Tridha - 3 in Hindi Fiction Stories by आयुषी सिंह books and stories PDF | त्रिधा - 3

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त्रिधा - 3

अगले दिन त्रिधा कॉलेज के लिए तैयार होते वक़्त आइने में कुछ ज्यादा ही देर अपने अक्स को देखती रही वहीं माया के फोन में आज भी गाना चल रहा था -
महबूब मेरे, महबूब मेरे
महबूब मेरे, महबूब मेरे
तू है तो दुनिया, कितनी हसीं है
जो तू नहीं तो, कुछ भी नहीं है
महबूब मेरे, महबूब मेरे
महबूब मेरे, महबूब मेरे...
गाने के बोलों ने एक बार फिर त्रिधा को हर्षवर्धन के ख़यालों में उलझा दिया। आज त्रिधा ने हल्के पीले रंग का सूट पहना हुआ था जिसपर छोटे छोटे लाल फूल और चांदी के रंग के पत्ते बने हुए थे, कानों में पहने उसकी मां के झुमकों में लाल रंग के फूल बिल्कुल उसके सूट पर बने फूलों से मेल खा रहे थे। हमेशा से उलट आज त्रिधा ने आंखों में काजल लगाया और उसके सामान में पड़ी गुलाबी लिपस्टिक पर अपने आप उसके हाथ चले गए और उसने लिपस्टिक का एक हल्का सा कोट लगा लिया। उसके हाथों में आज भी चांदी के रंग की चूड़ियां थीं और पैरों में कोल्हापुरी जूतियां।
गाना अब भी चल रहा था, त्रिधा को खुद में और माया में बस एक ही चीज सामान लगती थी - दोनों को ही पुराने गाने पसंद थे। गानों के साथ साथ त्रिधा ने हर्षवर्धन के खयाल को भी एक तरफ झटका और कॉलेज के लिए निकलने ही वाली थी कि तभी उसे एक लाइन याद आ गई " इश्क़ तो उस हवा की तरह है जिससे इंसान चाहे जितना भी दूर रहने की कोशिश करे, वह उसे छू ही जाती है "

" हवाओं से ही काफी बीमारियां भी फैलती हैं " बड़बड़ाते हुए त्रिधा कॉलेज के लिए निकल गई।

जब त्रिधा कॉलेज जा रही तो प्रभात उसे रास्ते में ही मिल गया। हमेशा बाइक पर आने जाने वाले प्रभात को चलकर कॉलेज जाते देख आखिर त्रिधा को प्रभात का मज़ाक उड़ाने का एक मौका मिल ही गया।

" प्रभात.... तो आज प्रभात की गर्लफ्रेंड ने उससे ब्रेकअप कर ही लिया " त्रिधा ने प्रभात को पीछे से आवाज़ देते हुए कहा।

" मेरी गर्लफ्रेंड.... कौन ? " प्रभात ने आश्चर्य से पूछा।

" अरे तुम्हारी बाइक यार, हमेशा तो उससे चिपके रहते हो तो हुई ना तुम्हारी गर्लफ्रेंड " त्रिधा ने कहा।
त्रिधा को यूं हंसते, मज़ाक करते देख प्रभात को खुशी हुई, इतने वक़्त में पहली बार त्रिधा ने कोई मज़ाक किया था।

" हम्म... आज साथ छोड़ दिया, खराब पड़ी है " प्रभात ने मुस्कुराते हुए कहा और त्रिधा को एकटक देखने लगा।

" ऐसे लुक्स क्यों दे रहे हो? मैं अजीब लग रही हूं क्या? " त्रिधा ने मासूमियत से प्रभात से पूछा।

" बहुत खूबसूरत लग रही हो... आज किसी की जान लेनी है क्या? "

" प्रभात.... तुम.... ये क्या बक बक लगा रखी है ? " त्रिधा ने खीजते हुए कहा।

" अगर तुम दोनों का कोई सीन हुआ न तो कसम महादेव की, गंगा में पानी नहीं, तुम दोनों का खून बहेगा " दोनों के पीछे अपना स्कूटर रोक कर उस पर बैठी संध्या ने मुंह टेढ़ा करते हुए कहा।

" तुम पागल हो शक तो था, आज यकीन भी हो गया। तुम्हें क्या लगता है अगर एक लड़का और एक लड़की दोस्त हैं तो क्या पुरानी फिल्मों की तरह एक दिन उनकी दोस्ती प्यार में बदल जाएगी? त्रिधा और मेरा न कोई सीन है, न ही होगा। एक मिनट, तुम्हें क्या अगर मेरा किसी से कुछ भी सीन हो? तुम मेरी मां हो? वकील हो? रिपोर्टर हो? नहीं न... तो इतने सवाल क्यों कर रही हो ? " प्रभात ने खीजते हुए कहा।

" अरे चिल यार बस मज़ाक था और तुम्हें मुझे सफाई देने की जरूरत भी नहीं थी प्रभात अगर तुम्हारा मन नहीं था तो। मैं सोचती थी मैं भी तुम्हारी दोस्त हूं तो बस इसीलिए मज़ाक कर दिया पर गलती मेरी है तुम बदतमीज ही रहोगे, पहले दिन की तरह " संध्या ने इतना कहा और फिर गुस्से में अपना स्कूटर लेकर चली गई और त्रिधा और प्रभात , संध्या को इतने गुस्से में देखकर वहीं सन्न से खड़े रह गए।

" मुझे अपना दोस्त मानती है.... " प्रभात बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गया और उसके साथ ही त्रिधा भी।

कॉलेज में प्रवेश कर त्रिधा क्लासरूम की तरफ बढ़ गई और प्रभात कैंटीन में बैठी संध्या के पास पहुंचा।
जब त्रिधा क्लासरूम के सामने पहुंची तो देखा क्लासरूम का दरवाज़ा बंद था मतलब अभी कोई नहीं आया था तब उसे याद आया कि हर्षवर्धन को देखने की जल्दबाजी में वह ही जल्दी आ गई थी। वह दरवाज़ा खोलने आगे बढ़ी और जैसे ही दरवाजा खोला, तो गुलाब की ढेर सारी पंखुड़ियां उसके ऊपर बरस पड़ीं उसे कुछ समझ आता इससे पहले ही उसे सामने खड़ा हर्षवर्धन दिखा।

" गुड मॉर्निंग " एक जादुई सी मुस्कुराहट के साथ हर्षवर्धन ने कहा।

" यह सब मत करो मैं तुम में बिल्कुल भी इंटरेस्टेड नहीं हूं और न ही तुम्हारी उन गर्लफ्रेंड्स की तरह हूं जो तुम्हारे यह सब करने से इंप्रेस हो जाती हैं, मैं इंप्रेस नहीं होने वाली तुमसे " त्रिधा ने किसी तरह अपने मन पर काबू करते हुए कहा।

" तुम्हारा नाम तो जान सकता हूं न या अटेंडेंस के वक़्त ही ध्यान से सुनना होगा ? " हर्षवर्धन पर जैसे त्रिधा की बेरुखी का कोई असर ही भी हुआ।

" मुझसे कोई उम्मीद मत रखो, जो ठीक लगे करो " त्रिधा ने इतना कहा और अपना बैग लेकर कैंटीन की तरफ चली गई।

हर्षवर्धन मुस्कुराता हुआ उस जाते हुए देखता रहा और धीरे से बोला " सिर्फ नाम ही नहीं, तुम्हारी पसंद, नापसंद, तुमसे जुड़ी हर एक बात जानकर रहूंगा, तुम्हारी आंखों में फैली इस उदासी को एक दिन तुमसे दूर करके ही रहूंगा.... वादा है तुम्हारे हर्ष का "

इधर त्रिधा कैंटीन पहुंची तो एक अलग ही ड्रामा चल रहा था और यह तो तय था जहां संध्या हो वहां ड्रामा कैसे न हो। प्रभात आगे आगे और संध्या हाथों में सॉस की बॉटल पकड़े उसके पीछे पीछे, कैंटीन का छोटू और उसके पापा दोनों ही हतप्रभ से खड़े थे। छोटू ने संध्या को रोकने के इरादे से एक कदम ही आगे बढ़ाया था कि तभी संध्या ने घूरकर उसे देखा, छोटू तो बेचारा उसके घूरने भर से ही गिर पड़ा तभी त्रिधा को देखकर प्रभात उसके दोनों हाथ पकड़ कर उसके पीछे छिप गया। अब हालात यह थे कि प्रभात संध्या से बचने के लिए त्रिधा को छोड़ने को तैयार नहीं और संध्या, प्रभात के ऊपर सॉस डाले बिना उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी और बार बार सॉस की बॉटल का खुला हुआ हिस्सा प्रभात की ओर कर उस प्रभात पर गिराने की धमकी देती और प्रभात त्रिधा को आगे कर देता। इधर हर्षवर्धन जो त्रिधा से बात करने के लिए उसके पीछे पीछे आया था जब उसने यह सब देखा तो वह बोल ही पड़ा " यह सब क्या हो रहा है?" हर्षवर्धन पर सबका ध्यान गया तो प्रभात को भागने का मौका मिल गया। जब किसीने कोई जवाब नहीं दिया तो उसने फिर पूछा - "यहां यह सब क्या हो रहा है?" और खुद ही कुल्हाड़ी पर पैर रख बैठा.... उसकी आवाज दोबारा सुनते ही संध्या को लगा प्रभात वहां पहुंच गया और उसने सॉस की सारी बॉटल हर्षवर्धन पर उड़ेल दी। अगले ही पल संध्या को समझ आया कि उसने किसी और पर सॉस की बॉटल उड़ेल दी है तो उसने हर्षवर्धन से कहा "आय'म रियली वेरी सॉरी, मुझे लगा प्रभात वहां पहुंच गया है "

" इट्स ओके " हर्षवर्धन ने बिना किसी भाव के कहा।

हर्षवर्धन को इस हाल में देख त्रिधा खिलखिला कर हंस पड़ी और उसे ऐसे हंसते हुए देख हर्षवर्धन के साथ साथ प्रभात और संध्या भी अपनी लड़ाई भूलकर उसे देखने में मग्न हो गए। त्रिधा बहुत कम हंसती थी और जब भी वह हंसती तो तीनों को ही अच्छा लगता कि कम से कम वह अपनी परेशानियों को भूल रही है। हर्षवर्धन तो मन ही मन सोच रहा था तुम्हारी इस हंसी के लिए तो मैं हर दिन अपने ऊपर सॉस उड़ेल सकता हूं। तीनों को अपनी ओर देखता पाकर त्रिधा सकपका गई और बोली " क्या हुआ था संध्या? यह सब क्या बचपना है? "

" इसने मुझे फूल दिया " संध्या ने गुस्से भरी नज़रों से प्रभात को देखते हुए कहा।

" तो? " हर्षवर्धन बीच में ही बोल पड़ा।

" तुम बीच में मत बोलो सुनना है तो सुनो वरना जाओ " त्रिधा ने फिर बेरुखी से कहा।

यह सुनकर हर्षवर्धन बच्चों की तरह अपने होठों पर उंगली रख कर चुपचाप खड़ा हो गया।

" तुम नाराज़ थीं, तुम्हें मनाने के लिए दिया होगा न ऐसे क्यों रिएक्ट कर रही हो? दोस्तों को भी फूल दिए जा सकते हैं... व्हाट्स द बिग डील? " त्रिधा ने आगे कहा।

" दोस्तों को भी फूल दिए जा सकते हैं मानती हूं पर जानती हो त्रिधु इसने मुझसे क्या कहा... यह बोला एक फूल, एक फूल के लिए, सॉरी.... मतलब इसने मुझे सॉरी बोलते वक़्त भी बुद्धू कहा " संध्या ने प्रभात को खा जाने वाली नज़रों से घूरा।

" प्लीज़ लड़ना बन्द करो " त्रिधा ने कहा तो प्रभात और संध्या दोनों एक दूसरे से मुंह फेरकर उल्टी दिशा में आगे बढ़ गए और हर्षवर्धन मुस्कुराता हुआ त्रिधा को देखते हुए चला गया।

**********

एक सप्ताह बीत गया लेकिन त्रिधा को पढ़ानेे के लिए न ही कोई विद्यार्थी मिले और न ही कोई उचित जगह मिली। इधर संध्या और प्रभात एक दूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे लेकिन दोनों ही त्रिधा की मदद करने की पूरी कोशिश कर चुके थे पर उन्हें भी कोई हल नहीं मिला जिससे कि वे त्रिधा की कुछ सहायता कर पाते। उधर हर्षवर्धन त्रिधा के आसपास रहने की, उससे बात करने की, उसे खुश करने की कोशिशें करता रहता पर त्रिधा के लिए जैसे वह था ही नहीं।

एक शाम संध्या त्रिधा के हॉस्टल अाई और उससे कहा कि उसके घर के पास चार बच्चे हैं जो पढ़ना चाहते हैं तब त्रिधा ने खुशी खुशी हां कह दिया और अगले ही दिन से बच्चों को पढ़ाने जाने लगी।

अब त्रिधा को पढ़ाते हुए एक महीना हो चुका था और इस एक महीने के अंदर ही त्रिधा को समझ आ गया कि यह इतना भी आसान नहीं क्योंकि बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ उसे अपनी पढ़ाई के लिए भी वक़्त मैनेज करना था साथ ही संध्या का घर त्रिधा के हॉस्टल से बहुत दूर था और इसीलिए वह ऑटो या सिटी बस से उन बच्चो को पढ़ाने जाती थी जिसमें उसकी लगभग आधी कमाई खर्च हो जाती थी लेकिन जितना भी मिल रहा था उससे त्रिधा को काफी सहूलियत हो गई थी इसीलिए उसने बच्चों को पढ़ाना जारी रखा।

एक दिन प्रभात शाम को अपने घर से बाहर निकल कर कहीं जाने ही वाला था कि उसे सामने से त्रिधा आती हुई दिखी, वह बहुत घबराई हुई और परेशान लग रही थी। प्रभात को देखते ही त्रिधा उसके गले लग गई और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। त्रिधा को इतना परेशान देखकर प्रभात यूं भी घबरा गया था ऊपर से उसके रोने से उसे कुछ बुरा घटित होने की आशंका होने लगी। फिर भी उसने समझदारी से काम लिया और त्रिधा के सर पर हाथ फेरते हुए उसे चुप करवाने की कोशिश करने लगा। जब त्रिधा थोड़ी संभली तो प्रभात उसे अपने घर ले गया और उसे अपने सामने बैठाते हुए पूछा " अब बताओ... क्या हुआ है त्रिधा? तुम इतना क्यों घबरा रही हो? " इतना सुनते ही त्रिधा वापस रोने लगी और कुछ देर बाद खुद ही प्रभात से कहने लगी " मैं बच्चों को पढ़ा कर आ रही थी, बहुत देर तक कोई भी बस या ऑटो नहीं मिला तभी वहां कुछ लड़के आ गए और मुझे अजीब तरह से घूरने लगे, उल्टी सीधी बातें करने लगे, इतने पर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ा आगे बढ़कर ऑटो का इंतजार करने लगी। अभी दो मिनट ही हुए होंगे कि उन लड़कों में से एक भागकर मेरी तरफ आया और मेरा दुपट्टा पकड़ लिया और बाकी सब भी मेरी तरफ आने लगे कि तभी एक ऑटो आ गया और उन लड़कों को मुझे परेशान करता देखकर कई लोग भी वहां आने लगे तब मैं उस ऑटो में बैठ कर आ गई " यह सब त्रिधा डरते हुए मगर एक ही बार में बोल गई। प्रभात को एक पल तो विश्वास ही नहीं हुआ कि त्रिधा इतनी बहादुर है जो ऐसे हालात में सूझ बूझ से काम लिया और यहां तक अाई वरना अगर कोई और लड़की होती तो वहीं रोने लगती और भीड़ जमा कर लेती। प्रभात ने आगे बढ़कर त्रिधा को गले लगा लिया और किसी बड़े की तरह तब तक उसके सिर पर हाथ फेरता रहा जब तक कि त्रिधा ने रोना बन्द न कर दिया। त्रिधा अभी प्रभात के गले लगी हुई सुबक रही थी कि तभी प्रभात की मां मीनाक्षी आ गईं और प्रभात और त्रिधा को ऐसे देखकर हर भारतीय मां की तरह पूरे खोजबीन के अंदाज़ में बोलीं " यह कौन है बेटा? " अपनी मां को देखकर प्रभात को अच्छा लगा साथ ही उसे लगा कि त्रिधा उसकी मां से अपनी परेशानी ज्यादा अच्छे से कह पाएगी और वे एक महिला होने के नाते त्रिधा को ज्यादा अच्छे से समझेंगी भी और समझाएंगी भी।

" मां यह मेरी दोस्त है... मैंने आपको बताया था न " प्रभात ने बताया तब त्रिधा ने भी हाथ जोड़ कर अभिवादन किया।

मीनाक्षी जी त्रिधा के पास आईं और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा " आप तो बहुत सुंदर हो बेटा लेकिन इतने खूबसूरत चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है? " उनके ऐसे प्यार से बोलने से त्रिधा को अपनी मां की छवि उनमें नज़र आने लगी और त्रिधा ने उसके साथ शाम को जो कुछ भी हुआ सब बताया तब उन्होंने त्रिधा को प्यार से गले लगाते हुए कहा " बेटा आप बहुत हिम्मत वाली हो जो बिना डरे ऐसी सिचुएशन को संभाला, अब जो हुआ उसे भूल जाओ और वापस पहले की तरह हंसने बोलने लगो "

" जी आंटी " त्रिधा ने बनावटी मुस्कुराते हुए कहा।

" वैसे बेटा प्रभात बता रहा था कि आपको छोले भटूरे बहुत पसंद हैं और आज मैं छोले भटूरे ही बनाने वाली थी, खाकर जाना ठीक है न " मीनाक्षी जी ने इतने प्यार से कहा कि त्रिधा चाहते हुए भी ना नहीं कह पाई। कुछ देर बाद मीनाक्षी जी खाना बनाने चली गईं।

" वैसे प्रभात तुम्हारे पापा कहां हैं? " त्रिधा ने सहज ही पूछ लिया।

" वो किसी ज़रूरी काम से बाहर गए हैं, कल तक आ जाएंगे" प्रभात ने कहा।

बातों से ध्यान हटा तो त्रिधा फिर उदास हो गई तब प्रभात ने उसका ध्यान बटाने के लिए फिर अपनी बेतुकी बातें शुरू कर दी।

" तुम्हारा कभी कोई बॉयफ्रेंड था? " प्रभात ने किसी जासूस की तरह पूछा।

" तुम्हें लगता है जिस लड़की को खुलकर सांस लेने का भी हक नहीं मिला उसे किसी से प्यार हुआ होगा, जब अपने ही दुश्मन बन जाते हैं तो सारी दुनिया से भरोसा उठ जाता है प्रभात और फिर किसी पर भी भरोसा करना आसान नहीं होता तो प्यार का तो कोई सवाल ही नहीं है " कहते हुए त्रिधा उदास हो गई। एक बार फिर उसे अपना बीता हुआ कल याद आ गया था। त्रिधा को उदास देखकर प्रभात ने अपना माथा पीट लिया, उसने तो सोचा था प्यार वगैरह की बातों से त्रिधा चिढ़ेगी, नाराज़ होगी और हुआ उल्टा... एक और वजह मिल गई उसे उदास होने की।

" चलो कोई बात नहीं वो उस दिन कैंटीन में जो लड़का था न... हर्षवर्धन सिंह राठौर नाम है उसका, तुम्हें कितने गौर से देख रहा था न जैसे एकतरफा प्यार करने वाले देखा करते हैं। मुझे लगता है वो सच में तुम्हें बहुत पसंद करता है और शायद पसंद ही नहीं प्यार भी और.... " प्रभात ने इस बार अनजाने में ही सही लेकिन सही बात बोल दी थी। हर्षवर्धन का नाम सुनते ही त्रिधा के उदास चेहरे पर रौनक आ गई लेकिन कहीं प्रभात उसके मन की बात न जान के यह सोचकर त्रिधा ने प्रभात की बात बीच में ही काट दी और बोली " मेरी चिंता मत करो, मुझे तो जब, जिससे प्यार होना होगा, हो जाएगा, तुम बोलो उस दिन तुमने संध्या को ' एक फूल, एक फूल के लिए ' कहा था उसका मतलब संध्या भले ही ' बुद्धू ' समझी हो पर मुझे पता है तुमने संध्या को ' फूल यानी फ्लावर ' वाला फूल कहा था न "

" बकवास बन्द करो ऐसा कुछ भी नहीं है मैंने उसे बुद्धू ही कहा था पर बुद्धू वो नहीं बुद्धू तुम हो " प्रभात ने त्रिधा के मुंह पर पास रखा कुशन फेंकते हुए कहा।

" मुझे चुप कराने से सच नहीं बदलेगा प्रभात.... तुम पसंद करते हो संध्या को तो क्यों नहीं मान लेते? " त्रिधा ने थोड़ी ऊंची आवाज में पूछा।

" आज एक महीने बाद पूछ रही हो? " प्रभात ने बात बदलने की कोशिश की।

" हां मैं पढ़ने - पढ़ाने में इतनी बिजी हो गई कि बहुत बार सोचा पर पूछ नहीं पाई लेकिन प्रभात ये बात बदलने से काम नहीं चलेगा " त्रिधा ने भी प्रभात के बात बदलने के इरादे को भांप लिया। लेकिन प्रभात की किस्मत अच्छी थी उसी वक़्त मीनाक्षी जी ने दोनों को डिनर करने बुला लिया और त्रिधा को चुप चाप डायनिंग टेबल पर बैठना पड़ा।

मीनाक्षी जी ने त्रिधा को इतने चाव से खाते देखा तो वे उसे थोड़े और छोले देने लगीं।

" नहीं आंटी और नहीं चाहिए काफी है " त्रिधा ने मुस्कुराते हुए कहा।

" अरे बेटा और लो न और आंटी क्यों मम्मा कहो न, मम्मी कहो, मां कहो " मीनाक्षी जी ने त्रिधा को प्यार से देखते हुए कहा और इतना सुनते ही प्रभात जल्दी जल्दी बोलने लगा " अरे यह त्रिधा है, मैं इसे नहीं संध्या.... " और फिर खुद ही बोलते बोलते चुप हो गया। इतना सुनकर मीनाक्षी जी मुस्कुराते हुए चली गईं और जब लौटकर आईं तो उनके हाथ में एक डब्बा था जिसे उन्होंने त्रिधा की तरफ बढ़ाते हुए कहा " बेटा मैं तुम्हे इसकी दूसरी दोस्त समझ रही थी , तुम्हारे बारे में भी प्रभात ने मुझे सब बताया है। कभी यह मत समझना कि तुम अकेली हो मैं भी तुम्हारी मां ही हूं जब मन करे तब आ जाया करो अपनी मां के पास " मीनाक्षी जी ने त्रिधा के सिर पर हाथ रख दिया।

" जी आंटी.... लेकिन मैं यह नहीं ले सकती " त्रिधा ने हिचकिचाते हुए कहा।

" यह बेसन के लड्डू हैं, तुम्हें पसंद आएंगे और चुपचाप रखो कोई आनाकानी नहीं, मां डांटती भी है " मीनाक्षी जी ने कहा।

कुछ देर बाद प्रभात त्रिधा को हॉस्टल छोड़ आया और त्रिधा भी कुछ देर पहले की घटनाओं को रास्ते पर ही छोड़ कर खुशी खुशी एक नई सुबह के लिए तैयार थी।


क्रमशः