Mohini ( A thristy witch ) - 2 in Hindi Horror Stories by Shalini Chaudhary books and stories PDF | मोहिनी ( प्यास डायन की ) - 2

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मोहिनी ( प्यास डायन की ) - 2

जय श्री कृष्णा 🙏

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणतः क्लेश नाशाय गोविंदाय नमो नमः।

चंद्रा का कमरा ,

वैशाली की बात सुन दोनो उसका मूंह ताकने लगती है ,तभी चंद्रा कहती है !

चंद्रा "देखो विशु कुछ उल्टा तरीका है , तो उसे अपने पास ही रखो ,वैसे भी तुम्हारा दिमाग कुछ ज्यादा ही उल्टा चलता है ! "

चंद्रा की बात पर तारा भी सहमति में अपना सर हिलाती है , जिसे देख कर वैशाली का तो मूंह ही बन जाता है , वैशाली थोड़ी देर तक उन दोनो का मूंह देखती है फिर एक दम से झल्ला कर कहती है ।

वैशाली (झल्लाते हुए) " बिना सुने ही तुम दोनो परिणाम पर पहुंच गई यही आदत मुझे बिल्कुल पसंद नही , अरे एक बार सुन तो लो पर नही इन्हे तो बिना सुने ही परिणाम घोषित करना है "

उसके इतना गुस्से में भड़कने की वजह से एक पल को तो चंद्रा और तारा की हालत ही खराब हो गई , क्योंकि वैशाली का स्वभाव ऐसे चिल्लाने वाला नही था, उसे जल्दी गुस्सा नही आता था उसके इस तरह गुस्सा करने का मतलब था की जरूर उसके पास कोई अच्छी योजना थी तभी तारा उसे शांत करते हुए बोली ।

तारा " विष ऐ.. देख तू ऐसे गुस्सा ना हो हमारा मतलब ऐसा कुछ नही था जैसा तू सोच रही है "

तारा और चंद्रा एक दूसरे का मूंह देख रही थी तभी चंद्रा बोली

चंद्रा ( प्यार से ) " विशु देख मेरा मतलब तुझे चोट पहुंचाने से नही था पर अगर फिर भी मेरी बातों का बुरा लगा हो तो हमे क्षमा कर दो "

तारा " ये सब छोड़ और ये बता की तू क्या बता रही थी? कोनसा रास्ता है तेरे पास ? "

तारा की बात पर चंद्रा भी अपना सर हां में हिलाती है वो दोनो बिल्कुल शांत और गंभीर बन कर बैठे थे, उन दोनों को ऐसे देख कर वैशाली अपना माथा पीट लेती है ।

वैशाली " तुम दोनो तो ऐसे बैठी हो जैसे हम अभी ही तुम दोनो को कोई सजा सुनाएंगे, अरे बात बड़ी साधारण सी है की हम सब पुस्तकालय जाए और उस किताब को पढ़े उस किताब में ही मणि की सारी जानकारी है और उस फकीर बाबा के अनुसार और भी कई शक्तियों की जानकारी है "

तारा " बोल तो सही रही हो पर पुस्तकालय जा कर उस गुप्त कमरे में जा कर उस किताब को पढ़ना कोई रसगुल्ला खाने इतना आसान काम नही है,समझी "

चंद्रा " एक बार करके देखने में क्या जाता है अगर सफलता मिल गई तो काम बन जायेगा "

वैशाली " हां , तो तय रहा थोड़ी देर के बाद सब आराम करने जायेंगे तब हम लोग उस किताब को लेने जाएंगे , और अगर किसी ने देखा या कुछ पूछा तो कैह देंगे की हम सब बगीचा में जा रहे है "

उन के बीच सब तय हो चुका था ,बस इंतजार था तो सब कुछ शांत होने का , अभी वो सब बात कर ही रही थी की तारा की नजर खिड़की से बाहर पड़ती है, जहां एक लड़की हाथ में दूध का ग्लास पकड़े जरूरत से ज्यादा श्रृंगार किए कमरे के अंदर जा रही थी, उसे देख कर तारा का मूंह बन जाता है और वो उन दोनों को इशारा करते हुए उधर देखने को कहती है ।

तारा " चंद्रा ये मालती हमेशा वीरेंद्र भाई सा के आस पास ही प्रेतात्मा की तरह क्यों भटकती रहती है "

वैशाली " सामान्य दिनों में इतना अधिक श्रृंगार कौन करता है ? इतने गहने इससे संभलते कैसे है ? "

तारा " मुझे इसका चरित्र भी ठीक नही लग रहा , ऐसा लगता भी है की इसी वर्ष इसके माता पिता की मृत्यु हुई है "

उनकी बात सुनकर चंद्र एकदम से बिस्तर से उतर जाती है और कमरे से बाहर जाने लगती है ।

चंद्रा " इन सारे किताबों को संदूक में रख दो कोई देख न ले "

ये कहती हुई वो कमरे से बाहर निकल कर उसी कमरे की तरफ जाने लगती है जिसमें अभी अभी मालती गई थी।

चंद्रा प्रताप गढ़ के राजा देवराज सिंह की पहली संतान थीं और अपनी मां गायत्री सिंह की लाडली , इससे दो छोटे भाई थे वीरेंद्र और अमरेंद्र जिन्हे ये बहोत प्यार करती थी।

दूसरी तरफ

वीरेंद्र का कमरा,

वीरेंद्र बिस्तर के किनारे बैठा , अपने एक हाथ में एक पत्र पकड़े और दूसरे हाथ में दूध पकड़े हुए था , उसके ठीक सामने मालती बड़ी ही अदा से खड़ी थी उसने हरे रंग का घाघरा चोली पहन रखा था उसके चोली के आगे और पीछे दोनो तरफ का गला थोड़ा बड़ा था, उसने जान बूझ कर अपने पल्लू को ऐसे ही ढलका रखा था, जिससे उसका आकर्षक बदन ऐसे ही दिख रहा था और वो किसी बात पर हस रही थी वीरेंद्र भी हस रहा था, लेकिन उसकी नजर नीचे धरती को घूरे जा रही थी उसने एक बार भी मालती के तरफ नही देखा था , तभी चंद्रा कमरे में आती है , उन दोनो को ऐसे हसता देख उसका खून खौल उठता है वो दरवाजे के पास से ही बोलती है

चंद्रा " अरे मालती तुम यहां क्या कर रही हो ? "

चंद्रा की आवाज सुनते ही मालती बड़ी ही चालाकी से अपने आगे के पल्लू को ठीक कर लेती है अब आगे से उसका बदन पूरी तरह ढका था और उसके लंबे बाल के खुले होने के कारण उसका पीठ भी ढका था , उसे देखने से ऐसा बिल्कुल भी नही लग रहा था की ये इतनी अभद्रता से खड़ी थी । मालती मुस्कुराते हुए पलटती है।

मालती(मन ही मन कुढ़ते हुए) " जीजी वो मैं कुंवर सा को दूध देने आई थी "

चंद्रा (शांत लहजे में ) " दे दिया न तो अब जाओ , मुझे कुंवर सा से कुछ बात करनी है "

मालती कमरे से बाहर आ जाती है, और दूसरी तरफ के खिड़की के पास खड़ी हो कर उनकी बात सुनने लगती है। मालती के जाने के बाद वीरेंद्र चंद्रा से कहता है।

वीरेंद्र " जीजी आपको क्या बात करनी है ? "

चंद्रा ( समझाने के अंदाज में ) " देखो वीर तुम अब बच्चे नही हो, एक पूर्णपुरुष हो और प्रताप गढ़ के भावी राजा, तो अपने व्यक्तित्व में गंभीरता को विकसित करो"

वीरेंद्र सर झुकाए हुए ही चंद्रा से कहता है।

वीरेंद्र " जीजी कुछ गलती हुई है क्या मुझसे ? "

चंद्रा ( सर हां में हिलाते हुए ) " हां हुई है गलती तुमसे, देखो वीर तुम वर्तमान में कुंवर हो और भविष्य के राजा तो तुम्हे नही लगता की तुम्हारे कमरे में कोई भी ऐसे ही नही घुस सकता , कल को तुम्हारे पास बहोत सी गुप्त जानकारियां होंगी, तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ेगी न की कम होगी, अगर तुम गंभीर नही होगे तो कैसे चलेगा ? "

वीरेंद्र " जी , जीजी आगे से ध्यान रखेंगे "

वीरेंद्र को समझाने के क्रम में चंद्रा के आवाज में थोड़ा भारीपन आ गया था, वो हल्के हल्के गुस्से में आ गई थी, उसने अपने उसी तीखे अंदाज में ही अपनी बात आगे बढ़ाई।

चंद्रा " और एक बात अपने अंतर आत्मा में बैठा लो की अपने परिवार के स्त्रियों के अलावा, किस भी पराई स्त्री के साथ इस तरह हस हस कर बात नही कर सकते तुम समझे, क्योंकि तुम्हारा ये व्यवहार तुम्हारे व्यक्तित्व और चरित्र दोनो पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है, (उंगली दिखाते हुए ) बात समझ में आई ? "

वीरेंद्र " जी आगे से ध्यान रखूंगा "

चंद्रा मुस्कुराते हुए उसके हाथ से दूध ले कर चली जाती है, और बाहर आ कर पूरे भरे ग्लास के दूध को पास के ही गमले में उड़ेल देती है। चंद्रा को दूध फेंकते हुए मालती देख लेती है, उसका चेहरा एक दम से लाल हो जाता है, और वो गुस्से से कांपने लगती है।

दोपहर का समय

सिंह भवन,

सभी खाना खा चुके थे और सबका का काम लगभग समाप्त हो चुका था, इक्का दुक्का ही कोई था जो जगा था क्योंकि यहां का नियम था की सारा काम खतम होने के बाद सारे नौकर दोपहर में आराम करेंगे सभी अपने कमरे में आराम कर रहे थे और देवराज सिंह अपने कमरे में बैठें कोई हिसाब किताब मिला रहे थे। वैशाली घूम घूम कर सब कुछ देख रही थी जब उसे विश्वास हो गया की सब चले गए तब वो दौड़ती हुई सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए तारा के कमरे में घुस जाती है जहां तारा और चंद्रा पहले से ही बैठे थे ।

वैशाली ( हाँफते हुए ) " चलो सब गए रास्ता साफ है हम पुस्तकालय चलते है "

तीनो पुस्तकालय की तरफ चोरी चुपके जाने लगते है, क्यूंकि उस तरफ जाना मना था वो पुस्तकालय देवराज सिंह का निजी पुस्तकालय था, बांकी सबके लिए दूसरा पुस्तकालय बनवाया गया था , वो सब जा ही रहे थे की सामने से देवेंद्र जी आते हुए दिखाई देते है तीनो जल्दी से दीवार के पीछे छिप जाती है देवेंद्र जी उन्हें नही देखते और चले जाते है,फिर वो तीनो पुस्तकालय तक पहुंच जाते है और खिड़की से कूद कर अंदर घुस जाते है फिर बिना आवाज किए वो इस दीवार तक पहुंच कर उस तस्वीर को हटा देते है ।

तारा " चंद्रा जल्दी से दरवाजा खोलो अगर राजा सा ने हमे पाकर लिया तो हमारी हालत खराब कर देंगे "

चंद्रा उस छेद में हाथ डाल कर ताला को घुमाती है तभी वो दीवार दो हिस्सो में बंट जाता है और वो तीनो अंदर चली जाती है अंदर जाने पर देखती है की वो कमरा बहुत बड़ा था वहां बहुत सारी किताबे रखी थी जो गुप्त ज्ञान का भंडार थी तभी उनकी नजर कमरे के एक कोने में जाता है उस कोने में एक लकड़ी के पट्टे पर एक संदूक रखा था, संदूक देखते ही तीनो पहचान लेती है की ये वही संदूक है जिसमे देवराज जी ने उस रहस्यमयी मणि और किताब को रखा था, वैशाली दौड़ कर जाती है और उस संदूक को उठा कर लाने लगती है पर संदूक भारी था जिस वजह से वो संभाल नही पा रही थी।

वैशाली " एक किताब और एक छोटा सा मणि रखा है इसमें तो ये इतना भरी क्यों है ? "

तारा संदूक संभालते हुए ।

तारा " अरे वो सिर्फ मणि नही शक्तियों का भंडार है भारी तो होगा ही "

फिर वो दोनो उस संदूक को वही पास के मेज पर रख देती है और जैसे ही संदूक खोलने को होती है तो देखती है की उस संदूक पर ताला लगा है और उसे लाल धागे से बांध रखा है ताले के छेद में एक लोहे की कील ठूकी है ये देख कर चंद्रा अपना सर पकड़ लेती है।

चंद्रा (मायूस होते हुए ) " इस संदूक को किलित कर रखा है पिता जी ने, इसे हम नही खोल सकते "

तारा " अब क्या करे ? "

चंद्रा " अब क्या ? कुछ नही क्योंकि इसे सिर्फ उत्कीलन विधि के द्वारा ही खोला जा सकता है और हमे वो आता नही, अब हमारे लिए गुरु की आवश्यकता और अधिक हो गई है "

वैशाली " इतनी मेहनत पानी में गई, अब पहले हमे यहां से निकलना चाहिए "

फिर तीनो वहा से निकल कर छुपते छुपाते उसी तरह ही अपने कमरे में वापस आ जाती है। वहीं दूसरी तरफ, मालती अपने कमरे में इधर उधर चक्कर काट रही थी, क्योंकि जब से चंद्रा ने वीरेंद्र को डांट लगाई थी तब से मालती के कई कोशिशों के बाद भी वीरेंद्र ने उससे कोई बात नही की थी, इसी बात से वो गुस्से से उबल रही थी ।

मालती ( गुस्से से ) " इस चंद्रा को तो मैं देख लूंगी सारा हिसाब बराबर करूंगी,(फिर खुद को आईने में देखते हुए) वीर जी आपको तो मैं पा कर रहूंगी आप सिर्फ मेरे है, इस चंद्रा की वजह से आप मुझसे बात नहीं कर रहे, ( फिर गुस्से से दांत पीसते हुए ) चंद्रा मैं तुझे नही छोडूंगी तूने मेरे और मेरे वीर जी के बीच आ कर सही नही किया, मैं तुझे नही छोडूंगी बिल्कुल नही "

वो इस समय बिल्कुल पागल लग रही थी।




क्या होगा इस कहानी में आगे ? क्या सुलझा पाएंगी ये तीनो दोस्त इस मणि का रहस्य ? और कौन है ये मालती और क्या करेगी वो ? सब जानने के लिए बने रहे मोहिनी ( प्यास डायन की)।

✍️ शालिनी चौधरी