Kaamsutra - 7 in Hindi Mythological Stories by Lokesh Dangi books and stories PDF | कामसूत्र - भाग 7

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कामसूत्र - भाग 7

भाग 7: आचार और नैतिकता का महत्व

कामसूत्र का सातवां भाग आचार और नैतिकता के महत्व पर केंद्रित है, जो किसी भी रिश्ते या शारीरिक संबंधों के स्थायित्व के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। महर्षि वात्स्यायन का मानना था कि शारीरिक संबंधों में केवल भौतिक आनंद या शारीरिक संतुष्टि ही मुख्य उद्देश्य नहीं है, बल्कि नैतिकता और सम्मान की भावना का होना भी जरूरी है। यह भाग हमें यह सिखाता है कि किसी भी प्रकार के रिश्ते में संतुलन, सम्मान, और आचार का पालन किया जाए, ताकि रिश्ता न केवल बाहरी रूप से बल्कि अंदर से भी मजबूत और सशक्त हो।

आचार और नैतिकता का संबंध रिश्तों से

महर्षि वात्स्यायन ने कामसूत्र में आचार और नैतिकता को रिश्तों के केंद्र में रखा है। जब दो लोग एक-दूसरे के साथ शारीरिक या मानसिक संबंध साझा करते हैं, तो यह आवश्यक है कि वे एक-दूसरे के प्रति सम्मान और नैतिकता की भावना बनाए रखें। एक सशक्त रिश्ते की नींव यह है कि दोनों व्यक्तियों के बीच आत्मिक, मानसिक और शारीरिक संपर्क सही आचार और नैतिकता से जुड़ा हो।

आचार का मतलब केवल उन नियमों और आस्थाओं से नहीं है जो समाज में स्वीकार्य माने जाते हैं, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ा है कि हम अपने साथी के प्रति कितने ईमानदार और सच्चे हैं। यह रिश्ता केवल शारीरिक सुख तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी मजबूत बनता है, जब उसमें नैतिकता और आचार का पालन किया जाता है।

शारीरिक संबंधों में सम्मान की आवश्यकता

कामसूत्र के इस भाग में महर्षि वात्स्यायन ने शारीरिक संबंधों में सम्मान को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। शारीरिक संबंधों में एक-दूसरे का सम्मान करना दोनों व्यक्तियों के बीच विश्वास और आत्मीयता को बनाए रखता है। जब दोनों साथी एक-दूसरे की इच्छाओं, भावनाओं, और सीमाओं का सम्मान करते हैं, तो शारीरिक संबंध न केवल शारीरिक संतुष्टि बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी लाते हैं।

सम्मान के बिना शारीरिक संबंधों का कोई अर्थ नहीं होता। जब हम किसी से शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं, तो यह जरूरी है कि हम उनके व्यक्तिगत आत्म-सम्मान और भावनाओं का पूरा ख्याल रखें। सम्मान ही वह बुनियादी तत्व है जो किसी भी रिश्ते को स्थिर और सामंजस्यपूर्ण बनाए रखता है।

आत्मा की शुद्धता और नैतिकता

कामसूत्र में आचार और नैतिकता की बात करते हुए महर्षि वात्स्यायन ने यह भी बताया है कि एक व्यक्ति की आत्मा की शुद्धता शारीरिक और मानसिक संतुलन के लिए अनिवार्य है। आत्मा की शुद्धता का मतलब है, अपने विचारों, इच्छाओं और कार्यों में सच्चाई और ईमानदारी को बनाए रखना। जब व्यक्ति अपनी आत्मा को शुद्ध करता है, तो वह न केवल अपने शारीरिक संबंधों में, बल्कि अपने जीवन के हर पहलू में नैतिकता और आचार का पालन करता है।

यह शुद्धता केवल शारीरिक संबंधों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह आत्मीयता, भावनात्मक जुड़ाव, और मानसिक संतुलन के स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जब अपनी आत्मा को शुद्ध रखता है, तो वह अपने रिश्ते में भी अधिक संतुलित और समझदार होता है।

शारीरिक संबंधों में नैतिकता का पालन

महर्षि वात्स्यायन ने शारीरिक संबंधों में नैतिकता के पालन को अत्यधिक आवश्यक बताया है। शारीरिक संबंध केवल भौतिक आनंद का साधन नहीं होते, बल्कि यह एक रिश्ते के अंदर गहरे भावनात्मक, मानसिक और आत्मिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। नैतिकता का पालन शारीरिक संबंधों को अधिक सम्मानजनक, सुरक्षित और संतोषजनक बनाता है। यह रिश्ते में विश्वास और समझ की भावना उत्पन्न करता है, जो किसी भी रिश्ते की सफलता के लिए जरूरी है।

जब शारीरिक संबंध में नैतिकता का पालन होता है, तो यह दोनों व्यक्तियों के बीच एक गहरी समझ और आत्मीयता को उत्पन्न करता है। यह केवल शारीरिक संतुष्टि से परे जाकर मानसिक संतुलन और भावनात्मक पूर्ति की दिशा में भी एक कदम बढ़ाता है।

रिश्तों में विश्वास और ईमानदारी का महत्व

आचार और नैतिकता के तहत विश्वास और ईमानदारी का अत्यधिक महत्व है। किसी भी रिश्ते में सबसे महत्वपूर्ण तत्व विश्वास होता है। जब दो लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तो यह आवश्यक होता है कि वे एक-दूसरे पर विश्वास करें और अपने विचारों और भावनाओं में ईमानदार रहें। विश्वास के बिना कोई भी रिश्ता स्थिर नहीं हो सकता, और यही विश्वास शारीरिक और मानसिक संतुष्टि के लिए महत्वपूर्ण है।

महर्षि वात्स्यायन ने यह कहा कि शारीरिक संबंधों में भी विश्वास और ईमानदारी का पालन करना चाहिए। जब दोनों व्यक्तियों के बीच ईमानदारी और विश्वास होता है, तो शारीरिक संबंध न केवल शारीरिक आनंद देते हैं, बल्कि यह एक गहरी भावनात्मक और मानसिक संतुष्टि भी उत्पन्न करते हैं।

समाज में नैतिकता का स्थान

कामसूत्र के इस भाग में महर्षि वात्स्यायन ने समाज में नैतिकता और आचार के महत्व पर भी प्रकाश डाला है। शारीरिक संबंधों में नैतिकता का पालन समाज के नियमों और रीति-रिवाजों के अनुसार होता है। समाज में नैतिकता का पालन रिश्तों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए जरूरी है। यह रिश्तों के सम्मान और गरिमा को बनाए रखने में मदद करता है।

समाज में नैतिकता का पालन करने से न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन आता है, बल्कि यह समाज में भी शांति और सद्भाव बनाए रखने में मदद करता है। कामसूत्र में यह बताया गया है कि शारीरिक संबंधों के दौरान एक व्यक्ति को न केवल अपने साथी का सम्मान करना चाहिए, बल्कि समाज और संस्कृति के मानदंडों का भी पालन करना चाहिए।


कामसूत्र का यह सातवां भाग हमें यह सिखाता है कि शारीरिक और मानसिक संबंधों में नैतिकता, आचार और सम्मान का पालन अत्यंत आवश्यक है। महर्षि वात्स्यायन के अनुसार, शारीरिक संबंधों का उद्देश्य केवल शारीरिक सुख प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह एक गहरे आत्मीय और मानसिक संतुलन की दिशा में एक कदम होता है। नैतिकता का पालन करने से न केवल रिश्ते मजबूत होते हैं, बल्कि यह जीवन को अधिक शांतिपूर्ण और संतुलित बनाता है।