Nagada in Hindi Moral Stories by Renu Asthana books and stories PDF | नगाड़ा

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नगाड़ा

नगाड़ा

मई की चिलचिलाती दुपहरी अंगारे बरसा रही थी, उस पर बवंडर उठाती गर्म हवा । जमीन झुलसी जा रही थी । पानी सूख रहा था । खेत दरारों से पटे जा रहे थे । और शहरों में थोड़ी – थोड़ी छाया का टुकड़ा पाकर पशु – पक्षी दुबके पड़े थे । गली – चौराहों के नीम – पीपल की छाया में रिक्शे वाले गमछे से मुँह लपेटे अपने – अपने रिक्शों के हुड उठाए सोए थे । कोई कहीं चलने को कहता तो सीधे ‘ना’ में सर हिला देते । दुकानों – गलियों के साथ आकाश भी सूना था । बस सड़कें ही थीं जहाँ आदमी भाग रहा था । बस में, गाड़ी में, साइकल पर अथवा पैदल ।

धनपति भी इसी भीड़ का एक हिस्सा था जो दो दिन से लगातार आगरा की सड़कों पर अपना परिवार लिए इधर – उधर भटक रहा था । गाँव छोड़कर शहर में उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । पीठ पर गठरी ,हाथ में डंडा और कंधे पर लटकी डोरी में झूलते नगाड़े के सिवाय उसके पास न कुछ कमाने को था न बताने को ।

पीछे चलते छोटू ने आवाज लगाई थी “बापू--- भूख लगी है ।” धनपति बहरा बना चला जा रहा था । उसे न पीछे आती बेटी और छोटू के साथ गोद में एक बच्चा संभाले पत्नी का ध्यान था, न पैर की लाल मुँह खोले उन बेवाईयों का जो चप्पल से बाहर निकलीं सड़क पर हांफ – हांफ कर चल रही थीं ।

आधा किलोमीटर के बाद अंदर की ओर मुड़ती गली से भीतर जाकर वह एक दूसरी गली के मुहाने पर खड़ा हो गया । जहां गली के इस पार से उस पार तक एक अभेद्य सन्नाटा था । धनपति ने तपता सूरज देख नगाड़े पर ज़ोर का संघात किया । गली तड़ – तड़ की आवाज से गूंज उठी पर गली के दरवाजे जकड़े खड़े रहे । धनपति डामर से चमकती गली देखता ,एक घर की बाहरी सीढ़ी पर बैठ गया । सूखे होठों के पीछे प्यास बावली हुई जा रही थी । और आँतें भूखे पेट से सिकुड़ रही थीं ।

“बाबू ,डुगडुगी बजाओ ।” बहुत देर तक चुपचाप बैठे पिता को देख छोटू ने धनपति की धोती हिलाई । बेटे को देख उसने ऐसे मूंह फेर लिया जैसे सुना ही न हो । छोटू ने फिर से धोती हिलाई “बाबू .....डुगडुगी बजाओ नी “ । धनपति ने गुस्से से बिवाइयों भरा खुरदरा पैर बेटे की ओर उठाया ।

“डुगडुगी बजाओ ?”

“के काम डुगडुगी का ? बोल ?”

“ है कोई देखन वाला जो थारा खेल देखेगा ? म्हारी डुगडुगी सुनेगा ? डुगडुगी बजाओ ....बड़बड़ाता धनपति बगल की नाली देखने लगा, जहां बहते पानी में डूब कर बैठा कुत्ता कहीं से बह आई रोटी ,अपने पैरों मे फंसाए बड़े चाव से खा रहा था ।” कुत्ते को देख धनपति विद्रुप हंसी हंसा। कुत्ता रोटी खाकर नाली का पानी पी तृप्त अंगड़ाई लेता, अपना शरीर झाड़ रहा था ।

धनपति को अपना गाँव याद आया जहाँ मवेशी हड्डियाँ निकले साल के कई – कई महीने बेबसी से पथरीले पहाड़ और बंजर धरती को देखते हैं । जहाँ आदमी गर्मी आते ही अपना घर - पशु सब भगवान के भरोसे छोड़कर दो रोटी की खोज में निकल जाता है । जो बरसात हुए कभी तो लौटकर आता है, और कभी किसी बाहरी गाँव मे ही बस जाता है ।

“बाबू तैने कहा था ,जब ये फिरंगी आपणे देस चले जाएंगे तो इन भाटन मा (पत्थर ) अनाज पैदा होवेगा । हमारी आपणी जमीन होवेगी, घर होवेगा, रियाया (रियासत ) होवेगी । हम आपणे मालिक होवेंगे । पर सब झूठ हुआ । हम जैसे के तैसे रह गए बाबू ।”

“मैं छोटे से चालीस का हो गया । न आपणी जमीन हुई ना घर । हां सरकार जरूर आपणी है ।”

“और हम ? हम बंजारे ही रह गए ?”

“भला हुआ जो तू स्वर्ग सिधार गया । जीता तो खूण के आँसू रोता ।” धनपति फिर से नाली में बहते पानी को देखता है जहाँ से रोटी खाकर तृप्त कुत्ता शरीर फटकारता चला गया था । धनपति के पास ही माँ के साथ बैठी उसकी बेटी बड़े ध्यान से कभी तारकोल की चमकती सड़क कभी पिता का चेहरा देख रही थी । समझ रही थी पिता के भीतर का अंधड़ पर समझ नहीं पा रही थी क्या करे ।

कुछ देर चुपचाप बैठी रहने के बाद पिता के पास जाकर उसने धीरे से कहा “बाबू, एक बार फिर से डुगडुगी बजाओ नी ।”

“शायद राम जी.... आगे के शब्द उसके गले में फंसे रह गए । धनपति ने टूट कर बेटी को देखा था”— राम जी ?

“बावरी”! “रामजी सोणे की थाली मा आरती पावे हैं । मन्ने पास के है । ए गठरी औ डंडा बस ?”

“बाबू, बजाओ तो ।” लड़की ने दूर तक दिखता तारकोल देखा था ।

“बावली हुई सै...?”

“एक बार बाबू । बस एक बार”

“चल ! तू कहे है तो ये भी सही पर राम...”

धनपति ने पास रखे डंडों को जमीन पर डाल, नगाड़ा गले मे लटका लिया । संघात से पहले जो उसने आँखें बंद की तो भीतर गाँव के पथरीले पहाड़, खूँटें उगाते खेत और कीकर- नागफनी के मोटे विषैले कांटे चुभ गए । जहां न रोजी थी न रोटी । न नींद थी न सपना । वहाँ बस पथरीला सन्नाटा था या दाने दाने को मुंह देखती ज़िंदगी । आँख जल उठी धनपति की । संघात उतना ही गहरा हुआ । नगाड़े की ताड़-ताड़ की नाद ने अब घर की सांकलों को ही नहीं फाटक भी खोल दिये । लोग धीरे-धीरे कर बाहर निकलने लगे ।

धनपति के नगाड़े ने ताल बदली । छोटू लगा कलाबाज़ियाँ खाने । वह कभी रबड की तरह अपने हांथ-पैर मोडकर खोलता तो कभी पैर का फंदा बनाता उसमें सर घुसाकर बाहर निकल आता । कभी नगाड़े की ताल पर घूमर नृत्य करता तो कभी दोनों हांथ ज़मीन पर टिका पैर ऊपर उठाकर गोल चक्कर लगाता ।

बच्चे खुश थे । छोटू उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था । हाँ, उनके बीच प्रश्न भी चल रहे थे—

“इसकी आँखें देखो, कैसी निकल रही हैं । भूत –सी । “

“इसकी गले की हड्डियाँ नहीं देख रहे कितनी निकली हैं ?”

“लगता है इसे खाना नहीं मिलता । “

“मैं अपना होर्लिक्स दे दूँ भैया ?” एक छोटी बच्ची ने साथ खड़े भाई को देखा ।

“चुप ,मम्मी पीटेगी....

प्रश्न ,जिज्ञासा बच्चों के बीच उठते रहे ,छोटू कलाबाज़ियाँ दिखाता रहा । छोटू के बाद धनपति की लड़की उठी थी । गेहूंए रंग की धुंधली, कमजोर लड़की । छल्लों से दो – चार खेल दिखाने के बाद अब वह बांस से बंधी रस्सी पर चल रही थी । उसके सर पर एक प्लेट में पानी से भरा गिलास रखा था और डैने से फैले दोनों हाथों पर मिट्टी का दिया । लड़की पिता के नगाड़े का नाद थामे रस्सी पर इस पार से उस पार चली जा रही थी । उसका शरीर पसीने से भीग रहा था और आँखें लाल थीं । लोग सांस रोके उसे देख रहे थे । फटे दुपट्टे से दिखता उसके शरीर का एक टुकड़ा किसी के भीतर दया पैदा कर रहा था तो किसी में ममता । और किसी के भीतर कुर्ते के उन रेशों को भी और चीर देने की दुर्दांत चाह जनम रही थी । पसीने से भीगी लड़की उस पार से अब इस पार धीरे – धीरे चली आ रही थी । छोटू की तरह अपनी सांस अपने विश्वास को बांधे ।

नगाड़ा धीरे – धीरे करता ठंडा हो रहा था साथ ही ठंडी हो रही थी वहाँ की भीड़ । बच्चों के प्रश्न और लोगों की आँखें । लड़की वापस माँ के बैठी अपनी सांसें थाम रही थी । औरत सामान समेट रही थी और छोटू पिता के साथ बैठा सड़क पर फैली चादर पर गिरते आटे , चावल और पैसों को देख रहा था । गोल – गोल रोटियाँ उसमें भूख पैदा कर रही थीं ।

चादर को बांध अपनी धरोहर संभालें वो पलट कर चल दिये । “सुनो “ वो कुछ कदम ही चले थे कि उन्हें किसी ने बुलाया ।

“मैं तुम्हीं को बुला रही । ओ नगाड़े वाले भइया जी ....”

धनपति मुड़ा था “ ये कुछ खाने का सामान और कपड़े हैं ।

“इस बिटिया के लिए “ कुछ कदम आगे बढ़ कर औरत ने लड़की के सर पर हाथ फिराया था । लड़की ने दोनों पॉलिथीन के झोले संभाल लिए ।

“तुम्हारी बेटी बहुत प्यारी है । इसे खुला मत रखा करो ।“ औरत ने धनपति की पत्नी को देखकर कहा ।

सर हिलाकर वह हँस दी । “खुली बेटी लुटा पानी कौन चाहे है बहू सा” मन ही मन कहती वह सबके साथ चल दी । कुछ देर बाद किसी दूसरी गली में धनपति का नगाड़ा तड़ – तड़ का कर्कश नाद उठा रहा था । पता नहीं यह नाद उसके जीवन की चुनौती थी या ईश्वर से विद्रोह ।

रेणुका अस्थाना

भिवाड़ी

9982448126