया, सच-सच बता क्या बात है? तू ठीक तो है न?”
मेरी इस बात पर रिया अपने चेहरे पर एक मासूम सी हँसी लाते हुये मुझसे बोली, “अरे नहीं यार सिड, मुझे कुछ नहीं हुआ है| मैं एकदम ठीक हूँ|”
इसके बाद रिया अपनी कार का ड्राइविंग सीट के बगल वाला दरवाजा खोलते हुये मुझे उसमें बैठने का इशारा करते हुये बोली, “अच्छा, चल यार सिड! अब जल्दी से अपना सामान कार में रख और आगे आकर बैठ जा, फिर जल्दी से घर चलते हैं|” और ये कहते हुये वो कार की ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गयी| मेने भी कार की पीछे वाली सीट पर अपना सारा सामान रख दिया, और फिर कार में आगे रिया के बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया|
मेरे कार में बैठने के बाद रिया कार को बेंगलुरु की सड़कों पर अपने घर के मार्ग पर ड्राइव करने लगी| उसके घर के मार्ग में मेने धीमे स्वर में रिया से पूछा, “अच्छा रिया, एक बात पूछूँ क्या?” इसपर वो मुझसे बोली, “ हाँ सिड! पूछो न….”
मेने पूछा, “अच्छा, तू मुझे सबसे पहले तो ये बता कि तूने ये सिड-सिड क्या लगा रखा है? मेरा कितना अच्छा तो नाम है, सिद्धार्थ….”
उसने मेरी बात का उत्तर दिया (चेहरे पर नटखट मुस्कान लिये हुये), “अरे यार सिड, तू भी भई कितना बोरिंग है| तुझे इतना भी नहीं पता कि ये आजकल का फैशन है| ये कूल लगता है|”
इसपर मैं उससे बोलै (मुँह बनाते हुये), “नहीं यार रिया, मुझे कोई कूल-वूल बनने का शौक नहीं है| तू बस मुझे सिद्धार्थ कहकर ही बुला प्लीज…. मुझे अच्छा लगेगा|”
रिया ने मेरी बात सुनकर बस ‘हम्म’ कर दिया, पर कोई संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं दिया|
अपने घर के मार्ग पर कार ड्राइव करते-करते अचानक से रिया को जैसे कुछ याद आ गया हो, और वो धीरे से मुझसे बोली, “बाई दी वे, माय डिअर बेस्ट फ्रैंड सिड, अम्म सॉरी-सॉरी सिद्धार्थ, आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें…. हैप्पी बर्थडे तो यू!”
मुझे तो पेपर की उत्सुकता की वजह से ये याद ही नहीं था, कि उस दिन मेरा जन्मदिन था| वो तो जब रिया ने मुझे विश किया, तब मुझे याद आया|
फिर रिया मुझसे शरारत करते हुये बोली, “तो मिस्टर, आखिरकार आज आप पूरे 19 के हो ही गये| अँकल वाली ऐज होने की बधाई…..”
उसकी बात सुनकर मैं अपना मुँह बनाते हुये उससे बोला, “ओ, हैलो मैडम! मैं न बस अभी सिर्फ 19 इयर्स का ही हुआ हूँ| और हाँ, एक और बात…. अगर मैं अँकल वाली ऐज का हुआ हूँ न, तो तू भी पिछले महीने में 18 इयर्स की बूढी आंटी हो गई है|”
और ये कहने के बाद मैं शरारत भरी नज़रों से रिया को घूरने लगा| रिया ने गुस्से से अपना मुँह बनाते हुये मेरी तरफ देखा, और बोली, “क्या मैं आंटी!”
इसपर मैं रिया की चुटकी लेते हुये बोला, “हाँ आंटी!”
फिर एक गहरी साँस लेने के बाद उसकी तरफ देखते हुये बोलै, “हाँ तो, शुरू किसने किया था? जैसे को तैसा!”
इसबार रिया मुझे देखते हुये अपने चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान लिये हुये खुलकर हँस पड़ी, और फिर बोली, “क्या यार सिड! तू भी न भई….”
मेने रिया को टोका, “फिर से सिड!”
वो माफ़ी माँगते हुये बोली, “ओ, सॉरी-सॉरी, सिद्धार्थ! अब ठीक है….”
फिर कुछ सोचते हुए बोली, “अच्छा, ये बताओ कि आज बर्थडे पार्टी सेलिब्रेट करने कहाँ चलना है?”
इस बात का उत्तर देते हुये मेने रिया से कहा, “अरे, कहाँ बर्थडे पार्टी! अभी 25 तारीख को एग्जाम है| पहले उसको देख लेते हैं, बाद में पार्टी के बारे में सोचते हैं|”
फिर थोड़ा-सा विराम लेते हुये मेने आगे कहा, “और वैसे भी बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए बाहर जाने की क्या जरुरत है? हम अपने परिवार के बड़ों के साथ घर पर भी तो सेलिब्रेट कर सकते हैं|”
मेरी बात सुनकर रिया मुँह बिचकाते हुये बोली, “चल ठीक है फिर, आज हम घर पर ही तेरा 19वां बर्थडे सेलिब्रेट करते हैं|”
और ये बात कहकर वो फिर से कार ड्राइव करने में व्यस्त हो गई| कुछ देर कार से सफर करने के बाद हम दोनों रिया के घर पहुँच गये| घर पर पहुँचते से ही अँकल-आंटी मेरी खातिरदारी में लग गये| आज आंटी ने हम बच्चों के लिये अपने गोवा स्टाइल वाला स्वादिष्ट सी फ़ूड बनाया था| दरअसल, रिया की माताजी मूल रूप से गोवा की रहने वाली थीं, इसलिये गोवा स्टाइल वाला सी फ़ूड उनकी खासियत थी|
मेने उस दिन बेंगलुरु वाले अँकल के घर पहुँचने के बाद दोपहर में कुछ घण्टे आराम करके अपनी यात्रा की थकान को उतारा| शाम के वक़्त मेने अँकल-आंटी और रिया के साथ डायनिंग टेबल पर बैठकर एक-साथ रात्रि के भोजन का आनन्द लिया|
रिया और मुझे डायनिंग टेबल पर हँसते-खेलते हुये भोजन का आनन्द लेते हुये देखकर अँकल-आंटी के चेहरों पर उभरकर आयी खुशी देखते ही बन रही थी|
उनकों इस तरह से खुश देखकर मैं धीरे से रिया के पास जाकर उसके कान में फुसफुसाते हुये बोला, “देखा माय डिअर बेस्ट फ्रैंड! आज हमने अपने घर के बड़ों के साथ बर्थडे वाला दिन सेलिब्रेट किया, तो इससे उन्हें कितनी ज्यादा ख़ुशी मिली| तू उनके चेहरों की स्माइल तो देख….”
रिया अब अँकल-आंटी की तरफ देखती हुई धीरे से मुझसे बोली, “हाँ यार सिद्धार्थ, तू ठीक कह रहा है| वाकई में डेड-मोम बहुत खुश दिख रहे हैं|”
फिर धीरे से सीधे हाथ से चुटकी बजाते हुये बोली, “आगे से मैं भी कोई भी सेलिब्रेशन का मौका हो, मोम-डेड के साथ घर पर ही सेलिब्रेट किया करुँगी|”
और फिर इस बार हम दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे|
उस दिन हमने खूब एन्जॉय किया| अँकल के घर पर आने के बाद अगले दो दिन कहाँ गये पता ही नहीं चला, और 25 जून 2005, यानी ऑनलाइन एडमिशन परीक्षा वाला दिन आ ही गया| मेने समय से अपने परीक्षा केन्द्र पर जाकर पूरी तैयारी के साथ ऑनलाइन परीक्षा में भाग लिया| अब समय धीरे-धीरे करके गुजरने लगा|
मैं अगले एक महीने के लिये बेंगलुरु में अँकल के यहाँ ही रुकने वाला था| ऑनलाइन परीक्षा में भाग लेने वाले बच्चों को ई-मेल के द्वारा सूचित किया गया था कि परीक्षा के ठीक एक हफ्ते के अन्दर इस परीक्षा के परिणाम संस्था की आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित कर दिये जायेंगे|
साथ ही इस परीक्षा में रैंक प्राप्त करने वाले बच्चों को उनकी ई-मेल के जरिये उनका कनाडा की किस यूनिवर्सिटी में एडमिशन हुआ है, ये भी सूचित करने की बात कही गयी थी|
अब मैं बेसब्री से अपने परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा| मैं रोजाना सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले रिया के कमरे में मेज पर लगे उसके पी0सी0, अर्थात डेस्कटॉप कम्प्यूटर पर बैठकर संस्था की आधिकारिक वेबसाइट पर लॉगिन करके अपना स्टेटस देखता|
इसी बीच एक दिन रिया ने शाम के समय मुझे अपने कुछ दोस्तों से मिलवाने का प्लान बनाया| इसी दिन परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था के द्वारा मुझे ई-मेल द्वारा सूचित किया गया था कि कल आपका परीक्षा परिणाम सुबह 10:00 बजे तक आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित हो जायेगा| रिजल्ट की बात को लेकर मेरा उस दिन कहीं भी जाने का मन नहीं था| मगर जब रिया ने जोर देकर मुझसे कहा, तो मैं उसे मना नहीं कर पाया|
शाम को मैं 06:00-06:30 बजे के आस-पास रिया के साथ उसके दोस्तों से मिलने पहुँचे| रिया मुझे अपने दोस्तों से मिलवाने एक डिस्को पब में लेकर आई थी| मैं आश्चर्यचकित था, क्योंकि मैं उस समय तक कभी इस तरह के स्थान पर गया ही नहीं था|
साथ ही मैं रिया में इस तरह के बदलाव को देखकर भी काफी आश्चर्यचकित था| उस दिन मेने रिया से कुछ कहा तो नहीं, पर रिया को बार-बार देखते हुये बस यही सोच रहा था कि, “ये रिया काफी बदली-बदली सी है| ये वो रिया बिल्कुल नहीं है, जिसे मैं जानता था|”
खेर, डिस्को पब में पहुँचकर रिया ने मेरा परिचय वहाँ मौजूद सभी दोस्तों से कराया| इसके बाद वो अपने दोस्तों में व्यस्त हो गई| एक तो मुझे परीक्षा परिणाम की चिंता हो रही थी, और दूसरी ओर रिया मुझे ऐसी अजीब सी जगह पर ले आयी थो, जहाँ पर मैं बिल्कुल भी सहज महसूस नहीं कर रहा था|
इसके चलते अब मुझे एक अजीब सी बैचेनी का भी एहसास होने लगा था| मेने काफी बार सोचा भी कि मैं रिया को बुलाकर उसे ये बात बताऊँ, और हम लोग अभी के अभी इस जगह से निकलकर कहीं और चले जायें| लेकिन रिया उस समय अपने दोस्तों में इतना व्यस्त थी कि उसका मेरी तरफ ध्यान ही नहीं गया|
वो अपने दोस्तों के साथ खा रही थी, पी रही थी, और नाच रही थी| एक बार के लिये तो मुझे लगा कि जैसे वो इस बात को भूल ही गई हो कि मैं भी उसके साथ आया था| इस बीच रिया के कुछ दोस्तों ने मुझे भी जबरजस्ती नाचने के लिये कहा, और हाथ पकड़कर डांस फ्लोर तक ले जाने की भी कोशिश की, मगर मेने उनको मना कर दिया, और अपनी जगह पर वापस आकर बैठ गया, और अपनी जेब से अपने नोकिआ के मोबाइल फ़ोन को निकलकर कभी उसपर मैसेज पढ़कर, तो कभी स्नेक गेम खेलते हुये बेकार मन से अपने समय को व्यतीत करने लगा|
उस दिन पब में मुझे रिया के बाकी सारे दोस्त तो ठीक ही लगे, मगर पता नहीं क्यों? उनमें से एक लड़का था, जिसपर उसकी हरकतों की वजह से मेरा ध्यान बार-बार जा रहा था| वो नाचते समय बार-बार रिया, और अपने ग्रुप की बाकि लड़कियों के साथ अजीब तरह की हरकतें कर रहा था| कभी वो लड़कियों को नाचते-नाचते धक्का देता, या फिर उन्हें छूने की कोशिश करता|
लड़कियाँ भी उसकी इन हरकतों से सहज नहीं थीं, पर पता नहीं वो उस लड़के से कुछ बोल भी नहीं पा रही थीं| उस लड़के की हरकतों को देखकर मैं समझ गया था कि इस लड़के में कुछ तो गड़बड़ अवश्य है|
मेने पहले तो काफी देर तक देखा, पर जब उसकी हरकतें रिया के प्रति कुछ ज्यादा ही बढ़ गयीं, तो मैं तुरन्त उठकर रिया के पास गया, और उसका हाथ पकड़कर डांस फ्लोर से नीचे उतारकर उसको वहाँ से ले जाने के लिए बहाना बनाया, मेने उसे बताया, “मेरी तबियत कुछ सही नहीं लग रही है, और हमें अभी तुरन्त ही घर जाना चाहिये|” और मेने रिया के सामने ऐसे एक्ट किया, जैसे वास्तव में मेरी तबियत बहुत ज्यादा ख़राब हो रही हो|
मैं इतना तो जानता था कि चाहे जो हो जाये, मगर मुझे ऐसी स्थिति में देखकर रिया अपनेआप को रोक नहीं पायेगी, और मुझे वहाँ से लेकर तुरन्त घर पर लौट जायेगी| और जैसा मेने सोचा था, बिल्कुल वैसा ही हुआ| मेरी तबियत बिगड़ते देखकर रिया तुरन्त मुझे वहाँ से लेकर अपने घर वापस आ गई|
अगले दिन ठीक 10:00 बजे संस्था की आधिकारिक वेबसाइट पर एडमिशन की ऑनलाइन परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ| कुछ ही देर बाद मुझे संस्था के द्वारा मेरी ई-मेल पर मेल भेजकर सूचित किया गया कि इस परीक्षा में मेरी वर्ल्ड वाइड 11206 रैंक बनी है, और इसके चलते मेरा चयन कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलगरी के बी0टेक0 कम्प्यूटर साइंस के स्कॉलरशिप प्रोग्राम में हो गया है, और मुझे आने वाले तीन से चार दिनों के अन्दर यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर सभी आवश्यक डाक्यूमेंट्स को अपलोड करके सबमिट करना है|
मेरे परीक्षा में अच्छे नम्बर्स से उत्तीर्ण होने, और कनाडा की यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप प्रोग्राम में एडमिशन मिलने की बात से सब लोग बहुत खुश थे| सबसे ज्यादा खुश तो उस दिन रिया थी| रिजल्ट के बाद उसने मुझे ख़ुशी से झूमते हुये गले लगाया, और एडमिशन के लिये बधाई भी दी| इधर अँकल-आंटी भी मुझे शुभकामनायें देकर अपने-अपने काम पर निकल गये|
अँकल-आंटी के जाने के बाद मेने तुरन्त अपने घर पर कॉल करके अपने माताजी-पिताजी को अपने एडमिशन की सूचना दी| वो भी ये खबर सुनकर बहुत खुश हुये| उस दिन दोनों ही घरों में जश्न का माहौल था| सब मेरी सफलता से बहुत प्रसन्न थे| मगर उस दिन इस बात से सबसे ज्यादा खुश रिया दिखाई दे रही थी| उसको इतना खुश देखकर उस दिन मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था|
दो दिन बाद मेरे माताजी-पिताजी भी रेल यात्रा करके बेंगलुरु में अँकल के घर पर पहुँचने वाले थे| हम सबने मिलकर फैसला किया कि मेरे माताजी-पिताजी के बेंगलुरु पहुँचने के बाद सब लोग साथ में मिलकर मेरी सफलता को सेलिब्रेट करेंगे|
अगले दिन मेने सबसे पहले बिना किसी देरी के यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर जिन डाक्यूमेंट्स की आवश्यकता थी, उन्हें अपलोड करके सबमिट कर दिया, और यूनिवर्सिटी के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा|
अगले दिन दोपहर के समय रिया के डेस्कटॉप कम्प्यूटर पर इंटरनेट का उपयोग करते समय मुझे यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलगरी द्वारा ठीक 15 दिन बाद यूनिवर्सिटी कैंपस में आकर अपना कोर्स ज्वाइन करने की लिखित सूचना मेरी ई-मेल में अटैच किये गये लेटर में दी गई थी| मेने अपने बगल में बैठी रिया को ये खबर सुनाई| वो ये खबर सुनकर बहुत खुश हुयी, पर अगले ही क्षण वो थोड़ी मायूस भी हो गयी|
रिया मायूस मन से मुझसे बोली, “बहुत बढिया भई, अब तो तू मुझे छोड़कर कनाडा चला जायेगा| फिर तो वहाँ अपने नये-नये दोस्त बनायेगा, और अपनी इस दोस्त को भूल जायेगा| अब मैं अपनी बातें किसके साथ शेयर करुँगी? बता मुझे….”
और इस बार ये बात बोलते-बोलते उसकी आँखों में आँसू छलक आये| उसको इस तरह से देखकर मुझे भी बहुत अजीब-सा लग रहा था|
फिर मेने अपनी भावनाओं को समेटते हुये धीरे से उसके हाथ को पकड़कर सहलाते हुये उसको समझाया, “बक्क यार रिया, तू पागल है क्या? तू ऐसा क्यों सोच रही है कि मैं वहाँ जाकर तुझे भूल जाऊँगा| ऐसा कभी नहीं होगा| अरे यार, तू तो मेरी एकलौती फ्रैंड है| मेरी बेस्ट फ्रैंड,.. मेरी एंजेल…. तुझे भला मैं कैसे भूल सकता हूँ| तू भरोसा रख, मैं तुझे कभी नहीं भूलूँगा, कभी नहीं….”
ये कहते हुये इस बार मेरी भी आवाज भर्रा गयी, और मेरी भी आँखों में आसूँ उमड़ आये| मगर मेने अपनेआप को सँभालते हुये तुरंत अपने आसूँ पोंछ डाले, और रिया की तरफ देखते हुये हल्के से मुस्कुराया|
रिया ने कसकर मेरे हाथ को पकड़कर सुबकते हुये मुझसे पूछा, “सच्ची सिद्धार्थ, तू सच कह रहा है न!.... तू मुझे कभी नहीं भूलेगा? प्रॉमिस….”
उसकी आँखों से आँसुओं को पोंछते हुये मैं उसको भरोसा दिलाते हुये बोला, “और नहीं तो क्या.. मैं तुझे कभी नहीं भूलूँगा| और हाँ, हम फ़ोन और ई-मेल से एक-दूसरे के टच में रहेंगे| जब भी हममें से किसी को भी एक-दूसरे की याद आया करेगी, तो फ़ोन या ई-मेल के जरिये आपस में बातें कर लिया करेंगे| समझ गई!.... अब चल रोना बन्द कर, और खुश हो जा| आज तो खुलकर सेलिब्रेट करने वाला दिन है|”
और फिर हम दोनों आपस में इधर-उधर की सामान्य बातें करने लगे| मैं कनाडा जाने से पहले अपना ज्यादा से ज्यादा समय रिया के साथ बिताना चाहता था| मैं अपने साथ उसकी अच्छी यादों को लेकर कनाडा जाना चाहता था|
अभी हम लोग आपस में बात कर ही रहे थे कि तभी अचानक से रिया के मोबाइल फ़ोन की घंटी बज उठी| वो अपना फ़ोन रिसीव करते हुये वहाँ से उठते हुये अपने कमरे की बालकोनी में चली गयी, और वहाँ खड़ी होकर किसी से बातों में व्यस्त हो गयी|
मैं भी वहाँ से उठकर बाहर हॉल में सोफे पर आकर बैठ गया, और रिया के बहार आने का इंतजार करने लगा| मुझे रिया के साथ ढेर सारी बातें जो करनी थीं|
अभी मैं बाहर हॉल में बैठकर रिया के बाहर आने का इन्तजार कर ही रहा था, कि तभी रिया गुस्से से तमतमाती हुई अपने कमरे से बाहर निकलते हुये घर से बाहर की तरफ जाने लगी|
उसके एक हाथ में उसकी बाइक की चाबी और दूसरे हाथ में हेलमेट लगा हुआ था| उसको इस तरह से गुस्से में घर से बाहर जाते हुये देखकर मुझे इतना तो समझ में आ गया था कि हो न हो रिया अभी कुछ देर पहले उसके मोबाइल पर आयी फ़ोन कॉल की वजह से परेशान थी, और गुस्से में थी|
इससे पहले मैं कुछ समझ पाता या रिया से कुछ पूछ पाता कि, “बात क्या है? या फिर ये कि वो कहाँ जा रही थी?”, उससे पहले वो गुस्से में तमतमाती हुयी घर से बाहर जा चुकी थी| और मैं बस हैरान-परेशान सा खड़ा हुआ रिया को बाहर जाते हुये देखता रह गया| उस समय की स्थिति को देखकर मैं इतना तो समझ गया था कि कोई ऐसी बात जरुर हुयी है, जिसकी वजह से रिया इतनी अपसेट थी| मगर ये मामला इतना ज्यादा गम्भीर हो सकता था, उस वक़्त मुझे इसका जरा-सा भी अन्दाजा नहीं था|
मुझे तो उस समय केवल रिया की चिंता हो रही थी| मेरे लिये बेंगलुरु ज्यादा जाना-पहचाना भी नहीं था| न ही मुझे यहाँ के रास्तों की ज्यादा जानकारी ही थी| ऐसे में रिया को मैं ढूंढ़ने के लिये भी नहीं जा सकता था| बस अँकल के घर पर रहकर ही उसके आने की प्रतीक्षा कर सकता था| उस समय मुझे रिया की बहुत चिंता हो रही थी| साथ ही मैं स्वयं को ऐसी स्थिति में बहुत असहाय और लाचार महसूस कर रहा था|
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ? या किस तरह से रिया का पता लगाऊँ? फिर मेने खुद को सम्भाला, और बिना कोई देरी किये अँकल को फ़ोन कॉल करके पूरी बात उन्हें बताई|
मेरी बात सुनकर घबरा तो वो भी गये, लेकिन उन्होंने मुझे चिंता नहीं करने, और परेशान न होने की बात कहकर दिलासा दिया, और थोड़ी देर में आंटी के साथ घर पहुँचने की बात कही और ये कहते हुये उन्होंने फ़ोन काट किया|
थोड़ी ही देर में अँकल-आंटी घर लौट आये| उनके चेहरों पर परेशानी के भावों को साफ देखता जा सकता था| उन्हें देखकर इस बार मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सका, और आंटी के गले से लिपटकर फूटफूटकर रोने लगा|
उन दोनों ने मिलकर मुझे चुप कराया, और हिम्मत रखने की बात कही, और एक बार फिर से उन्होंने मुझसे पूरी बात सुनी| मेने भी उन्हें फिर से सारी बातें बताईं| अँकल-आंटी ने मेरी पूरी बात बड़े ध्यान से सुनी| बात सुनने के बाद अब अँकल-आंटी मेरे साथ गम्भीरता से रिया के विषय में पता लगाने के बारे में सोचने लगे|
आंटी रिया की माँ होने के नाते उसके लिये ज्यादा भावुक हो रही थीं, उन्होंने रिया की चिंता करते हुये अँकल और मुझे पास के पुलिस स्टेशन पर जाकर रिपोर्ट लिखाने का सुझाव दिया| लेकिन अँकल ने उन्हें कुछ ओर देर रिया का इन्तजार करने की बात कहकर दिलासा देने की कोशिश करी| उस समय उन दोनों की हालत रिया की चिंता की वजह से काफी ख़राब थी|
अभी हम तीनों चिंतित अवस्था में बैठे हुये रिया के आने की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि तभी अँकल के घर के लैंडलाइन वाले फ़ोन की घंटी बज उठी| इससे पहले अँकल-आंटी में से कोई फ़ोन उठा पाता, मेने सामने मेज पर पड़े कॉर्डलेस फ़ोन को एक झटके के साथ रिसीव किया, और स्पीकर पर दाल दिया|
फ़ोन रिसीव करने पर पता चला कि उस कॉल पर सामने से रिया की कोई ‘श्रीवैली’ नाम वाली दोस्त बोल रही थी| फ़ोन पर उसकी आवाज सुनकर लग रहा था कि किसी बात से वो बहुत डरी हुयी और घबराई हुयी थी| इस बात से हमारी चिंता दोगुनी जो गयी|
फिर भी मेने अपने भीतर हिम्मत जुटाते हुये रिया की दोस्त श्रीवैली से पूरी बात बताने को कहा| तब उसने विस्तारपूर्वक सारी बातें बताईं| जैसे-जैसे श्रीवैली कॉल पर हमें सारी बातें बता रही थी, वैसे-वैसे सारी बातों से पर्दा भी उठता चला गया, और तब जाकर हमें इस मामले की गम्भीरता का एहसास हुआ था|
श्रीवैली ने हमें सेहमी हुयी आवाज में बताया कि, “सिद्धार्थ उस शाम को जब तुम रिया को पब से जबरजस्ती तबियत ख़राब होने की बात कहकर घर पर ले गये थे, तब परेश को तुम्हारी ये बात बहुत बुरी लगी थी, और अगले दिन उसने अपने कुछ गुण्डे दोस्तों के साथ मिलकर तुम्हें सबक सीखने का प्लान बनाया था|”
ये वही महानुभाव थे, जिनकी हरकतों को देखकर मुझे वो सही नहीं लगे थे, और उनकी इन हरकतों से रिया को बचाने के लिये ही मैं रिया को अपनी तबियत ख़राब होने की बात बताकर घर पर वापस ले आया था|
श्रीवैली की बातें सुनकर अब मुझे सारा मामला साफ-साफ समझ में आ रहा था| मगर फिर भी मैं ये सबकुछ श्रीवैली के मुँह से सुनना चाहता था| जिससे हम उस लड़के परेश के खिलाफ सुबूत जमा कर सकें|
इसलिये मेने तुरन्त सोफे के पास रखे हुये अपने बैग से अपना वॉकमेन निकाला, और उसमें गानों की टेप डालकर उसे सामने मेज पर रखने हुये उसका रिकॉर्डिंग वाला बटन स्टार्ट कर दिया, और कॉर्डलेस फ़ोन को फिर से स्पीकर पर डालकर अपने वॉकमैन के पास रख दिया|
इसके बाद मेने श्रीवैली को परेश का प्लान विस्तार से हमें बताने के लिए कहा| तब श्रीवैली ने हमें परेश के पूरे प्लान के बारे में बताया|
जब वो हमें परेश के प्लान के बारे में बता रही थी, तब अँकल-आंटी, और मैं हम तीनों उसकी बात को बड़े ध्यान से सुन रहे थे| थोड़ी ही देर में श्रीवैली ने परेश का सारा कच्चा-चिट्ठा हमारे सामने खोलकर रख दिया था| श्रीवैली से बात करने के बात हम तीनों स्तब्ध रह गये, और चिंतित मुद्रा में एक दूसरे को देखने लगे|
परेश ने अपने गुण्डे दोस्तों के साथ मिलकर मेरे और रिया के साथ मारपीट करने का प्लान बनाया था, और उसी प्लान के तहत परेश ने या तो खुद, या फिर किसी और से रिया को फ़ोन कॉल पर कुछ न कुछ ऐसा अवश्य कहलवाया था, जिसे सुनकर रिया और मुझे गुस्सा आ जाता, और हम तैश में आकर परेश को सबक सिखाने उसके द्वारा बताई गयी जगह पर मिलने पहुँच जाते, और वो अपने बुरे मंसूबों में कामयाब हो जाता|
लेकिन ऐसा हुआ नहीं, उस कॉल पर अकेले रिया ने ही सामने वाले व्यक्ति से बात करी| सामने वाले व्यक्ति ने उसे कॉल पर ऐसा कुछ तो अवश्य कहा, जिससे रिया को गुस्सा आ गया, और वो उस व्यक्ति को गुस्से में सबक सिखाने के लिये मुझे इस बारे में बिना कुछ बताये, घर से अकेले ही निकल पड़ी थी|
ये सब जानने के बाद हमें इस बात का एहसास हुआ कि रिया ने उन लोगों की बातों में आकर स्वयं को कितनी बड़ी मुसीबत में डाल दिया है| ये सब जानकार हमें रिया की और ज्यादा चिन्ता होने लगी| मैं ये अब बातें जानकर जैसे अन्दर ही अन्दर टूट गया था, और इन सबका जिम्मेदार स्वयं को मान रहा था|
अचानक से मेरी आँखों में आँसू छलक आये, और गले में कफ जमने लगा| रोने और गले में कफ होने की वजह से मैं भरभराती आवाज से सुबकते हुये अँकल-आंटी से माफ़ी माँगते हुये उनसे बोला, “सॉरी अँकल-आंटी! मुझे माफ़ कर दीजिये| ये सब कुछ मेरी वजह से हो रहा है| अगर मेने उस दिन पब में ऐसे रिएक्ट नहीं किया होता, तो आज ऐसा कुछ भी नहीं होता| सॉरी!”
और ये कहते हुये मैं फूटफूटकर रोने लगा| अँकल मुझे दिलासा देते हुये हिम्मत रखने की बात कहते हुये मेरे कन्धे पर अपना हाथ रखते हुये बोले, “बस बेटा, बस.. हिम्मत रखो! कुछ नहीं होगा| और इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है| गलती तो ऐसे बन्दों की है, जो इस लेवल की सोच रखते हैं, गलती उस लड़के परेश की है|”
फिर थोड़ा विचार करते हुये वो आगे बोले, “हाँ, बस तुम लोगों से गलती इतनी सी हुयी कि पहले तो तुम लोगों को ऐसी जगह पर जाना ही नहीं चाहिये था, और अगर गये भी थे, तो हमें बताना तो चाहिये था| और जब तुम लोग उस रात में उस पब से लौट के आये थे, तो उसके बाद तो कम से कम वहाँ क्या हुआ था, इसकी जानकारी तो हमें देनी ही चाहिये थी|”
इसके बाद अँकल ने मुझे अपना वॉकमेन, जिसपर मेने रिया की दोस्त श्रीवैली की बातें रिकॉर्ड की थीं, उसे अपने साथ लेने की बात कहते हुये हॉल की एक दीवार पर लगी रिया की तस्वीर को उतारकर अपने साथ लेकर पुलिस में रिपोर्ट लिखाने के लिये चलने की बात की|
अभी हम लोग जल्दी-जल्दी पुलिस स्टेशन के लिये निकलने ही वाले थे, कि तभी उनके लैंडलाइन फ़ोन की घण्टी एक बार फिर से बज उठी| अँकल ने आगे बढ़कर फ़ोन रिसीव किया|
कॉल पर बात करने पर पता चला कि ये कॉल उनके इलाके में स्थित एक अस्पताल से था| दूसरी तरफ से अँकल को बताया गया कि कुल पाँच लड़कों ने रिया को एक खाली पड़े पार्क के पास घेरकर हॉकी-डंडों से बहुत बुरी तरह पीटा है, जिसकी वजह से उसके पूरे शरीर पर काफी गहरी चोटें आईं हैं| और अस्पताल से हमें फ़ौरन उसके पास पहुँचने की बात कही गयी|
अँकल ने स्वयं हिम्मत रखते हुये परिस्थिति को स्थिर बनाये रखने के लिये उस समय आंटी और मुझे बस इतना बताया कि रिया मिल गयी है, और वो ठीक है| और वो रिया को लेकर आने की बात करने लगे|
मगर आंटी को अँकल की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, इसलिये वो भी लगातार अँकल के साथ रिया के पास जाने की जिद करने लगीं| जैसे-तैसे अँकल ने आंटी को समझाया कि सबकुछ ठीक है, और रिया भी एकदम ठीक है| तुम यहीं घर पर रुको, हम दोनों जाकर रिया को घर पर वापस लेकर आते हैं| अँकल ने आंटी को ऐसे समझाते हुये चलने के लिये अपनी कार की चाबी उठायी, और मेरी तरफ देखते हुये अपने साथ चलने का इशारा किया|
मुझे अँकल के साथ चलते हुये कुछ अजीब तरह का एहसास हो रहा था, जैसे वो हमसे कुछ छुपा रहे हों| सोसायटी की लिफ्ट से बाहर निकलते वक़्त जल्दबाजी में मेरा हाथ उनके शरीर से हलके-से रगड़ खा गया|
तब मुझे एहसास हुआ कि उनके हाथ-पैर तो एकदम ठण्डे पड़ चुके थे, और वो मन ही मन कोई बात सोचकर नर्वस भी हो रहे थे| उनकी ऐसी हालत देखकर अब मुझे अंदेशा होने लगा था कि हो न हो रिया के साथ जरूर कुछ घटना घट गई है, जिसकी वजह से अँकल इतने परेशान हैं|
फिर भी मैं बिना कुछ उनसे पूछे, चुपचाप उनके साथ कार की तरफ आगे बढ रहा था| हाँ, मैं उनको हर वक़्त नोटिस अवश्य कर रहा था, और साथ ही सचेत भी था, कि यदि उनको कुछ दिक्कत होती है, तो मैं उन्हें सहारा दे सकूँ|
कार तक पहुँचते-पहुँचते अँकल की हिम्मत जवाब दे गई, और अचानक से उनके पैर उखड़ गये| मेने लपककर अँकल को सहारा देकर उनके हाथ से कार की चाबी लेते हुये कार को खोलकर उसमें उन्हें बैठाया, और उन्हें पानी की बोतल से थोड़ा पानी पिलाया| पानी पीने के कुछ पल के बाद जब उनके शरीर में फिर से थोड़ी हिम्मत आ गई, तो मेने कार की ड्राइविंग सीट पर फुर्ति के साथ बैठते हुये अँकल से पूछा कि रिया को लेने कहाँ चलना है|
मेरे द्वारा पता पूछे जाने पर पहले तो अँकल के मुँह से शब्द नहीं निकले, मगर दोबारा पूछने पर उनके मुँह से लड़खड़ाये स्वर में पास ही में स्थित सिटी सेंट्रल हॉस्पिटल का नाम निकला| उनके मुँह से अस्पताल का नाम सुनने के साथ ही अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया कि हो न हो रिया के साथ कुछ तो बहुत बुरा हुआ है|
मगर फिर सारे गलत विचारों को किनारे रखकर मेने हिम्मत की, और अपने दिमाग को शांत किया, और अस्पताल के मार्ग पर कार को ड्राइव करना चालू कर दिया|
रास्ते में अँकल ने मुझे सारी बात बताई| उनकी बातें सुनकर मुझे उन लड़कों पर गुस्सा तो इतना आ रहा था कि अभी जाकर उनके मुँह तोड़ डालूं| मगर इस समय मुझे रिया की बहुत चिंता हो रही थी| मैं जल्दी से जल्दी उसके पास पहुँचना चाहता था|
मुझे ऐसा लग रहा था कि जो मेरे साथ घटने वाला था, उससे मुझे बचाने के लिये रिया ने सबकुछ अपने ऊपर ले लिया था| और ये बात सोचकर तो मुझे रिया के लिये और भी बुरा लग रहा था| मैं बस कैसे भी करके जल्दी से रिया के पास पहुँचना चाह रहा था|
कुछ देर की ड्राइव के बार आख़िरकार हम लोग अस्पताल पहुँच ही गये| मेने जल्दी से अस्पताल की पार्किंग में अँकल की कार को पार्क किया, और अँकल को सहारा देकर कार से नीचे उतरा, और फिर हम दोनों अस्पताल के स्टाफ से रिया के बारे में पूछते-पूछते उस कक्ष के बाहर पहुँच गये, जहाँ डॉक्टर्स रिया के इलाज में व्यस्त थे|
अँकल की तो रिया को इस हालत में देखने की हिम्मत ही नहीं हुई| इसलिये मेने उन्हें वार्ड के बाहर दीवार के सहारे से लगी कुर्सी पर बैठा दिया| उनको वहाँ पर बैठाने के बाद मेने हिम्मत जुटाते हुये वार्ड के बाहर लगी काँच की खिड़की से अन्दर झाँककर रिया को देखने की कोशिश की|
मैं रिया को उस समय पूरी तरह तो नहीं देख पाया था, लेकिन जितनी मेरी उसपर नजर गई, मेने बस यही देखा की उसके शरीर पर जगह-जगह काफी गहरी चोटें थीं| ये देखकर मुझे और बुरा लग रहा था, और मेरी आँखों से आँसू छलक आये|
मुझसे रिया को ऐसी हालत में देखकर रहा नहीं गया, और मैं अपने आँसुओं को पोंछता हुआ तेजी से दौड़कर लॉबी के दूसरे छोर पर आकर उदास मन के साथ दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया|
रिया के वॉर्ड के बाहर उस क्षेत्र के इंस्पेक्टर रिया के परिवार से किसी के आने का इन्तजार कर रहे थे| जब उन्हें अस्पताल के स्टाफ से हमारे वहां पहुँचने की सूचना प्राप्त हुई, तो वो लोगों से पूछताछ करते हुये मेरे पास पहुँचे|
उन्होंने मुझसे पूछा, “हेलो मिस्टर, क्या आप मिस रिया की फैमिली से हैं?” जब उन्हें मुझसे ‘हाँ’ में उत्तर मिला, तो उन्होंने मुझे घटना की पूरी जानकारी दी| साथ ही उन्होंने मुझे बताया कि उन लोगों ने रिया पर हमला करने वाले लड़कों को पकड़ लिया है, और उनपर कार्यवाही की जा रही है|
उस समय इंस्पेक्टर की बातें सुनकर मेरे मन को इतनी तसल्ली तो मिली कि रिया पर हमला करने वाले लड़के पुलिस की गिरफ्त में हैं| लेकिन फिर अगले ही पल मन में विचार आया कि अब इस सब से क्या फायदा! रिया को तो चोट लग ही गई…” और ये विचार दिमाग में आते ही मैं एक बार फिर से उदास हो गया|
इंस्पेक्टर ने सांत्वना देते हुए मेरे कन्धे पर हाथ फेरा| मेने एक बार फिर से हिम्मत जुटाई, और उन्हें अँकल के पास ले गया|
इंस्पेक्टर साहब अँकल के पास बैठ गये| पहले तो उन्होंने हवलदार से कहकर अँकल को पानी पिलाया, और फिर उन लड़कों के खिलाफ क्या एक्शन लेना है? इस विषय में बात ही कर रहे थे कि तभी नये-नये नियुक्त होकर आये एसएसपी साहब अस्पताल आ पहुँचे|
उन्हें जैसे ही इस घटना की जानकारी मिली, वे स्वयं रिया को देखने आ गये थे| एसएसपी साहब को अचानक से देखते ही अस्पताल में मौजूद सभी पुलिसकर्मी सलाम करने लगे|
जैसे ही वो हमारे सामने आकर खड़े हुये, इंस्पेक्टर साहब भी फुर्ती के साथ अपने स्थान से उठकर खड़े हो गये, और उन्हें सलूट किया|
एसएसपी साहब ने इंस्पेक्टर साहब से मामले की पूरी जानकारी प्राप्त की| इसके बाद वो स्वयं अँकल के पास बैठ गये, और उन्होंने अँकल से इंस्पेक्टर साहब वाली बात दोहराई कि हमें उन लड़कों के साथ क्या एक्शन लेना है? तो इसपर पहले तो अँकल कुछ नहीं बोले|
पर जब एसएसपी साहब ने दोबारा अँकल को समझाने की कोशिश करते हुये उनसे कहा कि, “देखिये सर, हम समझ सकते हैं कि आपके लिये ये कैसा समय है? पर हमें जबतक आपकी तरफ से उन लड़कों के खिलाफ कोई शिकायत नहीं प्राप्त होगी, तबतक हम चाहते हुये भी उन लड़कों के खिलाफ कोई लीगल एक्शन नहीं ले सकते हैं|” और ये कहने के बाद वो अँकल की तरफ देखते हुये उनके जवाब की प्रतीक्षा करने लगे|
कुछ देर विचार करने के बाद कफ की वजह से बैठे हुये गले के कारण खाँसते हुये अँकल एसएसपी साहब से बोले, “सर आप इस समय मेरी बच्ची की स्थिति देख रहे हैं| अब आप ही बताइये कि अभी पहले हम अपनी बेटी को देखें, या उन लड़कों पर लीगल एक्शन लेने के लिए ही दौड़ते रहें!....”
एसएसपी साहब से ये बात बोलकर अँकल एकबार फिर से शाँत हो गये| अब कुछ देर के लिये वहाँ के माहौल में एकदम शांति पसर गई| मैं अँकल के पास बैठा हुआ उनकी पीठ को सेहला रहा था| एसएसपी साहब और इंस्पेक्टर साहब अभी भी अँकल से कोई सकारात्मक उत्तर मिलने की प्रतीक्षा में एकदम शांत बैठे हुये थे|
थोड़ी देर शांत रहने के बाद इस बार अँकल एसएसपी साहब की ओर मुड़कर हाथ जोड़ते हुये उनसे बोले, “सर अगर आप वास्तव में हमारे लिए कुछ करना चाहते हैं न, तो बस हमारी आपसे बस इतनी रिक्वेस्ट है कि हमारी बच्ची पर अटैक करने वाले जिन लड़कों को आपने पकड़ा है| आप प्लीज उन लड़कों को उनके पेरेंट्स के साथ यहाँ पर बुलाकर एक बार हमारी लड़की की हालात दिखाइये, और उनसे पूछिये कि आखिरकार ये सब करके उन्हें क्या मिल गया?”
फिर अँकल मेरे हाथ में लगी पानी की बोतल से एक घूंट पानी पीने के बाद एसएसपी साहब से अपनी बात को पूरी करते हुये बोले, “सर, हमारी लड़की के साथ जो होना था, वो तो हो ही चुका है| अब उसे तो कोई चाहकर भी नहीं बदल सकता है| तो अब हम उन लड़कों के खिलाफ लीगल एक्शन लेकर क्या ही कर लेंगे? क्या उससे हमारी बेटी फिर से पहले जैसी ठीक हो जाएगी? तो अब, ऐसे में हम लोगों के लिये सबसे बड़ी जस्टिस यही होगी कि उन लड़कों को उनके पेरेंट्स के साथ यहाँ पर बुलाया जाये, और उनसे हमारी लड़की के सामने अपने किये की माफ़ी मंगवाई जाये| और जब वो लड़के अपने पेरेंट्स के सामने हमारी बेटी से माफ़ी मांगेंगे, तो मेरी नजरों में उन लड़कों के लिए इससे बड़ा सबक और कुछ नहीं हो सकता|” और एसएसपी साहब से इतना बोलकर अँकल एकबार फिर से एकदम शांत हो गए|
एसएसपी साहब भी अँकल से ये कहते हुये अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए कि, “ठीक है सर, जैसा आप चाहें| वैसे तो इन लड़कों ने आपकी बेटी के साथ जो किया है, वो काफी गम्भीर कृत्य है| इसके लिये तो आपका लीगल एक्शन लेना बनता ही है| लेकिन अगर आपकी यही इच्छा है, तो हम इसकी भी व्यवस्था करवाते हैं|”
एसएसपी साहब ने वहाँ से जाते समय हमें अपना पर्सनल मोबाइल नम्बर दिया, और कहा कि जैसे ही रिया को पूरी तरह से होश आ जाये, और वो हम लोगों को पहचनने की स्थिति में आ जाये, तब हम उन्हें कॉल करके इस बारे में सूचित कर दें, जिससे अँकल की इच्छानुसार उन लड़कों और उनके माता-पिता को यहाँ अस्पताल लाने की व्यवस्था की जा सके| और ये कहते हुये एसएसपी साहब और उनके साथ अस्पताल में मौजूद पूरा पुलिस स्टॉफ अस्पताल से लौट गया|
घटना के बाद कई घण्टों के लम्बे इंतजार के बाद जब रिया को होश आया, तो उसने खुद को अस्पताल में पाया। अंकल-अंटी, मैं, और डॉक्टर आसपास खड़े थे। मेरी आँखों में चिंता और राहत दोनों झलक रही थीं। रिया ने जब हमारी ओर देखा, तो एक हल्की मुस्कान बिखेर दी।
अगले दिन, पुलिस ने उन लड़कों और उनके माता-पिता को अस्पताल बुलाया। सभी लड़के सिर झुकाए खड़े थे। उनके चेहरे पर पछतावे की लकीरें साफ दिख रही थीं। एसएसपी साहब ने उन्हें रिया के सामने खड़ा करके कहा, "आज इनकी वजह से ये लड़की अस्पताल में है। अब ये खुद अपनी गलती स्वीकार करेंगे।"
लड़कों ने धीरे-धीरे सिर उठाया और एक-एक करके रिया से माफी माँगने लगे। उनमें से कुछ की आँखों में आँसू भी थे। उनके माता-पिता भी शर्मिंदा खड़े थे। रिया ने एक गहरी सांस ली और संयमित स्वर में कहा, "मैं तुम्हारी माफी स्वीकार करती हूँ, लेकिन आगे से कभी किसी लड़की के साथ ऐसा मत करना। किसी को कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल होती है।"
उसकी बातों का असर उन लड़कों पर साफ दिख रहा था। मैं गर्व से रिया की ओर देख रहा था।
कुछ हफ्तों बाद, मुझे कनाडा की यूनिवर्सिटी से अंतिम कन्फर्मेशन मिल गया। सब कुछ तैयार था, लेकिन रिया की हालत देखकर मेने जाने का फैसला टाल दिया था|
जब मेने यह बात रिया को बताई, तो रिया ने थोड़ा नाराज़ होते हुए मुझसे कहा, "सिद्धार्थ, मैं ठीक हो रही हूँ। मेरा ख्याल रखने के लिए यहाँ माँ-पापा हैं। लेकिन तुम्हें यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। तुमने इसके लिए सालों मेहनत की है, और अब पीछे हटना सही नहीं होगा।"
मेने उससे कहा, "पर मैं तुम्हें इस हालत में छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?"
रिया मुस्कुराई और बोली, "तुम जाओगे, क्योंकि तुम्हें जाना चाहिए। हमारी दोस्ती सिर्फ पास होने से नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने से है। तुम मुझसे वादा करो कि तुम वहाँ जाकर अपना बेस्ट दोगे और अपने सपने पूरे करोगे। और हाँ, तुम्हारी ये बेस्ट फ्रेंड हमेशा तुम्हारे साथ है, तुम्हारे हर कदम पर!"
फिर मायूस मन से उसने मुझसे पूछा, “अच्छा, सिद्धार्थ, तुम वहाँ कनाडा जाकर मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”
मैं हल्के से मुस्कुराया, उसकी आँखों में नमी थी। "कभी नहीं, रिया!"
अंततः, मेने कनाडा जाने का फैसला किया। बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर सभी मुझे विदा करने आए थे। रिया ने हल्के-से मेरी तरफ देखा और कहा, "अब आगे बढ़ो, सिद्धार्थ! मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ!"
मेने रिया को एक आखिरी बार देखा और कनाडा के लिए उड़ान भर ली। लेकिन दूरी के बावजूद, हमारी दोस्ती वैसी ही बनी रही। हम दोनों आज भी एक-दूसरे से फोन, मेल और सोशल मीडिया के जरिए जुड़े हुये हैं। जीवन ने हमें अलग राहों पर भेजा, लेकिन हमारी दोस्ती का बंधन कभी कमजोर नहीं हुआ।
क्योंकि सच्ची दोस्ती हमेशा वक्त और दूरी से परे होती है!!
लेखक
अँकुर सक्सेना “मैडी”
[ANKUR SAXENA “MADDY”]
author88ankur@outlook.com
सांगानेर, प्रताप नगर,
जयपुर, राजस्थान, भारत
दिनांक- शनिवार, 08-03-2025 को लिखी गई कहानी