Bhay ka Kahar - 5 in Hindi Horror Stories by Abhishek Chaturvedi books and stories PDF | भय का कहर.. - भाग 5

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भय का कहर.. - भाग 5

भय का गह्वर (रहस्य का पुनरागमन)

महंत नारायण द्वारा हवेली के अभिशाप को समाप्त किए जाने के बाद, गांव में कई सालों तक शांति रही। लोग अब फिर से सामान्य जीवन जीने लगे थे। लेकिन जैसे कि हर रहस्य के साथ होता है, समय के साथ, हवेली की कहानियों को लोग भूलने लगे थे। हवेली अब सिर्फ एक खंडहर बन चुकी थी, जिसे अतीत के भूतिया किस्सों के अलावा कोई याद नहीं करता था। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, कुछ रहस्य कभी खत्म नहीं होते, वे बस गहराई में छिप जाते हैं।

कई वर्षों बाद, गांव में एक नया शिक्षक आया, जिसका नाम था राहुल। राहुल ने गांव के बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया और उसने गांव में एक छोटे से स्कूल की स्थापना की। बच्चों और उनके परिवारों के साथ घुलने-मिलने के दौरान, राहुल ने गांव के पुराने किस्से सुने। खासकर हवेली की कहानी ने उसकी जिज्ञासा को बढ़ा दिया। हालांकि गांववालों ने उसे सावधान किया कि वह हवेली से दूर रहे, लेकिन राहुल के भीतर कुछ ऐसा था जो उसे उस रहस्य की ओर खींच रहा था।

राहुल को विश्वास नहीं हो रहा था कि आज के आधुनिक युग में भी लोग ऐसी भूत-प्रेत की कहानियों पर विश्वास करते हैं। उसने तय किया कि वह खुद इस रहस्य का पता लगाएगा और इस भूतिया कहानी के पीछे की सच्चाई उजागर करेगा। उसने गांव के कुछ युवाओं से बात की, जो उसकी योजना में शामिल होने के लिए तैयार हो गए। उनमें से एक लड़का, अर्जुन का पोता, विशेष रूप से इस योजना के प्रति उत्साहित था। 

रात के समय, जब पूरा गांव गहरी नींद में था, राहुल और उसके साथी हवेली की ओर निकल पड़े। उन्होंने अपने साथ कैमरे, टोर्च, और कुछ अन्य औजार लिए थे ताकि अगर कोई अजीब घटना हो, तो वे उसे रिकॉर्ड कर सकें। हवेली के पास पहुंचते ही, हवा अचानक ठंडी हो गई और आसपास की आवाजें गुम हो गईं। लेकिन राहुल और उसके साथियों ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।

हवेली के अंदर प्रवेश करते ही, उन्हें एक अजीब-सा अहसास हुआ, जैसे कोई उन्हें देख रहा हो। दीवारों पर जमी धूल और मकड़ी के जाले हवेली की दशा को और भी भयानक बना रहे थे। लेकिन राहुल ने साहस दिखाते हुए अंदर जाने का फैसला किया।

उन्होंने हवेली के हर कोने की जांच करनी शुरू की, लेकिन कुछ खास नहीं मिला। राहुल ने सोचा कि शायद ये सारी बातें सिर्फ अफवाहें थीं। लेकिन तभी, हवेली के एक पुराने कमरे में, उन्हें एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया। यह दरवाजा पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। दरवाजे पर अजीबोगरीब चिन्ह बने हुए थे, जो शायद किसी प्राचीन भाषा में थे। 

राहुल ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह जाम हो चुका था। उसके साथियों ने मिलकर दरवाजे को धक्का दिया, और अचानक दरवाजा खुल गया। दरवाजे के पीछे एक और गहरी सुरंग थी, जो हवेली के नीचे की ओर जा रही थी। यह वही सुरंग थी जिसके बारे में महंत नारायण ने कई साल पहले बताया था। 

राहुल और उसके साथी सुरंग के अंदर जाने लगे। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, हवा और भी ठंडी होती गई, और उन्हें अजीबोगरीब फुसफुसाहटें सुनाई देने लगीं। सुरंग के दोनों ओर लगे दीपक अचानक खुद-ब-खुद जल उठे, और पूरे रास्ते में अजीब-सी रोशनी फैल गई। 

सुरंग के अंत में, उन्हें एक बड़ा कक्ष मिला। कक्ष के बीचोंबीच वही पत्थर का ताबूत था, जिसे महंत नारायण ने बंद किया था। लेकिन ताबूत अब खुला हुआ था, और उसके अंदर से एक भयानक अंधेरा निकल रहा था। 

राहुल ने ताबूत के पास जाकर जांच करने की कोशिश की, लेकिन अचानक कक्ष के चारों ओर की दीवारें कांपने लगीं। ताबूत के अंदर से एक तेज़ आवाज गूंजी, और वहां एक काले साए ने आकार लेना शुरू कर दिया। यह वही आत्मा थी जिसे महंत नारायण ने नियंत्रित किया था, लेकिन अब वह और भी शक्तिशाली हो चुकी थी। 

आत्मा ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, "तुम लोगों ने मेरी नींद को बाधित किया है। अब तुम्हें इसकी सजा भुगतनी होगी!" 

राहुल और उसके साथी डर के मारे भागने लगे, लेकिन सुरंग का दरवाजा अचानक खुद-ब-खुद बंद हो गया। आत्मा ने अपने अंधेरे जाल को फैलाना शुरू किया, और सुरंग के अंदर की हवा और भी घुटन भरी हो गई। 

राहुल ने अपनी सारी शक्ति से आत्मा का मुकाबला करने की कोशिश की, लेकिन उसका हर प्रयास विफल रहा। आत्मा ने धीरे-धीरे उन पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, और उनके शरीर में से जीवन शक्ति को खींचने लगी। राहुल और उसके साथी दर्द से चिल्ला उठे, लेकिन उनकी चीखें हवेली के अंदर ही गूंजकर रह गईं। 

अचानक, आत्मा की शक्ति और भी बढ़ गई और हवेली की दीवारों से खून बहने लगा। आत्मा ने कक्ष के चारों ओर की सारी रोशनी को निगल लिया, और वहां घना अंधकार छा गया। राहुल ने अपने अंतिम क्षणों में महसूस किया कि वह इस अभिशाप के चंगुल से बच नहीं सकता। 

सुरंग के बाहर, गांव वाले अचानक हवेली से निकलने वाली भयानक चीखों को सुनकर जाग उठे। उन्होंने महसूस किया कि कुछ भयानक घट चुका है। लेकिन कोई भी हवेली की तरफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाया। 

रात भर हवेली के अंदर से चीखें और ठहाके सुनाई देते रहे। और जब सुबह हुई, तो हवेली फिर से शांत हो गई। लेकिन उस दिन के बाद, राहुल और उसके साथियों का कोई पता नहीं चला। गांव के लोगों ने समझा कि हवेली का अभिशाप अब और भी भयानक हो चुका है।

**अन्धकार का किला** अब एक ऐसा रहस्य बन चुका था, जो कभी पूरी तरह से उजागर नहीं हो सका। अब गांव के लोग हवेली का नाम भी लेने से कतराने लगे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि इसका जिक्र भी उस अभिशाप को फिर से जागृत कर सकता है। 

और आज भी, जब हवेली के आसपास की हवा में एक अजीब-सी ठंडक आती है, तो लोग समझ जाते हैं कि वह काला साया अब भी वहां मौजूद है, अपने अगले शिकार का इंतजार कर रहा है। हवेली के अभिशाप ने गांव पर एक ऐसा साया डाल दिया था, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता था। 

भय का गह्वर अब भी ज़िंदा था, और इसके रहस्य के चंगुल से कोई नहीं बच सकता था।


भय का गह्वर (एक अंतहीन अंधकार)