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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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चौपाई छंद - प्रश्न

अपने सारे प्रश्न उठाओ।
बिल्कुल आप नहीं पछताओ।।
जितना चाहो झंडे गाड़ो।
क्यों आखिर तुम मौका ताड़ो।।

सबके अपने प्रश्न हैं भारी।
इक दिन आती सबकी बारी।।
चीनी प्याज का दाम रुलाए।
बड़ा प्रश्न ये दिन क्यों आए।।

विपक्ष आज प्रश्न पर जीता।
उसे लग रहा प्रश्न है गीता।।
कुछ प्रश्नों के उत्तर मिलते।
कुछ के उत्तर से खुद डरते।।

सबके अलग प्रश्न हैं होते।
कुछ को मजबूरी में ढोते।।
ईश्वर पर भी प्रश्न हैं उठते।
जाने कितने जाते ठगते।।

बहुत प्रश्न जीवन में होता।
कोई हँसता कोई रोता।।
खड़ा प्रश्न है आज हमारे।
इससे हमको कौन उबारे।।

यमराज मित्र ने प्रश्न उठाया।
घन-घमंड में क्यों भरमाया।।
या फिर प्रश्न समझ ना आया।
मानव तेरी उल्टी छाया।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद -शिव और सावन

शिव का सावन माह मनोहर।
हर जन-मन को लगता सुंदर।।
शिव जी के मन को ये भाए।
प्रकृति संग ये खूब सुहाए।।

सावन शिव जी को है प्यारा।
भक्त मानते आप सहारा।।
वन-उपवन हरियाली छाए।
कृषकों में खुशियां भर जाए।।

रिमझिम रिमझिम बरसे पानी।
सबकी अपनी राम कहानी।।
बच्चे कागज नाव चलाएँ।
बहन-बेटियाँ कजरी गाएँ।।

काँवड़िए जल भरकर लाएँ।
भोले बाबा को नहलाएँ।।
शिव शंकर के कर जयकारे।
कोशिश कर जाते शिव द्वारे।।

सुख-समृद्धि सावन में बरसे।
शिव पूजन कर जन-मन हरसे।।
शिव -सावन का मेल निराला।
औघड़ दानी भोला-भाला।।

सावन में शिव पूजन करना।
दर पर उनके माथा धरना।।
सावन शिव का सुंदर गहना।
हर प्राणी का ये है कहना।।

विनय सभी की शिव जी सुनते।
करुणा वारिश सब पर करते।।
शिव गौरा का गान जो करते।
खुशियों से झोली निज भरते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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हमें याद रहेंगे
************
कितना करते हैं हम-आप
जितना कहते फिरते हैं,
ईमानदारी से सोचिए
कितना विचार करते हैं?
मगर आप क्यों करेंगे?
आपकी आँखों का पानी जो मर गया है,
ऊपर से आपका फलसफा
कोई कुछ भी कहे, सोचे या समझें
हमें कुछ फर्क नहीं पड़ता,
हमको तो इसी में मजा आता है,
बेवजह लोगों की जुबान पर
मेरा नाम जो आता है।
अच्छा है जनाब लगे रहिए
चने की झाड़ पर बैठे
झुनझुना बजाते रहिए,
आप दुनिया में छा जाएंगे
टीवी, अखबार, सोशल मीडिया के
राक-स्टार बन जायेंगे,
लोग आपके फैन बन
आपके आगे पीछे दौड़ेंगे
आपसे आटोग्राफ माँगेंगे।
इतना ही नहीं आपके लिए
भारत रत्न की माँग के साथ
आपकी जय-जयकार करेंगे
और मौका पाकर आपको धक्का भी देंगे
आपके हाथ पैर तोड़ कर
आपकी औकात बता देंगे।
अब हम और कुछ नहीं कहते
मगर अफसोस आप कल कहाँ
और किस हाल में होंगे,
इसकी चर्चा तो हम
अपने इष्ट मित्रों से करते रहेंगे
इसी बहाने ही सही आप हमें याद रहेंगे।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया

मैंने जिस पर था किया, आँख मूँद विश्वास।
उसने धोखा दे दिया, तोड़ हमारी आस।।
तोड़ हमारी आस, दिखा दी अपनी रंगत।
खीस निपोरे आज, रहा खा पूड़ी पंगत।।
कहें मित्र यमराज, भीख ले उड़ता डैने।
अब कैसा विश्वास, बहुत झेला जब मैंने।।१२९

योगी - मोदी दे रहे, जनता को बहु भाव।
जो हैं आज विपक्ष में, उनको गहरा घाव।।
उनको गहरा घाव, नहीं मिले अब मरहम।
चिंता करते रोज, दिखे अब कोई हमदम।।
हर कोशिश बेकार, बने जाते सब रोगी।
मुश्किल गलनी दाल, सामने मोदी - योगी।।१३०

मथुरा - काशी की धरा, बोले जय श्री राम।
सारा विपक्ष बेहाल है, बिगड़े उनके काम।।
बिगड़े उनके काम, सूझता है कब चारा।
होता मनु लाचार, मिले नहिं आज सहारा।।
कहें। मित्र यमराज, जगत ने देखा मथुरा।
मोदी-योगी साथ, देख अब काशी- मथुरा।।१३१

देते हैं उपदेश जो, खुद समझें कब सार।
अंतर दिखता साफ है, वाणी अरु व्यवहार।।
वाणी अरु व्यवहार, दिखाते खुद को ज्ञानी।
चलें नहीं उस राह, याद आती हैं नानी।।
कहें मित्र यमराज, आज तक जो नहिं चेते।
नित नूतन उपदेश, वही आगे बढ़ देते।।१३२

जितना देते उपदेश हैं, औरों को हम-आप।
उतना मानें स्वयं भी, नहीं करेंगे पाप।।
नहीं करेंगे पाप, काश हम समझें इतना।
हमने बदला आज, रहा दिख खुद में कितना।।
कहें मित्र यमराज, सदा जीवन में पिसना।
अपने मन की यार, दिखा रहे हम जितना।।१३३

आशय जाने ही बिना, निर्णय लेना व्यर्थ।
इससे हो सकता बड़ा, समझो आप अनर्थ।।
समझो आप अनर्थ, बात बिन जाने बोले।
बिना डोर के कुँआ, भला कब पानी डोले।।
कहें मित्र यमराज, सुनो मम बात महाशय।
समय-समय पर गूढ़, बहुत होता है आशय।।१३४

आया है कैसा प्रलय, प्राणी हुए अधीर।
जाने मन में क्या धरे, आये हैं रघुवीर।।
आये हैं रघुवीर, धर्म का ध्वज फहराओ।
संकट का है दौर, ईश के शरण में जाओ।।
करें कृपा रघुवीर, छँटे तब विपदा साया।
प्रलय दिखाने आज, ईश खुद चलकर आया।।१३५

वर्षा रानी जब चली, लेकर मेघ बयार।
हर कोना धरती दिखे, लगता ज्यों त्योहार।।
लगता ज्यों त्योहार, तपन तन-मन के भागे।
नाचे मोर किसान, प्रकृति मुस्काकर जागे।।
कहें मित्र यमराज, सुनो अब राम कहानी।
जल ही जीवन मूल, गीत गा वर्षा रानी।।१३६

पानी टपके जब‌ गगन, जैसे मोती-हार।
सूखी नदियाँ भर चलीं, जागा जीवन-सार।।
जागा जीवन-सार, हरित धरती मुस्काई।
खेतों में उल्लास, स्वर्ण सी फसलें आई।।
कहें मित्र यमराज, आइए वर्षा रानी।
बूँद-बूँद से सींच, जगत को दो अब पानी।।१३७

छाई छटा के साथ, आया सावन द्वार।
मन हर्षाया देखकर, हरित धरा श्रृंगार।।
हरित धरा श्रृंगार, बरसती टप-टप बूँदें।
नाचें खुशी से मोर, भीगकर मेंढक कूदें।।
धन्यवाद प्रभु इंद्र, चले शीतल पुरवाई।
मिलता बड़ा सुकून, सुंदर छटा है छाई।।१३८

खोटी किस्मत दीन की , नयी नहीं है बात।
रोते गाते कट रहे, उनके भी दिन-रात।।
उनके भी दिन-रात, राम की माया कैसी।
देख रहे हम आप, कहें क्या क्षऐसी वैसी।।
कहें मित्र यमराज, मिले क्या उनको रोटी।
आये लेकर साथ, जन्म से किस्मत खोटी।।१३९

जाने कैसा हो गया, मानव का व्यवहार।
समझ नहीं अब आ रहा, कहाँ गया संस्कार।।
कहाँ गया संस्कार, बड़ी विचित्र है माया।
कलयुग का है दौर, उसी की दिखती काया।।
कहें मित्र यमराज, आप मत मेरी मानें।
बदले नहीं विचार, झूँठ है तुम भी जानें।।१४०

हमको सब हैं कह रहे, जलवा तेरा आज।
तेरा अब तक चल रहा, निष्कंटक है राज।।
निष्कंटक है राज, खूब हैं जलवे तेरे।
कोई नहीं करीब, आप सबसे प्रिय मेरे।।
कहें मित्र यमराज, कहो मत राजा इनको।
कहना हो तो आप, कहो बस राजा हमको।।१४१

जागे ज्योति साधना, भीतर बढ़े उजास।
करें समर्पण स्वयं का, मिट जाए सब त्रास।।
मिट जाए सब त्रास, आस्था दीप जलाना।
भावना हो निर्मल, तभी प्रभु दर्शन पाना।।
छिपा रहे जो पाप, सभी लग भागम-भागे।
मन की हो जो चाह, सफलता जीवन जागे।।१४२


जितने प्राणी जगत में, यहाँ सभी मेहमान।
फिर भी कहते गर्व है, क्या हम कोई दान।।
क्या हम कोई दान, हमें कोई ले लेगा।
बदले में आशीष, खूब केवल वो देगा।।
कहें मित्र यमराज, रंग दिखते हैं कितने।
कैसे मिटती भूख, नमूने सपने जितने।।१४३

होती अब वर्चस्व की, चर्चा चारों ओर।
जिधर देखिए उधर ही, पड़े सुनाई शोर।।
पड़े सुनाई शोर, सभी हैं दिखते ऐसे।
छोटी-छोटी बात, तने हैं तम्बू जैसे।
कहें मित्र यमराज, संभालो अपनी धोती।
लो हमसे गुरु ज्ञान, परीक्षा सबकी होती।।१४४

कलयुग के इस दौर में, हर रिश्ता बेकार।
नहीं जेब में दाम यदि, समझें सब लाचार।।
समझें सब लाचार, समय की मार देखिए।
चाहे जितना आज, लानतें आप भेजिए।।
कहें मित्र यमराज, गई सब चिड़िया अब चुग।
करो बैठ अब भजन, सीख देता है कलयुग।।१४५

इतना गंदा हो गया, अपना आज समाज।
दर्द झेलती बेटियाँ, बेशर्मों का राज।।
बेशर्मों का राज, तमाशा सभी देखते।
घोंट पी रहे चीख, तभी तो नहीं चेतते।।
कहें मित्र यमराज, गिरोगे अब तुम कितना।
सुता रही है पूछ, बता दो केवल इतना।।१४६

सतगुरु कृपा से हो गया, अपना जीवन धन्य।
वरना अब तक तो रहा, जैसे झाड़ी वन्य।।
जैसे झाड़ी वन्य, रहा बस आड़ा-तिरछा।
आते रहे विचार, करेगा कौन सुरक्षा।।
कहें मित्र यमराज, समय का बदला अब सुरु।
रखा शीश जब हाथ, आज मेरे श्री सतगुरु।।१४७

रखते जो खुद को सदा अपने आप प्रसन्न।
कहता है कब वह भला, मैं हूँ बड़ा विपन्न।।
मैं हूँ बड़ा विपन्न, सोच है पड़ती भारी।
करता कब है कौन, बताओ तुम तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, स्वाद खुशियों का चखते।
हर मुश्किल से आप, बचाए खुद को रखते।।१४८

हरियाली चहुँओर अब, शुरू हुई बरसात।
खेतों में जुटे किसान हैं, संग खुशी सौगात।।
संग खुशी सौगात, सभी आभारी ईश्वर।
गाते मन के गीत, बने हैं सभी कवीश्वर।।
कहें मित्र यमराज, यही होली दीवाली।
चहुँदिश में हो राज, सदा संचित हरियाली।।१४९

कितना कुछ हम तो कहें, रहा कौन सुन बात।
नाहक धमकाते फिरें, और मारते लात।।
और मारते लात, नहीं संयोग अपहरण।
ताना-बाना साथ, बहुत हैं इनके जन-गण।।
कहें मित्र यमराज, नहीं है तुमको मिटना।
इनसे रहिए दूर, करीबी चाहे जितना।।१५०

कलयुग में अब हो गया, आज अपहरण खेल।
अपने भी करने लगे, अब तो इससे मेल।।
अब तो इससे मेल, भला क्या हो सकता है।
इसके आगे आज, कहाँ रिश्ता टिकता है।।
बिल्कुल है बेकार, जियो कहना अब जुग-जुग।
समझाता यमराज, यही है असली कलयुग।।१५१

जलता आज जहान है, कैसी फैली आग।
होते इतने अपहरण, कौन सुनाए राग।
कौन सुनाए राग, लोभ लालच का चक्कर।
ले सकता है कौन, बताओ इनसे टक्कर।
कहें मित्र यमराज, इसी से अब डर लगता।
मजबूरी की आग, मनुज जब तब है जलता।।१५२

थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार।
कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।।
अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता।
पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।।
कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी।
रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१५३

तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार।
कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।।
भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए।
शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।।
कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको।
भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१५४

वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप।
इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।।
धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा।
नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा।
बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१५५

सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल।
जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।।
सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी।
लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।।
कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ।
वही बड़ा है आज, मानते चलता सतपथ।।१५६

अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव।
अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।।
सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला।
अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।।
कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना।
एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१५७

मिलती है पहचान अब, जो जितना शैतान।
आज भला इंसान की, कैसे हो पहचान।।
कैसे हो पहचान, सत्य कोई तो बोले।
वाले सब क्यों मौन, होंठ अपने तो खोले।।
कहें मित्र यमराज, सभ्यता रोज सिसकती।
करते जो नित पाप, पुण्य खुद आकर मिलती।।१५८

ईश्वर भी क्या जानते, इसीलिए तो मौन।
समझ रहे हम आप भी, कहने को है कौन।।
कहने को है कौन, छिपा है मन क्या किसके।
अब तक रहा अबूझ, कहें क्या पीछे इसके।।
कहें मित्र यमराज, भले सब कुछ है नश्वर।
पर दिखते लाचार, कहें हम जिनको ईश्वर।।१५९

सड़कें जल से हैं भरी, रुके नहीं जल धार।
छतरी वाला क्या करे, करता यही विचार।।
करता यही विचार, नहीं ईश्वर की माया।
लालच की है मार, भोगती मानव काया।।
कहें मित्र यमराज, बिजलियाँ अब भी कड़कें।
हम सब हैं लाचार, जलाजल गलियाँ सड़कें।।१६०

जितने भी पाखंड हैं, करते हैं ये लोग।
धर्म आड़ में सभी, फैलाते नित रोग।।
फैलाते नित रोग, एक अभियान चलायें।
बेशर्मी का राग, पकड़ जाने पर गाएँ।।
कहें मित्र यमराज, नहीं हम मूरख इतने।
झूठ और पाखंड, वार तुम चाहे जितने।।१६१

विधि का अजब विधान है, नयी नहीं ये बात।
कुछ को मिलता दुख तो, किसी को सुख सौगात।।
किसी को सुख सौगात, चक्र जीवन का चलता।
मगर यहाँ पर दाल, भला खुद किसका गलता।।
कहें मित्र यमराज, राज हम जानें किसका।
अजब-गजब विधान, यहाँ है केवल विधि का।।१६२

धरती पर नित बढ़ रहा, अब पापों का भार।
करना हमें विचार अब, क्या ये जीवन सार।।
क्या ये जीवन सार, सभी को हो बेचैनी।
मगर सभी हैं मस्त, बैठकर खाते खैनी।।
कहें मित्र यमराज, बने ये जीवन परती।
पूछे हमसे आज, बिलखकर अपनी धरती।।१६३

थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार।
कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।।
अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता।
पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।।
कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी।
रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१६४

तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार।
कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।।
भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए।
शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।।
कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको।
भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१६५

वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप।
इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।।
धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा।
नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा।
बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१६६

सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल।
जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।।
सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी।
लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।।
कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ।
वही बड़ा है आज, कहें जो चलना सतपथ।।१६७

अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव।
अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।।
सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला।
अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।।
कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना।
एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१६८

दिखते नित जग में नये, मित्र नमूने आज।
बात सत्य जो ना कहे, सत्याग्रह पहचान।।
सत्याग्रह पहचान, खेल बड़ा जो खेले।
छोटी सी जो बात, करें वो बड़े झमेले।।
कहें मित्र यमराज, झूठ जो सबको कहते।
हरिश्चंद्र औलाद, जगत में वो ही दिखते।।१६९

आया है जो द्वार पर, उसका हो सत्कार।
होना सबका चाहिए, हम सबका संस्कार।।
हम सबका संस्कार, मगर अब मरता जाता।
पैसा ही आधार, आज हर जन का नाता।।
कहें मित्र यमराज, देख सत्कारी माया।
नहीं है रिश्तेदार, द्वार जो मेरे आया।।११७०

ईश्वर रुप में द्वार पर, करो अतिथि सत्कार।
चलता आया देश में, सदियों का संस्कार।।
सदियों का संस्कार, नहीं तुम इसे मिटाना।
पुरखों का आधार, भूल मत आगे जाना।।
कहें मित्र यमराज, जगत में सब कुछ नश्वर।
जान रहे हम आप, अतिथि बन आते ईश्वर।।१७१

कहते वेद पुराण भी, प्रणव ब्रह्म का ‌ सार।
उत्पत्ति से सृष्टि के, ध्वनि गूँजी साकार।।
ध्वनि गूँजी साकार, चले जग जीवन धारा।
देव दनुज ऋषिगण साथ, शब्द सबको है प्यारा।। कहें मित्र यमराज, ध्यान नित मन जो जपते। प्रणव जगत आधार, मनुज हैं पल-छिन कहते।।१७२

समझेंगे कब लोग ये, बात कही सौ बार।
सहना है अन्याय भी, खुद पर अत्याचार।।
खुद पर अत्याचार, साधकर चुप्पी बैठे।
वो खुद ही जंजीर, बाँधकर रहते ऐंठे।।
मौन तोड़कर लोग, न्याय सारथी बनेंगे।
कहें मित्र यमराज, लोग कब खुद समझेंगे।।१७३

मिलता बिन मेहनत नहीं, खाली सपने चार।
समझेंगे कब लोग ये, जीवन का जो सार।।
जीवन का जो सार, राह जो भी हो देख।
कर्म करो दिन-रात, भाग्य भी तब ही लेखे।
जिसको होता ज्ञान, वही श्रम का फल गिनता।
वरना सब बेकार, मुफ्त क्या किसको मिलता।।१७४

सत्ता के हथियार का, दुरुपयोग पुरजोर।
चाहे जितना लें मचा, आप सभी नित शोर।।
आप सभी नित शोर, पीर सुनता कब कोई।
यही बनी है रीति, कहें क्या किस्सागोई।।
कहें मित्र यमराज, खोलिए अपना पत्ता।
बदलें अब कानून, मिले जन-मन को सत्ता।।१७५

मामा-माँ में खून का, रिश्ता सदा अटूट।
झगड़ा झंझट प्यार की, आपस में है छूट।।
आपस में है छूट, सभी के मामा प्यारे।
जाते जब हम रूठ, प्रेम से वही दुलारें।।
कहें मित्र यमराज, श्रेष्ठ रिश्तों का नामा।
रिश्तों का संसार, जगत में माँ अरु मामा।।१७६

दूजा माँ के रुप को मामा कहते लोग।
संग हमेशा हों खड़े, सुख-दुख हर संयोग।।
सुख-दुख हर संयोग, करें ना कभी शिकायत।
मुस्काते हैं खूब, देखकर आप शरारत।।
कहें मित्र यमराज, भरोसा जाता पूजा।
मामा होते साथ, नहीं दिखता जब दूजा।।१७७

धीरे-धीरे घट रहा, अब आपस में प्यार।
रिश्तों का अस्तित्व ही, लगता है बेकार।।
लगता है बेकार, बढ़े नित कुंठा भारी।
मसला है गंभीर, आज की जो बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, कलेजा जन-मन चीरे।
भले कह रहे आप, जहर ये चढ़ता धीरे।।१७८

सबके वश का है नहीं, राजनीति का खेल।
सबसे मुश्किल है यही, रखना इससे मेल।।
रखना इससे मेल, बनाकर दूरी रखिए।
बैठे रहकर दूर, स्वाद इसका भी चखिए।।
कहें मित्र यमराज, सगे हैं सारे तबके।
उम्मीदों की डोर, हाथ में आते सबके।।१७९

झूठे सपने देखते, जस शहरों में मोर।
आसमान में देखते , हरियाली हर ओर।।
हरियाली हर ओर, ख्वाब यह पाले रहिए।
पकड़ पकड़ कर लोग, सभी से कहते चलिए।।
कहें मित्र यमराज, कर्म उन सबके फूटे।
बड़े गर्व से आप, हमेशा देखें झूठे।।१८०

करते रहिए मित्रवर, चुगली सुबहो-शाम।
इससे अच्छा कुछ नहीं, और जगत में काम।।
और जगत में काम, खूब होगी तब चर्चा।
हर प्राणी ही रोज, आपका खोले पर्चा।।
कहें मित्र यमराज, लीक पर अपने चलते।
निश्चित होता नाम, नित्य ऐसा जो करते।।१८१

अच्छा होगा कीजिए, मौन साधकर काम।
चुगली से बढ़ता नहीं, कभी किसी का नाम।।
कभी किसी का नाम, भले हम करें प्रशंसा।
मान लीजिए आप, करेंगे कल ये हिंसा।।
कहें मित्र यमराज, देख फूलों का गुच्छा।
होता नहीं है यार, समय सबका ही अच्छा।।११८२

करते हम सब लोग ही, इतने सारे काम।
जिसको मिलता है नहीं, जीवन में आयाम।।
जीवन में आयाम, समस्या इतनी भारी।
लगती नहीं लगाम, रहे दे खुद को गारी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं हम इससे डरते।
मनमानी हम रोज, भला हम क्यों है करते।।१८३

सारे बाहर बैठकर, कहते हैं हड़ताल।
वादे जितने थे किए, कभी न पूछा हाल।।
कभी न पूछा हाल, हमारी भी मजबूरी।
नहीं समझते आप, बनाकर रखते दूरी।।
कहें मित्र यमराज, आज अब देखो तारे।
कफन शीश पर आज, बाँध हम बैठे सारे।।१८४

ज्ञानी बनकर घूमते, आज जगत में लोग।
और मिटाते नित्य हैं, हुआ नहीं जो रोग।।
हुआ नहीं जो रोग, चमकता इनका धंधा।
देखो मानव राज, बना है खुद से अंधा।।
कहें मित्र यमराज, सभी बनते हैं ध्यानी।
लूटें इनको आज, भेंट करते जब ज्ञानी।। १८५

करना मत तकरार अब, मुझ पर भूत सवार।
केवल नेक सलाह दो, कैसे हो उपचार।।
कैसे हो उपचार, किए जो गुंडागर्दी।
हिंसा अरु पथराव, चुनौती दे दी वर्दी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं इन सबसे डरना।
अब तो ठोस इलाज, सभी का जमकर करना।। १८६

नाहक ही सहना पड़े, उनको अत्याचार।
जो निर्धन असहाय हैं, और संग लाचार।।
और संग लाचार, मान ईश्वर की इच्छा।
देते रहते रोज, बिचारे कठिन परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, सुनो जगती के दायक।
हुए धरा पर भार, नहीं हम कहते नाहक।।१८७

ऐसा ही अब वक्त है, सह लो अत्याचार।
रोना धोना व्यर्थ है, नहीं सुने सरकार।।
नहीं सुने सरकार, भले तुम कितना सीखो।
अच्छा होगा आज, मौन रहकर ही चीखो।।
कहें मित्र यमराज, बोलता केवल पैसा।
इसमें क्या है झूठ, सभी को दिखता ऐसा।।१८८

ऐसा क्यों अब हो रहा, भटक रहा इंसान।
फिर भी करता गर्व से, कुंठा में प्रतिदान।।
कुंठा में प्रतिदान, बढ़ी जाये बीमारी।
नहीं समझते लोग, भूलते जिम्मेदारी।।
बनते हम क्यों आज, देखकर दूजा जैसा।
क्या है इसका लाभ, सभी बनते जो ऐसा।।१८९

कलयुग का अब आज है, नहीं खोइए होश।
इतना भी बनिए नहीं, आप सभी खरगोश।।
आप सभी खरगोश, बचाओ अपनी इज़्ज़त।
भूले शिष्टाचार, करो बिल्कुल मत हुज्जत।।
कहें मित्र यमराज, मुफ्त का सब कुछ लो चुग।
और करो तारीफ, बड़ा अच्छा है कलयुग।।१९०

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा

शुभकर्मों से आपके, महक बहे हर ओर।
एक नाम की जगत में, चहुँदिश चर्चा शोर।।

तन-मन गीला हो गया, रोई आँखें आज।
समझ नहीं है आ रहा, उसके मन का राज।।

नट-बोल्ट ढीला हुआ, फीकी है मुस्कान।
बाजी उल्टी पड़ गई, फिर झूठा अभिमान।।

जीवन भी इक जंग है, भूल रहे क्यों आप।
लग जाएगा क्या भला, मुफ्त आप को पाप।।

दो मित्रों के बीच में, छिड़ी है कैसी जंग।
मुश्किल क्या अब समझना, दिखा स्वार्थी रंग।।

रिश्तों में अब जंग का, आया कैसा दौर।
यही देखना था बचा, नहीं शेष कुछ और।।

हर दिन नव उत्साह हो, संग प्यार का रंग।
बिना लड़े ही जीत लें, आने वाली जंग।।

क्यों इतना विष पी लिया, और हुए निर्द्वंद्व।
फिर क्यों इतना कर रहे, नाहक में छलछंद।।

मीठी वाणी मुख रखें, हृदय गरल का कुंभ।
इनसे तो अच्छे लगें, राक्षस शुंभ-निशुंभ।।

संत वचन है शहद सा, कुटिल वचन जस गरल।
संगति कीजै सोच कर, जीवन आप सफल।।

जगत भाव कल्याण के, किया हलाहल पान।
तब शिव शंकर को मिला, नीलकंठ का नाम।।

कालकूट भीतर भरा, वाणी शहद मिठास।
सावधान रहना सभी, भूल भाल सब आस।।

लोभ मोह को मानिए, बिल्कुल जहर समान।
खोले रखना मित्रवर, अपने आँख व कान।।

मित्र वही है आपका, करे नहीं जो भेद।
बीच भँवर जब नाव हो, नहीं करे वो छेद।।

अगर किया है मित्रता, तो फिर रखिए मान।
ऐसा कुछ मत कीजिए, कल को हो अपमान।।

जो भी मन का मीत है, सब कुछ लेता जान।
मित्र राह किस जा रहा, रखता है संज्ञान।।

कभी मित्र के साथ में, करना मत मनभेद।
गलती उसकी हो भले, आप जताओ खेद।।

तर्क और सिद्धांत का, है विशाल महत्व।
जैसे धरती आकाश का, समझो आप घनत्व।।

नेताओं के तर्क का, होता है उपहास।
होता उनका सामने, अपना दल ही खास।।

सत्य-झूठ कुछ भी नहीं, केवल मेरा तर्क।
नहीं मानते हो अगर, पियो विषैला अर्क।।

काम नहीं आती दवा, जब तक दिल में दर्द।
मिलता हमें सुकून तब, हृदय हमारा सर्द।।

दर्द पुराना है बहुत, दवा न आए काम।
बोध नहीं सुकून का, रहे दूर आराम।।

बच्चे नहीं चला रहे, अब कागज की नाव।
क्योंकि अब मिलता कहाँ, पहले वाला गाँव।।

अपने भारत देश का, है विचित्र ही रंग।
राजनीति की देखकर, होते रहिए दंग।।

बिन चिंतन के जो करे, अपने सारे काम।
होना पड़ता है उसे, एक रोज बदनाम।।

झटके पर झटका मिले, फिर भी रहा न चेत।
इसीलिए तो बिक गया, तेरा सारा खेत।।

सभी तरक्की चाहते, बिना किए कुछ काम।
और संग में भावना, ऊँचा हो मम नाम।।

पहले खुद का कीजिए, अपना आज सुधार।
फिर दूजा को बाँटिए, ज्ञान बात व्यवहार।।

दुनिया का जो आचरण, लगता हैं क्यों भार।
पहले थोड़ा तो करो, अपना आज सुधार।।

अपना आज सुधारिए, फिर बनना तुम संत।
अभी आपका दिख रहा, अंदर बाहर दंत।।

पहले जीना सीख लो, वर्तमान में मित्र।
अपना आज सुधारकर, दूजा देखो चित्र।।

अपना आज सुधारते, वही सफल हैं लोग।
कल आता है कब भला, पड़े भोगना भोग।।

अपना आज सुधार लो, तुम अपना सुर-ताल।
अच्छा होता है नहीं, व्यर्थ बजाना गाल।।

चिढ़ा रहा वार्धक्य है, पर मन अभी जवान।
अनुभव का दीपक जले, है दूरस्थ पयान।।

मन भावन सावन लगे, रिमझिम पड़े फुहार।
शिव-शंकर को पूजता, है सारा संसार।।

काँवड़िए जल भर चले, भोले के दरबार।
मनभावन सावन कहे, कर लो जय जयकार।।

मन के मधुरिम राग से, गूंजित हो झंकार।
ईश कृपा इतनी रहे, हो नूतन विस्तार।।

वाणी तो तलवार से, करती दो-दो हाथ।
इनका आपस में कभी, काश नहीं हो साथ।।

बोली की गोली सदा, देती गहरा घाव।
सोच समझ कर बोलना, देता मित्र सुझाव।।

गोली से डरते नहीं, अपने वीर जवान।
हर दुश्मन के सामने, जाते सीना तान।।

जीवन के आधार का, सदा करो सम्मान।
नाहक ही बनिए नहीं, आप सभी नादान।।

मातु-पिता के साथ ही, गुरुवर का स्थान।
जीवन के आधार में, इनका मिश्रित ज्ञान।।

जीवन के आधार को, भूल रहे हैं लोग।
जिसके प्रतिफल में मिले, रोग शोक दुख भोग।।

सबके अपने कर्म का, दिख जाता है सार।
चल जाता जग को पता, जीवन का आधार।।

करना है यदि याचना, तो प्रभु सबसे श्रेष्ठ।
उसके आगे कौन है, जिसको मानें ज्येष्ठ।।

करो नहीं अब याचना, बनो नहीं लाचार।
बाँध कफन आगे बढ़ो, और करो प्रतिकार।।

याचक की अब याचना, तोड़ रही दम रोज।
आखिर अब कैसे करें, नई राह की खोज।।

आज याचना रंग भी, बदल रहा है खोल।
धमकी देकर प्रार्थना, अरु जहरीले बोल।।

काम आप ऐसा करो, फैले मन उल्लास।
और नहीं दूजा करे, कैसे भी परिहास।।

मन से सभी निकालिए, जितना भरा विषाद।
प्रेम भाव निस्वार्थ हो, जस श्रीराम निषाद।।

ग़म खाता जो मगन हो, वो है ईश समान।
ऐसे जन से लीजिए, जीवन का गुरु ज्ञान।।

पीता है जो जहर भी, लगा ईश को भोग।
मृत्यु भागती दूर है, बिना किसी संयोग।।

ईश्वर ने चाहा नहीं, पूरी हुई न चाह।
फिर भी मन मेरे भरा, अटल अमिट उत्साह।।

पूरी हुई न चाह तो, रो मत मेरे यार।
कोशिश करते ही रहो, किए बिना तकरार।।

मन से रखना दूर है, पूरी हुई न चाह।
उम्मीदें मत छोड़ना, ईश्वर देगा राह।।

छोड़ निराशा तुम बढ़ो, सदा सत्य की राह।
भले नहीं पूरी हुई, जिंदा रखना चाह।।

पूरी हुई न चाह का, व्यर्थ छेड़ तू राग।
हार मान मत बैठना, कल सोना अब जाग।।

गुरुवर अब सुन लीजिए, मेरी करुण पुकार।
या फिर हमको दीजिए, आप हमें दुत्कार।।

आज कौन सुनता भला, निर्बल करुण पुकार।
चाहे जितना रात-दिन, भले करें चीत्कार।।

शब्द करुण संवेदना, हमें कराता बोध।
ऐसा कुछ इसमें नहीं, जो करते सब शोध।।

सभी आज बीमार हैं, क्या कोई संयोग।
या फिर कोई कर रहा, नाहक नया प्रयोग।।

तरस रहे दीदार को, जिनकी खातिर लोग।
जो करते निज समय का, अर्थ लाभ उपयोग।।

सहज भाव रहिए सदा, बिना किसी संताप।
सबके हित की कामना, सुखदा माला जाप।।

हर प्राणी यदि हो सरल, जगत बने खुशहाल।
आपस में होवै नहीं, नाहक व्यर्थ बवाल।।

रखता अपने आप को, जो भी सदा सुबोध।
उसके जीवन में नहीं, आता है अवरोध।।

जो भी बोले आजकल, साफ और स्पष्ट।
उसे उठाना ही पड़े, कदम-कदम पर कष्ट।।

प्रांजल दिवस विशेष है, रखिए इसका ध्यान।
जीवन साथी का करो, सदा आप सम्मान।।

नहीं छोड़िए हौसला, हर मुश्किल आसान।
मगर आप करना नहीं, इक पल भी अभिमान।।

चाहे जैसा घोंसला, अपना लगता खास।
टूटा-फूटा हो मगर, करता नहीं उदास।।

शिव शंकर को पूजिए, रख मन में विश्वास।
औघड़दानी नाथ हैं, पूरी करेंगे आस।।

देवाधिदेव महादेव जी, कालों के हैं काल।
भक्तों पर करते कृपा, पापी होत निढाल।।

गंगा जी हैं बह रहीं, उलझ जटा शिव शीश।
नीलकंठ मदमस्त हैं, बने हुए अवनीश।।

किसकी होती जीत है, किसकी होती हार।
करना कौन विचार है, बिना समझ के सार।।

हार जीत के चक्र में, उलझ रहे क्यों लोग।
ईश्वर की होती कृपा, बने सुखद संयोग।।

चुना आपने स्वयं ही, तब कैसी तकरार।
नाहक ही हो पूछते, कैसी है सरकार।।

सोचो समझो आप ही, कैसी हो सरकार।
जनता हित के साथ ही, करें राष्ट्र से प्यार।।

हम सबको है सोचना, कैसी हो सरकार।
सोचे बस जो देश की, नहीं सिर्फ परिवार।।

वोट डालते समय क्या, सोचा था इक बार।
फिर रोना क्यों रो रहे, कैसी हो सरकार।।

अपने हित को देखकर, सबकी बिछे बिसात।
नीति नियम सिद्धांत को, छोड़ करें सब घात।।

कावड यात्रा में दिखे, छाया भगवा रंग।
भक्ति भावना है प्रवल, भोले बाबा संग।।

शिव मंदिर में भीड़ का, दिखता है उत्साह।
कावड़ यात्री कर रहे, सुविधा खूब सराह।।

श्रद्धा अरु विश्वास का, बहती दिखे बयार।
कावंड़ियों को देखकर, समझ रहा था सार।।

सुबह-साँझ की साधना, कर देती मन धीर।
जीवन पथ होता सुगम, मिटती प्राणी पीर।।

सूरज होता अस्त जब, नित्य साँझ के साथ।
कल के नूतन आस का, पकड़ाता है हाथ।।

प्रेम जगत का सार है, जान रहे हैं लोग।
फिर क्यों इसकी आड़ में, फैलाते हैं रोग।।

जन-मन के कल्याण का, प्रेम जगत का सार।
श्रद्धा करुणा विश्वास, सर्वश्रेष्ठ आधार।।

हर प्राणी को चाहिए, करें नहीं अभिमान।
प्रेम जगत का सार है, ज्ञानी देते ज्ञान।।

सतपथ पर चलिए मगर, इतना रखिए ध्यान।
विष हिस्से में आपके, मुफ्त लीजिए ज्ञान।।

चाहे जितना कीजिए, अमृत पान ही रोज।
धर्म कर्म के मार्ग तू, सबसे पहले खोज।।

कुदरत के संकेत का, करो नहीं उपहास।
वरना होगे मित्र कल, निश्चित आप उदास।।

कुदरत का संकेत है, रहिए आप सतर्क।
जल्दी ही आ जाएगा, आँख सामने फर्क।।

धरती के भगवान को, कुदरत का संकेत।
आने वाला समय है, जाना तुमको खेत।।

कुदरत के संकेत का, हमें समझना सार।
सबसे उत्तम आज का, यही श्रेष्ठ आधार।।

आजादी के गीत हम, गाते खूब हैं आज।
नहीं और कुछ रह गया, करें इसी पर नाज।।

आजादी के गीत को, देश रखेगा याद।
ऐसा होता ही रहे, बिना किसी उन्माद।।

करते उनको याद हम, बलिदानी जो वीर।
भारत माँ की गोद में, मौन हुए रणधीर।।

करिए उनको याद सब, दिये देश को मान।
आजादी के रंग से, रचा भारती गान।।

करते उनको याद जब, भीग रहे हैं नैन।
दे आजादी जो गये, भूले कब दिन रैन।।

श्रद्धा के दो पुष्प से, करिए उनको याद।
आज हमें दिखते नहीं, आजादी के बाद।।

करते उनको याद तो, क्या करते अहसान।
जो भी ऐसा कर रहे, वे करते अभिमान।।

अब प्रतीत होने लगा, वो रचता षड्यंत्र।
अपने पद की आड़ में, करता है कुछ तंत्र।।

उसको कहाँ प्रतीत हो, करता कैसी भूल।
पद प्रतिष्ठा मान सब, मिला रहा है धूल।।

जैसा उसका नाम है, वैसे करता काम।
बदनामी से चाहता, ऊँचा हो मम नाम।।

ग़म खाता जो आज है, सब कहते बेवकूफ।
कहाँ किसी को है पता, ईश्वर में मशरूफ।।

पीता है जो नित्य ही, उसके तर्क विचित्र।
कहता यही तो आज, सबसे प्यारा मित्र।।
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भूली बिसरी बात
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भूली बिसरी बात भी, मन को देती चैन।
आती है जब याद तो, भीगें प्राणी नैन।।

नाहक करते याद क्यों,भूली बिसरी बात।
पहुँचाते जब आपको, आए दिन आघात।।

भूली बिसरी बात का, अपना अलग महत्व।
नहीं समझ सकते सभी, इसमें है जो तत्व।।

भूली बिसरी बात पर, होना नहीं अधीर।
जीवन के हर दौर में, बन रहिए रणधीर।।

भूली बिसरी बात से, रह सकते हो दूर।
खुद पर अंकुश आपको, नहीं बनो मजबूर।।
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राखी
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राखी बंधन प्रेम का, भ्रात-बहन का मान।
पावन ये रिश्ता बड़ा, कहता जगत महान॥

राखी धागा संग में, बरसे प्यार दुलार।
भाई रक्षा वचन दे, समझाए अधिकार॥

रिमझिम बारिश बीच में, आया राखी पर्व।
कच्चे धागों में बँधा, भाई-बहना गर्व॥

राखी धागे में बँधा, रिश्ता बड़ा अटूट।
चाहे जितनी दूरियाँ, बंधन कभी न छूट॥

राखी बाँधे हाथ में, भर आँखों नूर।
देती ढेरों वो दुआ, हर बाधा हो दूर।।

राखी धागों में बँधा, भाई-बहन का प्यार।
बिन भाई या बिन बहन, सून लगे संसार।।
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सैनिक
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सीमा पर सैनिक खड़ा, अरि को दे ललकार।
दुश्मन से प्रतिशोध का, उत्तर दे खूँखार॥

अरि की गोली से गिरा, अपना सैनिक वीर।
साथीगण प्रतिशोध में, होते सदा अधीर॥

देकर अपने प्राण भी, सैनिक रखते मान।
अरि का काटे शीश वो, ले प्रतिशोध सुजान॥

अरि आँखों में झाँककर, सैनिक करता वार।
पूरा कर प्रतिशोध वो, करता जय-जयकार।।
********
बहन
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बड़ी बहन है मातु सम, अनुजा सुता समान।
भ्राताओं की जान हैं, रखती बहुधा ध्यान।।

बहन बड़ी बरगद सदृश, देती शीतल छाँव।
भाई का दुख ओढ़ ले, देती संबल ठाँव।।

झगड़े रुठे प्यार दे, करे शिकायत खूब।
बहन बिना आँगन गया, सूनेपन में डूब।।

बहन हमारी लाड़ली, वो है मेरी जान।
जिस पर करता मैं सदा, गर्व भरा अभिमान।।

माँ सी ममता दे सदा, बेटा सम करती प्यार।
करें शरारत हम कभी, देती भूत उतार।।
*******
सावन
*******
सावन में अभिषेक का, अपना बड़ा महत्व।
इसके पीछे शिव छिपा, स्वयं गूढ़तम तत्व।।

अज्ञानी हम सब बड़े, भले न समझें सार।
शिव जी के अभिषेक से, मिले जगत उपहार।।

रिमझिम बारिश बीच में, शिव पूजन की भीड़।
हर जन-मन है चाहता, मिट जाए हर पीड़।।

शिव मंदिर में भीड़ है, आया सावन मास।
भक्तों में उत्साह का, दृश्य बहुत है खास।।

सावन में शिव पूजना, सबका नहीं नसीब।
जिन पर भोले की कृपा, रहता कहाँ गरीब।।

सावन की बरसात है, खेतों को वरदान।
कृषकों की उम्मीद को, ईश्वर का अवदान॥

बहनों में उत्साह है, आया सावन मास।
राखी का त्योहार भी, इसे बनाए खास॥
*********
जिसकी जैसी सोच है
*********
जिसकी जैसी सोच है, वैसे उसके काम।
कुछ को चिंता काम की, कुछ होना बदनाम।।

जिसकी जैसी सोच है, वैसा दिखे चरित्र।
इसीलिए यमराज क्या, मेरे अच्छे मित्र।।

कहते हैं यमराज जी, जिसकी जैसी सोच।
पर मुश्किल है जानना, किसमें कितना लोच।।

जिसकी जैसी सोच है, वैसे उसका कर्म।
मजबूरी में ही सही, भूल रहे निज धर्म।।

जिसकी जैसी सोच है, वैसा लिखे कवित्त।
कुछ का बढ़ता भाव है, कुछ हो जाते चित्त।।
*********
तुमसे बढ़कर कौन
**************
तुमसे बढ़कर कौन है, क्या बतलाऊँ यार।
करना मुझको है नहीं, नाहक ही तकरार।।

नाहक ही हो पूछते, तुमसे बढ़कर कौन।
मानो प्यारे बात तुम, हो जाओ बस मौन।।

तुमसे बढ़कर कौन है, करिए आप विचार।
पर पहले यह जान लो, छोटा है संसार।।

सच सुनना हो चाहते, तुमसे बढ़कर कौन।
अच्छा लगना है नहीं, इसीलिए तो मौन।।

तुमसे बढ़कर कौन है, इसमें कैसा रार।
मम गुरुवर सबसे बड़े, करते हमसे प्यार।।

अगर चाह लें हम सभी, उन्नति करे समाज।
तब ही सबके शीश, सुख-सुविधा का ताज।।

समझ रहे हैं हम सभी, कैसा हुआ समाज।
सभी चाहते आज हैं, निज स्वारथ का राज।।

कभी-कभी प्यादे बड़े, कर देते हैं काम।
जिससे मिल जाता हमें, नाहक ही सम्मान।।

वादा करना बाद में, पहले करो विचार।
पूरा करना आपका, भला कहाँ संस्कार।।
*******
भेदभाव से दूर
********
कितना हम सब हो गए, भेदभाव से दूर।
जान रहे हैं ये सभी, करो नहीं मजबूर।।

भेदभाव से हम भला, रह सकते क्या दूर।
राजनीति के खेल का, यही चमकता नूर।।

भेदभाव से दूरियाँ, रखने का क्या काम।
वैसे भी क्या लाभ हैं, सिर्फ हुए बदनाम।।

भेदभाव से दूर का, मंत्र पढ़ें जो लोग।
सबसे ज्यादा हैं वही, फैलाते जो रोग।।

कोशिश तो होती रही, भेदभाव हो दूर।
पर वोटों की आड़ में, कुर्सी रहती घूर।।
********
उलझन सबकी एक है
********
उलझन सबकी एक है, जिम्मेदारी का भार।
नहीं आय के स्रोत बिन, फँसी नाव मझधार।।

हम सबको ही है पता, उलझन सबकी एक।
अलग बात यह और है, तर्क वितर्क अनेक।।

उलझन सबकी एक है, मरते नित आधार।
स्वार्थ लोभ के फेर में, भूल रहे संस्कार।।

उलझन किसको आज है, रिश्ते खोते धार।
कितने विचलित हो रहे, खोकर प्यार दुलार।।

उलझन सबकी एक है, कहने को तो आज।
पर हर कोई चाहता, बने हमारा काज।।

लंबी इतना क्यों भला, अगर आप आजाद।
इसका मतलब यह नहीं, करो देश बरबाद।।

केवल इतना कह रहा, मानो मेरी बात।
माना तुम आजाद हो, फिर क्यों करते घात।।

सुधीर श्रीवास्तव

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परंपराओं की संवाहक मातृशक्तियाँ

भारतीय परंपरा और संस्कारों की प्रतीकता,
जिसकी संवाहक बनती हमारी मातृशक्तियाँ।
यह हमारा आपका सौभाग्य है
कि हमारे अपने जीवन में हमसे ज्यादा
मातृशक्तियों का योगदान है।
जो सदियों से निभाती आ रही
रीति रिवाजों और परंपराओं को सजाती हैं,
संस्कारों को सँवारने के साथ
हम सबके लिए, परिवार, समाज के लिए
त्याग की पराकाष्ठा की हद तक।
तीज, त्योहार, व्रत, पूजा-पाठ आदि-आदि से
और हमें जोड़कर रखती हैं
अपनी संस्कृति, संस्कार, परंपराओं और प्रकृति से
और बचाती हैं हमें तमाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मुश्किलों से।
इसीलिए हम उन्हें लक्ष्मी स्वरूपा मानते हैं
उनको मान सम्मान देते और उन पर गर्व करते हैं,
उनके साथ अपने हर रिश्ते को मान देते हैं,
समय, रीति और परंपराओं के अनुसार
उनके चरणों में नत्मस्तक भी होते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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जयकरी छंद
माँ की ममता
*********
माँ की ममता बड़ी अपार।
मान रहे हम सब आधार।।
कौन हुआ इससे उद्धार।
करते रहिए माँ से प्यार।।

प्राणी जीवन का ये सार।
इनसे मिलता प्यार दुलार।।
माँ का खोता है सम्मान।
लोग बने मूरख अंजान।।

माता झेल रही है दंश।
पीछे इसके अपना अंश।।
माँ को होता भीषण दर्द।
पता चले कब चुभती सर्द।।

माँ का ये कैसा दुर्भाग्य।
अपने करते उसका त्याग्य।।
ये कैसा हम करते पाप।
नाहक है सब पूजा जाप।।

अब अपने में करो सुधार।
वरना निश्चित है बँटाधार।।
माँ की ममता नहीं उधार।
करते रहिए माँ को प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - माता
**********
हम सबकी है जीवन दाता।
कहें आप हम जिसको माता।।
पालन पोषण भी वो करती।
ममता आँचल अपना धरती।।

रातों दिन वो खटती रहती।
फिर भी कभी कहाँ वो थकती।।
ईश्वर की अनमोल धरोहर।
होती कब वो भला सहोदर।।

आज समय का खेल निराला।
हम सबका होता मुँह काला।।
नित माँ का अपमान करें हम।
जिसका हमको ना कोई ग़म।।

माँ का फटता आज कलेजा।
तड़प रहा है उसका भेजा।।
हम सब माँ को रुला रहे हैं।
पाप शीश निज चढ़ा रहे हैं।।

माँ की आहें भले मौन हैं।
हम भूलें वो भला कौन हैं।।
आखिर इसका दंड भी पाते।
अपने बच्चे मारें लातें ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - चिट्ठी

खुशियों का संदेशा लाती।
घर में जब भी चिट्ठी आती।
आँगन में सब दौड़े आते।
हाथों-हाथ खबर हैं पाते।।

स्याही से सब मन की बातें।
कागज पर सब पीड़ा गातें।।
दूर बसे प्रियजन की माया।
शब्दों में अपनापन छाया।।

द्वार डाकिया जब भी आता।
कोई हँसता कोई रोता।।
चिट्ठी की अपनी ही वाणी।
समझें सब अपने ही प्राणी।।

मोबाइल का युग अब आया।
चिट्ठी का है मान घटाया।।
हाथ लिखी जो प्रीत पुरानी।
वो डिजिटल से है अनजानी।।

भाव आज चिट्ठी का खोया।
नव पीढ़ी पूछे क्या गोया।।
चिट्ठी की है अजब कहानी।
कहती हमसे दादी नानी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीवन की किताब
--------------
जीवन एक किताब है
जिसमें होते हैं जीवन के
विविध रंग बिरंगे अध्याय,
जिसे हमको मन-बेमन से पढ़ना ही पड़ता है।
कभी हँसना, तो कभी रोना
खुशियों में नहाकर नाचते गाते हैं
तो वेदना को अपने आँसुओँ से सीँचना भी पड़ता है,
सब कुछ हमारे अनुरूप नहीं होता
कुछ सुंदर, तो कुछ कुरुप भी होता है।
कुछ प्रत्याशित तो कुछ अप्रत्याशित होता,
चाहें या न चाहें, हमें हर अध्याय पढ़ना पड़ता है,
इसे हम भले ही बेबसी कहें
पर जीवन की किताब हमें ही नहीं
हर किसी को पढ़ना पड़ता है,
परीक्षा देना पड़ता है।
कभी पास तो कभी फेल भी होना पड़ता है
बस जीवन की किताब का क्रय भर नहीं करना पड़ता है
तो किसी को देकर हाथ नहीं झाड़ सकते
न किसी को बेंच सकते हैं
और न ही कहीं फेंककर मुक्त हो सकते हैं।
यह जीवन की किताब है जनाब
इसे नदी नाले सागर में फाड़कर फेंक नहीं सकते
जलाकर अस्तित्व हीन भी नहीं कर सकते,
उसके एक भी शब्द को नजरंदाज नहीं कर सकते,
सिर्फ और सिर्फ पढ़ सकते हैं,
और जैसा चाहें, हँसकर या रोकर जी सकते हैं।

सुधीर श्रीवास्तब

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