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प्रश्न : रत्नों का महत्व क्या है? रत्नों से भाग्य बदलता है? उत्तर: रत्नों का उपयोग अंगूठी और आभूषण की सुंदरता बढ़ाने के लिए होता है। रत्नों को ग्रहों और उसके कारक के साथ जोड़ा गया है। रत्नों से आपका व्यक्तित्व और आत्मविश्वास निखरता है ऐसा प्रयोगात्मक विश्लेषण से पता चलता है। यदि कोई ज्योतिषी आपको रत्न का सुझाव करता है और उसे पहनने के बाद यदि आप के आंतरिक आत्मविश्वास और व्यक्तित्व को बाह्य रूप से निखार मिलता है एवं आप की प्रसन्नता,और सुंदरता बढ़ती है तो ही वह रत्न पहने। यह भी याद रखे, इंसान के अलावा, कुदरत का कोई भी जीव रत्न या आभूषण नहीं पहनता। उनके पास भी जीवन है, उनको भूख,प्यास,नींद,भय,पीड़ा, सेक्स की इच्छा और असुरक्षा उतनी ही महसूस होती है जितनी इंसान को, परन्तु इंसान के पास एक चीज है, जो इन जीवों के पास नहीं है, वह है समाज ,और सामाजिक इच्छाए मनुष्य को ही है, उसे आत्मविश्वास, प्रभाव,भाषा,तर्क , ज्ञान,सम्मान,संपति और प्रगति की चाह है। और यदि रत्न पहनने से यह सारी इच्छाओं की पूर्ति में सहायता मिलती है तो रत्न जरूर पहनना चाहिए।
----------------------------- (૧) શત્રુ, દ્વેષી,પાપી ( સર્વહિત નું ચિંતન) (૨)અજાણ્યા,તટસ્થ, ધર્માત્મા (સ્વીકાર, પ્રગતિ) (૩) પ્રેમી, મિત્ર, બંધુ ( પ્રેમ,પોષણ,પ્રસન્નતા) ----------------------------- આ નવ જીવો જીવનયાત્રા ને વિકસિત કરનાર સહયાત્રીઓ છે, જે પોતાનું યોગદાન કરીને શૂન્ય માં પ્રયાણ કરે છે. આ સર્વેનું વિશેષ દાન જીવન ને મધુર બનાવે છે. જે જીવન માં પ્રેમ,પોષણ,પ્રસન્નતા,સ્વીકાર,પ્રગતિ અને સર્વહિત નું ચિંતન છે.. એ વિકાસ પામે છે.
उपाय यानी कि Remedies पर प्रश्न। --------------------------::------ प्रश्न : मंत्र ,तंत्र और यंत्र का क्या प्रयोजन है? यह उपाय के तौर पर ठीक है? उत्तर : मंत्र का अर्थ है Code, तंत्र यानी System, यंत्र का अर्थ है Machine. Code , System and Machine इन तीनों के संयोजन से एक टेक्नोलॉजी का निर्माण होता है। यह टेक्नोलॉजी किसी विशेष प्रयोजन के लिए होती है। परन्तु टेक्नोलॉजी का यह अर्थ बाह्य संसाधनों के विकास के लिए है। पारंपरिक अर्थ के रूप में मंत्र,तंत्र,और यंत्र का उपयोग स्वभाव, विचार और कर्मों को दिशा देने के लिए होता था। जो बाद में अलग अलग प्रकार की साधना,उपासना,अनुष्ठान और क्रियाकांड में बदल कर विकृत हो गया, और इसका प्रयोग इष्ट देवी या देवता को सात्विक ,राजसी और तामसिक रूप से प्रसन्न करने और इच्छा पूर्ति के लिए होने लगा। यज्ञ और होम हवन के लिए भी होने लगा। इसके बाद विविध प्रकार के सांप्रदायिक उपचारों हेतु ग्रहों और उसके कारकत्व के साथ मंत्र ,तंत्र,यंत्र को जोड़ दिया। और इसका प्रभाव बहुत समय तक समाज में रहा, बाद में यह केवल देवी देवताओं तक सीमित न रह कर नाग,किन्नर, अप्सरा, यक्षिणी,भूत ,प्रेत, गण, भैरव,पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, बैताल, ब्रम्हराक्षस, पीर, फकीर, महात्माओं, संतो , वीर,जोगिनी की विशिष्ट कृपा प्राप्ति हेतु किए जाने वाले अभिचारिक प्रयोगों का माध्यम बन गया और यहां से और विकृत हो कर विविध प्रकार के अंधविश्वासी विचारों को फैलाने का निमित्त बन गया, जिनसे बहुत प्रकार के मानसिक रोगों का जन्म हुआ, और समाज में आज भी इसका भय फैला हुआ है। ज्योतिष में ग्रह पीड़ा के निवारण के लिए, रत्नों को सिद्ध करने हेतु , दान के संकल्प के लिए एवं और भी बहुत तरह से आज भी इसका प्रयोग किया जाता है, जो मेरी दृष्टि में अंधविश्वास ही है। यह कर्म और पुरुषार्थ की जगह चमत्कार और जादू की मानसिकता को बढ़ावा देता है, गुणों में वृद्धि की जगह स्थूल और शुष्क आराधनाओं को और आडम्बरों को जन्म देता है। इसी लिए उपाय के तौर पर केवल श्रद्धा से ही इसका उपयोग ठीक है परन्तु इस से किसी विशेष लाभ की प्राप्ति पर संशय है।
उपाय यानी कि Remedies पर प्रश्न। --------------------------::------ प्रश्न : व्रत या उपवास के नियम पालन से ग्रह पीड़ा निवारण होता है? उत्तर: व्रत या उपवास कुदरत और जीवन का स्वभाव नहीं है। समय ,ऋतु और शरीर के हिसाब से पोषणयुक्त और संतुलित आहार और विहार की ही महिमा है। रोग या स्वास्थ्य की तकलीफों के वक्त उपवास एक औषधि की तरह काम करता है जो चिकित्सक की सलाह अनुसार आप की मूल प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए। जहां तक व्रत और संकल्प की बात है इसका ग्रह पीड़ा निवारण से कोई लेना देना नहीं है। यह मान्यता और श्रद्धा आधारित नियम पालन है, इसका ज्योतिष से संबध ना बराबर है।
उपाय यानी कि Remedies पर प्रश्न। --------------------------::------ *प्रश्न : दान की महिमा क्या है? वास्तव में ग्रहों के दान से भाग्य बदलता है? उत्तर : दान और कर दोनों ही जीवन और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक है। कर सुविधाओं का सृजन करता है और दान वंचित वर्ग के लिए आपूर्ति करता है। दान और ग्रहों का सीधा कोई संबंध नहीं है परन्तु धान्य और खाद्य पदार्थों को ग्रहों के साथ जोड़ा गया है। और उसी से ग्रहों के लिए दान का पारंपरिक लोकवाद प्रारंभ हुआ। यज्ञ यानी सामूहिक उन्नति के लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ, तप यानी सामूहिक उन्नति के लिए सार्थक योग्यता प्राप्त करने का परिश्रम और अभ्यास। और तप और यज्ञ से दान उत्पन्न होता है। जैसे एक योद्धा सैनिक देश की सेवा के लिए ट्रेनिंग प्राप्त करता है,वह उसका तप है। फिर वह अपनी पूरी ताकत से देश की सरहदों की रक्षा करता है वह उसका यज्ञ है। और जरूरत पड़ने पर वह शत्रुओं का विनाश करता है ,कभी कभी खुद की जान खतरे में डाल कर बलिदान करता है यह उसका दान है, दूसरों के हित के लिए कुछ भी निस्वार्थ भाव से देना या समर्पित करना दान है। भौतिक वस्तुओं का, समय का, ज्ञान का ,सहायता का ,दान बहुत प्रकार का होता है। इसी दान से समाज और कुदरत का चक्र संतुलित है। पशु पक्षियों की सेवा , चींटीओ की सेवा भी दान की श्रेणी में आता है। योग्य व्यक्ति को दिया जानेवाला दान जीवन रक्षक और पोषक है। प्रसन्नता और सुकून में वृद्धि करने वाला स्वाभाव, विचार और जीवन ऊर्जा को सुख ,शांति प्रदान करने वाला और पीड़ा का शमन करने वाला भी है, कभी कभी यह दान आपके प्रभाव और प्रतिष्ठा में वृद्धि भी करता है और यश भी प्राप्त होता है इसी लिए ग्रहों की पीड़ा के निवारण हेतु दान का विशेष महत्व है।
उपाय यानी कि Remedies पर प्रश्न। --------------------------::------ *प्रश्न : क्या टोने टोटके काम करते है?* उत्तर: टोने टोटके, शगुन अपशगुन, यह सब पारंपरिक लोकवाद के आधार पर समाज में प्रचलित है। और इसके पीछे केवल मान्यताओं का प्रभाव है। जब कोई एक समाज किसी एक बात पर सामूहिक रूप से विश्वास करता है, तो वहीं बाते परंपरा के रूप में आने वाली पीढ़ियों को भी बताता है, इस तरह से पीढ़ियों से अंधविश्वास चलता आ रहा है। मूल रूप से टोने टोटके के पीछे इंसान का भय और लोभ काम करता है। रावण संहिता, लाल किताब, काली किताब जैसे कुछ ग्रन्थ जो ऐसे टोटको का समर्थन करते है। अब यह किताबें जिस समय में लिखी गई उस समय जन सामान्य में तर्क और विज्ञान का बहुत प्रभाव नहीं था, और श्रद्धा के आधार पर समाज में बहुत सारे नियम और आचार व्याप्त थे। अब आप टोटके करोगे तो उसमें सफलता की संभावना महतम 50-50% रहेगी। मतलब १० लोग अगर यह करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा 5 लोगों को लाभ होगा, इस संभावना के आधार पर टोने,टोटके की दुकान चलती है, जो पूर्ण रूप से विश्वास योग्य नहीं है।
૫૦૦ વાત નો એક સાર , તમને કોઈ પણ ક્રિયા માં મજા આવે છે અને તેના દ્વારા તમારા અને અન્ય ના જીવન નો વિકાસ શક્ય છે.. તો એ જ કાર્ય આ કુદરત માં કરવા યોગ્ય છે. સમષ્ટિ નુ ક્ષેમ અને સ્વ ની ખુશી.. આ બન્ને નો યોગ જ સંતોષ અને સમૃદ્ધિ છે.. કૃષ્ણ એને અકર્મ કહે છે. વિચારો,કર્મ અને સંગત માં સૌથી કષ્ટદાયક સંગત છે,જો એ ખોટી મળે તો અપમાન,કાયરતા,અપકીર્તિ બધું જ પ્રાપ્ત થઈ જાય.. અર્જુન ને નાજુક પળો માં યુદ્ધ ની વચ્ચે જ્યારે એની સ્થિતિ બગડી ત્યારે કૃષ્ણ ની સંગત મળી. અને દુનિયા ને ગીતા મળી... આમ ખોટા સમયે સાચી સંગત જગત ની દિશા બદલી નાખે છે.. અને સાચા સમયે ખોટી સંગત જીવન ની દિશા બદલી નાખે છે..
१६ से १८ साल के बच्चे अपनी फ्यूचर रिलेशनशिप और उसके स्टेट्स के बारे में जब पूछते, तब मजा आता है क्योंकि वह बड़े भोले होते है, और २० - २२ साल के बच्चे शादी के बारे में सोचने लगते है और पूछने लगते है। अब यह बात अच्छे से समझे, --------------------- आप का शरीर १४-१५ साल की उम्र से ही विजातीय आकर्षण महसूस करता है। यह बात सच है, और यह भी सच है कि भारत में लड़की के लिए शादी या संबंध शुरू करने की जो लघुतम आयु है वह १८ वर्ष है , और लड़के के लिए यह उम्र २१ साल है। समाज के नियम कुछ अलग है, समाज में लड़का और लड़की का परिवार, उनकी शिक्षा, उनकी कमाई, जीवनशैली , चरित्र, घर, सुविधाएं, जाति,संप्रदाय यह सब कुछ देखा जाता है। और आज कल समाज में औसतन २४-२५ साल के बाद ही रिश्ता देखने की शुरुवात होती है। शादी की जहां तक बात है आपको कानून और समाज दोनों के हिसाब से खुद को काबिल बनाना होगा, और तब तक शादी के बारे में प्रश्न करना कुछ हद तक आपकी कल्पनाओं और विचारों को बोझ ही देगा। अब रही मैत्री संबंध, प्रेम विवाह, सिचुएशनशिप की बात तो उस बारे में भी आप १८ - १९ साल के बाद ही सोचे, आज कल १५ - १६ साल की बच्चियों को अबॉर्शन करवाना पड़ता है, यह दुखद बात है। तो कृपया समझे कि स्त्री और पुरुष का संबंध केवल शारीरिक नहीं है, वह एक अलग तरह का उत्तरदायित्व और समझदारी मांगता है। आप यदि किसी भी तरह के संबंध को निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार है ,और हर तरह की परेशानियों से जूझने के लिए तैयार है तो ही अपनी मानसिक ऊर्जा को "रिलेशनशिप" नाम के आयाम में लगाए। जब भी आप तैयार होंगे ,समाज और वातावरण की और से आप को खुद ही प्रस्ताव मिलने चालू हो जाएंगे। इस चीज के बारे में कम से कम पढ़ाई के समय सोचना छोड़ दे, पहले काबिल बन जाए। और १६-१७ की उम्र में इस बारे में ज्योतिष एप्लीकेशन पर पूछ कर पैसे व्यर्थ न करे।
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