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उपवन होने का गुमान हो गया है तुम्हें लेकिन सच तो ये है कि एक फूल भी नहीं हो तुम । कल्पवृक्ष होने का वहम पाले बैठे हो तो ठीक से पहचान लो कि बबूल भी नहीं हो तुम । स्वयं को शिखर कलश मानते हो पर धर्म की धरोहर का मूल भी नहीं हो तुम । मुझमें दोष निकालने वालो ख़ुद को भी परख लो तुम क्योंकि मुझे आँक सको इतने भी मुकम्मल नहीं हो तुम। 😎 - उषा जरवाल
मेरी कविता …✍️ सागर की शार्क तुम ठहरे मलय की शीतल - सी बयार, और मैं ज्येष्ठ की दहकती दुपहरी प्रखर। तुममें समाई समंदर -सी अथाह गहराई, जिसकी थाह लेने को आतुर मीन ललचाई । पर मुझमें है सतर्क शार्क-सी तीक्ष्ण चतुराई जिसकी पैनी दृष्टि से कोई मीन ठहर न पाई। ज्यों मधु-कलश पर मंडराती भौरों की पंक्ति, रस-लोभ में करती बारंबार निष्फल प्रयास । पर मैं कमल-पत्र की तीक्ष्ण धार समान, एक स्पर्श में ही रोक दूँ उनका विलास। ज्यों दीपक की लौ पर आकृष्ट पतंगों का दल, प्रभा को पाने को करता उन्मत्त विस्तार । पर मैं उसकी प्रहरी-वज्र-सी अडिग खड़ी, जला दूँ उनके साहस का समस्त अहंकार। ज्यों गुड़ की डली पर चींटियों की लंबी कतार, मिठास के मोह में उमड़ती जाती है बारंबार । पर मैं नागिन-सी बनकर फुफकार उठूँ, और छिन्न कर दूँ उनका सारा विस्तार। तो सुन लो हे मीनों की उत्सुक टोली, इस सागर पर है बस मेरा ही अधिकार । जो रहती हो आतुर यहाँ करने को विहार, यह क्षेत्र है मेरी चौकस पहरेदारी का द्वार। मुस्कुराकर मैं बस इतना कह दूँ— लहरों का आकर्षण चाहे जितना लुभाए, पर शार्क की एक झलक भर से हर मीन दिशा बदलना ही भाए। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
आज हमने अपने विद्यालय का प्रथम एवं सफल शैक्षणिक सत्र पूर्ण किया। यह सत्र सफलतापूर्वक पूर्ण करना केवल एक उपलब्धि नहीं है बल्कि माननीय पदासीन अधिकारियों द्वारा दिया गया उचित मार्गदर्शन, परिश्रम, अथक प्रयास एवं सामुदायिक सहयोग का परिणाम है। इस कार्यकाल के दौरान हमने अनेक त्रुटियाँ कीं, अनेक चुनौतियों का सामना किया और प्रत्येक कठिनाई को एक अवसर में रूपांतरित कर दिया। इस सत्र ने हमें अनुभूति कराई कि सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए अपने अथक परिश्रम, आपसी सहयोग एवं अनवरत प्रयास से हम सफलता के नए आयाम स्थापित करने के लिए सक्षम हैं । हमें विश्वास है कि इसी समर्पण एवं एकजुटता के साथ हम आगामी सत्रों में और अधिक उत्कृष्ट उपलब्धियाँ अर्जित करेंगे। विद्यालय परिवार के प्रत्येक सदस्य का योगदान इस सफलता की आधारशिला रहा है, जिसके लिए हम हृदय से कृतज्ञ हैं। आइए, इसी उत्साह, अनुशासन एवं दृढ़ संकल्प के साथ हम भविष्य की ओर अग्रसर हों और शिक्षा के पथ पर निरंतर प्रगति के नवीन इतिहास रचने के लिए तत्पर हों ।
खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है मेरी बढ़ती उम्र का अनुभव - जल वक्त की बरसात थमने का नाम नहीं ले रही पर मेरा साहस खड़ा है, अडिग, अचल… चेहरे पर उभरती रेखाएँ कहती हैं, कि हर वर्ष ने मुझे और निखारा है… थकते कदमों के बावजूद भी मैंने काम से अपना नाता और संवारा है… भागते वक्त की तेज़ हवाओं में भी मेरा जुनून दीपक-सा जलता रहा… अब उम्र नहीं, मेरा हौसला बोलता है— हर ढलती साँझ में मैं और सँवरती रही ।
एक घर के आँगन में बहुत सारे पौधे लगे हुए थे जिन्हें इनके माली ने मेहनत, लगन और स्नेहमयी स्पर्श देकर सींचा था । समय के साथ उन पौधों के आँगन अलग हो गए और वे नई मिट्टी में जाकर अपनी - अपनी दुनिया में ख़ुशी से रहने लगे । सब एक - दूसरे से दूर थे लेकिन जब तक माली था तब तक अपनेपन की बयार ने उन्हें एक - दूसरे से जोड़कर रखा था । एक दिन माली चला गया और धीरे - धीरे उनके बीच जो अपनेपन की डोर थी वो खिंचती चली गई । डोर इतनी दूर तक खिंच चुकी थी कि अब हवा ने भी उनके बीच आना बंद कर दिया था लेकिन पता नहीं क्यों एक पौधे को विश्वास था कि चाहे जो भी हो जाए लेकिन एक शीतल बयार है जो उसके मुरझाते हुए शरीर में नई चेतना का संचार करती रहेगी । भले ही वह शीतल बयार अपनी राह बदल चुकी है लेकिन उस पौधे की आस अभी भी बनी हुई है ।
मुझे ‘मैं’ पसंद हूँ । यह बिंदी ना लगाया करो , यह तुम पर जँचती नहीं । गहरे रंग ही पहना करो , यह साड़ी तुम पर फबती नहीं ॥ तो सुनो ... यह बिंदी मैंने लगाई है , तो मुझे तो जँचती ही होगी। यह साड़ी भी मैंने ही खरीदी है, पहनी है तो मुझे पसंद ही होगी ॥ तुम्हें लाल रंग पसंद है तो , पीला रंग खराब है क्या ? तुम शौक़ीन हो ‘अंग्रेज़ी’ में बड़बड़ाने के, तो ‘हिंदी’ मेरी बेमिसाल नहीं है क्या ? इतना तो तुम्हें भी पता ही होगा कि , नहीं मिलते दो लोगों के उंगलियों के भी निशान । फिर कैसे हो सकती है ? सभी की पसंद नापसंद एक समान । । मेरे शौक को ,मेरे पहनावे को, मेरे खाने को , मेरे गाने को , यूँ बेवजह जज ना तुम किया करो । खुद में भी मस्त रहना सीखो , हरदम दूसरों में नुक्स निकालने का कष्ट ना तुम किया करो ॥ क्या पता ... तुम्हारी कोई पसंद भी , करोड़ों में से हर एक को रास नहीं हो। । तो क्या ? आज तक जो तुम खुद को ‘ख़ूब’ समझते आए हो , मतलब, तुम भी कुछ खास नहीं हो। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
क्रोध को कभी क्रोध समाप्त नहीं कर पाया । शक्ति को भी शिव ने सदैव झुककर मनाया । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
पल - पल जिया जिस पल के लिए, वो पल भी आया कुछ पल के लिए । सोचा कि ठहर जाए वो पल, हर पल के लिए पर वो पल भी रहा कुछ पल के लिए पल - पल जिस पल का सपना सँजोया मैंने वो पल भी न रुका पलभर के लिए । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
छल - प्रपंच को आवरण की आवश्यकता होती है । सच तो स्वच्छंद होकर सामना करता है । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
बातों की मिठास अंदर के भेद नहीं खोलती । मोर को देखकर कौन कह सकता है कि ये साँप खाता होगा ? - उषा जरवाल
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